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	<title>मीडिया &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/मीडिया/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "मीडिया"</description>
	<pubDate>Sun, 20 Jul 2008 10:52:47 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[मौसम का मिजाज...]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/?p=206</link>
<pubDate>Mon, 31 Mar 2008 12:39:21 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[टी वी पर समाचार देख/सुन रहे थे कल। समाच]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>टी वी पर समाचार देख/सुन रहे थे कल। समाचार वाचक सुन्दरी ने मौसम का हाल बताते हुए , मुस्कुराते हुए अंग्रेजी में जो कहा उसका आशय कुछ ऐसा था "दिल्ली और उत्तरप्रदेश के लोग राहत की सांस ले सकते हैं क्योंकि यहां बारिश की संभावनाएं हैं" (चैनल का नाम ध्यान नही) । पता नही उनका सामान्य ज्ञान कैसा था...या फिर उनके लिये लोगों से मतलब सिर्फ शहरों में रहने वाले, नौकरीपेशा लोग होते  होंगे (गांव में कौन अंग्रेजी चैनल देखता है)...लेकिन  साल के इस समय हिन्दुस्तान भर के खेतों की फसल कट कर खलिहानों में रखी होती है और हल्की सी बरसात उसकी गुणवत्ता बिगाड सकती है। ज्यादा हो जाये तो भगवान ही मालिक है। तो बारिश इस समय राहत की सांस नही होती...गले की फांस हो जाती है। फसल के सही पैसे आये तो ही पुराने कर्जे चुकेंगे, बच्चों की शादियां निपटेंगीं और अगली फसल की तैयारी हो पायेगी। बहुत उम्मीदें बंधी होती हैं। शायद टी वी सुन्दरी को इस बात की जानकारी हो।</p>
<p>मौसम कुछ ऐसा बिगड रहा है कि मेरे गृह जिले झालावाड और उसके आसपास भी मौसम खराब हो रहा है और यहां १५०० किलेमीटर दूर हैदराबाद में भी पिछला सप्ताह गीला बीता..आज सुबह भी मौसम बेइमान हो रहा था। सिर्फ किसान ही नही..आइसक्रीम बेचने वाला मेरा  FlatMate भी  मौसम के मिजाज से दुखी है...अप्रेल का महीना आ गया और बेचारे की बिक्री अभी तक परवान नही चढी।</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[आरुषि के बहाने ]]></title>
<link>http://amitabhtri.wordpress.com/?p=83</link>
<pubDate>Thu, 22 May 2008 15:54:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>amitabhtri</dc:creator>
<guid>http://amitabhtri.wordpress.com/?p=83</guid>
<description><![CDATA[पिछले चार पाँच दिन से समाचार माध्यमों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले चार पाँच दिन से समाचार माध्यमों में नोएडा की रहने वाली आरुषि की रहस्यमय हत्या का मामला छाया है। मीडिया द्वारा इस विषय को महत्व देना कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है, इससे पूर्व भी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हुई हत्याओं को काफी महत्व मिलता रहा है। परंतु इस घटना के समय को लेकर एक प्रश्न मन में अवश्य उठता है कि जब इसी समय अभी कोई दस दिन पहले राजस्थान की राजधानी जयपुर में आतंकवादी आक्रमण हुआ है और उस सम्बन्ध में भी जाँच चल रही है तो हमारे समाचार माध्यमों का ध्यान उस ओर क्यों नहीं जा रहा है या फिर यूँ कहें कि उनका ध्यान उस ओर से पूरी तरह हट गया है। यह एक ऐसा विषय है जिस पर गम्भीरतापूर्वक सोचने की आवश्यकता है। </p>
<p>आरुषि हत्याकाण्ड में जिस प्रकार समाचार माध्यमों ने रुचि दिखाई और पुलिस प्रशासन को दबाव में लिया कि नोएडा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को बकायदा प्रेस कांफ्रेस करनी पडी और इस मामले में जाँच में हो रही प्रगति के सम्बन्ध में मीडिया को बताना पडा। यह मीडिया की शक्ति की ओर संकेत करता है पर वहीं एक प्रश्न यह भी उठता है कि आरुषि के मामले को इतना तूल देकर कहीं मीडिया ने जयपुर मामले में बहस से लोगों का ध्यान हटाने का शुभ कार्य तो नहीं किया है। निश्चय ही मीडिया के इस कार्य से सरकार काफी राहत मिली है और उसी राहत का अनुभव करते हुए भारत के गृहमंत्री ने बयान दे डाला कि मोहम्मद अफजल को फांसी की पैरवी नहीं करनी चाहिये। </p>
<p>आरुषि मामले को मीडिया द्वारा तूल देने के पीछे कोई षडयंत्रकारी पक्ष देखना तो उचित तो नहीं होगा पर इससे कुछ प्रश्न अवश्य उठते है। क्या मीडिया जयपुर जैसी घटनाओं को नजरअन्दाज करने की रणनीति अपना रहा है। इस बात के संकेत मिलते भी हैं। पिछले तीन वर्षों में यदि इस्लामी आतंकवाद  के सम्बन्ध में मीडिया की रिपोर्टिंग पर नजर डाली जाये तो कुछ स्थिति स्पष्ट होती है। 11 जुलाई 2006 को देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई में लोकल रेल व्यवस्था पर आक्रमण हुआ और उस समय की रिपोर्टिंग और अब जयपुर में हुए आक्रमण की प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया की रिपोर्टिंग में कुछ गुणात्मक परिवर्तन देखने को मिल रहा है। यह गुणात्मक परिवर्तन इस सन्दर्भ में है कि ऐसी घटनाओं की क्षति, लोगों पर इसके प्रभाव और इस आतंकवाद में लिप्त लोगों पर चर्चा को उतना ही रखा जाये जितना पत्रकारिता धर्म के विरुद्ध नहीं है। इस नजरिये से घटना की रिपोर्टिंग तो होती है परंतु घटना के बाद इस विषय से बचने का प्रयास किया जाता है। यह बात 2006 से आज तक हुए प्रत्येक आतंकवादी आक्रमण के सम्बन्ध में क्रमशः होती रही है। यदि जयपुर आक्रमण के बाद विभिन्न समाचार पत्रों में सम्पादकीय या उससे सम्बन्धित लेखों की संख्या देखी जाये तो ऐसा लगता है कि इस सम्बन्ध में खाना पूरी की जा रही है और जोर इस बात पर अधिक है कि यह घटना लोगों के स्मरण से कितनी जल्दी दूर हो जाये या इसे लोग भूल जायें। </p>
<p>मीडिया के इस व्यवहार की समीक्षा इस पृष्टभूमि में भी की जा सकती है कि कहीं आतंकवादी घटनाओं की अधिक  रिपोर्टिंग और उस पर अधिक चर्चा नहीं करने को भी इस आतंकवाद से निपटने का एक तरीका माना जा रहा है जैसा कि प्रसिद्ध आतंकवाद प्रतिरोध विशेषज्ञ बी रमन ने हाल के अपने एक लेख में सुझाव दिया है। उनका मानना है कि आतंकवादी आक्रमणों के बाद ऐसा प्रदर्शन नहीं करना चाहिये कि हमारे जीवन पर इसका कोई प्रभाव हो रहा है क्योंकि इससे आतंकवादियों को लगता है कि वे अपने उद्देश्य में सफल हैं। बी रमन मानते हैं कि आतंकवादी न तो साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड पाये हैं और न ही पर्यटन स्थलों पर आक्रमण कर लोगों को ऐसे स्थलों पर जाने से रोक सके हैं। </p>
<p>इसी प्रकार का सुझाव जुलाई 2006 में मुम्बई में स्थानीय रेल व्यवस्था पर हुए आक्रमण के पश्चात संसद एनेक्सी में कुछ मुस्लिम संगठनों द्वारा बुलाए गये आतंकवाद विरोधी सम्मेलन में प्रधानमंत्री और सूचना प्रसारण मंत्री की उपस्थिति में दिया गया था और मीडिया को अमेरिका और यहूदियों का एजेंट बताकर उनपर आरोप लगाया गया था कि वे आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों और इस्लाम को बदनाम कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे सुझाव अब असर करने लगे हैं और इस्लामी आतंकवाद को लेकर मीडिया ने अपने ऊपर एक सेंसरशिप थोप ली है और इस सम्बन्ध में क्षमाप्रार्थना का भाव व्याप्त कर लिया है। अब प्रश्न यह उठता है कि इस रूख से किसे लाभ होने जा रहा है और क्या इस रूख से आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध के इस युग में हम आतंकवाद पर विजय प्राप्त कर सकेंगे? निश्चित रूप से इससे आतंकवाद के युद्ध में आतंकवादियों को ही लाभ होने जा रहा है और उन राजनीतिक दलों को लाभ होने जा रहा जो इस्लामी आतंकवाद से मुस्लिम समुदाय के जुडाव के कारण इस विषय में न कोई चर्चा करना चाहते हैं और न ही कोई कार्रवाई। </p>
<p>जयपुर पर हुए आक्रमण के बाद जिस प्रकार आक्रमण में घायल हुए लोगों, जाँच की प्रगति और आतंकवाद के मोर्चे पर पूरी तरह असफल केन्द्र सरकार की कोई खबर मीडिया ने नहीं ली उससे एक बात स्पष्ट है कि आज लोकतंत्र के सभी स्तम्भ यहाँ तक कि पाँचवा स्तम्भ माना जाने वाला मीडिया भी शुतुरमुर्गी रवैया अपना रहा है और इन सबकी स्थिति उस कबूतर की भाँति है जो बिल्ली के सामने अपनी आंखें बन्द कर सोचता है कि बिल्ली भाग जायेगी। लोकतंत्र में मीडिया की अपनी भूमिका होती है लेकिन जिस प्रकार मीडिया बहस से भाग रहा है उससे इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वालों को यही सन्देश जा रहा है कि हमारे अन्दर इच्छाशक्ति नहीं है और मुकाबले के स्थान पर पलायन का रूख अपना रहे हैं। </p>
<p>आखिर यह अंतर क्यों आया है। जयपुर के सम्बन्ध में अंतर यह आया है कि अब यह स्पष्ट हो गया है कि भारत में स्थानीय मुसलमानों का एक वर्ग इस्लाम के नाम पर पूरे विश्व में चल रहे जिहाद के साथ जुड चुका है और वह देश में आतंकवादियों के लिये हर प्रकार का वातावरण निर्माण कर रहा है। इसी कारण इस मामले से हर कोई बचना चाहता है। </p>
<p>इस प्रकार का रवैया अपना कर हम पहले दो बार जिहादवाद के विस्तार को रोकने का अवसर खो चुके हैं और तीसरी बार वही भूल करने जा रहे हैं। पहली बार जब 1989 में जम्मू कश्मीर में आतंकवाद ने प्रवेश किया तो हमारे नेताओं, पत्रकारो और बुद्धिजीवियों ने उसे कुछ गुमराह और बेरोजगार युवकों का काम बताया और बाद में इन्हीं गुमराह युवकों ने हिन्दुओं को घाटी से निकाल दिया और डंके की चोट पर घोषित किया कि यह जिहाद है। इसी प्रकार जब भारत में कश्मीर से बाहर पहली जिहादी घटना 1993 में मुम्बई में श्रृखलाबद्ध बम विस्फोटों के रूप में हुई तो भी इसे जिहाद के स्थान पर बाबरी ढाँचे के 1992 में ध्वस्त होने की प्रतिक्रिया माना गया। वह अवसर था जब जिहादवाद भारत में विस्तार कर रहा था पर उस ओर ध्यान  नहीं दिया गया। आज हम तीसरा अवसर खो रहे हैं जब हमें पता चल चुका है कि भारत में मुस्लिम जनसंख्या का एक बडा वर्ग वैश्विक जिहाद के उद्देश्य से सहानुभूति रखता है तो उस वर्ग का विस्तार रोकने के लिये कठोर कानूनी और विचारधारागत कदम उठाने के स्थान पर हम इस पर बहस ही नहीं करने को इसका समाधान मानकर चल रहे हैं। </p>
<p>जयपुर में हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद जिस प्रकार इस मामले को मीडिया ने ठण्डे बस्ते में डाला है वह सराहनीय नहीं है। इस सम्बन्ध में लोगों की सहनशीलता को असीमित मानकर चलने की यह भावना खतरनाक है। ऐसे आक्रमणों का सामना इनकी अवहेलना कर नहीं इस पर बहस कर किया जा सकता है। क्योंकि बहस न होने से यह पता लगा पाना कदापि सम्भव नहीं होगा इस विषय पर देश में क्या भाव है और लोग इसके मूलभूत कारणों के बारे में क्या सोचते हैं। कहीं ऐसा न हो कि इस विषय में संवादहीनता का परिणाम आगे चलकर भयावह हो जाये जैसा कि पहले कई अवसरों पर हम देख भी चुके हैं। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Open Source Education in Public Funded Universities in India]]></title>
<link>http://oskanpur.wordpress.com/2008/03/26/open-source-education-in-public-funded-universities-in-india/</link>
<pubDate>Wed, 26 Mar 2008 13:33:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>oskanpur</dc:creator>
<guid>http://oskanpur.wordpress.com/2008/03/26/open-source-education-in-public-funded-universities-in-india/</guid>
<description><![CDATA[खुला सोर्स कोड - भारत मे सार्वजनिक विग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>खुला सोर्स कोड - भारत मे सार्वजनिक विग्यान व तकनीकी शिक्षा के आयाम :</p>
<div class="snap_preview">दक्षिण अफ्रीका में लाइनक्स उबुँटू का अत्याधुनिक व प्रमाणित पाठ्यक्रम - <a title="Obsidian - Certified Linux Ubuntu Training in South Africa" href="http://www.obsidian.co.za/">ओब्सीडियन द्वारा</a> -
</div>
<div class="snap_preview"><a title="Ubuntu Linux certified professional training course" href="http://www.ubuntu.com/news/obsidian-linux-training-south-africa" target="_blank">http://www.ubuntu.com/news/obsidian-linux-training-south-africa</a></div>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[How to send email in Hindi to Shri Lalu Prasad Yadav ?]]></title>
<link>http://ubuntuschools.wordpress.com/2008/03/11/how-to-send-email-in-hindi-to-shri-lalu-prasad-yadav/</link>
<pubDate>Tue, 11 Mar 2008 11:51:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>oskanpur</dc:creator>
<guid>http://ubuntuschools.wordpress.com/2008/03/11/how-to-send-email-in-hindi-to-shri-lalu-prasad-yadav/</guid>
<description><![CDATA[LokVidya IT KaryaShala Evam Manthan - July/August 2008 - Dehradoon
Duration - 7 Days
Format - A grou]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>LokVidya IT KaryaShala Evam Manthan</strong> - July/August 2008 - Dehradoon<br />
<strong>Duration</strong> - 7 Days<br />
<strong>Format</strong> - A group of 50 - 60 participants will live together for 7 days and interact in loose group settings.<br />
<strong>Costs</strong> : Free to participate - Organizations pay for their participants travel, hostel, stationary and food costs - Voluntary contributions welcome<br />
<strong>Topic</strong> - LokVidya IT and related issues in context of and as relevant to - swadeshi samaj and IT hierarchies.<br />
<strong>Access</strong> - Open to all age-groups, backgrounds and IT skill levels.<br />
Girls and youth from Hindi speaking and rural background will get priority over English speaking and urban background participants in case hostel accommodation is exceeded.<br />
<strong>Breakup</strong> - Groups of 10 participants will join together to form Teams. Each Team will have access to One Desktop Computer and Free Software.<br />
Participants should be encouraged to ask questions and actively kill fear of Information Technology.<br />
Leader of each group will be rated by the team on how cooperative and knowledgeable he or she is.<br />
Is knowledge to be shared or to be kept secret and mystified ?<br />
<strong>Participants</strong> - About 15 from each activist organization - Any participant who has a laptop can bring it along if it has Ubuntu loaded on it or wants Ubuntu loaded on it.<br />
<strong>Medium of Instruction</strong> - Hindi and English<br />
Proposed Content - A. Karyashala  B. Manthan</p>
<p>Rough Outline of LokVidya IT - 1 - Course Content :<br />
A. <strong>LokVidyaIT Karyashala</strong> and <strong>Manthan</strong> :</p>
<p>1. Demonstration of component parts of a Desktop Computer and UPS<br />
2. Connecting and Installing a Computer with UPS - Power Connections - Internet connection<br />
3. Examining an Ubuntu Linux CD<br />
4. Installing Ubuntu Linux on a computer - independently by oneself - then reformatting Hard Disk and Reinstalling Ubuntu - Remove fear of Computers - Does Software cause a shock ? Brief discussion of Directory structure.<br />
5. Reading and Discussing about Ubuntu software ownership and Terms of Use - Asking Who is making Free Software for Me and Why ?<br />
Asking who is NOT making Free Software for me and Why ?<br />
6. Tips for teaching others how to Ubuntu - especially children, youth and women<br />
7. Creating a free Email Account and remembering Password details<br />
8. Configuring speaker and multimedia connections<br />
9. Search Engine and how to search for free Information<br />
10. How to download Ubuntu and other free softwares and from where<br />
11. What is Wikipedia - How to make a Wikipedia account and create a page to share information on Wikipedia<br />
12. Writing in Hindi on Desktop Computer and Hindi on Internet<br />
13. Send an email in Hindi<br />
14. How to search and find other Free Softwares - How to search for - and - block pornography -<br />
15. Using a Digital Camera and uploading photos<br />
16. How to compare software features<br />
17. Creating a basic document, spreadsheet and Presentation using Free Software on Ubuntu and Emailing it.<br />
18. Creating a free Blog - Apna Akhbar - MeraAkhbar - Create, Edit, Delete, Search<br />
19. Create a Google Group for family and friends - news and details<br />
20. How to book a Railway Ticket from the Indian Railways website / How to file an Online Income Tax Return / How to send an email to Laloo Yadav in Hindi<br />
21. How to search for information from the Right to Information Act website - How to search for Hindi IT courses offered by Indian Institute of Technology / IIM and other top IT and management training institutes of India<br />
22. How to book a web domain for a website and create a free Hindi website - if time permits<br />
23. Any other interesting topic by Participants Demand</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लॉगर भेंटवार्ता टेलीविजन पर .....]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/?p=232</link>
<pubDate>Thu, 07 Feb 2008 07:26:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
<guid>http://itsme.wordpress.com/?p=232</guid>
<description><![CDATA[पिछले माह, 12 जनवरी 2008, हुई दिल्ली ब्लॉग ए]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले माह, 12 जनवरी 2008, हुई दिल्ली ब्लॉग एण्ड न्यू मीडिया सोसायटी (Delhi Blog and New Media Society aka DBNMS) द्वारा आयोजित <a href="/2008/01/08/are-you-coming/">प्रथम ब्लॉगर भेंटवार्ता</a> काफ़ी सफ़ल रही। बहुत से साथी ब्लॉगरों और ब्लॉग इच्छुकों और उत्सुकों ने इसमें भाग लेकर इस भेंट को सफ़ल बनाया। अपने हिन्दी ब्लॉगजगत से भी कई बंधुओं ने शिरकत कर मेरी इस सोच को मज़बूत किया कि ब्लॉगर चाहे कैसा हो और चाहे किसी भी भाषा में लिखता हो परन्तु होता वह ब्लॉगर ही है इसलिए हम इस ब्लॉगजगत में क्षेत्र अथवा भाषा के मापदंड पर बंटवारा नहीं करेंगे। :)</p>
<p>मीडिया में भी इस ब्लॉगर भेंटवार्ता को काफ़ी कवरेज मिली और ब्लॉगजगत तथा ब्लॉगरों के बारे में खबर दूर-२ तक पहुँची। इससे अपेक्षित है कि ब्लॉगिंग का मर्ज़ बहुतों को अपनी चपेट में लेगा। :)</p>
<p>भेंटवार्ता से एक दिन पहले अंग्रेज़ी के हिन्दुस्तान टाइम्स की अनुपूरक पत्रिका एचटी सिटी(HT City) के मुख्यपृष्ठ पर भेंटवार्ता संबन्धित <a href="http://snipurl.com/dbnms_meet1_ht" target="_blank">यह लेख</a> छपा था। हालांकि इसमें पत्रकार/लेखिका से एक त्रुटि हो गई और अंत में वेबसाइट के पते में वो delhi लगाना भूल गई, असल वेबसाइट <a href="http://www.delhibloggers.in/" target="_blank">www.delhibloggers.in</a> है। एनडीटीवी (NDTV) ने इस पूरी भेंटवार्ता को कवर किया था और पत्रकार गरिमा दत्त ने एनडीटीवी (NDTV) की वेबसाइट पर भेंटवार्ता के अगले दिन <a href="http://snipurl.com/dbnms_meet1_ndtv" target="_blank">यह लेख</a> छापा। सिर्फ़ छापे वाले मीडिया में ही नहीं, टेलीविजन पर भी इसकी कवरेज दिखाई गई।</p>
<p>एनडीटीवी 24x7 (NDTV 24x7) पर दिखाई गई न्यूज़ बाइट<br />
<span style='text-align:center; display: block;'><object width='425' height='350'><param name='movie' value='http://www.youtube.com/v/NTAQYkbvhsI'></param><param name='wmode' value='transparent'></param><embed src='http://www.youtube.com/v/NTAQYkbvhsI&rel=0' type='application/x-shockwave-flash' wmode='transparent' width='425' height='350'></embed></object></span><br />
यूट्यूब पर इस वीडियो को <a href="http://www.youtube.com/watch?v=NTAQYkbvhsI" target="_blank">यहाँ देखें</a>। वीडियो को FLV रूप में <a href="http://www.videodownloadx.com/misc/download-video/id/7214" target="_blank">यहाँ डाउनलोड करें</a>।</p>
<p>एनडीटीवी मेट्रोनेशन (NDTV Metronation) पर दिखाई गई न्यूज़ बाइट<br />
<span style='text-align:center; display: block;'><object width='425' height='350'><param name='movie' value='http://www.youtube.com/v/ky4ewGi8-mQ'></param><param name='wmode' value='transparent'></param><embed src='http://www.youtube.com/v/ky4ewGi8-mQ&rel=0' type='application/x-shockwave-flash' wmode='transparent' width='425' height='350'></embed></object></span><br />
यूट्यूब पर इस वीडियो को <a href="http://www.youtube.com/watch?v=ky4ewGi8-mQ" target="_blank">यहाँ देखें</a>। वीडियो को FLV रूप में <a href="http://www.videodownloadx.com/misc/download-video/id/7219" target="_blank">यहाँ डाउनलोड करें</a>।</p>
<p>एनडीटीवी मेट्रोनेशन (NDTV Metronation) पर दिखाई गई विस्तृत कवरेज<br />
<span style='text-align:center; display: block;'><object width='425' height='350'><param name='movie' value='http://www.youtube.com/v/XjvzL7180ws'></param><param name='wmode' value='transparent'></param><embed src='http://www.youtube.com/v/XjvzL7180ws&rel=0' type='application/x-shockwave-flash' wmode='transparent' width='425' height='350'></embed></object></span><br />
यूट्यूब पर इस वीडियो को <a href="http://www.youtube.com/watch?v=XjvzL7180ws" target="_blank">यहाँ देखें</a>। वीडियो को FLV रूप में <a href="http://www.videodownloadx.com/misc/download-video/id/7221" target="_blank">यहाँ डाउनलोड करें</a>।</p>
<p>मीडिया में इस कवरेज का लाभ सीधे ही दिखा। जहाँ कई लोग हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले दिन छपे लेख के कारण भेंटवार्ता में आए वहीं कुछ लोग बाद में एनडीटीवी (NDTV) पर इसकी कवरेज देख कर समूह से जुड़े और अपने ब्लॉग बनाए। भेंटवार्ता के अगले ही दिन एनडीटीवी (NDTV) पर प्रसारित <a href="/2008/01/18/should-blogs-be-regulated/">बर्खा दत्त के We The People कार्यक्रम</a> का मुद्दा भी ब्लॉग ही थे। मतलब साफ़ है, मीडिया भी अब खुले रूप से ब्लॉगों पर ध्यान दे रहा है, और यह अच्छा भी है क्योंकि इससे जल्द ही यह भ्रम(जो कि बहुत लोग पाले हुए हैं) टूटेगा कि ब्लॉग मुख्यधारा मीडिया की जगह ले सकते हैं, दोनों एक दूसरे के सहायक/पूरक हो सकते हैं लेकिन दोनों की अपनी-२ पहचान और स्थान है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्या ब्लॉगों पर नियंत्रण होना चाहिए?]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2008/01/18/should-blogs-be-regulated/</link>
<pubDate>Fri, 18 Jan 2008 01:37:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
<guid>http://itsme.wordpress.com/2008/01/18/should-blogs-be-regulated/</guid>
<description><![CDATA[बर्खा दत्त एनडीटीवी पर हर सप्ताह एक अं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बर्खा दत्त एनडीटीवी पर हर सप्ताह एक अंग्रेज़ी का टॉक शो (talkshow), वी द पीपल(we the people), प्रस्तुत करती हैं। इस बार 13 जनवरी 2008 को प्रसारित हुए अध्याय में वार्ता का विषय था - क्या ब्लॉगों पर नियंत्रण होना चाहिए? (should the blogs be regulated?)</p>
<p>अब इस बार पैनल पर कुछ ब्लॉगर, एक वकील और एक मनोवैज्ञानिक थे, श्रोताओं में भी कुछ ब्लॉगर आदि बैठे थे। मौजूद ब्लॉगरों में कुछ जाने पहचाने नाम थे जैसे <a href="http://kamlabhattshow.com/" target="_blank">कमला भट्ट</a>, <a href="http://www.blogworks.in/blog/" target="_blank">राजेश लालवानी</a> और अपने <a href="http://naisadak.blogspot.com/" target="_blank">कस्बे वाले रवीश</a> जी। चर्चा आरंभ हुई एक ब्लॉगर और उनके ब्लॉग पर लिखी उनकी व्यक्तिगत सेक्स संबन्धी पोस्ट से, कि कैसे जब काफ़ी समय तक उनको सेक्स नहीं मिलता तो वो सिगरेट फूंकती रहती हैं, और आगे बढ़ी एक दूसरे ब्लॉगर की ओर जिन्होंने अपने ब्लॉग पर सरेआम व्यक्त किया हुआ है कि वे समलैंगिक हैं और एक बॉयफ्रेन्ड की तलाश में हैं। आधे कार्यक्रम में तो चर्चा इसी बात पर होती रही कि कौन अपने व्यक्तिगत ब्लॉग पर क्या लिख रहा है, दुनिया के सामने उसको पढ़ने के लिए डाल रहा है और इन्हीं एक-दो सेक्स संबन्धी पोस्ट पर बात होती रही। एक बात जो मुझे यह समझ नहीं आई वह यह कि आखिर बर्खा क्या चाह रही थीं, और यह कार्यक्रम के मुद्दे से कैसे संबन्धित है? क्या किसी का ब्लॉग इसलिए नियंत्रण के तहत आना चाहिए कि वह व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत बातें दुनिया के सामने रख रहा है? व्यक्तिगत ब्लॉग जब तक किसी पर उँगली उठा कुछ कह नहीं रहा तो उसमें किसी को तो कोई आपत्ति होनी ही नहीं चाहिए। और यदि है तो फिर वह मुख्यधारा मीडिया पर क्यों नहीं लागू होती?</p>
<p>कई लोगों ने कई विचार व्यक्त किए, एक ने तो यहाँ तक कहा कि ब्लॉग सिर्फ़ समय की बरबादी हैं और किसी का कुछ भला नहीं कर रहे। खैर, इस तरह के अज्ञानी लोग तो नादान हैं इसलिए इनके अज्ञान को क्या कहें सिवाय इसके कि जनाब घर के बाहर भी दुनिया है ज़रा घर से बाहर आकर तो देखो। ;) लेकिन कई लोगों की सोच पर हंसी भी आई कि ऐसे भी लोग होते हैं। एक मोहतरमा ने कहा कि हमारी संस्कृति ऐसी है कि वह नियंत्रण माँगती है और इसलिए हमारी संस्कृति के अनुसार इन ब्लॉगों पर नियंत्रण होना चाहिए। वाह-वाह, क्या बात है!! मेरे पल्ले तो नहीं पड़ा कौन सी संस्कृति की बात हो रही थी, कम से कम भारतीय संस्कृति की तो नहीं हो रही थी।</p>
<p>रवीश जी ने हिन्दी ब्लॉगों की प्रशंसा करते हुए कहा कि बहुत अच्छा ऐसा कार्य हो रहा है जो पहले नहीं हुआ, बहुत से लोग लिख रहे हैं और काफ़ी अच्छा लिख रहे हैं, ब्लॉगों के माध्यम से बहुत से ऐसे साहित्य को सबको उपलब्ध कराया गया है जो अभी तक किसी गुमनाम कोने में पड़ा हुआ था। और सबसे बढ़िया बात तो यह रही कि रवीश जी अंग्रेज़ी के कार्यक्रम में हिन्दी में बोले और आखिरकार उनको संबोधित करते हुए बर्खा दत्त को भी हिन्दी में बोलना पड़ा।</p>
<div style="float:right;width:150px;text-align:center;font-weight:bold;border:3px dashed #660000;border-left:none;border-right:none;margin:10px 0 10px 10px;padding:5px 0;">अमां यदि तुमने बैलगाड़ी से उतर हवाई जहाज़ को आज देखा है तो इसका अर्थ यह तो नहीं हो गया कि वह कोई नया शगूफ़ा है!!</div>
<p>सबसे अधिक खीज इस बात को लेकर हो रही थी कि सभी इसको एक नई चीज़ नई चीज़ करके अपने को उत्साहित दिखा रहे थे। अमां यदि तुमने बैलगाड़ी से उतर हवाई जहाज़ को आज देखा है तो इसका अर्थ यह तो नहीं हो गया कि वह कोई नया शगूफ़ा है!! इसी तरह यदि पैनल पर बैठे इन एक-दो लोगों को और भारतीय मीडिया को कल-परसों में ही ब्लॉगों की उपस्थिति का आभास हुआ है तो यह नई चीज़ तो न हो गई, यह तो तब से है जब इनमें से आधे से अधिक लोग ईमेल-चैट भी न जानते थे कि वह क्या होता है; ई ब्लॉगन का सन्‌ 1999 से तो मैं ही देख, पढ़ और लिख रिया हूँ!! ;)</p>
<p>कुल मिलाकर एक निराशाजनक कार्यक्रम रहा जिसका कोई खास अर्थ न बना। बर्खा दत्त के कार्यक्रम की इससे अधिक अपेक्षा थी। साथ ही यह सोच रहा हूँ कि अच्छा ही हुआ कि हमने(<a href="http://www.dbnms.org/" target="_blank">दिल्ली ब्लॉग एण्ड न्यू मीडिया सोसायटी</a> के संस्थापकों) ने उसमें जाने से इंकार कर दिया, वर्ना न्योता तो हमको भी आया था। आप इस कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग <a href="http://www.ndtv.com/convergence/ndtv/videopod/default.aspx?id=22159" target="_blank">यहाँ देख सकते हैं</a>। यह वीडियो अंग्रेज़ी में है और तकरीबन पचास मिनट का है।</p>
<p>खैर यह तो इस टीवी कार्यक्रम की बात रही, इस विषय पर आपका क्या कहना है और आपके क्या विचार है? <a href="http://www.akshargram.com/paricharcha/viewtopic.php?id=1163" target="_blank">यह चर्चा यहाँ ज़ारी है</a> तो आईये आप भी अपने विचार <a href="http://www.akshargram.com/paricharcha/viewtopic.php?id=1163" target="_blank">यहाँ व्यक्त करें</a>।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अल-जज़ीरा सबके लिए]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2007/07/04/al-jazeera-for-everyone/</link>
<pubDate>Wed, 04 Jul 2007 11:30:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
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<description><![CDATA[विख्यात अरबी टीवी चैनल अल-जज़ीरा, जिसने]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>विख्यात अरबी टीवी चैनल अल-जज़ीरा, जिसने ओसामा बिन लादेन के वीडियो दिखा ख्याति पाई, मध्य-पूर्व के बाहर सभी के टीवी सैटों पर नहीं आता। अब यह दूरी समाप्त हो गई क्योंकि अब इसके वीडियो <a href="http://www.youtube.com/" target="_blank">यूट्यूब</a> पर अंग्रेज़ी में <a href="http://www.youtube.com/aljazeeraenglish" target="_blank">यहाँ</a> उपलब्ध हैं। (हैट टिप - <a href="http://www.mohamedn.com/" target="_blank">मोहामिद</a>)</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[समाज के सर्वज्ञ]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2007/03/13/know-it-alls-of-society/</link>
<pubDate>Tue, 13 Mar 2007 18:29:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
<guid>http://itsme.wordpress.com/2007/03/13/know-it-alls-of-society/</guid>
<description><![CDATA[जो कोई भी अख़बार आदि पढ़ता है अथवा टीवी प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जो कोई भी अख़बार आदि पढ़ता है अथवा टीवी पर समाचार चैनलों को झेलता है उसे कभी न कभी तो इस बात का एहसास होता ही होगा कि समाचार माध्यम पर जो बकवास की जा रही है उसका आगा-पीछा कुछ भी समाचार प्रस्तुत करने वाले को नहीं पता लेकिन फिर भी वह पिले जा रहा है, अपनी नौकरी बजाए जा रहा है, रिजक़ कमाए जा रहा है!! पत्रकार को जिस विषय की वह रिपोर्टिंग कर रहा है बहुतया उसके बारे में कुछ नहीं या बहुत कम ही पता होता है, लेकिन वह दर्शाता ऐसे है कि उससे अधिक उस विषय पर कोई नहीं बकवास कर सकता। ऐसा क्यों होता है? अब मेरी समझ में इसके केवल दो ही कारण आते हैं:</p>
<ol>
<li>पत्रकार का बॉस किसी जानकार व्यक्ति को नहीं पकड़ना चाहता तथा पत्रकार को भी उस विषय पर कुछ तैयारी करने का समय नहीं देना चाहता।</li>
<li>पत्रकार स्वयं ही अपने को फन्ने खां से कम नहीं समझता जिसे हर विषय की पूर्ण से भी अधिक जानकारी है।</li>
</ol>
<p>अब इन दोनों में से मूर्खता का कोई भी कारण हो लेकिन नतीजा तो वही होता है, मूर्खता की चाश्नी में लिपटी रपट/लेख जिसे यदि उस विषय का कोई जानकार पढ़/सुन ले तो तुरंत ताड़ जाए कि लिखने वाला निश्चय ही अव्वल दर्जे का मूर्ख रहा होगा।</p>
<p>मेरा ज्ञानक्षेत्र/कार्यक्षेत्र सूचना प्रौद्योगिकी का है, उसमें भी सॉफ़्टवेयर और इंटरनेट से जुड़ा हूँ। अब मैं यह नहीं कहता कि मैं अपनी गली-मोहल्ले में कोई तोपची हूँ लेकिन फिर भी कुछ तो बुद्धि रखता हूँ। जिस समय टीवी बाज़ार में आया था, मुझे नहीं पता कि उस समय भी इन पत्रकारों के हम-पेशा पूर्वजों ने उसके लाभ कम और हानि अधिक गिनाई थीं कि नहीं पर अब जब इंटरनेट लोगों में धीरे-२ अपनी जगह बनाता जा रहा है तो ये लोग इसकी सिर्फ़ खामियाँ ही दिखाने में लगे हैं, और खामियाँ भी ऐसी नहीं जो कि इंटरनेट के आगमन से ही आई है वरन्‌ ऐसी जो वर्षों-शताब्दियों से समाज का अंतरंग भाग रही हैं।</p>
<p>अभी रविवार ही की बात है, <a href="/2007/03/12/6-hour-hindi-blogger-meet-in-delhi/">हिन्दी ब्लॉगर भेंटवार्ता</a> के लिए मैं क्नॉट प्लेस के एक कैफ़े कॉफ़ी डे में बैठा आने वाले अन्य ब्लॉगर साथियों की प्रतीक्षा कर रहा था तो मेरी दृष्टि एक दिन पुराने यानि कि शनिवार के एक अंग्रेज़ी समाचारपत्र मेट्रो नाओ(Metro Now) पर पड़ी। समय व्यतीत करने की गरज से मैं उसे कॉफ़ी की चुस्कियों के साथ पढ़ने लगा। अख़बार के दूसरे पन्ने पर इंटरनेट संबन्धी एक समाचार और एक लघु लेख था, तो मैं थोड़ा ध्यान से पढ़ने लगा। समाचार दिल्ली के रयान इंटरनेशनल स्कूल की किसी कक्षा नौ की छात्रा के बारे में था जो कि घर से लापता थी अथवा भाग गई थी। अब ख़बर में यह बात विशिष्ट रूप से दर्शाई गई थी कि कन्या इंटरनेट पर किसी सिद्धार्थ नामक लड़के से चैटिंग करती थी और कुछ समय से कदाचित्‌ दोनों का प्रेम प्रसंग चल रहा था, कन्या की सहेलियों के बयान से तो यही समझ आता है कि कम से कम कन्या तो अमुक लड़के की ओर आकर्षित थी। और एक रविवार वह अपने घर से भाग गई, उसके माता-पिता और पुलिस का मानना है कि वह अमुक लड़के के साथ भाग गई है। पुलिस ने उस लड़के के घर को पंजाब में कपूरथला तक ट्रेस किया लेकिन लड़का वहाँ नहीं मिला और उसके माता-पिता भी लड़के की मौजूदा स्थिति से अनभिज्ञ थे। यहाँ तक तो सब चौकस लेकिन फिर पत्रकार का परोक्ष रूप से इस बात पर ज़ोर देना कि यह सब इंटरनेट के कारण हुआ किसी भी मूर्ख को दिखाई दे जाएगा। तो यदि शब्दों के ताने-बाने के बीच पढ़ें तो आप समझ जाएँगे कि पत्रकार इंटरनेट के मामले में अज्ञानी लोगों को यह समझा रहा है कि यदि इंटरनेट न होता या अमुक कन्या को उसका प्रयोग नहीं करने दिया जाता तो कदाचित्‌ वह घर से न भागती(स्कूल से फिर भी भाग सकती थी)। गोया इसका अर्थ तो ठीक वही हुआ कि यदि कन्या किसी से फोन पर बात करती और फिर उसके साथ भाग जाती तो इसमें फोन का दोष होता। स्कूल में पढ़ने वाले किसी विद्यार्थी के साथ भागती तो स्कूल का दोष है, कन्या यदि स्कूल ही नहीं जाती तो वैसा नहीं होता, घर में आने वाले किसी रिश्तेदार के सुपुत्र के साथ भाग जाती तो रिश्तेदारों का होना ही गुनाह होता!!! :roll:</p>
<p>तत्पश्चात मेरी दृष्टि जिस पर गई वह एक लघु लेख की भांति था जिसमें बताया गया था कि इंटरनेट किस प्रकार दुष्ट है और दुष्ट लोगों से भरा पड़ा है(जैसे यहाँ पर वे दुष्ट लोग मंगल ग्रह से आए हैं)। उसमें किसी कॉलसेन्टर में कार्य करने वाली किसी महिला का उदाहरण दिया गया था। अमुक महिला इंटरनेट पर एक पुरूष के झांसे में आ गई जिसने अपने आपको एक गिगोलो(पुरूष वेश्या) बताया और दावा किया कि वह कई अमीर और प्रसिद्ध महिलाओं के साथ सो चुका है। कन्या उससे प्रभावित हो गई, फोन नंबरों की अदला-बदली हुई। उसके बाद उस तथाकथित गिगोलो ने लड़की का पीछा(स्टॉक यानि कि stalk) करना आरम्भ कर दिया और एक दिन उसने अपने कुछ मित्रों के साथ राह चलती उस कन्या का अपनी गाड़ी में अपहरण कर लिया और अपने घर ले जाकर उसके साथ बलात्कार किया।</p>
<p>कोई ज्ञानी व्यक्ति सबसे पहले तो इस वाक्ये से संबन्धित यह प्रश्न करेगा कि वह महिला अपने को एक गिगोलो बताने वाले व्यक्ति के साथ कर क्या रही थी?? निश्चय ही वह महिला कोई समाज सुधारक तो थी नहीं जो कि वेश्या उत्थान कार्यक्रम के तहत उस व्यक्ति से संपर्क बनाए हुए थी। वेश्यावृत्ती भारत में गैरकानूनी है, तो यह तो वही बात हुई कि चोर के घर डाका पड़ गया, तो हल्ला किस बात का है भई?? इंटरनेट का दोष कहाँ है??</p>
<p>दूसरे उदाहरण के तौर पर समीरा(बदला हुआ नाम) नाम की एक महिला के साथ घटी घटना बताई गई थी। समीरा इंटरनेट पर चैटिंग करते हुए एक पुरूष के संपर्क में आई जो कि अपने को दिल्ली पुलिस के किसी एसीपी(असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस) का भाई बताता था। अब इन दोनों का संबन्ध इतना आगे बढ़ गया कि दोनों के शारीरिक संबन्ध भी बन गए। अब मलाई चाटने के बाद बिल्ली तो निकल ली, मतलब मौज लेने के बाद वह बंदा <em>पतली गली से कट लिया</em>, उस बेचारी समीरा के फोन भी सुनने बंद कर दिए। कुछ समय बाद इस प्रकार के आग्रहों से युक्त उस व्यक्ति के मित्रों के फोन इन मैडम को आने लगे, तंग आकर मैडम ने शहर से ही पलायन कर लिया।</p>
<p>तो इस वाक्ये पर कोई भी समझदार यही पूछेगा कि इसमें इंटरनेट का क्या दोष है? इंटरनेट ने तो समीरा को एक अपरिचित व्यक्ति से अंतरंग संबन्ध बनाने को नहीं कहा था। यदि कोई राह चलता व्यक्ति अपने को डीसीपी(डिप्टी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस) अथवा पुलिस कमिश्नर का भाई या बेटा बताता तो क्या समीरा उसके साथ भी ऐसे संबन्ध बना लेती? इंटरनेट क्या कोई विश्वसनीयता की मोहर है कि वहाँ मिलने वाला व्यक्ति पाक़-साफ़ मन का होगा? क्या वहाँ उपस्थित लोग किसी दूसरे ग्रह से आए हैं या सतयुग के प्राणी हैं??</p>
<p>अब कोई इंटरनेट अज्ञानी इन दोनों समाचारों को पढ़ेगा तो यही निष्कर्ष निकालेगा कि इंटरनेट से दूर रहने में ही भलाई है, और यही छवि बहुत से ऐसे जन्तुओं की जमात वाले ये दोनों लेखक/पत्रकार प्रक्षेपित करना चाहते हैं।</p>
<p>एक तो लोगों में इंटरनेट को लेकर वैसे ही जानकारी कम और भ्रांतियाँ अधिक हैं, ऊपर से कलम की ताकत का दुरुपयोग करने वाले ये पत्रकार उसके बारे में और मिथ्या प्रचार कर रहे हैं। अभी पिछले नवंबर की कड़क सर्दी में <a href="http://neerajdiwan.wordpress.com/" target="_blank">नीरज</a> भाई ने मुझे अपने टीवी चैनल के एक कार्यक्रम "इंडिया बोले" में इंटरनेट प्रयोगकर्ता के तौर पर बुलाया था जिसका विषय <a href="/2006/11/24/cyber-relations-good-bad/">साईबर संबन्ध</a> पर था। उसमें भी लोगों के विचार आदि सुनने को मिले तो यही प्रतीत हुआ कि अधिकतर जनता इसी भ्रांति से ग्रसित है कि इंटरनेट एक दुःस्वप्न है, शैतान का अवतार है, इससे जितना दूर रहा जाए उतना ही बेहतर है। तो ऐसे में यह देखकर और भी खीज होती है जब किसी पत्रकार आदि को इन भ्रांतियों को सशक्त करते देखता हूँ। उस समय मेरे मन में वाकई यह ख़्याल आता है कि पत्रकार वाकई एक ऐसा जन्तु है जो कि हमेशा दयनीय और टुच्ची सनसनी की खोज में रहता है, इसलिए ऐसे पत्रकारों से मैं यही कहना चाहूँगा:</p>
<blockquote><p>
आपके पास कलम की ताकत है, टीवी/रेडियो प्रसारण का बल/पहुँच है, इसलिए इसे केवल रिजक़ कमाने का साधन मत समझिए। रिजक़ पर आपका उतना ही हक़ है जितना किसी और का लेकिन आपको यह भी समझना चाहिए कि आपका रिजक़ कमाने का साधन लाखों-करोड़ों लोगों को प्रभावित करता है और यदि आप इस साधन का उपयोग भ्रांति फैलाने और लोगों को गुमराह करने के लिए करते हैं तो आप समाजद्रोह कर रहे हैं जिसके लिए आप दंड के पात्र हैं और विश्वास कीजिए कि यदि आज नहीं तो कल, आपको किसी न किसी रूप में दंड अवश्य मिलेगा।</p>
<p>इसलिए अभी भी समय है, अपनी रोटियाँ सेंकने के लिए लोगों को गुमराह न करें। चोर, स्मगलर आदि भी अपनी रोटियाँ सेंकने के अधिकारी हैं लेकिन जो मार्ग वे अख़्तियार करते हैं वह गैरकानूनी होता है। आपका मार्ग फिलहाल गैरकानूनी नहीं ठहराया जा सकता परन्तु समाज के विरूद्ध अवश्य है।
</p></blockquote>
<p>लेकिन अपने सीमित अनुभव के कारण यह भी जानता हूँ कि पत्रकार नामक दयनीय जन्तु के कान पर जूँ भी न रेंगेगी और वह अपनी टुच्ची मानसिकता, संकीर्ण दृष्टिकोण के साथ इस हीन कार्य में लगा रहेगा।</p>
]]></content:encoded>
</item>

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