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	<title>मेरी-कुछ-कहानियां &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "मेरी-कुछ-कहानियां"</description>
	<pubDate>Sat, 06 Sep 2008 16:19:16 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[ सिसकती ज़िन्दगी]]></title>
<link>http://ramadwivedi.wordpress.com/?p=277</link>
<pubDate>Wed, 21 May 2008 09:53:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>ramadwivedi</dc:creator>
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<description><![CDATA[
 
                                   
       सर्द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align:left;"> </p>
<p style="text-align:left;">                                   </p>
<p style="text-align:left;">       सर्दियों के दिन थे। कई महींनों से मै घर पर अकेली ही थी क्योंकि पतिदेव किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में एक वर्ष के लिए अमेरिका गए हुए थे। किन्हीं निजी कारणों से मैं साथ नहीं गई । जनवरी में ठंड के कारण जल्दी उठा भी नहीं जाता था किन्तु मुझे जल्दी मुंह अंधेरे ही  उठने की आदत थी  इसलिए आज भी उठ गई। गर्म चाय का एक प्याला लेकर उसकी चुस्कियां लेती हुई अखबार अभी पढ़ना शुरू ही किया था<br />
 कि दरवाजे की घंटी बजी। मैंने बड़े ही अनमने मन से दरवाजा खोला, सामने सामान लिए कुमारिका खड़ी थी। मैं कुछ संभलती कि वह सामान फेंककर मेरे गले लगकर जोर- जोर से रोने लगी। कोई उसका रोना सुन न ले इसलिए मैंने उसे शीघ्रता से अन्दर लाकर बिठाया और कहा ऐसे कोई घर थोड़े ही छोड़ देता है । उसने रोते हुए अपने चेहरे के खुले  केशों को हटा कर दिखाया, गालों पर मारने के गहरे निशान उभर आए थे पीठ, गले व<br />
 हाथों पर भी नील स्याह निशान पड़ गए थे। मैं सोचने लगी ठीक-ठाक दिखने वाला कोई व्यक्ति इतना क्रूर कैसे हो सकता है? इतनी बेरहमी से कोई मारता-पीटता है क्या? क्या मर्दों की मर्दानगी इसी में निहित है? अभी अभी शादी हुई है ,दोंनो की पहचान भी ठीक से नहीं बन पाई और यह सब? कोई बड़े भी साथ में नहीं हैं जो इनका मार्गदर्शन करें । एक दिन भी बडों के साथ नहीं रहे । यह कैसा जीवन है जहां किसी प्रकार   का न तो अनुशासन है न जिम्मेदारी का अहसास ? देखने में लंबी ,छरहरे बदन की सुन्दर, पढ़ी लिखी ,हंसमुख और मिलनसार पत्नी को पाकर तो कोई भी पति फ़क्र करता । कुमारिका ग्राफिक डिजाइनर थी। छै वर्ष का उसे काम का अनुभव भी था।  इस नए शहर में भी वह नौकरी ढ़ूंढ़ रही थी । मेरा उसका परिचय भी कुल तीन-चार महीने का ही था । किसी नेट के मित्र के द्वारा ही हमारा परिचय हुआ था। वह भी मुशकिल से  हम तीन चार बार   ही मिले होंगे बस । इतने कम परिचय में भी जब मैं इस संकट की घड़ी में  उसे अपने घर रख सकती हूं तब क्या मनमीत में इतनी भी इन्सानियत नहीं कि वो जब उसे ब्याह कर लाया है तब उसका ख्याल रखे या कम से कम मार-पीट तो न करे। मैंने उसे पानी पिलाया और उसे आश्वस्त किया कि यहां पर वह सुरक्षित है। उसे चाय बनाकर दी और जब उसका मन शान्त हुआ तब मैंने उससे पूछा कि अब बताओ,आखिर हुआ क्या था? वह बताना तो<br />
 नहीं चाहती थी लेकिन बताना जरूरी था इसलिए थोड़ी ही बात उसने बताई। पूरी बात तो उसने नहीं बताई या मुझे ही ऐसा लग रहा था कि कहीं कुछ छुपा रही है । शायद दुविधा में थी कि बताए या नहीं । आखिर पति की इज़्ज़त का सवाल जो था । और खुद को भी मेरी नज़रों में गिराना नहीं चाहती थी । एक द्वन्द्व था कि मैं शायद यह न सोचूं कि कैसा परिवार है? या कैसी लड़की है जो अपने पति को संभाल नहीं सकती । या शायद मैं<br />
 कहीं मदद करने से मना न कर दूं तब वो कहां जाएगी? ऐसे ही कई प्रश्न उसके मन को भ्रमित कर रहे थे और वह खुलकर बता नहीं रही थी । मेरे मन में ऐसा कुछ नहीं था सिवाय इसके कि मैं इसका दुख कैसे कम करूं ? लड़कियों के दुख के प्रति मुझे विशेष हमदर्दी और लगाव है इसलिए मैं अकेली होती हुई भी उसकी मदद के लिए तत्पर थी ।<br />
     उसने अपने देवर को जो दिल्ली में रहता था,तुरन्त फोन किया उसे सब पूरी बात बताई उसने तुरन्त अपने माता-पिता को बताया और उन्होंने भी तुरन्त फोन करके पता किया कि कुमारिका कैसी है? मुझसे यह भी कहा कि मैं उसे कुछ खिला-पिला दूं और उसका ख्याल रखूं जब तक वे यहां न पहुंच जाए । मैं यह सब देखकर आश्चर्य चकित थी कि कुमारिका ने अपने माता-पिता को यह सब क्यों नहीं बताया? अक्सर लड़कियां अपना<br />
 दुख दर्द अपने माता-पिता को पहले बताती हैं। मेरे अन्दर उथल-पुथल मच रही थी अत: मौका देखकर मैंने कुमारिका से पूछ ही लिया "तुमने अपने माता-पिता को यह बात बताई"। उसने बड़ी ही सहजता से उत्तर दिया ’नहीं’ ।’मैंने पूछा क्यों? तब उसने उत्तर दिया मैं उन्हें क्यों बताऊं और उन्हें क्यों तकलीफ दूं ? जिसके लड़के की गलती है मुझे पहले उन्हें ही बताना चाहिए । मेरे माता-पिता बहुत वृद्ध हैं,मेरे  पापा सत्तर वर्ष से ऊपर हैं मैं उन्हें अपनी यह सब तकलीफें बताकर परेशान नहीं करना चाहती । मैं खुद इस समस्या को हल करूंगी । उसके इस कथन से मैं बहुत प्रभावित हुई और सोचने लगी कि काश सभी लड़कियों में इतनी दम-खम और समझ होती ? आखिर तक कुमारिका ने अपने माता-पिता या भाई- बहिन किसी को भी इस बात की हवा तक नहीं लगने दी । परिस्थितियों का बड़ी ही हिम्मत से सामना किया । सबसे बड़ी बात यह थी कि  सास-ससुर पर भरोसा रखा । </p>
<p style="text-align:left;">      मैंने  फिर पूछा कि ऐसा क्या हो गया कि उसने तुम्हें इतना मारा पीटा?</p>
<p style="text-align:left;">       तब उसने जो बताया उसे सुनकर मैं भी अवाक रह गई। कुमारिका ने बताना शुरू किया कि अभी हमारी शादी के चार महीने ही हुए है और वह मुझे अब तक पांच बार पीट चुका है।<br />
 मैंने पूछा क्यों?<br />
 तब उसने बताया कि वह रात -रात भर कम्प्युटर में बैठा रहता है।<br />
 मैंने कहा शायद आफिस का काम करता होगा।<br />
 उसने कहा अगर ऐसा होता तो मैं भी कुछ न कहती किन्तु ऐसा नहीं है।<br />
       तब मैंने कहा तब क्या बात है?<br />
       उसने बताना शुरू किया कि वह रात-रात भर ’आर्कुट’ में लड़कियों से बात करता रहता है।<br />
      मैं ने तब कहा ऐसा तुम कैसे जानती हो?<br />
       उसने बताया कि उसे कम्प्युटर की पूरी जानकारी है। जब वह देर रात तक बिस्तर पर नहीं आता तब वह जाकर देखती है तो वह कम्प्युटर पर ही बैठा मिलता है और बातचीत में इतना तल्लीन रहता है कि उसे पता नहीं चलता कि उसके पीछे खड़ी होकर मैं जो वह लिख रहा है मैं पढ़ रही हूं। मैंने उसे जब-जब ऐसा करने के लिए टोका तब-तब उसने मुझे मारा-पीटा यह कहकर कि वह कुछ भी करे मैं उसे कुछ न बोलूं।वह जब बात करता है  तब मेसेजेज को डिलीट करना भूल जाता है। एक दिन जब वह आफिस गया हुआ था तब मैंने मेसेज बाक्स खोलकर देखा तब मुझे पता चला कि एक सप्ताह में वह लगभग दो सौ लड़िकियों  से बात कर चुका है और  उसमें यह भी  बता रहा है कि वह अविवाहित है,ताकि लड़कियां आकर्षित हों और वह उनका साथ  एन्जोय कर सके।<br />
 वेब कैम में एक दूसरे को देखते भी है और तमाम तरह के संकेत भी देते हैं। यह सब पढ़कर  मेरा नारी-मन बार- बार आहत होता है कि मैंने इस आदमी से शादी क्यों की?<br />
       मैंने कहा तुमने तो खुद पसन्द करके इससे शादी की थी और तुम लोग भी तो नेट के जरिए ही मिले थे ना? क्या तुम्हें इस बारे में पहले पता नहीं था? मैंने कहा- हो सकता है शादी से पहले से ही वह यह काम करता रहा हो । तभी गंदी आदत पड़ गई है ।<br />
      उसने कहा कि शादी से पहले वह क्या करता रहा है उससे मुझे कोई मतलब नहीं है लेकिन अब उसे यह सब नहीं करना चाहिए ।<br />
मैंने भी हां में हां मिलाई और कहा उसे ऐसा नहीं करना चाहिए । अपनी नवविवाहिता को समय न देकर नेट में सर्फ़िंग,ब्लागिंग करके लड़कियों को ढ़ूढ़कर कुसमय बात करना बहुत गलत बात है ।<br />
उसने कहा-मैं मानती हूं कि दोस्त बनाना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन सीमाएं तो होनी चाहिए ना?<br />
    मैंने कहा तुम दो ही लोग साथ रहते हो। न सास-ससुर, जेठ- जिठानी ,देवर-देवरानी ,ननद आदि कोई भी तो साथ नहीं रहते कि झगड़े का कोई अन्य वजह हो।<br />
     उसने कहा घर पर तो सिर्फ दो ही लोग है पर कम्प्युटर के द्वारा पूरी दुनिया घर के अन्दर घुस आई है। जिससे आदमी को एक प्रकार का नशा हो गया है वह उसके अन्दर मुंह घुसाए रखना चाहता है । उसे किसी और नशे की जरूरत ही नहीं है कम्प्युटर में हर चीज़ देखने सुनने को मिलती है और अगर चाहत और बढ़ी तो तै करके बाहर जाकर मिल सकते हैं । आपको पता है आजकल लोग चैट के जरिए ही तरह तरह के  दोस्त बनाते हैं और  गलत रास्तों में भटक जाते हैं। नई जेनरेशन  अपना अकेलापन भरने के लिए रात-दिन कम्प्युटर में सर घुसाए रहती है,माता-पिता काम में चले जाते है और बच्चे जब घर में अकेले होते हैं तब गेम के साथ सेक्स,नशे और हारर पिक्चर्स भी देख्ते हैं जिससे उनमें बहुत कम उम्र में सेक्स की उत्तेजना पैदा हो जाती है और वे बलात्कार ,नशा,चोरी,स्मग्लिंग  जैसे अपराध कर बैठते हैं ।<br />
      मैंने उससे कहा-’आर्कुट’ तो अच्छी  साइट है और लोग अपना प्रोफाइल वहां दोस्त बनाने या पुराने दोस्तों को ढ़ूढ़ने के लिए ड़ालते हैं।<br />
उसने कहा-साइट बहुत अच्छा है पर कुछ लोग उसे भी गलत तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं ।<br />
मैंने उससे पूछा , तुम्हें कैसे पता कि वह लड़कियों से फ्लर्ट करता है? क्या यह बात तुम्हें शादी से पहले पता नहीं थी।<br />
 वह बोली मैं यह अच्छी तरह अब जानती हूं कि यह लड़कियों से फ्लर्ट करता है  लेकिन तब मैं क्या जानती थी कि यह ऐसा निकलेगा? मैं शादी से पहले सिर्फ एक बार ही मिली थी वह भी परिवार के सामने। मेरी उमर तीस की हो गई थी और मेरे माता-पिता शादी करने की जल्दी कर रहे थे । मैंने कई लड़के रिजेक्ट कर दिए थे । मेरे पापा बहुत गुस्सेवाले हैं इसलिए मेरे पीछे ही पड़ गए कि शादी करनी ही होगी। तभी मेरी<br />
 मुलाकात नेट पर मनमीत से हुई । बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा और हमने तै कर लिया कि शादी कर लेंगे । मैने अपने जीजा जी को बताया कि वे उसके माता-पिता से बात करें । दोंनों परिवार ने खुशी-खुशी इस शादी के लिए हां कर दी। मैंने तो यह सोचकर शादी कर ली कि एक बार तो करनी ही पड़ेगी ,चलो अपनी किस्मत यहीं आजमा लेते हैं  क्योंकि अब तक जो रिश्ते आए थे उनमें यही बेहतर था । मनमीत के पास तब नौकरी भी नहीं  थी } उसकी उम्र भी ज्यादा हो गई थी लेकिन उसने यह सब मुझे बताया था इसलिए मुझे बुरा नहीं लगा मैंने सोचा नौकरी मिल ही जाएगी ।हमारी शादी से एक महीने पहले ही उसे नौकरी मिली। शादी का पूरा खर्च मनमीत के छोटे भाई ने उठाया जो एक साफ्टवेयर कम्पनी में बहुत बड़े पद पर है ।<br />
  आगे कुमारिका ने कहा मैं अब वापस नहीं जाऊंगी। मुझे अब इस आदमी से नफ़रत हो गई है।<br />
       मैंने उसे बहुत समझाया कि ऐसा नहीं कहते । एक बार घर जाओ और  बड़ों के साथ बैठकर बात करो उसके बाद तुम्हें जो निर्णय लेना हो ले सकती हो लेकिन एक बार तुम्हें अवश्य ही जाना चाहिए। उसके माता-पिता का इसमें क्या दोष है?<br />
 किसी तरह कुमारिका मेरी बात मानकर घर चली गई लेकिन यह कहकर कि मैं इसका ढ़ोल पीटकर ही इसे छोड़ूंगी । इसने अपने आप को समझ क्या रखा है? मैं इतनी आसानी से इसे तलाक नहीं दूंगी ।<br />
 बेचैन दिल कुछ भी कहता है बाद में सब शान्त हो जाता है।<br />
        तीसरे दिन उसके सास-ससुर यहां पहुंचे और अपने बेटे को लेकर स्टेशन से सीधे मेरे घर आए अपनी बहू को लेने के लिए। कुमारिका की सास उसे गले लगाकर बहुत रोई । यह दृश्य देखकर मेरे आंख में भी आंसू आ गए । कोई सास भी बहू के दुख से इतना दुखी हो सकती है यह पहली बार देखा । सास -ससुर अपने बेटे के कृत्य से बड़े शर्मिन्दा थे । सर उठा कर मेरे सामने बात भी नहीं कर सके। बस हाथ जोड़ कर इतना ही कह पाए कि  आपने हमारी इज्जत बचा ली वर्ना पता नहीं क्या हो जाता ?<br />
मैंने कहा कि बच्चों से गलती हो गई है लेकिन दुबारा यह गलती न दोहराएं यह आपको समझाना पड़ेगा । बेहतर यही होगा आप लोग कुछ महीने इन लोंगो के साथ रहे और इनका जीवन सुव्यवस्थित कर दें ।</p>
<p style="text-align:left;">      कुमारिका चली तो गई माता-पिता के समझाने से मनमीत ने कुमारिका से माफी भी मांग ली और बहुत रोया भी यह कहकर कि एक बार उसे माफ करदे अगर दोबारा गलती हो  तो छोड़कर चली जाए।<br />
      एक दिन मैंने फिर कुमारिका को फोन किया कि कैसी है वह । उसने कहा कि वह ठीक है नौकरी में व्यस्त है। मैंने  उससे पूछा कि मनमीत कैसा है। उसने कहा ठीक है अब कम्प्युटर में ही नहीं बैठता। यह कहकर हंसने लगी। मुझे भी नौकरी मिल गई है इसलिए मैं भी अब नहीं देखती कि वह क्या कर रहा है? मम्मी- पापा भी घर में हैं। अभी तो सब ठीक है ।<br />
मैंने फिर पूछा क्या तुमने उसे माफ कर दिया ? उसने कहा नहीं प्रत्यक्ष तो कुछ नहीं कहती सब नार्मल है लेकिन दिल से उसे माफ नहीं किया। मेरी अन्तरात्मा बहुत आहत हुई है। अब शायद ही यह घाव भर पाए। कुमारिका दिल्ली वापस अपने सास -ससुर के घर चली गई क्योंकि मनमीत अमेरिका नौकरी ढूंढ़ने के लिए चला गया।  आज फिर कुमारिका आनलाइन दिखी । मैंने बात की और कहा मैं उससे बहुत नाराज़ हूं क्योंकि वह<br />
 मुझसे बिना मिले ही चली गई।</p>
<p style="text-align:left;">   उसने कहा कि उसे मुझसे मिलने में असहजता महसूस होती है  इसलिए क्योंकि मेरी छवि आपके नज़रों में अच्छी नहीं बन सकी ।<br />
    मैंने कहा मैं तो ऐसा नहीं सोचती । कभी-कभी ज़िन्दगी में ऐसा हो जाता है जो हम नहीं चाहते । इसके लिए कोई क्या कर सकता है? इसका मतलब यह भी नहीं होता कि अगला बहुत बुरा है । तुम अपने दिल में यह अपराधभाव मत पालो कि मैं तुम्हारे या मनमीत के बारे में कुछ गलत सोच रही हूं । बस जो गया मैं भी भूल गई हूं तुम भी भूल जाओ । यही सबके लिए अच्छा है ।<br />
   उसने कहा आप ठीक कह रही हैं पर भूलना इतना सरल नहीं होता शायद समय यह घाव भर दे । बस उस  घड़ी का इन्तज़ार है। काश मैं सब कुछ भूल पाती?<br />
    " मैं सोचने लगी कि अभी तो शादीशुदा ज़िन्दगी के कुछ माह ही गुजरे हैं पूरी ज़िन्दगी कैसे गुजारेंगे? क्या समय मीडिया, टेक्नोलोजी के बढ़ते विकास के दुष्प्रभाव से रिश्ते और अधिक प्रभावित नहीं होंगे? क्या भटकाव के अन्य अनेक रास्ते नहीं खुल जाएंगे? क्या तब भी समय घाव भरने का मरहम बन पाएगा या और तीखे घाव देगा ? समय मरहम तो तब बनेगा जब हमारी सोच परिष्कृत और संतुलित बन सकेगी? अन्यथा कई कुमारिकाएं पति के ज़ुल्म से पीड़ित घुट-घुटकर ज़िन्दगी जिएंगी या आत्महत्या कर लेंगी या फिर तलाक ? नेटचैटिंग क्या -क्या गुल खिलायेगी ? कितने घर टूटेंगे ? दिलों के बीच कितनी दीवारें खड़ी कर देगी"? कुमारिका की शादी टूटने-टूटते इसलिए बच गई कि समय पर उसे मदद मिल गई और सास-ससुर भी समझदार निकले। आजकल नवयुवक व नवयुवतियों के विचार बेलगाम दौड़ते हैं और फिर प्रागाधुनिकता की खाई में गिर जाते हैं । जहां से उबरना आसान नहीं है। यह एक तीव्र प्रभाव छोड़ने वाला व्यसन है।यह भी अन्य मादक नशे से कम नशा देनेवाला नहीं है। इसकी लत लग जाने पर इसका  छूटना नमुमकिन नहीं तो मुश्किल अवश्य है।</p>
<p style="text-align:left;">कुमारिका के कठोर कदम उठाने से ही विवाह सूत्र टूटने से तो बच गया परन्तु प्रेम के अनुबंध की  नींव हिल अवश्य  गईं ।</p>
<p style="text-align:left;">     मैंने सोचा वह सच कह रही है शादी टूटने से तो बच गई लेकिन मन में न जाने कितने अन्युत्तरित प्रश्न छोड़ गई। तभी दूरदर्शन  पर समाचार आ रहा था ’आर्कुट वरदान या अभिशाप’। मैंने सोचा यह नेट का नशा कुछ ज्यादा ही लोगों को चढ़ गया है। यहां तक कि  आदमी अपनी जिम्मेदारियां भी भूलने लगा है।<br />
   कुमारिका  बचे खुचे खंड़ित ,सिसकते अरमानों की लाश उठाए जी रही है उसके अन्दर की औरत तो कब की मर चुकी है ???</p>
<p style="text-align:left;">  लेखिका: डा. रमा द्विवेदी</p>
<p style="text-align:left;">
<table id="datatable" class="tbldata" border="0" cellspacing="0" cellpadding="2" width="100%" summary="List of messages">
<tbody>
<tr class="msgold">
<td class="fixwidth"> </td>
<td>
<div>
<h2><a title="© All Rights Reserved" href="http://ramadwivedi.wordpress.com/wp-admin/compose?fid=Draft&#38;mid=1_2890_AMERaMsAAWwOSCk2owoJohAILBI&#38;draft=1&#38;uc=0&#38;.rand=1434857012"><span style="color:#003399;">© All Rights Reserved</span></a></h2>
</div>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
</blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ ललक शहर में शादी की]]></title>
<link>http://ramadwivedi.wordpress.com/2007/07/18/lalak/</link>
<pubDate>Wed, 18 Jul 2007 10:17:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>ramadwivedi</dc:creator>
<guid>http://ramadwivedi.wordpress.com/2007/07/18/lalak/</guid>
<description><![CDATA[
         बड़े पिता जी का पत्र आया था। पत्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p align="left">         बड़े पिता जी का पत्र आया था। पत्र में लिखा था कि संध्या बहुत चिड़चिड़ी हो गई है। बात-बात पर झगड़ा करती है। किसी से ठीक से बात ही नहीं करती। हर समय लड़ना-झगड़ना,रोना -धोना मानो यही उसकी दिनचर्या बन गई है।मैं बहुत दुखी हूं ,समझ में नहीं आ रहा कि इसके जीवन को ठीक से व्यवस्थित करने के लिए ऐसा क्या करूं कि वह बाकी का जीवन खुशी से गुजार सके। तुम ही कुछ उपाय बताओ। पत्र पढ़कर मैं सोच में डूब गई।</p>
<p align="left">         मैं अतीत की अतल गहराईयों में झांकने लगी।तब मैंने पाया कि संध्या जब नौ बरस की थी तब बड़ी मां बहुत बीमार रहती थीं। दिन में कई-कई बार उन्हें हिस्टीरिया के दौरे पड़ते थे। गांव में डाक्टर तो थे नहीं हां जो भी नीम-हकीम दवा बताते की गई। एक दो बार शहर के डाक्टरों को भी बताया गया,उन्होंने कहा कि ज्यादा मानसिक तनाव की वजह से ऐसा होता है। इन्हें आराम की शख्त जरुरत है। समय समय पर चेक-अप के लिए लाएं और जो दवाई दी गई है उसे समय पर देते रहें और तनाव से दूर रखें। </p>
<p align="left">            घर पर कोई और औरत तो थी नहीं और बड़े पिता जी तो अक्सर खेती-बाड़ी के काम-काज और राजनीति में उलझे रहते।मां तो अक्सर बिस्तर पर पड़ी रहती किन्तु घर के काम-काज का भार नन्हीं सी जान संध्या पर आ पड़ा। खाना पकाना,बरतन धोना, और घर बुहारना इन्हीं सब कामों में दिन निकल जाता अत: संध्या की पढ़ाई बन्द हो गई। दुर्भाग्यवश संध्या पांचवीं तक भी न पढ़ सकी। वैसे भी गांव में प्राइमरी स्कूल ही था इसलिये ज्यादा पढ़ाई की तो संभावना भी नहीं थी। मां अपनी बीमारी से लाचार थी  और पिता जी जीवन की अन्य समस्याओं को सुलझाने में उलझे रहते। संध्या की पढ़ाई की ओर उनका ध्यान ही नहीं गया। बड़ी मां को सिर्फ अक्षर ज्ञान ही था अत: वे इतना ही सोच पाती थी कि पढ़ लिख कर नौकरी थोड़ी ही करनी है। घर का चौका-चूल्हा ही तो करना है इसलिये संध्या की पढ़ाई बंद होने का  उन्हें लेशमात्र भी दु:ख नहीं हुआ।<br />
           "समय ढ़लता रहा और संध्या का कोमल बचपन चूल्हे की भेंट चढ़  गया। सपने जन्म ही न ले सके उड़ान भरनें की बात कौन कहे?"लेकिन सोलवां बसन्त पार करते-करते उसके दिल में यह बात अवश्य ही घर कर गई कि सुख तो अब शादी के बाद ही मिल सकता है,वो भी तब अगर शहर में शादी हुई तो? गांव में त्तो ऐसे ही काम करना पड़ेगा और उसका मन काम से ऊब चुका था। उसकी इस सोच में उसकी सहेली सुदामिनी की सलाह ने आग में घी का काम किया। जब बड़े पिता जी ने उसका रिश्ता एक अच्छे खाते -पीते घर में तै कर दिया किन्तु लड़के का रंग काला था। जब संध्या ने यह सुना तो उसने रो-रोकर घर भर दिया कि मैं काले लड़के से शादी नहीं करूंगी और मर जाने की धमकी दे डाली। आखिर में पिताजी ने रिश्ता तोड़ दिया। जब दूसरी बार पिताजी ने अच्छा लड़का और परिवार देखकर बात तै कर दी तब संध्या से अपने गांव की  एक लड़की ने जो उसी गांव में ब्याही थी,उसने कहा कि वह उसके घर दान लेने आया करेगी क्योंकि उसके होने वाले ससुराल के लोग उसके घर पूजा करवाने आते हैं बस इतनी बात संध्या को चुभ गई और उसने शादी करने से विद्रोह कर दिया। इसी बीच उसकी सहेली ने उसके मन में यह बात डाल दी कि गांव में कभी शादी मत करना जीवन भर ऐसे ही काम करना पड़ेगा। उसकी यह बात उसे बहुत ठीक लगी।</p>
<p align="left">           अपनी इच्छा पूर्ति न होते देख उसने मां से दोटूक शब्दों में कहा"मां मैं शहर में शादी करूंगी चाहे वह कुली ही क्यों न हो" ?<br />
 मां बेटी की यह बात सुनकर अवाक रह गई,उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ" उन्होंने कहा यह तू क्या कह रही है? तुझे कुछ होश है"?<br />
 संध्या ने अपनी बात बड़े आत्म-विश्वास से दोहराई-" मैं गांव में शादी नहीं करूंगी अगर शादी करूंगी तो शहर में नहीं तो मैं आत्म हत्या कर लूंगी"।<br />
           मां ने उसे बहुत समझाया-बुझाया लेकिन संध्या थी कि अपनी जिद पर अड़ी रही। मां अब क्या करती? बेटी पर तरस आया और उन्होंने  पिता जी से संध्या की सारी बात कह दी। पहले तो पिताजी बहुत नाराज हुए,कई दिन तक घर में तनाव रहा। बेटी को ऊंच-नीच सब प्रकार से समझाने की कोशिश की लेकिन संध्या टस से मस न हुई। आखिर में पिताजी ने लड़के वालों को मना कर दिया।<br />
           कुछ ही समय बाद गांव के तिवारी जी की बेटी रन्नो की शादी हुई । बारात शहर से आई थी। संध्या भी इस शादी को देखने गई। सभी बाराती साफ़-सुथरे, सुन्दर वेशभूषा  में थे। बातचीत में तो शहर के लोग शिष्ट और चतुर होते ही हैं। संध्या ने देखा कि रन्नो की शादी में सुन्दर गहने एवं साड़ियां आईं हैं। दूल्हा भी बहुत सुन्दर और स्मार्ट है। बस यह सब देखकर उसकी इच्छा शहर में शादी करने की और भी दृढ़ हो गई।<br />
              ज्यादा दुनिया तो देखी नहीं थी। छोटी सी बुद्धि में आगे  कुछ सोचने-समझने की शक्ति नहीं थी। संध्या गोरी, तीखे नाक-नक्श,छरहरा बदन,कुल मिलाकर उसकी आकर्षक छबि थी और देखने वाले भी सहज ही आकर्षित हो जाते। इसी विवाह में किसी ने संध्या को देखा। रूप-रंग पसंद आने के कारण रन्नो के घरवालों से पता करके रिश्ता लेकर पिताजी के पास आए। चूंकि रिश्ता रन्नो के ससुराल वालों के माध्यम से आया था इसलिए पिता जी को कोई शक नहीं हुआ। सीधे-सादे  पिता जी को क्या पता था कि इसमें कुछ छ्लावा भी हो सकता है फिर अपनी बेटी की इच्छा भी तो शहर में  शादी करने की थी इसलिए पिताजी ने ज्यादा छान-बीन नहीं की ।बस एक बार नागपुर जाकर लड़का और उसका घर देख आए। शहर के लोग ठहरे चालाक उन्होंने किसी और की दुकान को अपना कह कर बता दिया। पिता जी को सब ठीक लगा इसलिए सगुन देकर वापस आ गये।<br />
          लड़के वालों ने सिर्फ एक ही महीने में शादी करने की बात रखी। शादी की तैयारियां शुरू हुईं और एक दिन संध्या की शादी बड़ी ही सादगी से संपन्न हो गई।" संध्या बहुत खुश थी कि उसकी सबसे बड़ी साध पूरी हो गई। उसका मन कल्पना लोक में विचरण कर रहा था"। आखिर में वो समय भी आ गया जब संध्या की विदाई मां-पिता जी ने बड़े ही भारी मन से कर दी। जब संध्या ससुराल पहुंची और देखा कि घर में ऐसा कुछ नहीं है जिसे देखकर खुश हुआ जा सके। संध्या को शीघ्र ही पता चल गया कि पति शराबी है और निठल्ला भी है।न कोई नौकरी न व्यापार । बस एक पुराना घर है जिसका एक पोरशन किराए पर है  उसी से बहुत मुश्किल से  घर चलता है। बूढ़ी मां और एक कुंवारी बहन शादी के योग्य है। तीन बहनों की शादी बहुत पैसों वालों के घर तब हो गई थी जब उनके पिता जी जिन्दा थे क्योंकि तब उनके पिताजी का अच्छा व्यापार था और अच्छा नाम भी था। उनके न रहने पर लड़के ने सब गंवा दिया शराब के नशे में। कितना ही अथाह धन क्यों न हो अगर खर्च ही खर्च किया जाय तो तिजोरी भी खाली हो जाती है।यही हाल यहां हुआ। कभी -कभी बहनें पैसों से इनकी मदद कर देतीं थीं लेकिन किसी की मदद से कब तक चल सकता था? तीनों  बहनों ने मिल कर छोटी बहन की शादी अच्छा घर-वर देख कर करवा दी किन्तु फिर इन लोगों की आर्थिक मदद करना बन्द कर दिया। पति के दुर्व्यवहार और कुछ काम न करने से संध्या बहुत दुखी रहने लगी। उस पर सास यह ताना देती कि उनका बेटा उसके आने से ही बिगड़ गया है। सास के ताने सुन-सुन कर संध्या यह सोचती कि जो कभी सुधरा ही नहीं था वह बिगड़ कैसे गया?इन्हें अपने बेटे के लक्षण मालूम थे फिर भी इन्होंने छलावे से झूठ बोल कर शादी करवा दी ।यह सोच कर वह बहुत दुखी और उदास रहने लगी कि वह और उसके माता-पिता बुरी तरह छले गए हैं।उसका स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन गिरने लगा। ऐसे ही करीब पांच वर्ष बीत गए लेकिन उसने किसी को कुछ नहीं बताया। किस मुंह से बताती क्योंकि वह खुद ही तो शहर में शादी करना चाहती थी। पहले ही उसने मां और पिता जी को बहुत कष्ट दिये हैं अब और नहीं देगी। शायद इसी लिए भगवान ने उसे सजा दी है जो ऐसा पति मिला,अब यही मेरा प्रारब्ध है। नियति को कौन टाल सकता है? अब मुझे इसी नर्क में जीना है अब मैं किसी को दुख नहीं दूंगी। दुख और संघर्षों का प्रभाव तो स्वास्थ्य पर निश्चित ही पड़ता है। संध्या के मलिन मुख और दुबले शरीर को देख कर मां-पिताजी समझ गए कि वह खुश नहीं है,कोई बड़ा गम है जो उसे अन्दर ही अन्दर  खाए जा रहा है? एक दिन पिता जी ने बड़े प्यार से उसे अपने पास बिठाकर अपनी कसम देकर पूछा "सच सच बताना कि तुम वहां खुश तो हो ना"? संध्या थोड़ी देर तो चुप रही,उसके मन में द्वन्द्व का तूफ़ान उठा कि बताए या नहीं ?लेकिन उसका दर्द भी असहनीय होता जा रहा था इसलिए यह सोचकर कि मां और पिता जी तो अपने हैं वे अवश्य उसका दर्द समझेंगे । वह कुछ कहना चाहती थी पर कंठ से शब्द नहीं फूट रहे थे। आखिर में दर्द आसुंओं में बह निकला। संध्या फफक-फफक कर रो पड़ी। पिता जी ने उसे प्यार से थपकियां देते हुए गले से लगा कर कहा"पगली इसमें रोने की क्या बात है? हम हैं ना तेरे दुख को समझने के लिए। संध्या ने आपबीती सब कुछ बता दिया। पिताजी और  मां अवाक रह गए। उन्हें लगा कि वे बुरी तरह ठगे गए हैं। मां-पिता जी का दुख संध्या से देखा नहीं गया और उसने कहा कि वे उसकी चिन्ता न करें ।वह कैसे भी  रह लेगी किन्तु कोई भी माता-पिता बेटी का दुख जानकर चुप  कैसे बैठे रह सकते हैं? पिताजी ने दमाद को समझाया-बुझाया लेकिन उसने उनकी एक बात न सुनी। शराब की बुरी लत जो पड़ चुकी थी जिसने उसकी बुद्धि को भी नष्ट कर दिया था। अंत में जब कोई समाधान न रहा तब हारकर पिताजी संध्या को हमेशा के लिए घर ले आए"।<br />
           संध्या के सुनहरे सपने यथार्थ की धरती पर गिर कर चूर-चूर हो गए थे फिर भी उम्मीद की एक आस  लिए वह सुख की असीम  आकांक्षा लेकर जिए जा रही "।<br />
            संध्या को वैवाहिक जीवन से कोई सुख मिला ही नहीं ऐसी स्थिति में उसका चिड़चिड़ा हो जाना स्वाभाविक ही था। वो भी तीन बच्चों के साथ जीवन की मुसीबतें कुछ कम नहीं थीं। मुझे संध्या पर बहुत तरस आता।<br />
             मां-पिताजी भी बहुत दुखी रहते। बेटी को दुखी देखकर कौन मां-बाप खुश रह सकते हैं?<br />
              मैंने बड़े पिताजी को पत्र में लिखा कि जो होना था  वो तो हो गया। संध्या को कोई छोटा बिजनेस करवा दें। इससे एक तो उसका मन लगा रहेगा और वह आर्थिक रूप से स्वावलंबी भी बन जाने से उसके हृदय का दर्द भी कुछ कम हो जाएगा। वह क्रोशिया वर्क और इम्ब्रायडरी वर्क में बहुत निपुण है क्यों नहीं  उसे  यह काम करने के लिए प्रोत्साहित करते? बाज़ार में इसकी मांग भी बहुत है। थोड़ी सी ट्रेनिंग लेकर वह यह काम शुरू कर सकती है। सरकार भी महिलाओं को बिजनेस शुरू करने के लिए बहुत कम सूद पर कर्ज़ देती है। आप उसे किसी न किसी काम में अवश्य लगाईए ,सब कुछ ठीक हो जाएगा। उसकी दोंनो लड़कियों और लड़के  को पढ़ाना भी बहुत जरूरी है ताकि भविष्य में वे कोई भी मुश्किल का सामना स्वयं करने में सक्षम बन सकें। इतना लिखकर मेरे मन को कुछ शान्ति मिली और मैं उसके सुखद भविष्य की कामना के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने लगी ।  *****</p>
<p align="left">                    लेखिका: डा. रमा द्विवेदी</p>
<p align="left">                    <a href="http://ramadwivedi.wordpress.com/ym/Compose?DMid=1931_540543_10140_419_26_0_24948_-1_0&#38;YY=35261&#38;y5beta=yes&#38;y5beta=yes&#38;inc=25&#38;order=down&#38;sort=date&#38;pos=1&#38;view=a&#38;head=&#38;box=Draft" id="folderviewmsg3subjlink"><font color="#003399">© All Rights Reserved </font></a></p>
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ संवेदनाओं के पुल]]></title>
<link>http://ramadwivedi.wordpress.com/2007/04/13/samvedanaaonkepul/</link>
<pubDate>Fri, 13 Apr 2007 13:47:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>ramadwivedi</dc:creator>
<guid>http://ramadwivedi.wordpress.com/2007/04/13/samvedanaaonkepul/</guid>
<description><![CDATA[
                                          कहानी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p align="left">                                          कहानीकार: डा. रमा द्विवेदी</p>
<p align="left">
                        "प्रेम" शब्द अपनेआप में कितना व्यापक अर्थ रखता है,कितनी गहराई तक इसकी जड़े समाहित होती हैं? कितनी ऊर्जा प्रदान करता है? संघर्षों से जूझने की कितनी शक्ति देता है? मनुष्य के चरित्र को कितना ऊंचा उठाता है यह "प्रेम"।यह तो वही बता सकता है जिसने कभी सच्चा प्रेम किया हो ।अक्सर रिश्तों में अधिकार की भावना इस प्रेम को बोझिल बना देती है, क्योंकि प्रेम शर्तों पर नहीं किया जा सकता ।'प्रेम'स्वत: अनायास ही उगता है,पल्लवित पुष्पित होता है,और अपना साम्राज्य स्थापित कर लेता है लेकिन यह सब कुछ होता है संवेदनाओं की नींव पर। अगर प्रेमासिक्त संवेदनाएं दो दिलों में न उगें तो संवेदनाओं के पुल का निर्माण कभी नहीं हो सकता} 'प्रेम' में सिर्फ़ देने की भावना ही होती है पाने की चिन्ता तो वे नहीं करते जो किसी से सच्चे दिल से प्रेम करते हैं।<br />
                    प्रेम-पूर्ण द्रिष्टिमनुष्य को आकाश की ऊंचाईयों तक पहुंचा सकती है। प्रेमाश्रु से नख-सिख तक सराबोर कर सकती है। इसी प्रेम द्रिष्टि ने लैला-मजनूं,हीर-रांझा,<br />
शीरी-फ़रियाद, सोहनी-महिवाल व रोमियो-जूलियट को महान बना दिया । यही द्रिष्टि पत्थर में भी प्राण फूंक देती है।हीरा को तराश कर सचमुच हीरा बना कर बेशकीमती  बना देती है। इसी प्रेम द्रिष्टि ने मीरा को दीवानी मीरा और राधा को क्रिष्ण की आह्लादिनी शक्ति बनाकर अमरत्व प्रदान किया।न जाने कितने सूर्यों की ऊष्मा और न जाने कितने च्न्द्रमाओं की शीतलता रखती है यह द्रिष्टि। सागर की गहराई भी इसके सामने छोटी जान पड़ती  है । यह द्रिष्टि पाने वाला व्यक्ति सात समन्दर पार बैठे व्यक्ति को भी अपने दिल के करीब महसूस करता है या यूं कहें कि प्रेम द्रिष्टि वह दूरबीन है जो अपने प्रिय को अपने अन्दर ही देखती है।<br />
            ऐसी ही प्रेम द्रिष्टि पाई थी मानसी और विराट ने। उनका विवाह माता-पिता की इच्छानुसार बिना लेन-देन के बड़ी ही सादगी से संपन्न हुआ था।  लाड़ली मानसी की विदाई उसके माता-पिता ने बड़े ही भारी मन से की थी । लड़की के माता-पिता को कुछ तो दु:ख या चिन्ता तो होती ही है कि नए घर,नए लोग व नए माहौल में उनकी बेटी सहज महसूस करेगी या नहीं। फिर भी दिल पर पत्थर रखकर बेटी को दूसरे घर विदा करना ही पड़ता है।<br />
               विराट की पढ़ाई अभी पूरी नहीं हुई थी। वह पी.एच.डी. करने के लिए विदेश जाना चाहता था इसलिए उसके माता-पिता ने जल्दी ही उसकी शादी सुन्दर सुशील एवं पढ़ी लिखी मानसी से करवा दी। विराट बहुत ही कुशाग्र बुद्धी के मेधावी छात्र के साथ-साथ सह्रदय इंसान भी थे।उसने पहले दिन से ही मानसी का ख्याल रखा ताकि उसके घर में उसे कोई तकलीफ न हो फिर भी घरवालों का व्यवहार कुछ न  कुछ गड़बड़ा ही जाता। विराट को  यह सब अच्छा तो न लगता फिर भी वो उन्हें कुछ  भी न कहता किन्तु मानसी के समक्ष माफ़ी मांग लेता। मानसी के लिए तो विराट का प्रेम ही उसका संबल था,इसी तरह दो माह बीत गए।<br />
                एक दिन एक पत्र प्राप्त हुआ, विराट ने उसे पढ़ा और खुशी से उछल पड़ा ।उसे 'प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी' में पी. एच. डी. के लिए एडमीशन मिल गया था और उसे जल्दी ही वहां जाना था।"विराट की इस खुशी में मानसी भी शामिल थी,किन्तु दिल के किसी कोने में एक चिन्ता थी कि वह विराट से अलग होकर इतने लंबे समय तक कैसे रहेगी? एक अन्जान भय भी था कि अगर विराट वापस नहीं  आए तो?"पहले तो मानसी ने विराट को जाने की स्वीक्रिति नहीं दी किन्तु जब  विराट ने आश्वस्त किया कि पढ़ाई पूरी होते ही वह शीघ्र वापस आ जायेगा या संभव हुआ तो उसे ही अपने पास बुला लेगा। मानसी के मन में कई दिन तक उथल-पुथल होती रही यह सोचकर कि जो विदेश जाता है,वापस ही नहीं आता लेकिन उसने अपने मन को यह कहकर समझा लिया कि जो होगा देखा जायेगा। उसे विराट की बातों पर विश्वास था इसलिए अग्यात भय से कंपित होते हुए भी उसने विराट को जाने की स्वीक्रिति दे दी। वह उसके उज्जवल भविष्य में बाधक नहीं बनना चाहती थी किन्तु उसने  विराट से यह आश्वासन  अवश्य ले लिया कि वो निरन्तर पत्र लिखेगा या फोन करेगा। विराट ने उसकी यह मांग सहर्ष  मान ली क्यों नहीं मानता? वह भी तो मानसी से दूर नहीं रहना  चाहता था।<br />
                 विराट के जाने की तैयारियां शुरू हुईं। समय के जैसे पंख लग गए हों। शीघ्र ही वो दिन भी आ गया जब विराट सबको छोड़ कर दूर जा रहा था। परिवार के सभी लोगों के साथ मानसी भी उसे विदाई देने एयरपोर्ट गई।  सामान की चेकिंग के बाद विराट एक बार फिर अंतिम विदा लेने के लिए आया। रेलिंग के उस पार से उसने अपने लोगों  से थोडी बातें की सबसे हाथ मिलाकर अंतिम विदाई ली किन्तु उसने मानसी को बड़ी ही दयनीय प्रेमपूर्ण द्रिष्टि से देखा,शब्द मौन हो गए  थे। क्या था उस प्रेमद्रिष्टि  में-प्रेम-आश्वासन-या बिछुडने का दु:ख।<br />
कभी-कभी यह द्रिष्टि भी कितनी गहरी-प्रखर-मुखर हो जाती है कि बिना कुछ कहे ही  क्या-क्या नहीं कह देती?जो भी था विराट की वह द्रिष्टि मानसी के ह्रिदय में सीधे उतर गई। एक बार तो उसे लगा कि उसका कलेजा ही बाहर आ जायेगा और वो फूट-फूट्कर रो पडेगी किन्तु उसने मुश्किल से अपने को संयत कर लिया। बस वो एक द्रिष्टि को दिल में बसाए घर वापस आ गई। विराट का प्रेम ही अब उसके जीवन को चलाने का आधार बन गया।<br />
                 कुछ हफ्तों  के बाद विराट का पत्र आया कि अब वह व्यवस्थित  हो गया है। अन्य तमाम बातों के साथ लिखा था कि वह अपना विशेष ख्याल रखे। अगर मन न लगे तो अपने माता-पिता के घर चली जाए, वो अपने माता-पिता से कह देगा। वे उसे भेजने से मना नहीं करेंगे।इस तरह महीने साल बीत गए। मानसी कभी अपने माता-पिता के घर और कभी विराट के घर आती जाती रही किन्तु विराट की कमी हमेशा  खलती रही लेकिन विराट के स्नेहपूर्ण पत्रों के सहारे सदैव ही उसे अपने पास महसूस करती। अक्सर अपने मन को यह कह कर समझा लेती कि पढ़ाई पूरी होते ही शीघ्र ही वापस आ जायेगा।<br />
                अकस्मात मानसी कुछ ऐसी बिमार पड़ी कि बहुत इलाज करवाने के बाद भी उसकी सेहत में सुधार नहीं हो रहा था वह दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही थी। डाक्टरों को समझ में  नहीं आ रहा था कि उसका 'ब्लडप्रेशर लो' क्यों रहता है?घर के लोग भी चिन्तित रहते कि हम विराट को सूचित कर देते हैं किन्तु मानसी उन्हें बताने न देती यह कहकर कि पढ़ाई छोड़कर आ जायेंगे। कुछ ही महीनों की तो बात है। मानसी का स्वास्थ्य निरन्तर गिरता जा रहा था। स्थिति गंभीरता को भांपकर विराट की मां ने विराट  को यह सूचना दी कि मानसी की तबियत काफी नाजुक है। विराट को जैसे ही यह खबर मिली वो उस रात सो नहीं सका। तमाम कुशंकाओं ने उसके  मन को बेचैन कर दिया। अब उसकी  एक ही चिन्ता थी कि वह शीघ्र ही मानसी के पास पहुंच जाए। सुबह होते ही बड़ी मुश्किल से टिकट का बंदोबस्त किया और शीघ्र ही हवाई जहाज में बैठ गया किन्तु सफ़र था कि काटे नहीं कट रहा था। कुछ घंटे वर्षों के समान प्रतीत हो रहे थे । तरह -तरह के  बुरे ख्याल उसके  मन -मस्तिष्क को उद्वेलित करते रहे जैसे -तैसे प्रतीक्षा की घड़ियां समाप्त हुईं और विराट मानसी के पास  पहुंच गया।<br />
              मानसी बहुत कमजोर हो गई थी इसलिए बिस्तर से उठ भी नहीं सकती थी। विराट ने उसके हाथों को अपने  हाथ में लेकर चूम लिया और बोला-"तुमने यह क्या हालत बना ली है अपनी? ऐसा कौन सा ग़म है जो तुम्हें अन्दर ही अन्दर खाए जा रहा है? अब मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगा । तुम जल्दी से ठीक हो जाओ"। मानसी बहुत खुश थी कि विराट उसके पास था किन्तु दु:ख इस बात का था कि वो अपनी पढ़ाई पूरी किए बिना ही उसके कारण वापस आ गया। मानसी ने विराट को बहुत समझाया कि वह उसकी चिन्ता न करे। वह ठीक है,शीघ्र वापस चला जाए और अपनी पढ़ाई  पूरी करे। विराट ने कहा-"नहीं मैं अब तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगा"। दोनों में बहुत बहस हुई इस बात पर," मानसी ने कहा कि यह संभव नहीं है। अभी तुम्हारी नौकरी भी नहीं है, कैसे तुम मेरा खर्च उठाओगे"?लेकिन विराट ने उसकी एक न सुनी और विराट ने ही अपने माता-पिता से कहा कि वो मानसी को साथ ले जाना चाहता है। पहले तो उन्हें इस बात पर असमंजस हुआ किन्तु जब विराट ने हठ की  तो माता-पिता मान गए।आखिर बेटे की खुशी में ही उनकी खुशी थी। काफी भागदौड़ व कागजी कार्यवाही के पश्चात मानसी को साथ ले जाने का "वीज़ा" मिल गया। विराट मानसी को लेकर वापस चला गया।<br />
                    मानसी को माता-पिता व सास-ससुर  को छोड़ने क दु:ख तो अवश्य था किन्तु विराट के साथ रहने की खुशी ने इस ग़म को भुलाने में मदद की ।  वहां पहुंच कर विराट ने मानसी का इलाज करवाया । कुछ तो दवाईयों का असर था और अधिक विराट के प्यार एवं निकटता से मानसी के स्वास्थ्य में आश्चर्यजनक सुधार होने लगा और शीघ्र ही  मानसी ठीक हो गई लेकिन विराट को इस बीच काफी  श्रम करना पड़ा अधिक धनार्जन करने के लिए । विराट अधिक से अधिक समय काम करता जिससे उसकी पढ़ाई पूरी होने में विलंब हो गया । जब मानसी को यह पाता चला कि विराट आर्थिक संकट से जूझ रहा है तब उसने एक परिचित की सहायता से नौकरी ढूंढ़ ली और एक स्टोर में नौकरी करने लगी । नौकरी छोटी ही थी किन्तु विराट के लिए यह बहुत मददगार साबित हुई उनके जीवन की जरूरतें पूरी होने लगी।"अहसास  बताने की नहीं अनुभूति की  वस्तु होती है। अनुभूति स्वयं सब कह देती है। दिखावा-छ्लावा में दो रिश्तों के बीच सेतु बन नहीं सकते और झूठ कभी टिकाऊ नहीं होता। कुछ लोग स्वाभाव के गंभीर होते हैं वे अपना स्नेह ठीक से दिखा नहीं पाते। बेमौसम के बदरा से बरसते नहीं । गंभीर और परिपक्व प्यार ही टिकाऊ होता है और जीवनरूपी गाडी को संतुलित रखने के लिए एवं चलाने के लिए ऐसे ही आत्मीय-विश्वसनीय क्षणों की ही आवश्यकता होती है,जो तपती धूप में एक दूसरे के लिए शीतल छांव बन जाए । ह्रिदय से ह्रिदय का जोड़ इससे ही मजबूत बनता  है।" मानसी ने विराट को प्रोत्साहित किया कि वो अपनी पढ़ाई शीघ्र ही पूरी  करे तब तक वो काम करेगी । विराट ने  अपना अधिक से अधिक  समय पढ़ाई में लगाया और कुछ ही महीनों में उसको पी.एच.डी. की डिगरी भी मिल गई । दोनों उस दिन बहुत खुश हुए । प्रयास करने पर एक अच्छी साफ्टवेयर कम्पनी में नौकरी भी मिल गई तब विराट ने मानसी का काम करना बन्द करवा दिया । जीवन खुशी-खुशी बीतने लगा । ऐसे ही कई वर्ष बीत गए। इस बीच वे मैत्रेयी और अंश दो बच्चों के माता-पिता भी बन गए। मानसी बच्चों के पालन-पोषण,पढ़ाई-लिखाई में उलझी रहती और विराट आफिस के काम में व्यस्त रहता। सब कुछ ठीक ही चल रहा था।<br />
                मुसीबत बता कर नहीं आती । अचानक नई सरकार बनने से अमेरिका की आर्थिक व्यवस्था  चरमरा गई और हजारों लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। यह गाज विराट पर भी गिरी । ज्यादातर लोग अपने-अपने वतन को लौट गए किन्तु विराट और मानसी वहीं बने रहे।<br />
कुछ महीनों तक तो बचत से काम चला लेकिन शीघ्र ही उन्हें लगने लगा कि अगर काम नहीं मिला तो आगे जीवन निर्वाह करना मुश्किल हो जायेगा । तब दोनों ने नौकरी के लिए हाथ -पांव मारना शुरू किया । उन्हें जो भी छोटी बड़ी नौकरी मिली दोनों करने लगे जीवन सुविधापूर्ण तो नहीं लेकिन किसी तरह चलने लगा । कुछ ही वर्षों में जब आर्थिक व्यवस्था में सुधार हुआ विराट को फिर अच्छी नौकरी  मिली किन्तु कड़ी मेहनत करके ही दोनों आगे बढ़ सके एवं बच्चों को पढ़ा-लिखा  कर स्वावलंबी बना सके।<br />
                इस तरह जीवन के तीन दशक कब बीत गये उन्हें पता ही नहीं चला?"आज जब दोनों सोचते हैं तब लगता है कि अगर एक दूसरे का साथ न होता तो इस परदेश में वे किसके सहारे  जीवन गुजारते? उनके जीवन में कई ऐसे झंझावात आए जो उनके जीवन को बुरी तरह झकझोर देते थे लेकिन ये संवेदनाओं के ऐसे पुल थे जो हिल तो जाते थे लेकिन कभी ढ़ह नहीं सके। उनके बीच जो प्रेम-आत्मीयता-विश्वास  की ऊष्मा व ऊर्जा थी वो आज भी वैसी ही तरो-ताजा है उसमें कहीं भी लेशमात्र भी बदलाव नहीं आया ।"<br />
              "काश !आज की नई पीढ़ी के पति-पत्नी में भी ऐसी संवेदनशील सोच-समझ व आत्मीयता होती जो जीवन की कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करने की शक्ति दे सकती और छोटी-छोटी बातों को लेकर स्थिति तलाक तक तो न पहुंचती।"<br />
                                        *************</p>
<p align="left">      डा. रमा द्विवेदी<br />
© All Rights Reserved</p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ ऊर्जस्विता        (कहानी)]]></title>
<link>http://ramadwivedi.wordpress.com/2006/11/07/oorjisvtaakahanee/</link>
<pubDate>Tue, 07 Nov 2006 02:29:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>ramadwivedi</dc:creator>
<guid>http://ramadwivedi.wordpress.com/2006/11/07/oorjisvtaakahanee/</guid>
<description><![CDATA[
 शूल केवल फूलों में ही नहीं उगते बल्कि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p align="left"> शूल केवल फूलों में ही नहीं उगते बल्कि ये हर समाज में शब्दों या अपहब्दों के  रूप में अपने डैने फैलाए चाहे-अनचाहे अपनी परिधि में जकड    कर अपने डंक चुभाते हैं  जिसकी असहनीय पीडा से व्यक्ति छटपटा कर रह जाता है अगर वह मरता नहीं तो  मरणतुल्य जीवन जीने के लिए अभिशप्त अवश्य हो जाता है। उसकी आत्मा में एक नासूर  अवश्य बन जाता है जो हर वक्त रिसता रहता है। समाज में उपेक्षित होकर जीने एवं आत्मग्लानि में मनुष्य का आत्मविश्वास एवं आत्मसम्मान सब कुछ चुक जाता है।<br />
        उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जनपद के एक बहुत ही छोटे से गांव"उमरी" में स्वयंप्रभा का जन्म हुआ था। इस गांव की आबादी लगभग पांच हजार होगी। स्वयंप्रभा के जीवन की नींव इसी गांव में रखी गई। एक भाई और एक बहिन में वह सबसे छोटी थी इसलिए माता-पिता की अधिक लाडली थी। उसके माता -पिता ने बडे ही प्यार-दुलार से उसका पालन-पोषण किया था।गांव के नैसर्गिक सौन्दर्य में उसके बचपन कोजीवन का नया अर्थ मिला था।  पीपल की छांव में झूले झूलना,बूढे बरगद के नीचे बने देवी के मंदिर के अहाते में लुका-छिपी खेलना , अमरूद के बगीचे से अमरूद चुरा कर तोडना-खाना, पत्थर मारकर कच्चे आम तोडना, बेरी-झरबेरी के बेर चुन कर खाना ,तालाब में नहाना-तैरना, लहलहाते खेत और पास में एक पोखर जिसमें सिंघाडे की बेल पडी रहती उसमें से वह कभी भी कच्चे सिंघाडे तोडकर खाती। बहुत ही मदमस्त जीवन था ।किसी अन्य सुख की चाह कभी नहीं हुई।<br />
          गांव में बालिकाओं के लिए एक छोटी सी पाठशाला  थी। एक बाईजी पढाती थी जो पढाती कम मारती-डांटती ज्यादा थी। इनकी भी बडी अजीब कहानी थी। सफेद साडी में लिपटी कंचन काया और युवावस्था का तेज मुख पर दमकता था।वे देखने में त्याग की सजीव मूर्ति लगती थी।वे बाल विधवा थी।जन्म से ही एक-नेत्रा थीं। पिता-भाई के सुख से वंचित थीं।घर में केवल विधवा मां थी। जीवन की गाडी चलाने के लिए ही नौकरी करती थीं। हर रोज पांच मील पैदल चलकर आती जाती थी। पढी लिखी ज्यादा नहीं थीं लेकिन पता नहीं नौकरी कैसे मिल गई थी।<br />
          जब स्वयंप्रभा पांच बरस की हुई तो शुभ दिन देखकर पाटी पूजन कर उसका नाम इसी पाठशाला में लिखवा दिया गया। स्वयंप्रभा बहुत मेधावी किन्तु चंचल स्वाभाव की थी। पढाई तो वह पलक झपकते कर लेती और कक्षा में वह सबसे अव्वल रहती। इस तरह बाई जी के क्रोध का भाजन उसे कभी नहीं होना पडा लेकिन दूसरों को पिटता देखकर और हमेशा बाईजी के हाथ में छडी देख वह डरती अवश्य थी। उसे मार खाना बिल्कुल पसन्द नहीं था। उसके साथ उसकी सहेली मालिनी  भी पढती थी। वह पढने में कमजोर थी पर इसकी उससे खूब बनती थी। एक दिन वह मालिनी के साथ खेलने उसके घर चली गई लेकिन मालिनी यह कहकर  घर के अन्दर चली गई कि वह उसका इन्तजार करे वह अभी आती है। जब वह काफी देर तक नहीं आई तो उसने दरवाजे की आड से उसके घर में झांक कर देखा। कई औरतें बैठी बातें कर रहीं थीं। तभी एक औरत ने उसकी  तरफ उंगली  दिखा कर दूसरी से पूछा यह किसकी लडकी है?<br />
     दूसरी ने कहा-तुम नहीं जानती "यह तो उसी कुलटा पंडिताइन की बेटी है जो दूसरा खसम कर गयी है।"<br />
      "दूसरे ने आश्चर्य  से हां में हां मिलाई"।<br />
    यह बात सुनकर स्वयंप्रभा के तन-बदन में आग लग गई किन्तु वह कुछ बोल न सकी और चुपचाप  अपमान का विष पीकर वहां से वापस घर आ गई। कई दिन तक वह बहुत उदास रही पर उसने किसी से कुछ नहीं कहा।<br />
यूं तो सात बरस की  आयु कोई  अधिक तो नहीं होती लेकिन स्वयंप्रभा को यह बात अवश्य समझ में आ गई कि यह बात उसकी मां के लिए सम्मानजनक नही थी। उसके ह्रिदय में यह अपमानित क्षण बहुत गहरे पैठ गया। उसके मन में समाज के ऐसे लोगों के प्रति क्षोभ और घ्रिणा उत्पन्न हो गई और उसने मन में कोसते हुए कहा कि समाज के ऐसे लोग ही तो शब्दों के शूल चुभा-चुभा कर जिस्म और आत्मा को लहूलुहान करते रहते हैं। वह ऐसे शूल अपने को कभी चुभने नहीं देगी।<br />
          वह बहुत संवेदनशील थी और उसकी उम्र के हिसाब से उसके विचार परिपक्व एवं प्रगतिशील थे,इसलिए  मां के लिए ऐसे अपशब्द सुनकर भी मां के प्रति उसकी श्रद्धा व सम्मान कम न होकर और भी बढ गया। " उसकी मां बाल-विधवा थी ।अगर उसने शादी करके अपना जीवन निर्वाह  करना चाहा  तो इसमें गलत क्या है? फिर उसकी सज़ा उसके बच्चों को क्यों मिले?<br />
      " जब उसकी मां का कोइ सहारा न था तब समाज के तथाकथित नामी कई नर-भेडिओं ने उसका जीना दुश्वार कर दिया था। हमेशा घात लगाए देखते रहते थे। तब ये समाज के लोग कहां थे? सत्तरह बरस की उम्र मे ही तो वे विधवा हो गई थी ऐसे में पूरी ज़िन्दगी बिना सहारे के गुजारना आसान नहीं था। ऐसी स्थिति में अगर उसकी मां ने एक सुद्र्ढ सहारा ढूढ कर शादी कर ली तो इसमें गुनाह कैसे हो गया"?<br />
      वह मां के बारे में यह सब बातें इसलिए  जानती थी क्योंकि कई बार मां को रो-रोकर अपनी सहेली को बताते हुए सुना था। जब भी वह मां को रोते हुए देखती वह भी रोने लगती। उसके कोमल ह्रिदय में मां के लिए और भी प्यार उमडता और वह यही सोचती कि वह ऐसा  कुछ न कुछ अवश्य करेगी जिससे उसकी मां को खुशी मिले और वह समाज में गर्व से सिर उठा कर जी सकें। बस यही वो द्रिढ संकल्प था जिसे पूरा करने के लिए वह कटिबद्ध हो गई। समाज को भी ज़वाब देने का इससे बढिया और कोई उपाय उसके पास नहीं था। उसने सोचा उसे और अधिक पढाई करनी पडेगी तभी वह अपनी मंज़िल तक पहुंच पाएगी। जब उसने पांचवीं कक्षा  प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण कर ली तब उसके सामने समस्या यह थी  कि गांव में तो बस एक प्राइमरी स्कूल ही था आगे की पढाई वह कैसे कर पाएगी? क्या उसके पिता उसे बाहर पढने के लिए भेज पायेंगे? बहुत ऊहापोह में कई दिन तक रही,फिर एक दिन हिम्मत करके वह अपने पिताजी से बोली मैं भी भैया की तरह  आगे पढना चाहती हूं। पहले तो पिता जी नहीं माने लेकिन बेटी की मेहनत और लगन देख कर हां कर दी। उसे कस्बे के स्कूल में दाखिल करवा दिया। इस स्कूल में रहने की व्यवस्था भी थी। वह अपनी मनचाही मुराद पूरी करने के लिए जीजान से जुट गई।<br />
       स्वयंप्रभा ने फिर पीछे मुडकर नहीं देखा। पढनें के सिवा उसके जीवन का और कोई दूसरा लक्ष्य नहीं था। समय बीतता गया और वह डिग्रियां हासिल करती चली गई। तमाम प्रतियोगी परिक्षाओं से गुजरती हुई आखिर एक दिन उसे उनमें सफलता मिल ही गई और उसकी नियुक्ति उप-जिलाधीश के पद पर पर हुई। माता-पिता गर्व से फूले न  समाते। उसके भाई ने ज्यादा पढाई नहीं की बस एम.ए. कर कालेज में कामर्स का व्याख्याता बन गए।जीवन के गुजारे भर के लिए कमा लेते थे। बडी बहिन को पढने में रुचि नहीं थी इसलिए पिताजी ने उसकी शादी जल्दी ही कर दी थी।<br />
         स्वयंप्रभा की कर्मठता एवं ईमानदारी के कारण उसकी पदोन्नति शीघ्र होती गई और एक दिन वह अपने ही जिले की कलक्टर बन गई। जब एक दिन वह सरकारी जीप में बैठ कर अपने गांव गई तो उसे देखने के लिए भीड उमड पडी । सब लोग झुक-झुक कर उसके पांव छूते और कहते"धन्य हो बिटिया तुमने हमारा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया  है। अब हम शान से कह सकते हैं कि तुम इस गांव की बिटिया हो"।<br />
           स्वयंप्रभा ने समाज की उपेक्षा ही को तो अपनी आत्मशक्ति बनाई थी और उसी आत्मविश्वास के बल पर ही तो उसने सब कुछ पाया था। मैं सोचती हूं  "काश! सभी लडकियों की सोच उस जैसी होती और तब समाज की उपेक्षा को भी सकारात्मक कार्य करके  वे अपनी प्रतिभा को सिद्ध कर पातीं। "जीवन में चाहे कितना ही घना अंधेरा क्यों न हो  उसकी सकारात्मक सोच,द्र्ढ संकल्प और सच्ची लगन  हर बाधाओं से लडने की  असीमित ऊर्जा  देती है। रास्ते कंटकोंपूर्ण  हो सकते हैं लेकिन अगर पांव  लहूलुहान हो जाने पर भी चलने की क्षमता रखते हों तो उसको मंज़िल तक पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता"। संसार की हर महान बनने वाली महिलाओं के रास्ते भी तो आसान नहीं रहें होंगे लेकिन उन्होंने अपनी सूझ-बूझ एवं दम-खम से ही वो प्राप्त किया होगा जो उन्हें चाहिए था  और रास्ते तो कई हैं बस उन पर चलने की देर है।" काश ! सभी स्वयंप्रभा जैसी ऊर्जस्विता बन सकें"।<br />
       चलो अब मैं चलती हूं मुझे उन महिलाओं से भी मिलना है जिन्होंने मुझे इतना काबिल बनाया है। मालिनी के घर जाकर "कैसी हैं काकी जी? क्या आपने मुझे पहचाना ? मैं पंडिताइन की बिटिया हूं"।<br />
 "यह सुनकर वे पैरों पर गिर पडीं और बोली बिटिया तुम्हें कौन नहीं जानता? हमें माफ़ कर दो"।<br />
   मेरी आंखों में प्रेम के आंसू छलछ्ला आए। मैंने उन्हें उठा कर  गले से लगा लिया ।मन का मैल तो कब का धुल चुका था।**********</p>
<p align="left"> डा. रमा द्विवेदी<br />
© All Rights Reserved</p>
<p align="left">    संपर्क सूत्र:-<br />
    १०२, इम्पीरियल मनोर अपार्टमेंट,<br />
    बेगमपेट ,हैदराबाद -५०००१६</p>
</blockquote>
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<title><![CDATA[   पुनर्विवाह दंश (कहानी)]]></title>
<link>http://ramadwivedi.wordpress.com/2006/10/05/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9b-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%82/</link>
<pubDate>Thu, 05 Oct 2006 18:09:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>ramadwivedi</dc:creator>
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<description><![CDATA[
पुनर्विवाह दंश     (कहानी)
लेखिका: डा. रम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p align="left">पुनर्विवाह दंश     (कहानी)</p>
<p align="left">लेखिका: डा. रमा द्विवेदी</p>
<p align="left">छोटे से गांव में जन्मी पूर्नियां का विवाह नौ वर्ष की अवस्था मेंसतरह वर्षीय भगवानदस के साथ संपन्न हुआ था।पूर्नियां तो बस गहने-कपडे पाकर ही खुश थी।उस समय उसे विवाह का अर्थ भी मालूम न था । अपने नन्हें दोस्तों को अपने गहनें-कपडे दिखा कर वह बहुत खुश हो रही थी,जैसे उसे कोई अमूल्य निधि मिल गई हो। अल्पायु पूर्नियां को ससुराल नहीं भेजा गया।बारात वापस चली गई।<br />
समय के जैसे पंख लग गए देखते ही देखतेपूर्नियां तेरहवें वर्ष में प्रवेश कर गई।शुभ मुहूर्त में उसके ससुराल वाले उसे विदा करवा कर ले गए।अनेक रीतिरिवाजों के साथ पूर्नियां का स्वागत हुआ और वह क्षण भी आ गया जब डरी सहमी सी उसने पति के चरणों में समर्पण कर दिया। ज़िन्दगी की दिनचर्या सहज रूप से चल रही थी ।दो वर्ष होते- होते पूर्नियां एक पुत्र की मां भी बन गई ।मां बनकर वह बहुत खुश थी ।<br />
अभी एक वर्ष भी नहीं बीता था कि भगवानदास को ऐसा ज्वर चढा. कि फिर उतरा ही नहें ।घरेलू उपचार करते रहे क्योंकि छोटे से गांव में अस्पताल या डाक्टर नहीं था। उचित चिकित्सा के अभाव मेंउनकी म्रत्यू हो गई। पूर्निया पर मुसीबतों का पहाड टूट पडा। वह कई दिनों तक रोती-विलखती रही किन्तु जो सच था वह बदल नहीं सकता था। पूर्निया एक ही जगह पडी रहती ,उसका शरीर मानों                                                                                       स्पन्दनरहित हो गया हो। उसकी यह दशा देखकर सब यही कहते-"बेचारी की उम्र ही क्या है?पहाड जैसा जीवन कैसे कटेगा?" लोगों के शब्द उसके ह्रदय को छलनी कर देते। दूसरी चिन्ता उसे  खाए जा रही थी कि जब  घरवालों को उसके दो माह के गर्भ के बारे में पता चलेगा तब वे उसके साथ कैसा सलूक करेंगे?<br />
जैसे-तैसे दिन काटने लगी।अपने को उसने यह समझा कर संभाल लिया कि बेटे के लिए तो जीना ही पडेगा। सास बेटे की म्रित्यु का दोष उसपर डाल रात-दिन कोसती प्रताडित करती कुलच्छिनी डायन मेरे बेटे को खा गई।वह खून के घूंट पीकर रह जाती,कुछ न कहती। अधिक श्रम का काम उससे करवाया जाता। उसस्के नन्हे से बेटे को भी बिना दूध की बासी रोटी खाने को दी जाती। जी-तोड मेहनत के बावजूद  भी उसे बचा-खुचा खाना ही दिया जाता। वह उसे ही अपने बच्चे को खिला कर खुद खाती और संतुष्ट  हो जाती। उसके दुखों का अन्त यहीं हो जाता तो अच्छा होता किन्तु भाग्य को किसने देखा है?<br />
उसकी सास बडी ही दुष्ट और कर्कशा स्त्री थी। विधवा थी,किसी का अंकुश उस पर नहीं था।दिन्प्रतिदिन वह उसपर जुल्म ढाने लगी। ऐसी ही कठिन परिस्थितियों में एक दिन उसने सुन्दर पुत्र को जन्म दिया।सूतक में भी पुर्नियां की सही देखभाल नहीं हुई। सास को उसपर दया नहीं आईऔर उसका दुर्व्यवहार जारी रहा।<br />
पुर्नियां की सहन शक्ति चुक गई थी।प्रतिदिन की कलह से तंग आकर उसने अपने पिता को बुला भेजा और अलग रहने की इच्छा प्रगट की।पिता ने पंचों को जमा करके पुर्नियां को जायदाद में हिस्सा देने की बात रखी किन्तु उसकी सास ने हिस्सा देने से साफ मना कर दिया। उसकी गांव में बडी धाक थी या यह कहिए कि पंच भी उसके खिलाफ नहीं जा सकते थे। बहुत समझाने पर एक कमरा और प्रतिदिन के हिसाब से एक सेर अनाज और एक कटोरी दाल्देने के लिए वह रजी हुई। इतने में दो बच्चओं क,पिता और खुद का खाना भी नहीं चलता था।फिर अन्य खर्च ? वह घर में रहकर लोगों का पीसना कूटना करके देने लगी। जैसे-तैसे दिन गुजरने लगे। बूढे पिता से बेटी का दुख देखा न गया ऊपर से सास आते जाते खरीखोटी सुना ही जाती।<br />
एक दिन पिता ने कहा-"तुम मेरे साथ चलो,मैं वहीं तुम्हारा प्रबन्ध कर दूंगा"।<br />
पूर्नियां के माता-पिता और भाईउसकी नि:संतान मैसी के घर रहते थे।मौसी का अलग रुत्बा था। उनकी बात और जबान अत्यधिक कटु थी। यहां आकर पूर्नियां को कुछ स्वतन्त्रता तो अवश्य मिल  गई किन्तु मेहनत करके ही जीना था अत:वह अपने पडोसी शिवशंकर से एक छोटी सी कोठरी मांगकर एक छोटी सी दुकान खोल ली।कोसो चल कर सामान लाती और बेंचती।इस तरह कडी मेहनत करके अपने ब्च्चों की परवरिश करने लगी।<br />
शिवशंकर स्वतन्त्रता सेनानी थे।कभी जेल जाते तो कभी छूट जाते इसलिए उम्र हो जाने पर भी कुंवारे थे।बचपन से ही वे पूर्नियां को चाहते थे। एक दिन जब वे जेल से छूट कर आए तो वे पुर्नियां के कष्टों को देख कर द्रवित हो गए। मन ही मन उन्होंने उसे अपनाने का संकल्प कर लिया।उसे अपने विश्वास में लेने का प्रयत्न करने लगे और पूर्नियां भीन जाने किस आकर्षण  के वशीभूथोकर उनकी ओर खिंची चली गई और एक दिन मर्यादा की सीमाएं टूट गईं।<br />
पूर्नियां चिन्तित रहने लगी कि अगर किसी को पता चलाकि वह गर्भवती हैतो उसके भाई-बाप उसे जिन्दा ही ज़मीन में गाड. देंगे। इसी चिन्ता में घुली जा रही थी कि उसके बच्चों राम और श्याम का क्या होगा? तभी एक दिन किसी ने उसकी मौसी को किसी ने बता दिया कि वह गर्भवती है। अब क्या था? क्षण भर में घर में भूचाल आ गया। उसके बडे भाई ने उसे बहुत मारा-पीटा और घर से निकाल दिया। बच्चे भी चीन लिए।वह अभी सोच ही रही थी कि वह क्या करे? कहीं जाकर मर जाए? या कहीं चली जाए?लेकिन कहां जाए?अपना कोईनहीं था?मरने की हिम्मत वह जुटा नहीम पा रही थी। तभी शिवशंकर वहां आएऔर उसे बाइज्जतपने घर ले गए और भगवान को साक्षी मान कर विवाह कर लिया।<br />
पूर्नियां को इस विवाह से एक सुद्रुढ. सहारा तो मिल गया किन्तु मानसिक धरातल पर  वह विक्षिप्त रहने लगी। समाज उसे हेय द्रिष्टी से देखता था। वह एक वर्ष तक नज़रबंद होकर रह गई। बच्चों की याद में वह छटपटाती और अपने आप को कोसती। इस गम ने उसे अनदर से तोण्ड दिया। अपना सारा आक्रोश वह शिवशंकर पर ही उतारती। वे सह लेते कि कभी तो घाव भर जाएंगे और यह नार्मल हो जाएगी।<br />
शिवशंकर अक्सर राजनीति के  कार्यों में उलझे रहते। समाज में उनका सम्मान था इसलिए समाज की उपेक्षा का दंश उन्हें नहीम झेलना पडा। सच तो यह था पूर्नियां को अपना कर उनमें कोइ हीन भावना भी नहीं आई थी  लेकिन पूर्नियां स्त्री थी और मां भी। उसकी आन्तरिक कुढ.न  और घुटन बढती ही गई।<br />
एक दिन उसने एक पुत्र को जन्म दिया।शिवशंकर खुशी से फूले न समाए। पुत्र का नाम रखा उमाशंकर।पूर्नियां को इस पुत्र के जन्म पर खुशी कम उन बिछुडे पुत्रों का गम अधिक था।सबसे बडी विडम्बना  यह थीकि वे सामने के घर में ही रहते थे। वह उन्हें देखने के लिए घंटों दरवाजे की ओट में खडी रहतीकिन्तु न जाने वे कहां छुप जाते कि दिखई ही न देते। यह दु:ख उसे घुन की तरह खाए जा रहा था। वह हमेशा यही सोचती उसने पुनर्विवाह क्यों किया?कैसे वह कलेजों के टुकडों को अलग कर सकी? उसे यह सुख भोगने का कोई हक नहीं ? उसकी इसी घुटन ने उसे मानसिक रूप से बिमार बना दिया।<br />
धीरे-धीरे समाज से उसका संपर्क बढा। उसकी बचपन की एक सहेली थी'कमली'।उसके भी दो बच्चे थेऔर जवानी में ही वह विधवा हो गई थी किन्त माता-पिता की इक्लौती संतान होने के कारण सुखपूर्वक जीवन बिता रही थी। उसने दूसरी शादी तो नहीं की किन्तु अपनी आवश्यकताओंकी पूर्ति अन्य  तरीकों से की और बहुत बदनाम भी हो गई। उसए देख कर पूर्नियां को कुछ संतोष होता कि उसने जो किया है,खुलेआम किया हैऔर एक ही व्यक्ति से किया हैकिन्तु उसका विवेक ज्यादा देर तक न रहता और भावना प्रबल हो जाती।<br />
राम और श्याम किशोरावस्था में पहुंच गए। राम त्प शान्त प्रकित का था किन्तु श्याम मां के प्रति विद्रोही बन गया। वह मां को खुलेआम गालियां देता,घर में पत्थर फेंकता और तरह तरह से नुकसान पहुंचाने की योजनाएं बनाता। बेटे का विद्रोही रूप देखकर वह अन्दर से टूटती गई और सदैव स्वयं को ही दोषी पाती।<br />
श्याम की शादी हो गई। विवाह के तीसरे वर्ष वह बेटे का पिता भी बन गया। अभी विवाह चार वर्ष पूरे भी नहीं हुए थे कि अचानक हार्ट-अटैक से श्याम की म्रित्यु हो गई। मां की ममता हाहाकार कर उठी। गिरती-पडती बेटे के पास पहुंची किन्तु बहू बहुत दुष्ट थी उसने उसे दरवाजे पर ही दुत्कार दिया। वह अपमानित होकर भी उनकी देहरी पर बैठकर रोती रही। सुबह बेटे की अर्थी उठते वह फूट-फूट कर रो पडी। बेटे के अंतिम दर्शन  के लिए अर्थी के पास गई,लेकिन निर्दयी बहू ने उसे दूर ढकेल दिया। बेटे की म्रित्यु का गहरा आघात उसे पहुंचा। सामने जवान बहू और एक वर्ष का पोता? वह सोचती बहू का पहाड जैसा जीवन कैसे कटेगा? वह भी तो उसके साथ नहीं रहती।वह क्या करे? कैसे उसकी मदद करे?उसने पुनर्विवाह क्यों किया? उसे जीने का हक नहीं है।इतना बडा सदमा वह कैसे सह सकी? अनेकानेक ऐसे प्रश्न थे जो उसके मस्तिष्क को झंझोरते रहते। वह इन प्रश्नों से जूझती  जिन्दा लाश की तरह रहने लगी।<br />
इधर उमाशंकर की भी शादी  हो गई। पूर्नियां के मन में एक कुंठा घर कर गई कि उसने पुनर्विवाह करके ठीक नहीं किया। इसी दर से वह अपनी बहू का अतिरिक्त ख्याल रखती किन्तु बहू थी दुष्ट।  वह अपने पति से  उनकी शिकायतें करके मां बेटे को लडवाती। इससे उसके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पडा और उसे पित्ताशय का कैंसर हो गया। शीघ्र ही इलाज के अभाव में शरीर जर्जर हो गया और एक दिन वह तमाम कष्टों एवं कुंठाओं  से घिरी चिर निद्रा में लीन हो गई। उसके शान्त और सौम्य चेहरे को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह वह अपने जीवन के तमाम कष्टों से मुक्ति पा गई है।*********</p>
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