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	<title>मेरी-दिल्ली &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/मेरी-दिल्ली/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "मेरी-दिल्ली"</description>
	<pubDate>Sun, 20 Jul 2008 10:54:06 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[चाँदनी चौक में मेक्डॉनल्ड ]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2006/12/07/chandanichowk/</link>
<pubDate>Thu, 07 Dec 2006 11:11:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
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<description><![CDATA[आज बहुत दिनों बाद दिल्ली के चाँदनी चौक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">आज बहुत दिनों बाद दिल्ली के चाँदनी चौक जाना हुआ। यहां आये बदलाव बहुत ही सहजता से इस बाजार में घुल मिल गये हैं। यहां नयी पहुंची मेट्रो के स्टेशन के बाहर भी वैसे ही भिखारी बैठे मिल जायेंगे जैसे पुरानी दिल्ली स्टेशन के बाहर मिलते हैं।</p>
<p><img src="http://aaina2.wordpress.com/files/2006/12/cc.JPG" alt="cc.JPG" /></p>
<p>यहां देखिये चाँदनी चौक में खुले मेक्डॉनल्ड्स की तस्वीर। सामने हैं सामान उठा कर चलने वाले जिन्हे यहां झल्लीवाले कहा जाता है और कान से मैल निकालते कनमैलिये। कनमैलिये और झल्लीवाले पुरानी दिल्ली की पहचान हैं और मेक्डॉनल्ड्स को आधुनिकता (?) की निशानी कह सकते हैं। अब यह आप ही बताइये कि परंपरा ने आधुनिकता को अपनाया है या आधुनिकता ने परंपरा को?</font></p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[नीली रेखाओं और लाल चेहरों वाला शहर]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/10/23/bluelines-and-red-faces/</link>
<pubDate>Tue, 23 Oct 2007 10:10:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
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<description><![CDATA[आप लोग सोचते होंगे कि दिल्ली के लोग कै]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">आप लोग सोचते होंगे कि दिल्ली के लोग कैसे इतने खौफ में जीते होंगे। एक तरफ लाल चेहरे वाले <a target="_blank" href="http://hindinewspaper.blogspot.com/2007/10/blog-post_6173.html">बंदरों का आतंक </a>और दूसरी तरफ नीली रेखाओं वाली बसों का आंतंक। </font></p>
<p><font size="3">मगर दिल्ली के लोग बहुत ही व्यावाहारिक हैं। हर हालात में अपने को ढाल लेते हैं। सीख जाते हैं। </font></p>
<p><font size="3">दिल्ली के केंद्र में एक हरा भरा क्षेत्र है जिसे रिज एरिया कहा जाता है। यह रिज एरिया दक्षिण में धौला कूंआं से लेकर पश्चिम में नारायणा और केन्द्र में क्नॉट प्लेस के पास तक फैला है। इस रिज एरिया में बंदरों की आबादी बहुत हो गयी है जिससे बंदर आस पास की कालोनियों में घुस जाते हैं।  यह ढीठ  बंदर बेधड़क घरों में धुस जाते हैं और फ्रिज खोल कर उस  में से उठा कर मजे से सामान खाने लगते हैं। दिल्ली के सबसे बड़े अस्पताल एम्स में भी इनका बहुत आतंक है। कोई यदि फल ले कर मरीज को देखने यहां आये तो ये बंदर हाथ में पकड़ा फलों का थैला ही छीन लेते हैं और दूर भाग जाते हैं। जो लोग समझदार हैं वे पहले ही एक फल थैले से निकाल इनकी और उछाल देते हैं। फिर सारे  बंदर उस एक फल के पीछे भागते हैं और आप अपने बाकी फलों के साथ अस्पताल के अंदर खिसक सकते हैं। ऐसे लोगों को यहां प्रैक्टिकल यानि व्यावहारिक कहा जाता है। यह व्यावहारिकता यहां के हवा पानी में है।  बच्चा पैदा होते ही इसे सीख जाता है। </font></p>
<p><font size="3">आपको हैरानी नहीं होगी यदि दूसरी कक्षा का बच्चा घर आ कर मां से बोले "मम्मी मम्मी! क्लास में जो क्यूट सी नयी लड़की आयी है ना निशा, मैंने उससे कहा कि अगर तू मुझे अपने पास की सीट पर बैठने दे तो मैं अपने टिफिन से आधी मैगी खाने के दे सकता हूं और वो मान गयी।" मां  अपने बच्चे की इस व्यवहार कुशलता पर फूल कर कुप्पा हो जायेगी कि देखो मेरा बच्चा कितना प्रैक्टिकल है। बड़ा होकर बहुत सफल होगा।  </font></p>
<p><font size="3">आप यदि छोटे छोटे शहरों से, खाली बोर दोपहरों से, झोला उठा कर यहां चले आये हैं या आने की सोच रहे हैं तो अपना झोला, थैला, बैग आदि अच्छी तरह चैक कर लें कि कहीं उसमें आप अपना कोई सिद्धांत विद्धांत साथ में न ले आयें। ये सिद्धांत यहां कई बार बहुत आढ़े आते हैं। सिद्धांत व्गैरह की बात करने वालों को यहां अव्यवहारिक माना जाता है। </font></p>
<p><font size="3">अब जरा नीली रेखा वाली बसों यानि कि ब्लूलाईन की बात कर ली जाये। सारे मंत्री, मुख्यमंत्री और जनता कोशिश करके हार गये मगर कोइ इनका बाल भी बांका नहीं कर पाया तो इसके पीछे इन बस मालिकों की व्यवहारिकता ही है। आप सोचते होंगे कि यह बस वाले यदि इस तरह से बसे चलाते हैं तो ट्रैफिक वाले तो लगातार ही इनके पीछे पड़े रह्ते होंगे और ट्रैफिक वालों से ये लोग खौफ खाते होंगे। मगर यह बस वाले बहुत ही प्रैक्टिकल हैं। इसी तरह से ट्रैफिक वाले भी बहुत प्रैक्टिकल हैं। हर बस के रूट पर जितनी भी लाल बत्तियां होंगी उन सब पर प्रति माह सौ रुपया। हिसाब लगाइये। दिल्ली में लगभग छः हजार बसें हैं और हजारों लाल बत्तियां। प्रति बस, प्रति लालबत्ती, प्रति माह सौ रुपये के हिसाब से कितने करोड़ हुए।  इतनी टर्नओवर के सामने तो अंबानी का रिलांयस फ्रैश भी शरमा जाये। देश की बढ़ती मुद्रास्फीति में इस मुद्रा विनिमय का कितना योगदान है इसका अंदाजा अपने वित्त मंत्री जी को भी नहीं होगा। ये लोग हर चौराहे पर माह के पहले दस दिन मुस्तैद मिलते हैं उगाही के लिये। छः तारीख से ही जिसके पैसे न आयें उन्हे इशारे करने लगते हैं। दस तारीख तक पैसे न मिलें तो बस जब्त। अब बेचारा जो ड्राइवर नया नया आया होता है वो इन इशारों को समझ नहीं पाता और बस जब्त करवा बैठता है। </font></p>
<p><font size="3">अब अपने नीली पगड़ी वाले मन्नू भाई यहां की राजनीति में 'एक्सिडेंटली' आ गये हैं। लाल बत्ती पर बैठे लोगों के इशारों को समझ नहीं पा रहे। दस तारीख आने को है, लगता है अपनी बस जब्त करवायेंगे।</font></p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[दिल्ली की बरसात]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/08/06/delhi/</link>
<pubDate>Mon, 06 Aug 2007 10:31:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2007/08/06/delhi/</guid>
<description><![CDATA[दिल्ली के दक्षिण पश्चिम में बसा है द्व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">दिल्ली के दक्षिण पश्चिम में बसा है द्वारका सब सिटी। यहां की खुली सड़कें मन को बहुत लुभाती हैं। किसी भी महानगर में जहां सड़कें रेंग रेंग कर चलती हों वहां ऐसी खुली और खाली सड़कें एक अलग और खुशनुमा अनुभव देती हैं। द्वारका दिल्ली एयरपोर्ट के पास  दिल्ली गुड़गांव सीमा पर बसाया गया है। दिल्ली हरियाणा सीमा पर कापसहेड़ा से फार्म हाउसों और खेतों के पास से लगभग छः किलोमीटर लंबी एक नयी बनी सड़क है जो द्वारका को गुड़गांव से जोड़ती है। क्योंकि मुझे <a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/11/28/vikas/">अकसर गुड़गांव जाना </a>होता है तो जब से यह नया रास्ता बना है मुझे गुड़गांव जाना इतना अच्छा लगता है कि अकसर अच्छे मौसम के दिन कोई न कोई काम निकाल  गुड़गांव की ओर चल देता हूं। इस सड़क की शुरुआत पर दिल्ली जयपुर रेलवे लाइन के नीचे एक अंडरपास बनाया गया है जो लगभग दो साल पहले बना था। इस बार हुइ बरसात के बाद इस नये बने अंडरपास के क्या नजारे थे इन्हें आप भी देखिये।</font><img src="http://aaina2.wordpress.com/files/2007/08/d3d8scd1.jpg" alt="d3d8scd1.jpg" /><a href="http://aaina2.wordpress.com/wp-admin/0" title="null"><img border="0" align="bottom" width="1" src="http://aaina2.wordpress.com/files/2007/08/cb45scd.jpg" alt="cb45scd.jpg" height="1" /><img border="0" align="bottom" width="1" src="http://aaina2.wordpress.com/files/2007/08/a999scd.jpg" alt="a999scd.jpg" height="1" /><img border="0" align="bottom" width="1" src="http://aaina2.wordpress.com/files/2007/08/cb45scd.jpg" alt="cb45scd.jpg" height="1" /><img border="0" align="bottom" width="1" src="http://aaina2.wordpress.com/files/2007/08/cb45scd.jpg" alt="cb45scd.jpg" height="1" /><img border="0" align="bottom" width="1" src="http://aaina2.wordpress.com/files/2007/08/cb45scd.jpg" alt="cb45scd.jpg" height="1" /><img border="0" align="bottom" width="1" src="http://aaina2.wordpress.com/files/2007/08/f501scd.jpg" alt="f501scd.jpg" height="1" /></a><img border="0" align="bottom" width="1" src="http://aaina2.wordpress.com/files/2007/08/f501scd.jpg" alt="f501scd.jpg" height="1" /><img src="http://aaina2.wordpress.com/files/2007/08/a999scd.jpg" alt="a999scd.jpg" /><img src="http://aaina2.wordpress.com/files/2007/08/cb45scd.jpg" alt="cb45scd.jpg" /><img src="http://aaina2.wordpress.com/files/2007/08/8230scd.jpg" alt="8230scd.jpg" /><img src="http://aaina2.wordpress.com/files/2007/08/15f8scd.jpg" alt="15f8scd.jpg" /></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[मानव, बुब्बू और टिम्मी]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/01/19/manav/</link>
<pubDate>Fri, 19 Jan 2007 16:06:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
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<description><![CDATA[
बच्चों की बातें भी कितनी मासूम होती ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='http://aaina2.wordpress.com/files/2007/01/image_011.jpg' alt='image_011.jpg' /></p>
<p><font size="3">बच्चों की बातें भी कितनी मासूम होती हैं, हम बड़ों की दुनिया से एकदम अलग। मानव मेरा सात वर्षिय बेटा है। बुब्बू उसका कबूतर भाई है तथा छोटा सा पिल्ला टिम्मी हमारे परिवार का सदस्य। छोटा सा पिल्ला टिम्मी कोई बीस पच्चीस दिन पहले न जाने कहां से आकर हमारे अहाते में घुस गया।  बच्चों को तो जैसे खेल ही मिल गया। एक पुराना लकड़ी का दराज उसका कमरा बन गया तथा एक पुरानी शॉल उसका बिस्तर। एक प्लास्टिक का कटोरा उसका बर्तन। मैंने  देखा तो मुझे यह सब पसंद नहीं आया। मुझे लगा कि यह कुत्ता घर में जगह जगह गंदगी करेगा। मगर बच्चों का दिल नहीं तोड़ना चाहता था। फिर मेरी पत्नी ने भी कहा कि सर्दी बहुत है, छोटी सी जान है, यहीं कोने में पड़ा रहेगा और फिर इसे बाहर भी निकाल दिया तो यह इतना छोटा है कि बंद गेट के नीचे से भी घुस आयेगा। जब थोड़ा बड़ा होगा तो निकाल देंगे।</p>
<p>मगर कमाल तो तब हो गया जब मानव ने उसका नामकरण कर दिया टिम्मी भाटिया। इतना ही नहीं, वह पड़ोस में सब को बता भी आया कि हमारे डॉगी का नाम है टिम्मी भाटिया। मैंने उसे डांटा कि यह कुत्ता भाटिया कैसे हो गया तो जवाब मिला कि हमारे घर में जो भी रहता है सब के  नाम में भाटिया है तो टिम्मी भी तो हमारे घर में ही रहता है। उसके इस मासूम से जवाब ने मुझे निरुत्तर कर दिया। फिर 13 जनवरी को आयी लोहड़ी। बच्चे जिद्द करने लगे कि लोहड़ी जलाई जाये मगर मुझे दूसरी मंजिल की छत पर पड़ीं मोटी तथा भारी लकड़ियों को उठा कर नीचे लाने में आलस आ रहा था। मैंने बहाना बनाया कि लोहड़ी तो वो लोग मनाते हैं जिनके घर में नया नया बेबी आया हो।  "हमारे घर में भी तो टिम्मी आया है, हम उसकी लोहड़ी मनायेंगे।" मैं फिर निरुत्तर हो गया था।</p>
<p>लकड़ियां उठाने छत पर गये तो एक और सरप्राईज मेरा इंतजार कर रहा था। "मेरे भाई का ख्याल रखना, लकड़ियां उसे लग न जायें।" मेरा माथा ठनका। अब यह भाई कहां से आ गया। "बुब्बू मेरा भाई है।" "वो पिजन जो लकड़ियों के पास रहता है वो मेरा भाई है, उसका नाम है बुब्बू।" मानव अपने सभी दोस्तों को भाई कहता है। (बिल्कुल जैसे हम चिट्ठाकारों को भाई बुलाते हैं।) </p>
<p>बच्चों के मन बड़ों की तरह नहीं होते। वे पक्षियों तथा पशुओं से भी रिश्ता गढ़ लेते हैं। हम बड़े उनको व्यावहारिक बनाने के चक्कर में इतने अव्यावहारिक हो जाते हैं कि जब वो बुब्बू की बात करते हैं तो हम उन्हें बुक्स और होमवर्क की याद दिलाते हैं और जब वे टिम्मी की बात करना चाहते हैं तो  हम  उन्हे टर्म एग्जाम्स की याद दिलाते हैं। </p>
<p>लोहड़ी की रात टिम्मी की हमारे घर में आखिरी रात थी। अगले दिन एक सज्जन उसे बोरे में डाल कर कहीं दूर छोड़ आये। मानव जब स्कूल से आया तो उसे यह बात पता चली। मगर विश्वास नहीं हुआ। एक बार गली का चक्कर भी लगा आया टिम्मी को खोजने के लिये मगर निराश हो लौट आया। </p>
<p><img src='http://aaina2.wordpress.com/files/2007/01/timmi.JPG' alt='timmi.JPG' /></p>
<p>बच्चा तो टिम्मी को शायद भूल गया, मगर आज मुझे टिम्मी याद आ गया जब मैं आउटर रिंग रोड पर मंगोल पुरी के पास से गुजर रहा था।<br />
आज फिर वही हुआ जो हमेशा होता है। दिल्ली में आउटर रिंग रोड पर मंगोल पुरी से गुजरते हुए इतनी बदबू आती है कि नाक सड़ जाये। शायद भारत के हर शहर मैं इस तरह की कोई जगह आपको मिल जायेंगी। वहां रहने वाले सुबह सुबह अपनी प्रकृतिक जरूरतों का निपटारा खुले में ही कर लेते हैं और इसका पता हर आने जाने वाले को पूरे दिन वहां की हवा से लगता रहता है। आज तो जब मैं वहां से गुजरा तो हमारे रेडियो मिर्ची को भी पता चल गया तभी तो फट उन्होंने गीत लगा दिया <strong>'क्रेजी किया रे....।" </strong></p>
<p>हमारी सरकारें शहरों के विस्तार तो कर रही हैं मगर सार्वजनिक सुविधाओं के नाम पर न तो गरीबों को कोई सेवा देतीं हैं और न ही लोगों को इतनी तमीज है कि जहां हम रहते हैं कम से कम उस जगह को तो गंदा न करें। </p>
<p>मुझे किसी जानवर को पालने का अनुभव नहीं है। मैं टिम्मी को अपने घर नहीं रखना चाहता था क्योंकि मुझे डर था कि वह घर को गंदा करेगा मगर  टिम्मी जितने दिन भी हमारे घर रहा, उसने वहां गंदा नहीं किया। यह सिविक सेंस क्या हम छोटे से टिम्मी से सीखेंगे?</font></p>
<p><strong>इसे भी पढ़ें</strong></p>
<p><a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/08/20/simle/">क्या इतनी सिंपल सी बात गोवरंमेंट को समझ नहीं आती? </a><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/10/22/meraabharatmahan/">….फिर भी मेरा भारत महान</a><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/08/28/vandematram/">मेरा मन धक से रह जाता है……. </a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वर्ल्ड सिटी दिल्ली]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2006/04/27/%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%a1-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Thu, 27 Apr 2006 04:32:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
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<description><![CDATA[दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम हो रहे है
मेल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम हो रहे है<br />
मेलबर्न में शीला दीक्षित पूरे लाव लश्कर के साथ पँहुचीं,<br />
एश्वर्या के लटके झटके दिखाए पूरी दुनिया को,<br />
गुलज़ार साहब से "दिल्ली चलो" का गान लिखवाया,<br />
सच बताएं हमें भी बहुत अच्छा लगा टीवी पर देख कर।<br />
यहां टाईम्स ऑफ इंडिया ने चलो दिल्ली अभियान चलाया<br />
दिल्ली को Walled City to World City बनाने के लिए।<br />
जमीनी हकीकत यह है कि दिन में आठ से दस घंटे बिजली गायब रहती है और पानी की कमी इतनी कि कभी कभी नहाने का इंतजाम मुश्किल हो जाता है।</font></p>
]]></content:encoded>
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