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	<title>मेरी-बात &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/मेरी-बात/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "मेरी-बात"</description>
	<pubDate>Sun, 12 Oct 2008 23:18:03 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[जीवन की विडम्बना]]></title>
<link>http://kakesh.wordpress.com/2007/10/09/widambana/</link>
<pubDate>Tue, 09 Oct 2007 13:13:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>kakesh</dc:creator>
<guid>http://kakesh.hi.wordpress.com/2007/10/09/widambana/</guid>
<description><![CDATA[आप कितना भी कमाने लगो आपकी इच्छाओं या ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">आप कितना भी कमाने लगो आपकी इच्छाओं या कहें जरुरतों और जेब का अंतर बराबर ही रहता है.एक तरफ लगता है कि चीजें अब पहुंच में आ जायेंगी लेकिन नहीं आती दूसरी तरफ लगता कि हम किन चीजों के पीछे भाग रहे हैं और क्यों भाग रहे हैं? ऎसे विचार इसलिये मन मे आलोड़न विलोड़न करने लगते हैं जब देखता हूँ कि दुनिया में कितनी असमानता है. क्या ये असमानता हमेशा से थी ? क्या ये असमानता हमेशा रहेगी ? तो क्या पूंजीवाद सही में खराब है ? तो क्या साम्यवाद सही है? </font></p>
<p><font size="3">चलिये दो घटनाओं से आपका परिचय करवाता हूँ.कल एक व्यक्ति से, जिनसे कभी कभी बात होती रहती है लेकिन जिनको मित्र की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता,बात हो रही थी.उन्होने बताया कि अभी हाल ही में उन्होने नया फ्लैट बुक करवाया है. वो अभी खुद के फ्लैट में ही रहते है और एक नया फ्लैट इनवैस्टमेंट के तौर पर लिया है. कीमत एक करोड़ से ऊपर की है. कितनी ये उन्होने नहीं बताया. वह सज्जन कहीं नौकरी भी नहीं करते. केवल बी.कॉम पास हैं.क्या करते हैं ये तो मेरे को नहीं मालूम लेकिन जब ऑफिस के लिये निकलता हूँ सुबह तो सोसायटी के लॉन में बैठे नजर आते हैं और शाम को लौटता हूँ तो अक्सर वहीं घूमते,गपियाते मिल जाते हैं. क्या करते हैं नहीं मालूम. कोई कहता है कि शेयर का काम करते हैं,कोई कहता है कि प्रॉपर्टी का काम करते हैं. तो फिर वो पैसा कहाँ से कमाते हैं? उनके पास दो दो गाड़ियाँ भी हैं...और उनका घर देखो (हाँलाकि मैं कभी गया नहीं पर पत्नी ने बताया) लगता है फाइव स्टार होटल है. तीन कमरों में प्लाज्मा टीवी, हॉल में होम थियेटर, तरह तरह की पेंटिंग्स. एक पेंटिंग की कीमत लाख से ऊपर है, ऎसा उनकी पत्नी ने मेरी पत्नी को बताया... और फिर एक करोड़ से ऊपर का फ्लैट भी बुक करा दिया. </font></p>
<p><font size="3">आज सुबह </font><a href="http://kakesh.com/?p=167"><strong><font size="3">अपनी मधुशाला वाली पोस्ट</font></strong></a><font size="3"> पूरी की तो थोड़ी निराशा सी थी मन में. उमर खैयाम की रुबाइयों में एक तरह का दर्द है जो जीवन को नश्वर बता कर अंदर तक झकखोर देता है. निराशा और बढ़ी जब इतनी मेहनत से लिखी पोस्ट पर कॉमेंट नहीं आये. सोचने लगा कि इतनी मेहनत 'उमर' पर करूँ या किसी और विषय़ पर. खैर वो अलग बात है लेकिन आज एक समाचार पढ़ने में आया. बिहार में 'गया' नामक स्थान इसलिये प्रसिद्ध है क्योकि यहां पितृ आत्माओं के लिये श्राद्ध किये जाते हैं. अभी चल रहे पितृ दिवस में यहाँ पांव रखने की भी जगह नहीं रहती. लोग आत्माओं की शाति के लिये पिंड दान करते हैं.इन पिंडों को पानी में बहाने या गाय को खिलाने का चलन है. लेकिन गया में बहुत से लोग ऎसे है जो इन पिंडो को उठा लेते हैं और इनको सुखाकर,पीसकर खाते हैं और अपनी उदर तृप्ति करते हैं.समाचार के अनुसार इन पिंडों से इन लोगों के 2-3 महीने का खाना चल जाता है. </font></p>
<p><font size="3">कैसी विडम्बना है ..<strong>एक ओर तो हम मृत आत्माओं की उदरपूर्ति के लिये श्राद्ध कर रहे हैं और यहां जीवित आत्माऎं भोजन की तलाश में भटक रही हैं.</strong> </p>
<p>समाचार : दैनिक जागरण</p>
<p>पितृपक्ष मेले में पिंडदान के लिए आए लोगों की तलाश में लगी कई महिलाओं और बच्चों को देखा जा सकता है। ये वह लोग हैं जो अपने पेट की आग बुझाने के लिए दान किए गए पिंड ढूंढते फिरते हैं। पिंडों को लेकर अक्सर इनमें झगड़ा भी होता रहता है। गया में इन दिनों यह दृश्य आम है। प्रमुख पिंडवेदी स्थल विष्णुपद, अक्षयवट एवं सीताकुंड आदि जगहों पर कई महिलाएं और बच्चियां अर्पित पिंड बीनती रहती हैं पिंड जौ के आटे, चावल और तिल के मिश्रण से बनता है। इसे वैदिक मंत्रोच्चारण के बाद पूर्वजों की आत्माओं को समर्पित किया जाता है। विधान यह भी है कि पिंड को जल में प्रवाहित कर दिया जाए या गाय को खिला दिया जाए। हालांकि आम तौर पर ऐसा नहीं होता। यही वजह है कि धार्मिक विधानों को तोड़ गरीब, वेदी के आसपास पिंड बटोरने को जुटे रहते हैं। पिंड बटोरने वाले बताते हैं-वह इसे धूप में सुखाने के बाद कूट और चाल कर रोटी बनाते हैं। इससे उनका दो-तीन महीने तक काम चल जाता है। इस तरह कई परिवार पलते हैं। इन लोगों को पितृपक्ष का बेसब्री से इंतजार रहता है। गरीबी उन्मूलन की योजनाओं के बारे में ये लोग बहुत कुछ नहीं जानते, लेकिन इतना जरूर कहते हैं कि अगर उन्हें गेहूं-चावल मिलता तो पिंड चुनने की जरूरत ही नहीं पड़ती।<br />
</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लॉग का असली रूप:व्यक्तिगत डायरी के कुछ पन्ने]]></title>
<link>http://kakesh.wordpress.com/2007/10/07/my-interest-in-hindi-books/</link>
<pubDate>Sun, 07 Oct 2007 06:31:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>kakesh</dc:creator>
<guid>http://kakesh.hi.wordpress.com/2007/10/07/my-interest-in-hindi-books/</guid>
<description><![CDATA[
दरअसल ब्लॉग की शुरुआत एक दैनिन्दिनी य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"></p>
<p>दरअसल ब्लॉग की शुरुआत एक दैनिन्दिनी या डायरी के रूप में ही हुई थी. लोगो ने इसे अपनी डायरी का ही एक हिस्सा माना. ऎसी डायरी जो सार्वजनिक थी.इसी कारण अधिकतर लोगों ने छ्द्म नामों से लिखना प्रारम्भ किया.लेकिन आज ब्लॉग का स्वरूप बदल रहा है. लोग इसे वैकल्पिक पत्रकारिता या साहित्य लेखन से जोड़ने लगे है.इस चिट्ठे पर अब कुछ व्यक्तिगत से मुद्दों पर लिखने का विचार है.कम से कम सप्ताह में एक बार. हाँलाकि अब मैं <a href="http://kakesh.com/">नये चिट्ठे</a> पर लिखने लगा हूँ. लेकिन वहाँ पर कोशिश है कि कुछ <a href="http://kakesh.com/?p=157">साहित्यिक टाइप</a> (?) का लेखन करूँ.</p>
<p>किताबों से मुझे सदा से ही बहुत प्यार रहा है.बचपन से ही किताबें पढने का शौक रहा है. तब पढ़ने का समय होता था पर तब पैसे नहीं होते थे कि किताब खरीद सकें. अब पैसे हैं तो किताब पढ़ने का समय सिमटता जा रहा है. उन दिनों पुस्तकालय में जाके किताबें पढ़ता था. पर इस तरह पढ़ने से एक ही नुकसान होता है कि जब आप समय के साथ पढ़े हुए को भूलने लगते हैं और आपको फिर से उसी किताब को पढ़ने की इच्छा होती है तो आप कुछ नहीं कर पाते.कभी किसी किताब में पढ़े हुए को सन्दर्भ के रूप में प्रयोग करना हो भी आप मुश्किल में पढ़ जाते हैं. पिछ्ले दिनों प्रगति मैदान में एक छोटा सा पुस्तक मेला लगा था. मैं भी गया और कई किताबें खरीद डाली. उनकी चर्चा अपने <a href="http://kakesh.com/">मुख्य ब्लॉग</a> पर कभी करुंगा.</p>
<p>हिन्दी ब्लॉग लेखन से कम से कम मुझे एक लाभ हुआ है कि हिन्दी किताबों में रुचि फिर से बढ़ने लगी है. जब से प्राइवेट सैक्टर में नौकरी प्रारम्भ की तब से अधिकतर काम अंग्रेजी में ही होता है इसलिये अंग्रेजी ज्यादा रास आने लगी थी...और फिर अंग्रेजी किताबें पढ़ने का सिलसिला भी चालू हुआ. हिन्दी किताबें छूटती ही जा रहीं थी.हाँलाकि रस्म अदायगी के तौर पर हिन्दी किताबें कम से कम साल में एक बार खरीदता रहा लेकिन सब किताबें पढ़ी जायें ये संभव नहीं हो पाया. अब ब्लॉग लेखन के बाद हिन्दी की किताबों में दिलचस्पी फिर से बढ़ी है.इसीलिये कुछ नयी किताबें खरीद रहा हूँ कुछ पुरानी पढ़ रहा हूँ. राजकमल की 'पुस्तक मित्र योजना' का भी सदस्य बन गया हूँ.</p>
<p>कुछ पत्रिकाऎं भी नियमित रूप से मँगा रहा हूँ. 'कथादेश' <a href="http://mohalla.blogspot.com">अविनाश जी</a> के लेख के लिये नियमित पढ़्ता हूँ. 'आलोचना' और 'वाक' भी मंगा रखी हैं. 'लफ्ज' का भी ग्राहक बन रहा हूँ. कल भी श्री राम सैंटर से कुछ किताबें खरीद लाया. कितनी पढ़ी जायेंगी मालूम नहीं..</p>
<p>ये सब क्यों कर रहा हूँ या क्यो हो रहा है पता नहीं...पर जो भी है...मैं मानता हूँ कि अच्छा ही है...</p>
<p>थैक्यू ब्लॉगिंग. </p>
<p>------------------------------------------------------------------------</p>
<p>अभी हाल ही में जो लिखा दूसरे चिट्ठे पर. उमर खैयाम की रुबाइयों पर एक विशेष श्रंखला प्रारम्भ की है.</p>
<p>1. <a href="http://kakesh.com/?p=138">खैयाम की मधुशाला..</a></p>
<p>2. <a href="http://kakesh.com/?p=139">उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद..</a></p>
<p>3. <a href="http://kakesh.com/?p=148">मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये</a><br>4. <a href="http://kakesh.com/?p=157">उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में</a></p>
<p>&#160; कुछ व्यंग्य जो पिछ्ले दिनों लिखे.</p>
<p>1. <a href="http://kakesh.com/?p=142">एक व्यंग्य पुस्तक का विमोचन</a></p>
<p>2. <a href="http://kakesh.com/?p=135">एक ग्रेट फादर का बर्थडे…</a>[ यह बहुत पसंद किया गया.न पढ़ा हो तो कृपया पढ़ लें]</p>
<p>3. <a href="http://kakesh.com/?p=133">सपना मेरा मनी मनी !!</a></p>
<p>4. <a href="http://kakesh.com/?p=132">एस.एम.एस.प्यार ( SMS Love)</a> [ यह भी हिट रहा]</p>
<p>5. <a href="http://kakesh.com/?p=128">चकाचक प्रगति का फंडा</a></p>
<p>6. <a href="http://kakesh.com/?p=124">शांति की बेरोजगारी</a></p>
<p>बहस / मेरे विचार</p>
<p>1.<a href="http://kakesh.com/?p=125">नो सॉरी ..नो थैंक्यू !!</a></p>
<p>2. <a href="http://kakesh.com/?p=134">क्या चिट्ठाकार बढ़ने से फायदा हुआ है?</a></p>
<p>सूचना टाइप</p>
<p>1. <a href="http://kakesh.com/?p=131">ऑटो/टैक्सी के लिये मोलभाव गलत है ? !</a></p>
<p>2. <a href="http://kakesh.com/?p=162">प्रिंट में छ्पते चिट्ठाकार</a></font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हफ्ते की हलचल..]]></title>
<link>http://kakesh.wordpress.com/2007/09/23/%e0%a4%b9%e0%a4%ab%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%9a%e0%a4%b2/</link>
<pubDate>Sun, 23 Sep 2007 17:16:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>kakesh</dc:creator>
<guid>http://kakesh.hi.wordpress.com/2007/09/23/info-about-posts/</guid>
<description><![CDATA[पिछ्ले हफ्ते एक महीने से ज्यादा समय के]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">पिछ्ले हफ्ते एक महीने से ज्यादा समय के बाद लिखना शुरु किया.इस बार सारी पोस्टें </font><a href="http://kakesh.com/"><font size="3">नये पते पर</font></a><font size="3"> पोस्ट की गयी. कुछ लोग जो मेरे इस ब्लॉग पर रैगुलर आते थे वो वहाँ नहीं पहुंच पाये.जैसे अभय जी , अजदक जी , ज्ञान जी , फुरसतिया जी (जो दिल्ली आ के जोश दिला के गये थे),मैथिली जी , नीलिमा जी ,सुजाता जी और भी बहुत लोग.पंगेबाज तो कोई बहुत बड़े पंगे की योजना के लिये ट्रेनिंग ले रहे हैं.उन सभी की जानकारी के लिये पिछ्ले हफ्ते की पोस्टों की सूचना यहां भी दे रहा हूँ.</font></p>
<p><a href="http://kakesh.com/?p=112"><font size="3">हिन्दी की सेवा का मेवा</font></a><font size="3"> : एक हिन्दी सेवक की कहानी. (हास्य व्यंग्य) </font></p>
<p><a href="http://kakesh.com/?p=113"><font size="3">कैसे कमायें लाखों&#x2026;.हिन्दी सेवा से</font></a><font size="3"> : सेवन स्टेप्स फॉर चर्निंग मनी थ्रू हिन्दी सेवा&#x2019; (हास्य व्यंग्य) </font></p>
<p><a href="http://kakesh.com/?p=114"><font size="3">गणेश जी को प्रार्थना पत्र</font></a><font size="3"> : चूहों की शिकायत गणेश जी से.(हास्य व्यंग्य) </font></p>
<p><a href="http://kakesh.com/?p=119"><font size="3">ब्लॉगिंग में विमर्श:मन के प्रश्न !!</font></a><font size="3"> : कुछ कुछ सत्संग टाइप </font></p>
<p><a href="http://kakesh.com/?p=122"><font size="3">घूस खायें सैंया हमारे</font></a><font size="3"> : पड़ोस के झा जी को उपदेश (हास्य व्यंग्य) </font></p>
<p><a href="http://kakesh.com/?p=123"><font size="3">वह जो आदमी है न : हरिशंकर परसाई</font></a><font size="3"> : परसाई जी की प्रसिद्ध रचना </font></p>
<p><font size="3">अब प्रयास यही रहेगा कि हर हफ्ते कम से कम दो पोस्ट तो डाल ही दी जायें. आपकी टिप्पणीयां जरूर उत्साहवर्धन करेंगी.</font></p>
<p><font size="3">&#xA0;</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपुन का खोमचा भी शिफ्ट हो गयेला है भाई !!]]></title>
<link>http://kakesh.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%ae%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%ab%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%97/</link>
<pubDate>Mon, 17 Sep 2007 00:59:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>kakesh</dc:creator>
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<description><![CDATA[
बहुत दिनों से अपुन गायब है. अभी आया भी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"></p>
<p>बहुत दिनों से अपुन गायब है. अभी आया भी तो <a href="http://kakesh.com">नये ठिकाने पे.</a><br />
आज ही नया माल डाला है बाप. जरुरीइच आने का और कॉमेंट देने का.</p>
<p>this blog has been shifted <a href="http://kakesh.com">here</a> </p>
<p></font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आइये अभय जी समझें "व्यंग्य" को... ]]></title>
<link>http://kakesh.wordpress.com/2007/06/13/lets-understand-satire/</link>
<pubDate>Wed, 13 Jun 2007 09:58:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>kakesh</dc:creator>
<guid>http://kakesh.hi.wordpress.com/2007/06/13/lets-understand-satire/</guid>
<description><![CDATA[ अभय जी ने कहा कि 
“ काकेश जी.. आपके व्यंग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"> अभय जी ने कहा कि </p>
<blockquote><p>“ काकेश जी.. आपके व्यंग्य बाण की राह हम देख रहे हैं”</p></blockquote>
<p> .. जी नहीं आज व्यंग्य की विधा में बात नहीं करुंगा .. थोड़ी गंभीर बात करनी है ...और दिन में कभी कभी तो मैं गंभीर बात करता ही हूँ... </p>
<p>अभय जी ने आज अपनी पोस्ट में कहा कि मैने (काकेश ने) भी अपनी पोस्ट में कुछ लोगों के बारे में लिखा था इसलिये नारद द्वारा कारवाई तो मुझ पर भी होनी चाहिये थी.... अब नारद किस तरह से कारवाई का निर्णय लेता है उससे मेरा कोई सरोकार नहीं है और मैं इस बात पर अपने विचार भी नहीं रख रहा हूँ कि अभी नारद द्वारा जो निर्णय लिया गया वो सही है या गलत. ...मैं तो सिर्फ अपनी बात रख रहा हूँ... </p>
<p>मुझे खुशी है कि अभय जी ने मुझे <strong>गंभीर और शालीन इंसान </strong>बताया .. (हूँ नहीं :-) ) .. धन्यवाद!! .. लेकिन जहां तक मेरी पोस्ट को लेकर उन्होने कहा कि नारद को मेरे ऊपर कारवाई करनी चाहिये थी (यदि किसी और पर की है तो ..क्योकिं मेरा अपराध भी कमोबेश वही था जो इन महाशय का है) तो उससे मैं सहमत नहीं हूँ... <strong>व्यक्तिगत लांछ्न और व्यंग्य में फरक होता है </strong>... जब हम किसी पर व्यंग्य करते हैं तो उसके कुछ विचार कुछ आदतों कुछ क्रिया कलापों या कुछ विशेष पक्षों पर एक मजाकिया नजर डालते हैं .. ये कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं है ना ही इसमें कोई वैमनस्य की भावना होती है.. हाँ वैचारिक मतभेद होता है ... होना भी चाहिये..यदि ब्लौगजगत में वो भी ना करें तो क्या करें ..?  जिस तरह आपने कहा “ क्या आपके जनतांत्रिक समाज मे मनुष्य के पास यह हक़ नहीं होगा..? और फिर ऐसी भाषा..? ” ..<strong>जी हाँ हमें भी पूरा हक है आप पर कटाक्ष करने का ... (आपको भी है पर आप करते ही नहीं ...हम तो तैयार बैठे रहते हैं :-) ) </strong>और यहां पर बात सिर्फ भाषा की ही नहीं है ..भाषा में निहित अर्थों की भी है... भाषा तो महत्वपूर्ण है ही ... कहा भी गया है “ सत्यं ब्रूयात , प्रियम ब्रूयात “ .. <strong>आप सत्य को किस भाषा में कह रहे हैं वो भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना की सत्य....  </strong></p>
<p>हमारी हिन्दी की आम बोलचाल में बहुत से लोग गालियों का निर्बाध प्रयोग करते हैं .. हम लोग हॉस्ट्ल में थे तो कहते थे कि आप गाली उसी को देते हैं जो या तो आपका कट्टर दुश्मन होता है या फिर आपका जिगरी दोस्त. वही गाली दो अलग अलग व्यक्तियों को दो अलग अलग अर्थ दे जाती है .. आपने शायद <a href="http://puranikalok.blogspot.com/2007/06/blog-post_09.html ">पुराणिक जी का व्यंग्य </a>पढ़ा होगा .. जहाँ आप हरामी शब्द की नयी व्याख्या पाते हैं   </p>
<blockquote><p>“अगर हरामी शब्द के टेकनीकल मतलब को छोड़ दिया जाये, तो अब यह शब्द प्यार और सम्मान का सूचक है।“</p></blockquote>
<p> और ये बात किन्ही अर्थों में सही भी है... आप चाहें इस पोस्ट पर लोग़ों ने क्या क्या टिप्पणी की हैं ..जो देखा जाये तो कुछ नहीं सिर्फ गालियाँ है पर एकदम दूसरे अर्थों में..... </p>
<p>अभय जी ने मेरी दो पोस्टों का हवाला दिया... मुझे खुशी है इसी बहाने कुछ लोगों ने वो पोस्ट पढ़ लीं :-)  पर जरा आप भी इन पोस्टों को ध्यान से देखें ... इन पोस्टों में किसी भी ब्लौग का किसी भी तरह का लिंक या किसी व्यक्ति विशेष पर कोई सीधे आक्षेप है ??...नहीं है ... किसी व्यक्ति का नाम भी सीधे तौर पर नहीं आया है... सब कुछ प्रतीकों के जरिये दिखाने,समझाने की कोशिश की गयी है .. हाँलाकि जो चिट्ठाजगत की गतिविधियों से अवगत हैं उन्हें ये प्रतीक समझ आ भी जायेंगे और यही मकसद भी था/है ..लेकिन यदि हम किसी को नाम लेकर या लिंक देकर कोई पोस्ट लिखते हैं ..तब आप उस पर सीधे आक्षेप लगाते हैं लेकिन जब हम प्रतीकों के जरिये अपनी बात रख रहे हैं तो इसमें व्यक्ति गौण हो जाता है और उसके कुछ क्रिया कलाप प्रमुख .. और फिर यदि चिट्ठाजगत के बाहर का व्यक्ति उसे पढॆ (आज या आज से दस साल बाद भी) तो उसे वो पोस्ट सिर्फ उन्ही अर्थों में परिपूर्ण लगेगी जिन अर्थों में वो दिखती है .. यानि उस पोस्ट का महत्व चिट्ठाकारी के इतर भी है ... <strong>इन पोस्टों की चिंता स्थानीय होते हुए भी सार्वजनिक हैं.... </strong>आइये एक उदाहरण के साथ बताता हूँ ... </p>
<p>अभय जी ने लिखा </p>
<blockquote><p>“उन्होने मेरे और अविनाश के बीच चले एक विवाद को दो कुत्तो की लड़ाई के समकक्ष रखा.. ऐसी एक तस्वीर डाल के.. अविनाश की तुलना वे एक पागल कटखन्ने कुत्ते से पहले ही कर चुके थे..” </p></blockquote>
<p><strong>यहीं अभय जी से मेरा मतांतर है</strong>.. यदि मैं कहूँ कि <strong>“क्यों कुत्तों की तरह लड़ रहे हो ? “</strong> तो ये टिप्पणी लड़ने वाले व्यक्तियों पर नहीं वरन उनके द्वारा किये जा रहे “लड़ने” की क्रिया पर है.. यदि इसी वाक्य को इस तरह से कहें कि <strong>“ क्यों कुत्ते... क्यों लड़ रहे हो ? “</strong> तो ये लांछन है ... जहां दो लड़ने वाले व्यक्तियों की तुलना कुत्तों से की गयी है ...  इसी तरह से जब वह कहते हैं “अविनाश की तुलना वे एक पागल कटखन्ने कुत्ते से पहले ही कर चुके थे “ तो ये भी गलत है ..क्योकि मैने अविनाश जी की तुलना कभी भी नहीं की..पर हाँ मेरा विरोध या मतभेद उनके मोहल्ले ब्लौग पर किये जा रहे कुछ दुष्प्रचार पर था ..और उस क्रिया को मैने अपने व्यंग्य में निशाना बनाया .. ये व्यक्तिगत रूप से अविनाश जी पर की गयी टिप्पणी नहीं थी... ( वैसे आज मैने अविनाश जी को ई-पत्र लिखकर अपनी इस टिप्प्णी पर खेद भी प्रकट किया है... यदि वो इससे आहत हुए हों तो... ...लेकिन जिन बातों पर मेरा वैचारिक मतभेद था ...वो तब भी था और आज भी है ... भविष्य का पता नहीं .. ) .. ठीक इन्ही अर्थों में अन्य प्रतीक जैसे कौवे,गधे,सुअर भी प्रयोग किये गये हैं... तो मेरा अनुरोध कि इन तुलनाओं को व्यक्तिगत तुलना ना माना जाये... </p>
<p>अभय जी मेरे पसंदीदा चिट्ठाकारों में हैं ..जब मैं यह कहता हूँ तब मेरा मतलब सिर्फ और सिर्फ उनके लेखन से होता है . मैं उनके बारे में व्यक्तिगत रूप से ज्यादा नहीं जानता तो व्यक्तिगत रूप से उन पर टिप्पणी करना मेरे लिये ठीक भी नहीं है.... इसलिये मैं सिर्फ उनको पढ़ता हूँ और मन हुआ तो अपनी प्रतिक्रिया टिप्पणी के माध्यम से देता भी हूँ.. ..तो एक पाठक के नाते ही जब मेरा ये अधिकार बनता है कि मैं उनके लिखे पर टिप्पणी करूं तो ये भी बनता है कि मैं उनके विचारों से सहमत ना होकर उन पर व्यंग्य लिखूं ... </p>
<p>तो ये थी मेरी बात ... </p>
<p>वैसे शायद आपके मालूम हो उन्होने अपने ब्लौग से गुलाबी गमछे वाली फोटो हटा दी है और दाड़ी वाली फोटो लगा दी है .क्योकि मैने अपने दोनों ही पोस्टों में उनकी गुलाबी गमछे वाली फोटो का ही प्रयोग किया था ..इसीलिये वो थोड़ा घबरा गये और दाड़ी बढ़ाने लगे :-) .तो अगला व्यंग्य उनकी दाढ़ी वाली फोटो के माध्यम से होगा .. यदि वो आहत ना होने का वादा करें तो.... :-)<br />
</font></p>
]]></content:encoded>
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