<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><!-- generator="wordpress.com" -->
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	>

<channel>
	<title>ये-ज़िनदगी &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/ये-ज़िनदगी/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "ये-ज़िनदगी"</description>
	<pubDate>Tue, 13 May 2008 04:37:54 +0000</pubDate>

	<generator>http://wordpress.com/tags/</generator>
	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[मूंह मीठा करें]]></title>
<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/11/10/%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a0%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%82/</link>
<pubDate>Fri, 10 Nov 2006 11:00:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
<guid>http://shuaibi.wordpress.com/2006/11/10/%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a0%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%82/</guid>
<description><![CDATA[नीचे तसवीर पर किल्क करना लड्डू खाने जै]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="center"><strong>नीचे तसवीर पर किल्क करना लड्डू खाने जैसा है :)</strong></p>
<p align="left">और हां ....... लड्डू खाने के बाद चिट्ठाचर्चा चलें वहां आज <a target="_blank" href="http://chitthacharcha.blogspot.com/2006/11/blog-post_10.html" title="ChitthaCharcha">मज़ेदार चर्चा</a> चल रही है, बहुत दिनों की खामोशी के बाद सबको एक साथ एक जगह बोलते हुए अच्छा लग रहा है ........ लड्डू बाद मे खाना  - <a target="_blank" href="http://chitthacharcha.blogspot.com/2006/11/blog-post_10.html" title="Chittha Charcha">आइये आइये चलते हैं चिट्ठाचर्चा</a></p>
<p align="center"><a href="http://www.shuaib.in/chittha/"><img border="0" width="354" src="http://www.giftmela.com/images/827_thumb.jpg" alt="http://shuaib.in" height="338" style="width:354px;height:338px;" /></a></p>
<p align="center"><a href="http://www.shuaib.in/chittha/"></a><a href="http://www.shuaib.in/chittha/">This blog has been moved on a new location</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ये भारत है जनाब !!!]]></title>
<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/10/27/%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ac/</link>
<pubDate>Fri, 27 Oct 2006 05:57:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
<guid>http://shuaibi.wordpress.com/2006/10/27/%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ac/</guid>
<description><![CDATA[क्या अजीब देश है हमारा, यहां कभी त्योह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>क्या अजीब देश है हमारा, यहां कभी त्योहार खतम होने का नाम ही नही लेते कभी दीपावली की खरीदारी तो कभी रमज़ान की गहमा गहमी, कभी दशहरा तो कभी दुर्ग पूजा। पिछले चंद महीनों मे त्योहारों का जैसे एक सिलसिला चल रहा है। पहले तो पूरे भारत मे दशहरा की धूम धाम थी और लोगों ने रावन को जला कर चैन का सांस लिया ही था कि दिपावली और रमज़ान की तैयारियाँ और शुरू होगई।</p>
<p>रात के बारह बजते ही जहां पूरी दुनिया सोजाती है लेकिन इस वक्त रमज़ान और दिपावली के मौके पर पूरे भारत मे सवेरा हो जाता है - लोगों की चहल पहल की वजह से बाज़ारों मे रौनक लग जाती है। इस बार दिपावली के साथ रमज़ान का भी समाँ था, पूरे बाज़ार खरीदारी के लिए खचाखच भरे हुए, भारत मे इन त्योहारों के मौके पर कौन हिन्दू और कौन मुसलमान पहचानना मुश्किल है क्योंकि सभी भारतीयों का एक-दूसरे के त्योहारों मे आना-जाना और मुबारकबादी देना ज़रूरी है और तो और एक-दूसरे के घरों मे खाना भी खाते हैं और ये नज़ारा चंद नेता लोगों से हज़म नही होता, जैसे ही त्योहारों का मौसम खतम हुआ फिर दंगा फसाद शुरू करवा देते हैं - वाह क्या कल्चर है हमारा!</p>
<p>भारत कोई ऐसा वैसा देश नही जहां हिन्दू-मुसलमानों के बीच सिर्फ दंगे ही होते हैं - भारत के हिन्दू और मुसलमान अपस मे लडते ज़रूर हैं मगर एक दूसरे के बगैर रह भी नही सकते। वैसे तो मैं सिर्फ नाम का मुसलमान हूं और हर दिन मुसलमानों मे उठता बैठता हूं लेकिन अपने देश के कल्चर को ही अपना धर्म और भारत को अपनी मां सम्मान मानता हूं। मैं ने हमेशा से हिन्दू को हिन्दू नहीं बल्कि अपना भाई माना है हालांकि दंगों के वक्त अपने हिन्दू भाईयों से मार भी खा चुका हूं। खैर दंगे फसाद के मौके पर कौन क्या है दिखाई नही देता और ये दंगा फसाद तो हमारे देश मे रोज़ का मामूल है, फसाद किसी भी टाइप का हो मगर भुगतने वाला कोई, पकडा जाने वाला कोई, मरने वाला कोई लेकिन फसाद मचाने वाला आज़ाद - नेता लोग को कौन पकडे? जबकि पकडने,  मारने और फसाद मचाने का आर्डर तो वही देते हैं।</p>
<p>यहां दुबई मे कहने को बहुत सारे दोस्त हैं मगर अपना जो सच्चा दोस्त है वो एक हिन्दू है, ज़रूरतों पर काम आने वाला, खुशी और दुःख मे साथ देने वाला हालांकि वो अभी तक मुझे मुसलमान ही समझता है फिर भी अपनी सच्ची दोस्ती निभाता है। हम पिछले चार वर्षों से साथ हैं लेकिन आज तक उस ने मुझ से ये नही पूछा कि दूसरे मुसलमानों की तरह तू नमाज़ क्यों नही पढता? जबकि मैं ने उस से पूछ डाला तू पूजा पाठ क्यों नही करता? उसने जवाब दियाः "हालांकि मेरे माता-पिता हिन्दू हैं और पूजा भी करते हैं लेकिन जब से मैं ने दुनिया देखा धर्म पर से विश्वास उठ गया। ये सारे लोग झूठे हैं जो सुबह शाम राम अल्लाह का नाम लेते हैं और छुप कर गलत काम भी करते हैं लेकिन मैं राम अल्लाह का नाम नही लेता सिर्फ अपने दिल की सुनता हूं जो बुरा लगे वो बुरा और जो अच्छा लगे वो अच्छा।" अपने इस दोस्त के विचार जान कर मुझे बहुत खुशी हुई, पहली बार मुझे अपने विचारों जैसा अपने ही देश का ये मित्र मिला, मैं ने अपनी किस्मत का शुक्र अदा किया। आज अपने देश मे ऐसे बहुत सारे नौजवान हैं जो अपने धर्म मे पाबंदियों की वजह से तंग आचुके वो खुल कर जीना चाहते हैं लेकिन अपने माता-पिता की इज़्ज़त के लिए आवाज़ नही उठाते। ऐसे आज़ाद विचार वाले भी अपने मां बाप से डरते हैं और उनकी इज़्ज़त करते हैं, ऐसा प्यारा परिवार भारत के अलावा और कहां मिलेगा? ये कैसा अजीब देश है हमारा, जैसा भी हो वो हमें प्यारा।</p>
<p>इस लेख मे कुछ खास बात नही है, लेकिन ये लेख अपने इस मित्र के नाम लिख रहा हूं जो चार वर्ष साथ रहने के बाद उसके विचारों को पहली बार जान कर मुझे सच्ची खुशी मिली।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[छुट्टियों का चांद]]></title>
<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/10/19/%e0%a4%9b%e0%a5%81%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a6/</link>
<pubDate>Thu, 19 Oct 2006 05:58:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
<guid>http://shuaibi.wordpress.com/2006/10/19/%e0%a4%9b%e0%a5%81%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a6/</guid>
<description><![CDATA[ईद के लिए यहां दो दिन मिलने वाली छुट्ट]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ईद के लिए यहां दो दिन मिलने वाली छुट्टियों मे हम चंद दोस्त किराए की कारें ले कर शहर से दूर घूमने चले जाते हैं। इस बार हमारा रूम्मेट <strong>बिदप्पा</strong> (मैसूर से) ने एक सेकंड कार खरीद ली है, मगर वो हमेशा सिर्फ लडकियों को घुमाते रहता है। मैं ने उससे कह दिया इस बार ईद की छुट्टियों मे हमें अपनी कार मे घुमाने ले जाए शहर से कहीं दूर जहां शोर ना हो - वो बहुत मुश्किल से माना क्योंकि उसका प्लान दो दिन लडकियों के साथ मज़े करने का था। किराए की कारों से अच्छा है अपने दोस्त की कार हो और वो भी साथ हो तो घूमने मे बहुत मज़ा आता है।</p>
<p>वैसे शहर मे बहुत सारी घूमने की जगहें हैं मगर दिल और दिमाग को आराम के लिए शहर से दूर जाकर घूमना अच्छा है। यहां हम परदेसियों को वर्ष मे सिर्फ यही दो दिन मिलते हैं, वरना हर दिन वही साइकिल की तरह सुबह से शाम तक आँफिस फिर शाम को घर मे - वैसे सप्ताह मे एक दिन छुट्टी होती ही है जिसमे कपडे धोने और कुछ खरीदारी करने मे पूरा दिन लग जाता है। हमारे लिए ये दो दिन छुट्टी के गनीमत हैं, ऐसा महसूस होता है जैसे पूरे साल भर की थकान इन दो दिनों मे उतारली :) यहां ईद मनाने के लिए चांद देखते हैं मगर ये हमारे लिए छुट्टियों का चांद है :)</p>
<p><strong>दिवाली की मुबारकबाद</strong><br />
कल जब ये तीनों चिट्ठे <a target="_blank" href="http://kaviakela.blogspot.com/2006/10/blog-post_18.html" title="गिरिराज जोशी">गिरिराज जोशी</a>, <a target="_blank" href="http://udantashtari.blogspot.com/2006/10/blog-post_17.html" title="उडन तश्तरी">समीर जी</a> और <a target="_blank" href="http://hindini.com/fursatiya/?p=201" title="फुरसतिया जी">फुरसतिया जी</a> को पढा तो कुछ भी समझ नही आया जैसे कोड वर्ड मे बात चीत हो रही है ;) अपना छोटा दिमाग है बडी बातें नहीं घुसतीं ;) सुबह दफ्तर मे कुछ काम करलेने के बाद नारद और चिट्ठाचर्चा को सलाम करता हूं जिसके बगैर जैसे पूरा दिन अधूरा है। मगर ये हिन्दी चिट्ठे जो ब्लॉगस्पाट पर हैं, मैं वो सब चिट्ठे पढ तो सकता हूं लेकिन मेरी मजबूरी है कि उन पर टिप्पणी लिख नही सकता सिर्फ वर्ड प्रेस डाट कॉम वाले चिट्ठों को टिप्पणी दे सकता हूं। जहां तक हो सका मैं ने बहुत सारे हिन्दी चिट्ठाकारों को दिवाली की मुबारकबाद दिया, फिर भी उन लोगों के लिए जिन का चिट्ठा ब्लॉगस्पाट पर है, मैं अपनी इस पोस्ट के से सभी हिन्दी चिट्ठाकारों को दिवाली की शुभकामनाएँ और मुबारकबाद पेश करता हूं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[26 वर्ष पूरे हुए]]></title>
<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/09/12/26-%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b7-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%8f/</link>
<pubDate>Tue, 12 Sep 2006 17:22:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
<guid>http://shuaibi.wordpress.com/2006/09/12/26-%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b7-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%8f/</guid>
<description><![CDATA[आज पहली बार कहना पड रहा है कि अब मुझे भी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज पहली बार कहना पड रहा है कि अब मुझे भी ज़िन्दगी के 27 वर्षों का तजुर्बा है :) और ऐसे खुशी के मौके पर अपने एक फज़ूल मित्र ने हमारे सर पर दो सफेद बाल ढूंड कर साबित करदिया के ये हमारे बुढापे की ओर पहला कदम है :( खैर - अपने बुढापे की ओर बढते कदम का अफसोस नही, हर किसी को एक ना एक दिन बूढा होना ही है मगर खुशी की बात तो ये है कि अब सीना तान कर दुनिया से कहना है "हम भी ज़माने के 27 वर्ष देख चुके हैं" :)</p>
<p>रात बारह बजते ही हमेशा की तरह भारत और पोलैंड से sms की भरमार शेर व शायरी, लम्बी उम्र की दुआऐं उसके अलावा ई-मेल से ई-कार्डस् वगैरह। सवए हमारे बाकी बहुत से लोगों को खुशी हुई के हम 27 वर्ष के हो गए - अपने को कुछ ज़्यदा खुशी नही हुई क्योंकि पिछले वर्ष जो बहुत से काम करने थे वोह पूरे नही किए, उन कामों मे अपनी छोटी बेहन की शादी भी करवानी थी। खैर - पिछले वर्ष जो कुछ नही हुवा उसे अब जल्दी जल्दी निपटाना होगा (यानी अपना रात दिन एक बनाना है)</p>
<p>पिछले चार वर्षों से यहीं अपनी उम्र बढाई की रस्म (बर्थडे पार्टी) मनाई जा रही है - इस बार भी एक बढिया केक बनवा कर अपने फ्लैट मे अपने चंद मित्रों के बीच ज़ोरदार तालियों के साथ केक काट दिया :) खुद कमरा सजाया, टेबुल कुर्सियों का इनतेज़ाम किया - अपनों से बिछडने का बहुत अफसोस हो रहा था - वोह भी क्या दिन थे के हमारे जन्मदिन के रोज़ अपनी दोनों बेहनें पूरे घर को सजाति संवर्ती और उस दिन अम्मी मेरे पसंद के सभी मज़ेदार खाने बनाते थे और फिर शाम को सब मिल कर मेरे केक लाने का इनतेज़ार करते :) आज जब दोपहर को अम्मी से फोन पर बात हुई तो वोह भी उन दिनों को याद करके खूब रोई।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मुबारक हो जनाब]]></title>
<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/08/25/%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%95-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ac/</link>
<pubDate>Fri, 25 Aug 2006 06:05:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
<guid>http://shuaibi.wordpress.com/2006/08/25/%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%95-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ac/</guid>
<description><![CDATA[घर से निकलते वकत अम्मी ने बहुत समझाया ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>घर से निकलते वकत अम्मी ने बहुत समझाया के कुछ तो खाना पकाना सीखले, वहां जाकर क्या खाएगा? हम ने दो टोक जवाब दिया थाः वहां जाकर देखा जाएगा। अम्मी ने कहाः अंडा फिराई करना तो सीखले। हमारा जवाब थाः अभी जाने के वकत क्या किया सीखना पडेगा और ऊपर से टाइम भी बहुत कम है हमारे पास। अब यहां आए चार वर्ष होने को हैं, होटलों का खा खाके <a target="_blank" href="http://images.google.ae/images?q=tbn:AhFrQ7Zn2LIEhM:http://www.hinduonnet.com/thehindu/mp/2005/10/06/images/2005100600030201.jpg" title="Adnan Sami Picture">अदनान समी</a> को भी पीछे छोड दिया - वैसे भी होटलों मे पकने वाले खानों से हर कोई वाकिफ है और हमेशा होटलों का खाने से अजीबवगरीब बीमारियाँ? वहां घर के खानों मे नकस निकालना और मस्ती करना, कितना भी अच्छा पका हो फिर भी मां को कोसना के क्या ऐसा पकाया है?। हर किसी को घर से दूर घर का खाना बहुत याद आता है। खैर हमने घर का खाने के लिए जो मस्ती की थी अब उसकी सज़ा भी भुगत रहे हैं। घर से दूर इतने वर्षों बाद आज पहली बार तीन अंडे बरबाद करने के बाद आखिरकार चौथा अंडा फिराई करने मे हम कामयाब रहे - मुबारक हो जनाब :)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आज छुट्टी है?]]></title>
<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/08/15/%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%9b%e0%a5%81%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Tue, 15 Aug 2006 07:09:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
<guid>http://shuaibi.wordpress.com/2006/08/15/%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%9b%e0%a5%81%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</guid>
<description><![CDATA[सुबह सबेरे परेड ग्रऊँड पहुंचो, तिरंगा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="center">सुबह सबेरे परेड ग्रऊँड पहुंचो, तिरंगा लहराव,<br />
मन्त्रीयों का भाषन सुनो और तालियाँ बजाउ फिर मिठाई खाउ
</p>
<p align="center">&#160;</p>
<p><strong>आज सुबह सिर्फ दो घंटे आज़ादी का जशन मनाने के बाद बाकी पूरा दिन छुट्टी है<br />
हम सब भारतीयों को 59 वीं आज़ादी की छुट्टी मुबारक</strong></p>
<p>आज सुबह को सभी भारतीयों ने आज़ादी मिलने की खुशी मे अपने जोश और जज़बे का इज़हार देश भक्त गीतों से किया फिर सभी भारतीयों ने पूरी आज़ादी के साथ सुबह सुबह थंडी सांस ली क्योंकि आज छुट्टी का दिन है। और ऐसे भी लोग हैं जो आज का दिन सिर्फ छुट्टी समझ कर गुज़ार देते हैं। स्कूली बच्चों को याद दिलाया जाता है कि किस तरह शहीदों ने अपनी कुरबानियों से इस देश को आज़ाद करवाया, और इनही की वजा से आज हम आज़ादी के साथ सांस ले रहे हैं। बच्चे तो मान जाते हैं मगर आज भी चंद लोगों का रोना है कि ये कैसी आज़ादी है? कौन कहता है कि भारत आज़ाद देश है? ऐसे लोग और पचास साल बाद वैसे ही रोते नज़र आऐंगे कि भारत तो आज़ाद है मगर हम अभी तक गुलाम हैं। आज अगर भारत चीन और अमेरिका से दो कदम पीछे है तो सिर्फ उन लोगों की वजा से जो इसी देश का खाते हैं और दूसरे देशों का गाते हैं और तो और इतने बडे आज़ाद देश मे डरते हुए सांस लेते हैं। देखा जाए तो हर कोई सच्चा भारती अपने देश मे पूरी आज़ादी से सांस ले रहा है क्योंकि ये सिर्फ अपना देश ही नही बल्कि हमारी मां सम्मान देश है और अपनी मां की गोद मे बैठ कर पूरी आज़ादी से सांस लेने वाला किसी से डरता नही और वोह आराम से मज़े मे रहता है। अपनी किस्मत का शुक्र अदा करना चाहिए कि हम एक जन्नत जैसे देश मे पूरी पूरी आज़ादी से हैं। आज अखबारों मे खबरें पढ कर डर लगता है कि किस्मत मे अगर हमारा जनम किसी ऐसे वैसे देश मे होता तो ---- ऊपर वाले ने हमारी किस्मत चमकादी जिसने हमें एक आज़ाद और खुशहाल देश का शहरी बनाया और बाकी दुनिया की नज़रों मे इज़्ज़त दी जिस पर फखर से कहने को दिल करता है हम हिन्दुस्तानी हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ग्रीन चाय]]></title>
<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/07/30/%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%af/</link>
<pubDate>Sun, 30 Jul 2006 18:07:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
<guid>http://shuaibi.wordpress.com/2006/07/30/%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%af/</guid>
<description><![CDATA[हम भारती चाय के शौकीन हैं ही मगर चाय ऐस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हम भारती चाय के शौकीन हैं ही मगर चाय ऐसी जिस मे दूध<font face="Times New Roman">, </font>चीनी और इलाईची हो जिसे हम स्पेशल चाय कहते हैं। यहां अरब देशों मे लोग बगैर दूध की चाय पीते हैं यानी काली चाय । हम भारतियों को देख कर कुछ अरबी लोग दूध वाली चाय भी पी जाते हैं। यूरोप से हमारी एक मित्र ने चेटिंग पर बताया कि उनके यहां पोलैंड मे लोग ग्रीन टी (हरी पत्ती) पीना पसंद करते हैं। हमारी मित्र ज़ोशिय खुद कहती है कि ग्रीन टी पीने से सहत अच्छी बनी रहती है और उससे मोटापा भी नही आता। उसी के मशवरे पर हम<font face="Times New Roman"> </font>ने भी सुपर मार्केट से लिपटन का ग्रीन टी उठा लाया और आज पूरा एक महीना बीत गया हमने सिर्फ एक टी बेग यूज़ की ---- इतनी कडुवा कि मैं बता नही सकता<font face="Times New Roman">, </font>मगर वो कहती है सहत के लिए बहुत अच्छा है --- ऐसी चाय उसी को मुबारक।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कैसे करूँ शादी?]]></title>
<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/07/17/%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%81-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Mon, 17 Jul 2006 08:19:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
<guid>http://shuaibi.wordpress.com/2006/07/17/%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%81-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80/</guid>
<description><![CDATA[अम्मी ने मेरे लिए एक लडकी का फोटो साथ म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अम्मी ने मेरे लिए एक लडकी का फोटो साथ मे उसका बयुडाटा भेजा, वोह 22 वर्ष की BA पास खूबसूरत लडकी है साथ मे पांच वकत की नमाज़ी भी और उसका पूरा खानदान माशा-अल्लाह पक्का इसलामी और दीनदार है उन्हें भी पांच वकत का नमाज़ी और पक्का लडका चाहिए। यहां मेरे चंद मुसलमान मित्रों के साथ इस बारे मे बात किया तो बताया कि लडकी मे कुछ बुराई तो नही सोच समझ कर हां कह दे। मैं ने लडकी के घर वालों को डैरेक्ट खत भेजा जिसमे शादी की शर्त रखी कि अगर शादी होगी तो कोर्ट मे होगी वोरना नहीं। लडकी वाले आग बगला होए और हमारे घर जाकर झगडा किया कि कैसी तरबियत दी है अपने बेटे को? आपका बेटा मुसलमान है या फिर कोई और?? भाई हम मुसलमान हैं शादी घर मे हो या मसजिद मे मगर निकाह ज़रूरी है और आपका बेटा कहता है कि वोह कोर्ट मे शादी करेगा छी छी ------ किया लडकी को भगा के शादी करेगा या फिर लडकी लावारिस है?</p>
<p>उसके दूसरे दिन अम्मी ने मुझे फोन पर खूब सुनाई, तेरे विचार बताने की किया ज़रूरत थी? कितना अच्छा खानदान है ढूंडने से भी नही मिलता। अम्मी से बात करते होवे मेरी बोलती गुम होगई क्योंकि अब्बा भी वहीं थे। मैं ये बताना चाह रहा था कि अपनी होने वाली पार्टनर को अपने बारे मे सब कुछ सच सच बता देना चाहता हूं क्योंकि बाद मे वोह ना पछताए और मुझे गालियाँ दे कि पहले क्यों नही बताया। मैं खुल कर अपने विचार अपने घर वालों को बता नही सकता वोरना अब्बा खुद मेरी मौत का फत्वा निकाल देंगे और शाही इमाम दिल्ली से बेंगलौर तक मेरे खिलाफ जुलूस लेकर जनाज़ा के साथ पहुंच जाएगे।</p>
<p>अपने विचारों को शेर करने के लिए ये मेरा ब्लॉग काफी है और मेरी डाईरी यही ब्लॉग है, अपने ब्लॉग पर पूरी आज़ादी के साथ अपने विचार लिख सकता हूँ जो बोल नही सकता। भारत मेरा पहला धर्म है जहां मैं पैदा होवा और उसी देश के बनाए कानून के मुताबिक कोर्ट मे शादी करूँगा मगर ऐसी लडकी मिलेगी कहां?</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चश्मा]]></title>
<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/06/25/%e0%a4%9a%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Sun, 25 Jun 2006 08:11:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
<guid>http://shuaibi.wordpress.com/2006/06/25/%e0%a4%9a%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be/</guid>
<description><![CDATA[मेरी नज़र कमजोर तो नही फिर भी पिछले आठ व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मेरी नज़र कमजोर तो नही फिर भी पिछले आठ वर्षों से चश्मे के बगैर क्म्प्यूटर की स्क्रीन को नही देख सकता और अगर किसी दिन अपना चश्मा घर भूल आया तो दफतर मे कुछ काम नही कर सकता, अब तो चश्मा मेरी रोजी रोटी बन गया है क्योंकि क्म्प्यूटर के सिवा मुझे दूसरा कोई काम नहीं आता और चश्मे के बगैर क्म्प्यूटर चला नहीं सकता। मैं चश्मे के बगैर अखबार पढ सकता हूं, अँधेरे मे भी कुछ कुछ देख सकता हूं मगर टीवी, सिनेमा और क्म्प्यूटर की स्क्रीन नहीं देख पाता। अब तो क्म्प्यूटर पर गारमंट (Fabric) डिज़ाईन कर रहा हूं जो बहुत ही बारीकी का काम है यानी और ज्यादा नज़र कमजोर होने का काम है।</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
