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	<title>रास्ता &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/रास्ता/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "रास्ता"</description>
	<pubDate>Sat, 30 Aug 2008 14:47:51 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[नहीं मिलते उनकी करतूतों के निशान-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=225</link>
<pubDate>Sun, 10 Aug 2008 12:55:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=225</guid>
<description><![CDATA[कई किताबें पढ़कर बेचते है ज्ञान
अपने व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कई किताबें पढ़कर बेचते है ज्ञान<br />
अपने व्यापार को नाम देते अभियान<br />
चार दिशाओं के चौराहे पर खड़े होकर<br />
देते हैं हांका<br />
समाज की भीड़ भागती है भेड़ों की तरह<br />
नाम लेते हैं शांति का<br />
पहले कराते हैं सिद्धांतों के नाम पर झगड़ा<br />
बह जाता है खून सड़कों पर<br />
उनका नहीं होता बाल बांका<br />
कोई तनाव से कट जाता<br />
कोई गोली से उड़ जाता<br />
पर किसी ने उनके घर में नहीं झांका<br />
कहीं नहीं मिलते उनकी करतूतों के निशान<br />
....................................................</p>
<p>हमें मंजिल का पता बताकर<br />
खुद वह जंगल में अटके हैं<br />
कहने वाले सच कह गये<br />
जो सबको  बताते  हैं<br />
नदिया के पार जाने का रास्ता<br />
वह स्वयं  कभी पार नहीं हुए हैं<br />
कहैं  महाकवि दीपक बापू<br />
उन्मुक्त भाव से जीते हैं जो लोग<br />
मुक्त कहां हो पाते हैं स्वयं<br />
दुनियां भर के झंझट उनके मन के बाहर लटके हैं<br />
.................................................</strong></p>
<p><strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चालान की आशंका में सीटी नहीं बजाई-हास्य कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=458</link>
<pubDate>Fri, 08 Aug 2008 14:19:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=458</guid>
<description><![CDATA[मोटर साइकिल पर चलते हुए
जब उसने किसी भ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मोटर साइकिल पर चलते हुए<br />
जब उसने किसी भी लड़की को देखकर<br />
सीटी नहीं बजाई<br />
तो अचरज में पड़कर दोस्त ने पूछा<br />
‘क्या तुम्हारी आज तबियत ठीक नहीं है<br />
जो गाडि़यों पर चल रही किसी भी<br />
लड़की को देखकर सीटी नहीं बजाई’</p>
<p>उसने कहा<br />
‘न गाड़ी मेरे नाम से<br />
न लाइसैंस मेरे पास<br />
न सिर पर हैल्मेट<br />
न ही बीमा हैं कोई इस गाड़ी का<br />
जब पकड़े जाते है तो<br />
यही हर कोई मांगता है भाई<br />
लड़कियों को देख कर सीटी बजाने के<br />
चक्कर में कहीं कुछ दिखता नहीं है<br />
आजकल हो रहे हैं चालान खूब<br />
मैं तीन दिन में  दो बार करा चुका हूं<br />
अब कहीं होने की आशंका लगती है<br />
तो दूर से  रास्ता बदल लेता हूं<br />
पहले तो लगता था कि<br />
गाड़ी चलाते देख ले कोई<br />
पर अब कोई न देखें इसी में लगती है अच्छाई<br />
...................................................</p>
<blockquote><p><strong>यह मूल पाठ इस ब्लाग <a href="http://rajlekh.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका’</a> पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का शब्दज्ञान-पत्रिका</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अभी मशहूर नहीं हो सकते-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=347</link>
<pubDate>Tue, 05 Aug 2008 17:45:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=347</guid>
<description><![CDATA[घर आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापू हमें]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#800080;">घर आया फंदेबाज और बोला<br />
‘दीपक बापू हमें तुम पर<br />
बहुत तरस आता<br />
लिखते हुए बीत गए कई बरस<br />
पर तुम्हारा नाम<br />
कहीं चमक नहीं पाता<br />
केवल लिखने से तुम मशहूर नहीं हो सकते<br />
देखो लाया हूं<br />
मशहूर होने के हजार नुस्खे बताने वाली किताब<br />
मत पूछना पैसों का हिसाब<br />
इसे पढ़कर जानो कुछ<br />
लिखो अपनी रचना में बड़ो-बड़ो के नाम<br />
उनका करो प्रशस्ति गान<br />
हो गयी कृपा किसी की तो हो जायेंगे पौ-बारह<br />
हो जायेगी भीड़ आगे-पीछे<br />
ऐसे तुम लोगों की आंखों के नूर नहीं हो सकते’<br />
सुनकर पहले सोच में पड़े<br />
फिर नाक पर पसरे चश्में से<br />
आंखे नचाते हुए कहैं दीपक बापू<br />
‘कमबख्त, जब भीड़ होगी तो<br />
क्या खाक लिख  पायेंगें<br />
भेड़ की तरह बड़े नाम वाले<br />
हमको भी हांक ले जायेंगे<br />
लाए हो यह मशहूर करने वाली किताब<br />
क्या उसका लेखक मशहूर है<br />
क्या उसमें लिखने का भी शउर है<br />
लिखने के साथ मैनेजमेंट का<br />
रिश्ता कभी हो नहीं सकता<br />
चंद शब्द लिख कर<br />
बाजार में निकल पड़ें बेचने<br />
यह हमसे हो नहीं सकता<br />
जो मशहूर है वह  भी<br />
अपनी किस्मत को रोते<br />
अपने मन का लिखने से दूर होते <br />
दाम को देखकर लिख पाते<br />
जितना हुक्म देता बोस<br />
उतना ही दिख पाते<br />
हम अपने से दूर कभी हो नहीं सकते<br />
अंतर्जाल पर मिला है खुलकर<br />
लिखने का मौका<br />
रास्ता बदलकर हम अपना<br />
अभियान चूर नहीं कर सकते<br />
जिन्हें तुम बड़े बता रहे हो<br />
उनका बौना चरित्र हम ही देख पाते<br />
भाषा को बेचते है<br />
शब्दों के अर्थ से उनका क्या वास्ता<br />
उनका तो है बस माया का रास्ता<br />
उनका बाद में होता नहीं नाम लेवा<br />
जो अपनी जिंदगी में मशहूर होते<br />
जिनको पाना होता है कुछ<br />
उनका नाम लेकर<br />
वही उनकी बरसी पर रोते <br />
शब्दों के रचयिता हैं जो<br />
उनके सौदागर नहीं  हो सकते<br />
जिन पर मन होता है<br />
उनकी प्रशंसा में कमी नहीं रखते<br />
पर गुलाम बनकर लिखें<br />
किसी धनवान का गुणगान<br />
यह हमारे लिए संभव नहीं<br />
 दर्शक बनकर खड़े रहना है मंजूर<br />
किसी के इशारे पर खेलें यह संभव नहीं<br />
अभी शब्दों का  भंडार बहुत है लुटाने को<br />
कभी तो छा जायेंगे<br />
भले ही अभी मशहूर हो नहीं सकते<br />
......................................<br />
</span></strong></p>
<blockquote><p><strong>href="http://deepak.raj.wordpress.com"&#62;‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल तोड़ना at first sight]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=896</link>
<pubDate>Wed, 12 Mar 2008 04:25:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=896</guid>
<description><![CDATA[दिल तोड़ना at first sight
झूठा गुस्सा उस पर झूठ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">दिल तोड़ना at first sight<br />
झूठा गुस्सा उस पर झूठी fight<br />
लड़की है दीवानी लड़का दीवाना<br />
अपनी दोनों की जमेगी, right!</font></p>
<p><font color="#000000">तुमको रोज़-रोज़ करता हूँ miss<br />
please करने दो न एक kiss<br />
तुमको बनाऊँगा अपनी जान<br />
चाहोगी लाऊँगा तुम्हारे लिए चाँद</font></p>
<p><font color="#000000">ऐसी अदा ऐसा नशा जो देखा<br />
तुझे देखते ही प्यार हो गया<br />
आँखें बंद करके लेट भी गया<br />
पर नींद न आयी सारी-सारी night</font></p>
<p><font color="#000000">लड़की है दीवानी लड़का दीवाना<br />
अपनी दोनों की जमेगी, right!<br />
दिल तोड़ना at first sight<br />
झूठा गुस्सा उस पर झूठी fight</font></p>
<p><font color="#000000">मेरे love का angle ज़रा टेढ़ा है<br />
इन रास्तों पर रोड़ा ही रोड़ा है<br />
पर मेरी बात न माना मेरा दिल<br />
ढूँढ़ता रहा एक नयी मुश्किल</font></p>
<p><font color="#000000">मैंने कितना अपनी बात समझायी<br />
जो बीती वह कहानी दोहरायी<br />
पीछे-पीछे दौड़ता रहा मुझको खींचता रहा<br />
दिखाता रहा अंधेरे में light</font></p>
<p><font color="#000000">लड़की है दीवानी लड़का दीवाना<br />
अपनी दोनों की जमेगी, right!<br />
दिल तोड़ना at first sight<br />
झूठा गुस्सा उस पर झूठी fight</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २६ मई २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[टूटे हुए चाँद को]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=827</link>
<pubDate>Mon, 25 Feb 2008 16:26:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=827</guid>
<description><![CDATA[टूटे हुए चाँद को सादे काग़ज़ में लपेटा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">टूटे हुए चाँद को सादे काग़ज़ में लपेटा मैंने<br />
भीगे हुए सूरज को हथेलियों में समेटा मैंने<br />
तारे बसरने लगे और आसमाँ ख़ाली हो गया<br />
उसने एक आइने की तरह मुझे तोड़ दिया है<br />
...तोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">जला दिये दिल के जज़्बात उसने<br />
बढ़ा दिये मेरे मुश्किलात उसने<br />
जीना मेरा जीना बहुत मुश्किल है<br />
यह ज़हर पीना बहुत मुश्किल है</font></p>
<p><font color="#000000">बहार में भी शाख़ों पर ख़िज़ाँ थी<br />
सूखी-सूखी बंजर हर फ़िज़ा थी<br />
फ़िज़ाएँ रंग बदलने लगी हैं<br />
हवाओं के साथ चलने लगी हैं मगर<br />
उसने निगाहों में खिलना छोड़ दिया है<br />
...छोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">फ़िज़ाएँ मौसम के साथ खिलती हैं<br />
और मौसम बदलते रहते हैं<br />
मौसम बदला है तो फ़िज़ा भी बदलेगी<br />
बदले हुए मौसम ने हज़ार रास्तों को<br />
मेरी तरफ़ मोड़ दिया है, मोड़ दिया है<br />
...मोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">शब्दों की स्याही में रिश्ते हैं<br />
फूलों के अर्क़ में रिश्ते हैं<br />
हर शब्द हर फूल में मिलते हैं<br />
हर जिस्म की शाखों पर खिलते हैं<br />
मिलते हैं बिछुड़ते हैं,<br />
बिछुड़ते हैं मिलते हैं<br />
समंदर की लहर जैसे चलते रहते हैं<br />
खिलते हैं महकते हैं<br />
बनते हैं बुझते हैं<br />
यह धूप-छाँव के जैसे रंग बदलते हैं</font></p>
<p><font color="#000000">उसने एक रिश्ता तोड़ा है इक जोड़ दिया है<br />
जोड़कर उसने रिश्ते को फिर तोड़ दिया है<br />
...तोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">जला दिये दिल के जज़्बात उसने<br />
बढ़ा दिये मेरे मुश्किलात उसने<br />
जीना मेरा जीना बहुत मुश्किल है<br />
यह ज़हर पीना बहुत मुश्किल है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९ अप्रैल २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस पुराने शहर में]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=829</link>
<pubDate>Mon, 25 Feb 2008 16:26:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=829</guid>
<description><![CDATA[इस पुराने शहर में
कुछ पुरानी इमारतें ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">इस पुराने शहर में<br />
कुछ पुरानी इमारतें हैं<br />
कुछ खण्डहर हैं<br />
कुछ अजनबी रास्ते हैं</font></p>
<p><font color="#000000">दूर से पत्थर दिखता होगा<br />
बेजान दिल मेरा लगता होगा<br />
छूकर देखो,<br />
दीवारें आज भी साँस लेती हैं<br />
न कहती हैं न सुनती हैं<br />
टूटती-गिरती हैं...</font></p>
<p><font color="#000000">जब भी गुज़रता हूँ<br />
साये मुझको पुकारते हैं<br />
इस पुराने शहर में<br />
कुछ पुरानी इमारतें हैं<br />
कुछ खण्डहर हैं<br />
कुछ अजनबी रास्ते हैं</font></p>
<p><font color="#000000">कितने ख़ाबों के बादल बरसे<br />
कितनी ख़ुशबू की बेले महकीं<br />
हर बार,<br />
नशेमन जलकर खाक हुआ<br />
चिन्गारियाँ,<br />
दिलों में जब-जब दहकीं...</font></p>
<p><font color="#000000">जो भीगकर मिटती हैं<br />
कुछ ऐसी भी इबारतें हैं<br />
इस पुराने शहर में<br />
कुछ पुरानी इमारतें हैं<br />
कुछ खण्डहर हैं<br />
कुछ अजनबी रास्ते हैं</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९ अप्रैल २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मेरी राह के मुसाफ़िर]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=782</link>
<pubDate>Fri, 15 Feb 2008 12:51:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=782</guid>
<description><![CDATA[मेरी राह के मुसाफ़िर तू कहाँ खो गया है
ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">मेरी राह के मुसाफ़िर तू कहाँ खो गया है<br />
जबसे तुझे देखा दिल बेग़ाना हो गया है<br />
मेरी राह के मुसाफ़िर तू कहाँ खो गया है</font></p>
<p><font color="#000000">कब आयेगा तू इन राहों पर मुझको बता<br />
यह दीवाना दिल तेरा हुआ मुझे न सता<br />
मेरी राह के मुसाफ़िर तू कहाँ खो गया है</font></p>
<p><font color="#000000">सूनी-सूनी राहों का इन्तिज़ार बढ़ गया है<br />
आया था कोई तूफ़ाँ दिल से गुज़र गया है<br />
मेरी राह के मुसाफ़िर तू कहाँ खो गया है</font></p>
<p><font color="#000000">है नहीं कोई रास्ता पास तुझसे मिलने का<br />
है नहीं कोई सबब इस तरह छिपने का<br />
मेरी राह के मुसाफ़िर तू कहाँ खो गया है</font></p>
<p><font color="#000000">जबसे तुझे देखा दिल बेग़ाना हो गया है<br />
आया था कोई तूफ़ाँ दिल से गुज़र गया है<br />
मेरी राह के मुसाफ़िर तू कहाँ खो गया है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[फिर क्यों दोनों तन्हा]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=773</link>
<pubDate>Thu, 14 Feb 2008 08:45:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=773</guid>
<description><![CDATA[एक ही रास्ता जब है दोनों का
फिर क्यों द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">एक ही रास्ता जब है दोनों का<br />
फिर क्यों दोनों तन्हा<br />
फिर क्यों दोनों तन्हा</font></p>
<p><font color="#000000">मेरा मरहम है तू<br />
मेरा मज़हब है तू<br />
आँखों में तेरा ही चेहरा</font></p>
<p><font color="#000000">कंचन भी तू है<br />
चंदन भी तू है<br />
दिल चाहे तेरा ही रहना</font></p>
<p><font color="#000000">एक ही रास्ता जब है दोनों का<br />
फिर क्यों दोनों तन्हा<br />
फिर क्यों दोनों तन्हा</font></p>
<p><font color="#000000">मन मन्दिर है तू<br />
कितनी सुन्दर है तू<br />
तेरे बिन लागे दिल ना</font></p>
<p><font color="#000000">मेरा मंज़िल तू है<br />
मेरा साहिल तू है<br />
दिल चाहे तुझको पाना</font></p>
<p><font color="#000000">एक ही रास्ता जब है दोनों का<br />
फिर क्यों दोनों तन्हा<br />
फिर क्यों दोनों तन्हा</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल, मिलें कैसे कोई तो रास्ता दे]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=756</link>
<pubDate>Tue, 12 Feb 2008 13:28:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=756</guid>
<description><![CDATA[दिल, मिलें कैसे कोई तो रास्ता दे
क़ुछ यक़]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">दिल, मिलें कैसे कोई तो रास्ता दे<br />
क़ुछ यक़ीन ख़ुद पर रहे<br />
ऐसा ज़माने को वास्ता दे</font></p>
<p><font color="#000000">मैंने सपनों में सजायी जो सूरत है<br />
आज मिली वह ख़ूबसूरत है<br />
दिल, जाने क्या हो गया है<br />
सोचो तो ज़रा क्या खो गया है<br />
मेरी कहानी में यह क्या मोड़ आ गया<br />
तुम आकर मिलो...</font></p>
<p><font color="#000000">दिल, मिलें कैसे कोई तो रास्ता दे<br />
क़ुछ यक़ीन ख़ुद पर रहे<br />
ऐसा ज़माने को वास्ता दे</font></p>
<p><font color="#000000">आँखें मिलाकर नींदे चुराकर ले गया जो<br />
जिसकी शोख़ अदा पर<br />
हम मर मिटे वह गया तो<br />
फिर कैसे यह ख़्याल रह गया<br />
हर साँस में कैसा यह सवाल रह गया<br />
भूलें कैसे हुआ जो...</font></p>
<p><font color="#000000">दिल, मिलें कैसे कोई तो रास्ता दे<br />
क़ुछ यक़ीन ख़ुद पर रहे<br />
ऐसा ज़माने को वास्ता दे</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>

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