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	<title>रिश्ता &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/रिश्ता/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "रिश्ता"</description>
	<pubDate>Sun, 07 Sep 2008 03:47:30 +0000</pubDate>

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<item>
<title><![CDATA[क्या वादा करूँ तुझसे]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=1066</link>
<pubDate>Mon, 11 Aug 2008 13:25:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=1066</guid>
<description><![CDATA[क्या वादा करूँ तुझसे सितारे तोड़ लाऊँ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">क्या वादा करूँ तुझसे सितारे तोड़ लाऊँगा<br />
मेरी जान ऐसे वादों का रिवाज़ भी पुराना हुआ<br />
लोग अपने महबूब को चाँद बताते थे<br />
मेरी जान आज तो यह अंदाज़ भी पुराना हुआ</span></p>
<p><span style="color:#000000;">यह रात उलझी हुई है तेरी लटों में ओ जानम<br />
आग की रेशमी लपक-सा तेरा उजला चेहरा है<br />
सुर्ख़ तेरे लब हैं जैसे दहकते हुए अंगारे<br />
छलकते पैमाने जैसी आँखों में गुलाबी कोहरा है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">तंग पोशाक में उभरे हुए जिस्म की कशिश<br />
तेरा दीवाना आज ख़ुद तेरे हुस्न का शिकार है<br />
गोरे गालों पर काला तिल उफ़ क़ायमत हो<br />
मैं सैद तू सैय्याद यह रिश्ता भी निभाना हुआ</span></p>
<p><span style="color:#000000;">अदाएँ ख़ूब हैं मेरे जल्वागर जाँ-निसार की<br />
वह हर एक रंग में घुलता है निखरता है<br />
जब भी खिलती है उसके चेहरे पर ख़ुशी<br />
वह एक हसीं ख़ाब में भिगोया हुआ लगता है</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मतलब से ही जनम लेता है कोई रिश्ता]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=1043</link>
<pubDate>Fri, 25 Jul 2008 15:27:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=1043</guid>
<description><![CDATA[मतलब से ही जनम लेता है कोई रिश्ता
मतलब ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">मतलब से ही जनम लेता है कोई रिश्ता<br />
मतलब से ही मिट जाता है वह रिश्ता</span></p>
<p><span style="color:#000000;">तख़लीक़ के इस भँवर में तकलीफ़ है बहुत<br />
सँभलकर बुन जब भी बुन नया रिश्ता</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वक़्त का पहना उतार आये]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=1005</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 08:16:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=1005</guid>
<description><![CDATA[वक़्त का पहना उतार आये
कुछ लम्हे मरके ग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">वक़्त का पहना उतार आये<br />
कुछ लम्हे मरके गुज़ार आये</span></p>
<p><span style="color:#000000;">ख़ाबों में सही अपना तो माना<br />
दिल को मेरे अपना तो जाना</span></p>
<p><span style="color:#000000;">खट्टे-मीठे रिश्ते चख लिये हैं<br />
कुछ सच्चे पलकों पे रख लिये हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">ख़ाहिशों का बवण्डर है दिल<br />
दिल को उसके दर पे छोड़ आये</span></p>
<p><span style="color:#000000;">तेरी रज़ा क्या मेरी रज़ा क्या<br />
वफ़ाई-बेवफ़ाई की वजह क्या</span></p>
<p><span style="color:#000000;">दस्तूर-ए-इश्क़ से रिश्ते हुए हैं<br />
दिलों में रहकर फ़रिश्ते हुए हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">ख़ला-ख़ला सजायी एक महफ़िल<br />
महफ़िलों से उठके चले आये</span></p>
<p><span style="color:#000000;">वक़्त का पहना उतार आये<br />
कुछ लम्हे मरके गुज़ार आये</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४ </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बहुत दिनों बाद]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=1003</link>
<pubDate>Thu, 26 Jun 2008 08:01:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=1003</guid>
<description><![CDATA[बहुत दिनों बाद यादों की सुनहरी धूप निक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">बहुत दिनों बाद यादों की सुनहरी धूप निकली<br />
मैंने अपना बदन सेंका,<br />
ख़्याल महके जब ज़हन पे जमी बर्फ़ पिघली<br />
मैंने तस्वीरे-आज फेंका...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मालती की बेलें औराक़ पे हर्फ़ों की दीवार से लिपटीं<br />
ख़ुशबू-ए-मिज़ाज रखके यह मेरी आँखों में सिमटीं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">रोज़ रात शबनम में भीग जाती हैं सारी ख़ाहिशें जब<br />
उड़ चलती है फ़ाख़्ता-ए-मन पुराने शहर की तरफ़</span></p>
<p><span style="color:#000000;">लफ़्ज़ों की मौज ने ली अँगड़ाई रिश्तों के बदन पे<br />
मानूस चेहरों के चराग़ जल उठे ताक-ए-ज़हन पे</span></p>
<p><span style="color:#000000;">इन दिनों उड़ता फिरा हूँ मैं आँधी की तरह आवारा<br />
लूटने के लिए वो पुराने मौसम पतंगों वाले दोबारा</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४ </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रिमझिम रिमझिम वर्षा आई...]]></title>
<link>http://meredilne.wordpress.com/?p=10</link>
<pubDate>Fri, 23 May 2008 09:02:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://meredilne.wordpress.com/?p=10</guid>
<description><![CDATA[रिमझिम रिमझिम वर्षा आई,
देखो बरखा बाहर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>रिमझिम रिमझिम वर्षा आई,<br />
देखो बरखा बाहर आई,<br />
हम भीगे तुम भीगे,<br />
भीग गया जग सारा,</p>
<p>छोटी छोटी बूंदों मे,<br />
बरस गया प्यार सारा,<br />
हम भीगे तुम भीगे,<br />
भीग गया संसार हमारा,</p>
<p>भीगे भीगे मौसम मे,<br />
तन भीगा मन भीगा,<br />
आँखें भीगी दिल भीगा,<br />
भीग गया रिश्ता हमारा,</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मैं सबसे बुरा था ]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=973</link>
<pubDate>Wed, 21 May 2008 17:46:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=973</guid>
<description><![CDATA[मैं सबसे बुरा था
सबसे बुरा हूँ
सबसे बु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">मैं सबसे बुरा था<br />
सबसे बुरा हूँ<br />
सबसे बुरा ही रहूँगा<br />
मैं जी रहा था<br />
जी रहा हूँ<br />
ऐसे ही जीता रहूँगा</span></p>
<p><span style="color:#000000;">उसने मुझको सदा ख़ुशबू के<br />
इक बादल के पार देखा<br />
और मैं चाह कर भी कभी<br />
उसको इस तरह न देखूँगा</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मैं सबसे बुरा था<br />
सबसे बुरा हूँ<br />
सबसे बुरा ही रहूँगा</span></p>
<p><span style="color:#000000;">आईने उसकी आँखों के<br />
मुझको ढूँढ़ते रहे, जाने क्यों?<br />
और मैं अक्स उन आईनों का<br />
कभी भी न बनूँगा...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मैं जी रहा था<br />
जी रहा हूँ<br />
ऐसे ही जीता रहूँगा</span></p>
<p><span style="color:#000000;">इक मतलब ही तो है<br />
मुझसे जुड़ता हर नया रिश्ता<br />
और मैं ऐसे रिश्तों से कभी<br />
कोई जज़्बात न रखूँगा...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मैं सबसे बुरा था<br />
सबसे बुरा हूँ<br />
सबसे बुरा ही रहूँगा</span></p>
<p><span style="color:#000000;">हर शै पर हुक़ूमत करना<br />
मेरी सबसे बुरी आदत है<br />
और मैं अपनी यह आदत<br />
जानकर भी न बदलूँगा...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मैं जी रहा था<br />
जी रहा हूँ<br />
ऐसे ही जीता रहूँगा</span></p>
<p><span style="color:#000000;">अच्छा या बुरा जो भी समझो<br />
यह तुम्हारी अपनी सोच है<br />
और मैं किसी के लिए<br />
ख़ुद को कभी न बदलूँगा...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मैं सबसे बुरा था<br />
सबसे बुरा हूँ<br />
सबसे बुरा ही रहूँगा</span></p>
<p><span style="color:#000000;">वह किसी ग़ैर के पास जाता है<br />
तो चला जाये, बेपरवाह!<br />
और मैं उसके बेवफ़ा रुख़ का<br />
कभी अफ़सोस न करूँगा...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मैं जी रहा था<br />
जी रहा हूँ<br />
ऐसे ही जीता रहूँगा</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[और दाँव अपनी जाँ का]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=908</link>
<pubDate>Thu, 13 Mar 2008 05:54:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=908</guid>
<description><![CDATA[और दाँव अपनी जाँ का किसने लगाया होगा
फ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">और दाँव अपनी जाँ का किसने लगाया होगा<br />
फिर इश्क़ ने फ़रहाद कोई बुलाया होगा</font></p>
<p><font color="#000000">यूँ ही नहीं बिगड़ता है कोई किसी बात पे<br />
तुमने ज़रूर नमक में छालों को गलाया होगा</font></p>
<p><font color="#000000">इक मेरे' कौन दूसरा दुनिया में तन्हा है<br />
तुमसे ऐसा रिश्ता भला किसने निभाया होगा</font></p>
<p><font color="#000000">न कोई आहट है 'नज़र' न कोई ख़बर है<br />
क़ासिद ने ग़लत दरवाज़ा खटखटाया होगा</font></p>
<p>क़ासिद= messenger</p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[टूटे हुए चाँद को]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=827</link>
<pubDate>Mon, 25 Feb 2008 16:26:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=827</guid>
<description><![CDATA[टूटे हुए चाँद को सादे काग़ज़ में लपेटा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">टूटे हुए चाँद को सादे काग़ज़ में लपेटा मैंने<br />
भीगे हुए सूरज को हथेलियों में समेटा मैंने<br />
तारे बसरने लगे और आसमाँ ख़ाली हो गया<br />
उसने एक आइने की तरह मुझे तोड़ दिया है<br />
...तोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">जला दिये दिल के जज़्बात उसने<br />
बढ़ा दिये मेरे मुश्किलात उसने<br />
जीना मेरा जीना बहुत मुश्किल है<br />
यह ज़हर पीना बहुत मुश्किल है</font></p>
<p><font color="#000000">बहार में भी शाख़ों पर ख़िज़ाँ थी<br />
सूखी-सूखी बंजर हर फ़िज़ा थी<br />
फ़िज़ाएँ रंग बदलने लगी हैं<br />
हवाओं के साथ चलने लगी हैं मगर<br />
उसने निगाहों में खिलना छोड़ दिया है<br />
...छोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">फ़िज़ाएँ मौसम के साथ खिलती हैं<br />
और मौसम बदलते रहते हैं<br />
मौसम बदला है तो फ़िज़ा भी बदलेगी<br />
बदले हुए मौसम ने हज़ार रास्तों को<br />
मेरी तरफ़ मोड़ दिया है, मोड़ दिया है<br />
...मोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">शब्दों की स्याही में रिश्ते हैं<br />
फूलों के अर्क़ में रिश्ते हैं<br />
हर शब्द हर फूल में मिलते हैं<br />
हर जिस्म की शाखों पर खिलते हैं<br />
मिलते हैं बिछुड़ते हैं,<br />
बिछुड़ते हैं मिलते हैं<br />
समंदर की लहर जैसे चलते रहते हैं<br />
खिलते हैं महकते हैं<br />
बनते हैं बुझते हैं<br />
यह धूप-छाँव के जैसे रंग बदलते हैं</font></p>
<p><font color="#000000">उसने एक रिश्ता तोड़ा है इक जोड़ दिया है<br />
जोड़कर उसने रिश्ते को फिर तोड़ दिया है<br />
...तोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">जला दिये दिल के जज़्बात उसने<br />
बढ़ा दिये मेरे मुश्किलात उसने<br />
जीना मेरा जीना बहुत मुश्किल है<br />
यह ज़हर पीना बहुत मुश्किल है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९ अप्रैल २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तुमको लौट के यहीं आना है]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=821</link>
<pubDate>Sat, 23 Feb 2008 22:22:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=821</guid>
<description><![CDATA[तुमको लौट के यहीं आना है (यहीं आना है)
त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">तुमको लौट के यहीं आना है (यहीं आना है)<br />
तुम मानो या न मानो<br />
मेरा दिल तेरा आशियाना है (आशियाना है)<br />
तुम मानो या न मानो</font></p>
<p><font color="#000000">एक इल्ज़ाम देकर जा रहे हो ग़ैर की बाँहों में<br />
कभी तो तुम्हें उसको ठुकराना है<br />
तुम मानो या न मानो</font></p>
<p><font color="#000000">हम दोस्त थे तुमने अदू मान लिया जाने दो<br />
मुझे आज रब को भी आज़माना है<br />
तुम मानो या न मानो</font></p>
<p><font color="#000000">देखता हूँ यह रंग यह तेवर कब तलक हैं<br />
तुमको ख़ुद चलके मेरे पास आना है<br />
तुम मानो या न मानो</font></p>
<p><font color="#000000">जो गिरह तुमने ख़ुद डाली हमारे रिश्ते में<br />
उसको तुम्हें दुनिया से छुपाना है<br />
तुम मानो या न मानो</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति 'नज़र'<br />
लेखन वर्ष: १४ अप्रैल २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आती-जाती रहती हैं यह सदियाँ]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=797</link>
<pubDate>Sun, 17 Feb 2008 14:19:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=797</guid>
<description><![CDATA[आती-जाती रहती हैं यह सदियाँ
रास्ते पर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">आती-जाती रहती हैं यह सदियाँ<br />
रास्ते पर रहती हैं मेरी दो अँखियाँ<br />
तेरे इंतज़ार में तुझे देखने के लिए</font></p>
<p><font color="#000000">जाने कब से तू आँखों में बसी है<br />
जाने कब से यह महफ़िल सजी है<br />
यूँ ही घर आना-जाना बढ़ गया<br />
एक पल में तेरा नशा चढ़ गया</font></p>
<p><font color="#000000">एक ही ख़ाब आँखों में बसाया है<br />
तुमको हर जनम अपना बनाना हैं<br />
मेरी हर दुआ है तुझे माँगने के लिए</font></p>
<p><font color="#000000">जाने कब यह रिश्ता बंध गया<br />
आँखों ही आँखों में मेरा दिल गया<br />
बातों ही बातों में तुम लुभाने लगे<br />
और तन्हाई के डर सताने लगे </font></p>
<p><font color="#000000">आती-जाती रहती हैं यह सदियाँ<br />
रास्ते पर रहती हैं मेरी दो अँखियाँ<br />
तेरे इंतज़ार में तुझे देखने के लिए</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[लगे लगन तो छूटे नहीं यह]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=793</link>
<pubDate>Sun, 17 Feb 2008 10:27:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=793</guid>
<description><![CDATA[लगे लगन तो&#8230; छूटे नहीं यह&#8230;
बने सजन तो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">लगे लगन तो... छूटे नहीं यह...<br />
बने सजन तो... टूटे नहीं यह...<br />
बनता बन जाय, मिटता मिट जाय</font></p>
<p><font color="#000000">लगे लगन तो... छूटे नहीं यह...<br />
बने सजन तो... टूटे नहीं यह...<br />
लगे लगन तो... छूटे नहीं यह...<br />
बने सजन तो... टूटे नहीं यह...</font></p>
<p><font color="#000000">यह चारों ओर है, यह कच्ची डोर है<br />
यह चारों ओर है, यह कच्ची डोर है<br />
यह कच्ची डोर है, यह चारों ओर है </font></p>
<p><font color="#000000">कहते हैं... करो न जी... यह...<br />
कहते हैं... मरो न जी... यूँ...<br />
कहते हैं... करो न जी... यह...<br />
कहते हैं... मरो न जी... यूँ...<br />
जीते जी... भरो न जी... यह...<br />
जीता मरता जाय, मरता जीवन पाय</font></p>
<p><font color="#000000">लगे लगन तो... छूटे नहीं यह...<br />
बने सजन तो... टूटे नहीं यह...<br />
लगे लगन तो... छूटे नहीं यह...<br />
बने सजन तो... टूटे नहीं यह...</font></p>
<p><font color="#000000">रिश्तों को... बेग़ाना कर दे...<br />
ग़ैरों का... पैमाना भर दे...<br />
ख़ाहिश को... रस्ता देता है...<br />
किसी को... रिश्ता देता है...<br />
यारों का... गुलदस्ता देता है...<br />
बनता बन जाय, मिटता मिट जाय</font></p>
<p><font color="#000000">लगे लगन तो... छूटे नहीं यह...<br />
बने सजन तो... टूटे नहीं यह...</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मेरा दर्द मेरा दु:ख मेरा अपना है]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/12/28/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%96-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%aa/</link>
<pubDate>Fri, 28 Dec 2007 16:48:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/12/28/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%96-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%aa/</guid>
<description><![CDATA[मेरा   दर्द    मेरा   दु:ख   मेरा  अपना    ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">मेरा   दर्द    मेरा   दु:ख   मेरा  अपना    है<br />
बाक़ी   सब   झूठ   है  यह सच्चा सपना है</font></p>
<p><font color="#000000">कल तक लबों पर उसके लिए दुआ थी<br />
आज दुआ में थोड़ा कुछ हिस्सा अपना है</font></p>
<p><font color="#000000">मैं आज चली हूँ नयी मंज़िल की तरफ़<br />
आज मेरी आँखों में एक नया सपना है</font></p>
<p><font color="#000000">बीते   हुए   लम्हों   को   कैसे   भूलेगा कोई<br />
उसमें   तो एक  अधूरा   रिश्ता   अपना  है</font></p>
<p><font color="#000000">जादू   का   खेल   है   महब्बत   कैसे बचते<br />
क्या   करें   अब   यह टूटा हुआ सपना है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दर्द की तहरीरें]]></title>
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<pubDate>Thu, 20 Sep 2007 06:38:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
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<description><![CDATA[मैं जो तुम्हें देखता हूँ मुझको देखती ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">मैं जो तुम्हें देखता हूँ मुझको देखती हैं तेरी तस्वीरें<br />
साँस लेता हूँ मगर कमनसीब हैं हाथों की लक़ीरें</font></p>
<p><font color="#000000">न ही कोई रब्त न ही रिश्ता न मरासिम न बंधन<br />
फिर मेरे मन में पड़ रही हैं किसकी तसलीम की ज़ंजीरें</font></p>
<p><font color="#000000">पाँव मोड़ दर मोड़ चलके इस मोड़ तक आये थे<br />
शायद इसीलिए नाकाम हैं खा़हिशों की सारी तदबीरें</font></p>
<p><font color="#000000">जबींसाई से कब मिटा है माथे का लिखा हमनफ़सों<br />
ये दिल शबो-रोज़ खु़द लिखता है दर्द की तहरीरें</font></p>
<p><font color="#000000">नसीब है फ़ासला, हिज्र या फ़ुरक़त' कुछ भी कह लो<br />
वरना जुड़ जाती दो अजनबी आश्ना दिलों की तक़दीरें</font></p>
<p><font color="#000000">'नज़र' शब कहीं न समा जाये दर्द की गहराई में<br />
मैं जो उसे देखता हूँ मुझको देखती हैं उसकी तस्वीरें</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति 'नज़र'<br />
लेखन वर्ष: १२/११/२००४</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[एक रोशनी देखा करते थे]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/15/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%b6%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%a5%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 19:12:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
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<description><![CDATA[तेरी चौखट पे
एक रोशनी देखा करते थे
अब न ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">तेरी चौखट पे<br />
एक रोशनी देखा करते थे<br />
अब न वो दिखती है<br />
और न तुम...</font></p>
<p><font color="#000000">रुसवा ज़िन्दगी के पल हुए<br />
तेरी खु़दाई रंग लायी<br />
एक रिश्ता बाँधकर<br />
तुमने उसे तोड़ दिया...</font></p>
<p><font color="#000000">क्या तुम्हें हम बेवफ़ा मान लें<br />
या इसे वक़्त की रज़ा समझें<br />
रात की घनेरियाँ छायी हैं<br />
और सिर्फ़ एक सितारा नज़र आता है...</font></p>
<p><font color="#000000">चलती है जो नब्ज़ तेरे बिना<br />
उसमें ज़िन्दगी कहाँ है<br />
हज़ार ज़ख़्म हों जिस्म पे<br />
उनसे दर्द का बढ़ना कहाँ है</font></p>
<p><font color="#000000">एक पल में वह<br />
सालभर का रिश्ता तोड़ गये<br />
जोड़े कई ग़म<br />
और मेरा आशियाँ तोड़ गये<br />
</font> </p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००२</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अनिग्मा [Enigma]]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/15/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be-enigma/</link>
<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 15:29:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
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<description><![CDATA[वो क्यों देखता है मुझे?
उसे क्या चाहिए ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">वो क्यों देखता है मुझे?<br />
उसे क्या चाहिए मुझसे?<br />
न रब्त कोई रखा मैंने उससे<br />
न ही उसने मुझसे<br />
फिर क्यों देखता है वो -<br />
बार-बार दूर से ही मुझे</font></p>
<p><font color="#000000">पास आता है तो<br />
नज़रें फिरने लगती हैं उसकी<br />
झुकने लगती हैं,<br />
क्या चाहता है मुझसे?<br />
क्या ढूँढ़ता है मुझमें?</font></p>
<p><font color="#000000">बेवज़ह यह सिलसिले होते नहीं<br />
बार-बार किसी को निगाह में पिरोते नहीं<br />
वो क्यों देखता है मुझे?<br />
उसे क्या चाहिए मुझसे?</font></p>
<p><font color="#000000">वो तन्हा तो नहीं<br />
उसका मुझसे कोई रिश्ता तो नहीं<br />
बात क्या आख़िर कहे ना<br />
या कहलवा ही दे किसी से<br />
वो क्यों देखता है मुझे?<br />
उसे क्या चाहिए मुझसे?</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[फिर आज किसलिए...]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/08/27/%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%8f/</link>
<pubDate>Mon, 27 Aug 2007 21:57:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
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<description><![CDATA[वक़्त की इक और गिरह खुल गयी
रूह में इक और]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">वक़्त की इक और गिरह खुल गयी<br />
रूह में इक और शिगा़फ़ आ गया<br />
बदन की हर साँस दर्द बन गयी<br />
कि रोशनी को फिर अँधेरा खा गया</span></p>
<p><span style="color:#000000;">वक़्त छोटी-छोटी उम्मीदें<br />
हर वो सपना जो आपकी आँखों ने देखा है<br />
कैसे छीन लेता है<br />
मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता</span></p>
<p><span style="color:#000000;">जो रिश्ता मैंने बोया था<br />
उसे अपने हाथों से तुमने खु़द सींचा था<br />
फिर आज किसलिए<br />
ज़ीस्त तेरी उसकी खु़शबू से जुदा है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">आँसू आँखों की आँच में<br />
किनारे तक आते-आते धुँआ हो रहे हैं<br />
गीली पुरनम आँखों में<br />
दिल का टुकड़ा-टुकड़ा जल रहा है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मैं बूँद-बूँद वक़्त को<br />
तेरी खा़हिश के लिए जमा करता रहा<br />
आज ऐसा लगता है कि<br />
मैं दरम्याँ कोई दीवार चुन रहा था</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मुझे तेरी जुस्तजू अब भी है<br />
पर शायद तू आज भी खु़दग़रज़ है<br />
वरना क्यों खा़मोश है<br />
पहले की तरह कुछ कहता क्यों नहीं</span><br />
 </p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति 'नज़र'</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
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