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	<title>विश्लेषण &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "विश्लेषण"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 16:55:54 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[फ्रायड ने देखा एक ख्वाब]]></title>
<link>http://hariharjhahindi.wordpress.com/2007/10/24/%e0%a4%ab%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a1-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ac/</link>
<pubDate>Wed, 24 Oct 2007 23:53:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>Harihar Jha हरिहर झा</dc:creator>
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<description><![CDATA[फ्रायड ने देखा एक ख्वाब
मनुष्य जाति 
ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">फ्रायड ने देखा एक ख्वाब</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">मनुष्य जाति </span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">जो मनोरोगों से ग्रस्त</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">मानसिक विकारों से त्रस्त</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">कैसे जगे बीमारी को</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">दूर भगाने की आस</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">हो हर ताले की </span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">कुंजी उसके पास</span></p>
<p><font face="Times New Roman"> </font><span style="font-family:Mangal;"> </span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">फिर सपने मे देखा </span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">झोली या डंडा</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">मुर्गी या अंडा</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">अंडे का फंडा</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">प्रत्येक का जरूर कोई अर्थ</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">लाठी नाग तलवार या चाकू</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">कूआ, खाई</span><font face="Times New Roman">,<span>  </span></font><span style="font-family:Mangal;">पहाड़ या राई</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">सब कुछ यौन पिपासा</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">सर्व </span><span style="font-family:Mangal;"><span> </span>सेक्समयं जगत</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">सदा से भीतर की कुण्ठायें रोई</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">जब चेतन मन<span>  </span>बिल्ली की नींद सोया</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">दमित वासऩा<span>  </span>का चूहा </span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">चुपचाप</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">अपना भेष बदल कर निकला</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">मानो फ्रायड ने</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">चतुर बिल्ली की तरह </span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">नींद का ढ़ोग रच कर</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">जान लिया<span>  </span>चूहों का राज।</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">दंग रह गया फ्रायड</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">मन की गहराईयां बतलाते</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">ये सपने कितने सच्चे !</span><font face="Times New Roman"> </font></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">कि जैसे </span><span style="font-family:Mangal;">निरदो</span><span style="font-family:Mangal;">ष बच्चे </span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">बाकी झूठा इंसान </span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">झूठी यह दुनियां।</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;"></span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">Part II : Do you like 'Shaayari in English' ? Click on:</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;"></span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;"><a href="http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/10/i-am-silent/">http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/10/i-am-silent/</a></span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;"></span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">OR</span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;"><a href="http://hariharjha.wordpress.com/">http://hariharjha.wordpress.com</a></span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;"></span></p>
<p style="margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;"></span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भारत में आसन्न वर्ग-संघर्ष की पृष्ठभूमि]]></title>
<link>http://srijanshilpi.wordpress.com/2006/08/26/class_struggle/</link>
<pubDate>Sat, 26 Aug 2006 23:24:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
<guid>http://srijanshilpi.wordpress.com/2006/08/26/class_struggle/</guid>
<description><![CDATA[मार्क्स ने जिस अर्थ में &#8216;वर्ग-संघर्ष]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="MsoNormal"><span><a target="_blank" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Karl_Marx">मार्क्स</a> ने जिस अर्थ में 'वर्ग-संघर्ष' की बात की थी, यह सही है कि भारत में विशुद्ध रूप से वैसे किसी वर्ग-संघर्ष की स्थिति अब तक नहीं बन पाई। लेकिन बीसवीं शताब्दी के दौरान भारतीय समाज में कई स्तरों पर जो व्यापक परिवर्तन हुए, उनका किसी-न-किसी रूप में वर्ग-संघर्ष से अंतर्संबंध जरूर रहा है। दरअसल भारत की विशिष्ट सामाजिक परिस्थितियों ने वर्ग-संघर्ष के स्वरूप को गहरे रूप में प्रभावित किया है। किंतु बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में इतिहास की दिशा-धारा ने जो मोड़ लिया, उसको देखते हुए अब यह मुमकिन लगने लगा है कि इक्कीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में उस वास्तविक अर्थ में भी वर्ग-संघर्ष की नौबत आ सकती है। इस संभावना के कुछ स्पष्ट संकेत तो मिलने भी लगे हैं।</span></p>
<p><span><strong>बीसवीं सदी: परिवर्तन की सदी</strong> </span></p>
<p><span>बीसवीं शताब्दी भारत में व्यापक सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिवर्तनों की शताब्दी रही। जाति-प्रथा, जो अस्पृश्यता की अमानवीयता से ग्रसित थी, का बंधन काफी हद तक शिथिल हो गया। केरल और दक्षिण भारत के कुछ अन्य राज्यों में तो कथित निम्न समुदायों के लोगों को देखना तक </span><span><font face="Times New Roman">‘</font></span><span>छूत</span><span><font face="Times New Roman">’ </font></span><span>माना जाता था। आज उस केरल में कायापलट हो चुका है। सामंतों, जमींदारों और महाराजाओं का वर्ग समाप्त हो गया है। गाँवों-देहातों में दलितों, पिछड़ी जातियों और गरीबों को सताया जाना अब उतना आसान नहीं रह गया है। मेहनतकश वर्ग आज पहले से काफी बेहतर स्थिति में है और जो अब तक सिर्फ दूसरों की मेहनत के बल पर मौज किया करते थे, वे आज बहुत खस्ता हालत में हैं। राजनीतिक परिदृश्य पर हाशिये के वर्गों ने मजबूत पकड़ स्थापित कर ली है और आज वे किसी भी सत्ता-समीकरण को गंभीर रूप से प्रभावित करने और अपने पक्ष में मोड़ सकने में सक्षम हैं। स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं तक आम जनता की पहुँच बढ़ी है। गरीबी का प्रतिशत घटा है और अकाल से अब कम ही मौतें होती हैं। हालाँकि इन सब के बावजूद शोषण बदस्तूर जारी है। केवल शोषण-तंत्र का स्वरूप बदल गया है, शोषकों के चेहरे बदल गए हैं और उन्होंने नए मुखौटे लगा लिए हैं। आर्थिक विषमता बढ़ रही है और जो लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं वे ही शोषण के मुख्य शिकार हो रहे हैं। यानी शोषण का आधार अब सामाजिक उतना नहीं रह गया है, जितना कि आर्थिक। </span></p>
<p><span><strong><!--more--> </strong></span></p>
<p><span><strong>क्यों नहीं बन सके वैसे हालात </strong></span></p>
<p class="MsoNormal"><span>शोषक और शोषित वर्गों की मौजूदगी के बावजूद भारत में खुल्लम-खुल्ला वर्ग-संघर्ष की स्थिति उत्पन्न नहीं हो पाने के दो अहम कारण रहे हैं। एक तो यह कि इन वर्गों के आपसी हितों के टकराव के कारण संघर्ष की जो स्थिति पैदा हुई, उसकी अभिव्यक्ति एक संगठित आर्थिक मोर्चे पर होने के बजाय अलग-अलग जातिगत मोर्चे पर हो गई। दलित आंदोलन, पिछड़ी जातियों के आंदोलन, आदिवासी आंदोलन आदि जैसे सामाजिक न्याय से जुड़े असंबद्ध संघर्षों के कारण एक संगठित आर्थिक वर्ग-संघर्ष के लिए आवश्यक तनावपूर्ण परिस्थितियाँ संघनित नहीं हो सकीं। लेकिन इन सामाजिक संघर्षों का भी अपना एक विशिष्ट महत्व है और भारतीय यथार्थ परिस्थितियों के हिसाब से इस तरह के संघर्ष अपरिहार्य भी हैं। दूसरा कारण यह है कि भारत में सामाजिक गतिशीलता के चलते शोषक और शोषित वर्गों के बीच कोई स्पष्ट और स्थायी विभाजक रेखा नहीं बन पाई। जो लोग एक पीढ़ी पहले तक गाँवों में विकास की तमाम सुविधाओं से वंचित रहकर शोषण और गरीबी का शिकार हो रहे थे, उनमें से बहुत से अब अच्छी शिक्षा और ऊँचे पदों को हासिल करके शहरों-महानगरों में काफी बेहतर जीवन-स्तर के साथ रह रहे हैं और जो लोग एक-दो पीढ़ी पहले तक विशाल भूसंपत्ति और बेगार श्रम के बल पर ठाठ का जीवन व्यतीत कर रहे थे, उनमें से बहुत से अब बदले हालातों के चलते काफी बदहाल स्थिति में चले गए हैं। यदि सामाजिक गतिशीलता का यह तत्व प्रभावी नहीं रहा होता तो शोषक-शोषित, अमीर-गरीब के बीच का तनाव बढ़ता हुआ अब तक सारी सीमाओं को लांघ कर एक बड़े वर्ग-संघर्ष की नौबत पैदा कर सकता था। </span></p>
<p><span></span><span><strong>मध्य वर्ग ने बदली चाल</strong></span></p>
<p class="MsoNormal"><span>बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विश्व परिदृश्य की परिस्थितियाँ शताब्दी के पूर्वार्ध की परिस्थितियों की तुलना में बुनियादी रूप से बदल गई थीं। शताब्दी के पूर्वार्ध में तीसरी दुनिया उपनिवेशवाद-साम्राज्यवाद की चपेट में थी और इन देशों का प्रगतिशील मध्य वर्ग उसके खिलाफ सामूहिक रूप से संघर्षरत था, जबकि औपनिवेशिक शक्तियाँ आपसी प्रतिद्वंद्विता और वैमनस्य का शिकार थीं, जिसके कारण उनके बीच दो विश्व-युद्ध भी हुए। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, इटली, स्पेन, आस्ट्रिया और अमरीका आदि साम्राज्यवादी देशों के आपसी हितों की टकराहट के बरक्स दक्षिण एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका की स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत राष्ट्रों के हित एक समान थे। लेकिन बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध की परिस्थितियों में एक विशिष्ट परिवर्तन यह हुआ कि साम्राज्यवादी शक्तियाँ अपने उपनिवेशों से हाथ धोने के बाद संगठित होने लगीं और अपने विस्तारवादी उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए वे नए-नए तरीके खोजने में जुट गईं। इस क्रम में अंतर्राष्ट्रीय प्रवाहशील पूँजी को सामूहिक संस्थाबद्ध रूप दिया गया और विश्व व्यापार की ऐसी व्यवस्था कायम की गई, जिसके तहत विकासशील देशों के ऊपर वे अपने स्वार्थपूर्ण हितों के अनुकूल नीतियाँ थोप सकें। दरअसल, यह सब पुन</span><span><font face="Times New Roman">:</font></span><span> औपनिवेशीकरण के सुनियोजित दीर्घकालीन षड्यंत्र के तहत हुआ। लेकिन विडंबना की बात यह हुई कि तीसरी दुनिया में जिस प्रगतिशील मध्य वर्ग ने बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में स्वतंत्रता संघर्षों में बढ़-चढ़कर भाग लिया, उसी ने शताब्दी के उत्तरार्ध में आजादी मिलने के बाद सत्ता पर अपना कब्जा कायम करने और उसे स्थायी रूप से बरकरार रखने के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों को ताक पर रखते हुए इन नव-साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ हाथ मिला लिया। यदि तीसरी दुनिया के सत्ताधारी उच्च मध्यवर्ग ने आम जनता के हितों और व्यापक लोकतांत्रिक आदर्शों के साथ गद्दारी नहीं की होती तो भूमंडलीकरण की औपनिवेशिक आँधी को इतनी व्यापक सफलता नहीं मिल सकती थी। </span></p>
<p><span></span><span><strong>भूमंडलीकरण के साझे पैरोकार</strong></span></p>
<p><span></span><span>भारत में भी ऐसा ही हुआ। सर्वोदय, संयम और स्वावलंबन की गाँधीजी की नीति को तिलांजलि देकर भूमंडलीकरण, बाजारवाद और आर्थिक उदारीकरण की नीति को अपना लिया गया और ऐसा करने में कांग्रेस जितना तत्पर रही, भाजपा ने उससे दोगुनी तत्परता दिखाई। दरअसल, ये दोनों ही राजनीतिक पार्टियाँ जिन वर्गों का प्रतिनिधित्व करती हैं उनके स्वार्थ नव-साम्राज्यवादी शक्तियों के इरादों के साथ मेल खाते हैं। सभी आर्थिक मुद्दों पर इन दो पार्टियों की नीतियों के बीच हैरतअंगेज रूप से एकरूपता है और यह देश का दुर्भाग्य है कि इनमें से एक मुख्य सत्ताधारी पार्टी है तो दूसरी मुख्य विपक्षी पार्टी। </span><span>भूमंडलीकरण और मुक्त विश्व व्यापार व्यवस्था का मुख्य मकसद दुनिया भर के आर्थिक अधिशेषों (इकोनॉमिक सरप्लस) पर कब्जा जमाना और इसके लिए संचार-क्रांति के माध्यमों का उपयोग करते हुए उपभोक्ता संस्कृति को बढ़ावा देना तथा विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्गा कोष के माध्यम से निर्बाध बाजार की सुविधाएँ हासिल करना है। यह कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसी पार्टियों की मिलीभगत का ही नतीजा है कि भारत ने नव-साम्राज्यवादी शक्तियों के इस महत्वाकांक्षी मकसद के सम्मुख स्वैच्छिक समर्पण कर दिया है। भूमंडलीकरण और नई विश्व व्यापार व्यवस्था की नीतियों के चलते किसानों, मज़दूरों और हाशिये के जिन अन्य वर्गों का सबसे अधिक नुकसान हो रहा है, उन वर्गों का ये पार्टियाँ न तो प्रतिनिधित्व करती हैं और न ही उनके एजेंडे इन वर्गों के हितों से कोई सरोकार रखते हैं। जिस वर्ग का ये राजनीतिक पार्टियाँ वास्तव में प्रतिनिधित्व करती हैं उस वर्ग ने नई आर्थिक व्यवस्था के अंतर्गत बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एजेंट की भूमिका स्वीकार कर ली है और वह नवदीक्षितों के स्वाभाविक उत्साह के साथ भूमंडलीकरण और विश्व व्यापार की खूबियों की वकालत कर रहा है। </span></p>
<p><span></span><span><strong>दुष्परिणाम और खतरे</strong></span></p>
<p><span></span><span>भूमंडलीकरण और नई आर्थिक नीति के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं और ज्यों-ज्यों लोग इसके दंश को महसूस करेंगे, उनकी पीड़ा मुखर होने लगेगी। ऋण के मकड़जाल में उलझ चुके <a target="_blank" href="http://www.countercurrents.org/glo-shiva050404.htm">किसानों की आत्महत्याएँ</a>, लगातार बंद हो रहे लघु एवं कुटीर उद्योगों के बेरोजगार मजदूरों की हताशा, श्रम क़ानूनों के दायरे से बाहर काम करने वाले <a target="_blank" href="http://www.wsws.org/articles/2005/nov2005/indi-23n.shtml">कॉल सेंटरों में रात-दिन शोषण</a> का शिकार हो रहे सायबर कुलियों की भूमिका निभाने वाले युवाओं की कुंठा आने वाले वर्षों में इतना घातक और विकराल रूप लेगी कि उसको नियंत्रित कर पाना नामुमकिन हो जाएगा। सट्टेबाजी पर आधारित शेयर-मुद्रा बाजार और अस्थिर अल्पावधि वाली विदेशी पूँजी निवेश के बलबूते किसी मजबूत अर्थव्यवस्था की उम्मीद लंबे समय तक बरकरार नहीं रह सकती। विदेशी ऋण के अंबार और बढ़ते व्यापार घाटे को देखते हुए स्थिति में सुधार आने की संभावना अत्यंत क्षीण है। पेटेंट कानून में परिवर्तन और विश्व व्यापार संगठन के प्रावधानों के दायरे में कृषि क्षेत्र और श्रम मानकों से जुड़े मुद्दे जुड़ जाने के कारण नई आर्थिक नीति को आगे बढ़ाना आत्मघाती कदम साबित हो रहा है। खाद्य मामलों में हमारी आत्मनिर्भरता खतरे में पड़ चुकी है। बेतहाशा मूल्य-वृद्धि और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता में कमी ने आम जनता का जीवन दूभर कर दिया है। हालाँकि आँकड़ों की बाजीगरी में माहिर लोग अपना खेल दिखाकर भ्रम खड़ा करने की पूरी कोशिश करते रहते हैं, लेकिन देश के आम आदमी की हालत बद से बदतर होती जा रही है। जाहिर है कि इसकी प्रतिक्रिया में आने वाले वर्षों में तीव्र जन-प्रतिरोध अवश्य उभरेगा और वह इतना स्वत</span><span><font face="Times New Roman">:</font></span><span>स्फूर्त एवं चतुर्दिक होगा कि सत्ताधारी वर्ग की नींदें हराम हो जाएंगी। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span></span></p>
<p><span><strong>साजिश और उसके भागीदार </strong></span></p>
<p><span>नव-साम्राज्यवादी शक्तियों और उनके देशी पिट्ठुओं को भी आसन्न खतरे की आशंका है। देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकास और मीडिया की बढ़ती सक्रियता के फलस्वरूप देश में जनचेतना और जन-अपेक्षाओं में काफी वृद्धि हुई है। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने की सुनियोजित कोशिशें हो रही हैं। दरअसल भूमंडलीकरण के चलते सबसे बड़ा खतरा लोकतंत्र पर ही आया है। लेकिन सबसे अधिक खतरनाक है <a target="_blank" href="http://www.digantik.com/Digantik/Media%20Perspective%20Seminar/g-kumarketkar.htm">प्रेस और मीडिया के बड़े वर्ग का नव-उपनिवेशवादी बाजारवादी शक्तियों के साथ साँठ-गाँठ</a> कर लेना, जो आम जनता को उनके हित से जुड़े वास्तविक मुद्दों और शोषण की हकीकत से दूर करके निष्क्रिय मनोरंजन और उपभोक्तावादी फैशन के मोहजाल में फँसाकर प्रतिरोध और क्रांति की चिंगारी को कुंद कर देने की कुटिल कोशिश में जुट गया है। </span></p>
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