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	<title>विष्णु &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/विष्णु/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "विष्णु"</description>
	<pubDate>Sat, 30 Aug 2008 14:37:00 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[देवोपासना के कुछ सरल उपाय]]></title>
<link>http://aspundir.wordpress.com/?p=58</link>
<pubDate>Thu, 28 Aug 2008 15:52:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>aspundir</dc:creator>
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<description><![CDATA[देवोपासना के कुछ सरल उपाय
देवताओं की उ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>देवोपासना के कुछ सरल उपाय<br />
देवताओं की उपासना की अनेक विधियाँ शास्त्रों में दी गई है। उन विधियों का पालन करने से अपने इष्ट की कृपा सहज ही प्राप्त की जा सकती है। उनमें से ही कुछ सरल उपाय यहाँ प्रस्तुत है।-<br />
१॰ प्रत्येक मंगलवार को हनुमान जी को सिन्दूर चढ़ाना तथा उनके गले में राम-नाम अंकित माला (तुलसी की हो तो सर्वोत्तम), गुड़-लड्डू का भोग लगाना। इससे हनुमानजी की कृपा प्राप्त होती है।<br />
२॰ शुक्ल-पक्ष की एकादशी को भगवान् विष्णु को शंख, तुलसी-दल, हल्दी की गाँठ श्रद्धा-पूर्वक चढ़ाए। इससे भगवान् विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।<br />
३॰ शुक्ल-पक्ष की अष्टमी को दुर्गा जी की प्रतिमा को लाल वस्त्र, लाल कनेर, गुड़हल का फूल अर्पण करे। इससे भगवती दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है।<br />
४॰ शुक्ल-पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेशजी को लड्डू, दूब के टुकड़े, सिन्दूर, लाल कनेर का फूल चढ़ाए। तुलसी भूलकर भी नहीं चढ़ाए। इससे गणपति की कृपा प्राप्त होती है।<br />
५॰ रविवार की रात्रि में भैरवजी की प्रतिमा को तेल, गुड़, मदिरा, तिल, काजल अर्पण करे। इससे भगवान् शिव की कृपा प्राप्त होती है।<br />
६॰ शनिवार के दिन अपने शरीर के बराबर धागा नापकर पीपल के वृक्ष में बाँधे अथवा प्रत्येक शनिवार को पीपल-वृक्ष की जड़ में काला तिल, काला या नीला फूल, फल, नैवेद्य चढ़ाए और तेल का दीपक जलाए। इससे शनि-राहु-केतु ग्रह शान्त होते हैं और देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।</p>
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<title><![CDATA[भक्त का अहंकार]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/?p=166</link>
<pubDate>Sat, 17 May 2008 02:33:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक बार देवर्षि नारद ने भगवान विष्णु से]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक बार देवर्षि नारद ने भगवान विष्णु से पूछा, भगवान आप का सबसे बड़ा भक्त कौन है। भगवान विष्णु नारद के मन की बात समझ गए। उन्होंने कहां, अमुक गांव का अमुक किसान हमारा सबसे प्रिय भक्त है। भगवान विष्णु का उत्तर सुन कर नारद जी को निराशा हुई। वह बोले, भगवान आप का प्रिय भक्त तो मैं भी हूं फिर सबसे प्रिय क्यों नहीं। भगवान विष्णु ने कहा, तुम उस किसान के यहां जाकर उसकी दिन भर की दिनचर्या देख कर मुझे आकर बताओ फिर मैं बताऊंगा। नारद उस विष्णु भक्त किसान के घर पहुंचे। उन्होंने देखा कि किसान सुबह उठ कर कुछ देर भगवान विष्णु का स्मरण किया फिर रूखी सूखी रोटी खा कर हल बैल लेकर खेत जोतने चला गया। शाम को लौटा तो बैलों को चारा पानी दिया। उसके बाद थोड़ी देर के लिए भगवान का नाम लिया और रात को खाना खाकर सो गया। एक दिन उस किसान के घर रह कर नारद जी भगवान विष्णु के पास आए और उसकी आंखों देखी दिनचर्या के बारे में बताया। अंत में नारद ने कहा, प्रभु उसके पास तो आप का नाम लेने का समय भी नहीं है फिर वह आप का सबसे प्रिय भक्त कैसे बन गया। मैं तो दिन रात आप का नाम जपने के सिवाय कोई काम करता ही नहीं फिर भला वह किसान कैसे आप का सबसे प्रिय भक्त बन गया। </p>
<p>भगवान विष्णु उस बात को टालते हुए नारद को एक लबालब भरा अमृत कलश देते हुए कहा, देवर्षि तुम इस कलश को लेकर त्रैलोक्य की परिक्रमा करो। लेकिन यह ध्यान रखना कि इसकी एक बूंद भी छलकने न पाए। यदि एक बूंद भी नीचे गिरी तो तुम्हारा अब तक का किया गया सारा पुण्य खत्म हो जाएगा। </p>
<p>नारद अमृत कलश लेकर तीनों लोको की यात्रा पर निकल गए और यात्रा पूरी करके वह भगवान विष्णु को कलश देते हुए कहा, प्रभु कलश से एक बूंद भी अमृत नहीं छलकने पाई। भगवान विष्णु ने कहा- नारद, परिक्रमा के दौरान तुमने कितनी बार मेरा नाम स्मरण किया था। नारद ने कहा, प्रभु परिक्रमा के दौरान तो मेरा ध्यान इस कलश पर केंद्रित था इसलिए एक बार भी आप का स्मरण नहीं कर पाया। भगवान विष्णु ने हंस कर कहा, जब तुम परिक्रमा के दौरान एक बार भी अपना ध्यान कलश से हटा कर मेरा स्मरण नहीं कर सके जब कि वह किसान अपने सभी काम करते हुए भी कम से कम दो बार नियमित रूप से मेरा स्मरण करना नहीं भूलता तो वह सबसे बड़ा भक्त हुआ या आप। सबसे प्रिय भक्त हो होता है जो अपना कर्म करते हुए प्रेम से मेरा स्मरण भी करता है। नारद जी को सबसे प्रिय भक्त होने का अहंकार खत्म हो गया। </p>
<p><em>प्रस्तुति: सुरेश सिंह<br />
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[ॐ शक्ति है]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=819</link>
<pubDate>Thu, 21 Feb 2008 15:34:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=819</guid>
<description><![CDATA[ॐ शक्ति है ॐ ही ईश्वर प्रतीक है
ॐ नश्वर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">ॐ शक्ति है ॐ ही ईश्वर प्रतीक है<br />
ॐ नश्वर है ॐ ही सर्वत्र एक है<br />
ॐ भक्ति है ॐ ही शान्ति मंत्र है<br />
ॐ जगत है ॐ ही जीवन तंत्र है</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ में तुम हो ॐ हर कण तुम में<br />
ॐ मृदा धातु जल वायु गगन में</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ सत्य है ॐ ही चिंतन मनन है<br />
ॐ आत्मा है ॐ ही प्रभु शरण है<br />
ॐ विष्णु है ॐ ही त्रिकाल महादेव है<br />
ॐ दृष्टि है ॐ ही सुर और रव है</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ विद्यमान है प्राण है हर जीव में<br />
ॐ ही सजीव में ॐ ही निर्जीव में</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ संगीत है ॐ ही श्रेष्ठ मित्र है<br />
ॐ असत्य पर विजय का शस्त्र है<br />
ॐ ब्रह्माण्ड है ॐ उत्पत्ति सूत्र है<br />
ॐ मोक्ष है ॐ ही मुक्ति स्रोत है</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ चहुँ ओर ज्ञान का प्रकाश है<br />
ॐ कष्टकाल अंधकार का विनाश है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८</p>
]]></content:encoded>
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