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	<title>व्यंग्य-निंदा &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/व्यंग्य-निंदा/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "व्यंग्य-निंदा"</description>
	<pubDate>Sat, 17 May 2008 02:47:03 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[बस यूँ ही…]]></title>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2008 17:18:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>अंकुर वर्मा</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक अरसा हो गया है कुछ लिखे हुये, किसी की]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक अरसा हो गया है कुछ लिखे हुये, किसी की निंदा किये। यह सोचकर मन को बहला रहे थे कि आजकल व्यस्तता कुछ अधिक रहने लगी है। पर कारण शायद विषयाभाव था। आज प्रातः अनूप जी मिलने आये, शायद उससे कुछ प्रेरणा मिली होगी और फिर शाम को अकेले कानपुर शहर जाना पड़ा। दो घंटे की इस कष्टदायी यात्रा ने समय दिया विचार मंथन का और एक दो विचार जो मन में आये वही लिख रहा हूँ। पहली बात जिसे विचार के बजाय यदि अवलोकन कहा जाय तो अधिक उचित होगा। आज हमारे संविधान लेखन समिति के प्रमुख डॉ भीमराव अम्बेडकर का जन्मदिवस था जोकि पिछले कुछ वर्षों से राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाया जा रहा है। यदि आपको राष्ट्रीय अवकाश की गुरुता सही से समझ न आ रही हो तो जान लीजिये कि आज मदिरा निषिद्ध दिन (ड्राई डे) है, अब शायद आपको इसकी गुरुता समझ आ गयी होगी। चलिये इसी बहाने आज के दिन कुछ बुराइयाँ शायद कम हों या फिर अगर कालाबाजारी को भी एक बुराई माना जाय तो बाकी कुछ बुराइयाँ ज्यादा हों। ये ड्राई डे का फ़ंडा तो मेरी आज तक समझ नहीं आया। आपकी एक सोच होती है, कोई चीज बुरी है या फिर काम चालाऊ है पर कोई चीज किसी एक दिन के लिये अस्वीकार्य होना मेरी समझ से परे है। यही हाल मंगलवार या नवरात्रों में मांसाहार परहेजियों का है। यदि आप ईश्वर में विश्वास करते हैं तो कम से कम उसे मूर्ख तो नहीं समझना चाहिये। वैसे ऐसे लोगों के लिये ईश्वर का कुछ ने बोलना एक वरदान सरीखा है, वह तो कभी बताता नहीं यहाँ आकर कि "वत्स तुम जो ये ढोंग करते हो क्या सोचते हो मेरी समझ नहीं आता"। बोलते हैं वे लोग जिनसे आप लोभ देकर अपनी मनपसंद और सुविधाजनक बात बुलवा सकते हैं। धर्म का उद्देश्य होना चाहिये समाज को बुराइयों से दूर रखना और शायद कभी रहा भी हो पर आज कदापि नहीं है। मेहदी हसन की गायी ग़ज़ल की एक पंक्ति याद आ रही है -</p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#888888;">"ज़माने भर के ग़म और एक तेरा ग़म,<br />
ये ग़म होता तो कितने ग़म न होते।"</span></p>
<p>चलिये पर आज के उत्सव सरीखे वातावरण को देख मन में एक उम्मीद जगी। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और गाँधी जयन्ती जैसे राष्ट्रीय पर्व तो आजकल स्कूलों और सरकारी दफ़्तरों तक ही सीमित रह गये हैं या फिर कुछ ज्यादा ही अभद्रता से बोला जाय तो मजबूरी बन गये हैं। पर आज जिस तरह से आम जनता (या फिर कुछ लोग अगर इसे ख़ास जनता कहना चाहें) इसे मना रही थी यह समाजोत्थान का एक अच्छा संकेत हो सकता है यदि इसे राजनीति से दूर रखा जाय।</p>
<p>कल मैं कुछ समय के लिये एक सम्मेलन में भाग लेने के लिये शिमला जा रहा हूँ। कहने की कोई आवश्यकता तो नहीं है पर फिर भी यह सम्मेलन कम और देशाटन अधिक है। लौटकर कुछ अनुभव लिखूँगा यात्रा के बारे में और अपने विचारों के बारे में। यह लेख अपने आप में किसी तरह से भी पूर्ण नहीं है अतः आप अपनी टिप्पणियों से इसे पूरा करने में मेरी सहायता कर सकते हैं।</p>
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<title><![CDATA[नैनो विज्ञान और तकनीक का अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन, आईकानसेट -२००८ ]]></title>
<link>http://nindapuran.wordpress.com/?p=88</link>
<pubDate>Fri, 29 Feb 2008 21:31:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>अंकुर वर्मा</dc:creator>
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<description><![CDATA[आज चेन्नई ट्रेड सेंटर में तीन दिवसीय न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज चेन्नई ट्रेड सेंटर में तीन दिवसीय नैनो विज्ञान और तकनीक के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन <a href="http://www.iconsat2008.com/" target="_blank">आईकानसेट -२००८</a> का सुखद समापन हो गया&#124; सुखद इसलिए कि हमारे द्वारा प्रस्तुत पोस्टर को सर्वोत्तम आँका गया और १० हजार रुपये की पुरस्कार निधि से नवाज़ा गया&#124; यह खुशी तब दो गुनी हो गयी जब इसके अतिरिक्त हमारे ग्रुप को नैनो विज्ञान के क्षेत्र में विलक्षण योगदान के लिए १० लाख रुपये कीमत का स्कैनिग टनलिंग माइक्रोस्कोप पुरस्कार स्वरूप दिया गया (इस माइक्रोस्कोप के बारे में मैं आपको <a href="http://nanovigyan.wordpress.com" target="_blank">नैनो विज्ञान</a> पर शीघ्र ही बताऊंगा)&#124; यह सम्मेलन भारतीय वैज्ञानिक संस्थाओं के द्वारा दो वर्ष में एक बार आयोजित किया जाता है और लगभग कुम्भ के मेले के समान होता है&#124; इस वर्ष इसमें करीब ३८ आमंत्रित व्याख्यानों के अतिरिक्त ३०० से अधिक पोस्टर प्रदर्शित किए गए&#124; खैर चार-पाँच घंटे की गौरवानुभूति के बाद जब जब होश आया तो सोचा कि जबतक औरों को इसी प्रकार के पुरस्कार मिला करते थे तब यही सोचते थे कि सब पाखण्ड है और पहले से ही तय होता कि किसे सम्मानित करने में फ़ायदा है तो फ़िर आज क्या अलग हुआ&#124; तुरंत दिमाग ने दिल को बहलाने वाला उत्तर दिया इस बार आयोजकों ने अपना कलंक मिटाने के लिए और अपने पुरस्कार की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए हम लोगों को चुना है&#124; ठीक ही कहा है -</p>
<div align="center"><font color="#999999">हमको मालूम है जन्नत की हकीक़त लेकिन,<br />
दिल के ख़ुश रखने को 'गालिब' ये ख़याल अच्छा है &#124;</font></div>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[बैग पर एयरलाइन्स का टैग]]></title>
<link>http://nindapuran.wordpress.com/2008/01/11/airlinestag/</link>
<pubDate>Sat, 12 Jan 2008 16:59:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>अंकुर वर्मा</dc:creator>
<guid>http://nindapuran.wordpress.com/2008/01/11/airlinestag/</guid>
<description><![CDATA[हमारे देश ने पिछले १०-१५ वर्षों में का]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हमारे देश ने पिछले १०-१५ वर्षों में काफ़ी तरक्की की है। मुख्यतः सॉफ्टवेयर धूम के कारण देश के खासकर मध्यम वर्ग के लोगों में बहुत समृद्धि आयी है। पर इन सबके साथ आये सांस्कृतिक बदलाव और उसकी बदहजमी की झलक यहाँ-वहाँ देखने को मिल ही जाती है। अब सामान पर लगे एयरलाइन्स के टैग को ही ले लीजिये। यात्रा के बाद भी उसे न हटाया जाना किसी न किसी स्तर पर यह प्रयोक्ता की इस चेष्टा को उजागर करता है कि हाँ भाई लोगों हम भी हवाई जहाज की यात्रा कर चुके हैं। अपने मोबाइल को बिना वजह सार्वजनिक स्थान पर निकाल कर देखना, लघु संदेश पढ़ना भी कुछ इसी प्रकार का प्रयास है।  यह सब एकदम ऐसा लगता है मानो आपने किसी १९ वीं सदी के गाँव से आये आदमी को नयी वी.आई.पी की चड्ढी दी हो और सबको दिखाने के उद्देश्य से उसने वह पतलून के ऊपर से पहन ली हो। या फ़िर रेलगाड़ी के वातानुकूलित डिब्बे में सफ़र करके अपने आप को बहुत परिष्कृत दिखाना, बोलना कि "ये स्लीपर कोच कितने गन्दे और अनकम्फ़र्टेबल होते हैं, पता नहीं लोग कैसे सफ़र करते हैं उसमें" जैसे खुद पहले कभी उसमें गये ही न हों। सम्पन्नता बुरी नहीं है, परन्तु उसे पाकर अपना अतीत, <label for="in-category-360824">संस्कृति</label> और सभ्यता भुला देना घातक सिद्ध हो सकता है।</p>
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