<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><!-- generator="wordpress.com" -->
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	>

<channel>
	<title>शायद &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/शायद/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "शायद"</description>
	<pubDate>Sun, 07 Sep 2008 03:50:12 +0000</pubDate>

	<generator>http://wordpress.com/tags/</generator>
	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[मैंने अक्सर खोया है उसे]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=1089</link>
<pubDate>Thu, 04 Sep 2008 13:56:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=1089</guid>
<description><![CDATA[मैंने अक्सर खोया है उसे
जो मेरे दिल के ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">मैंने अक्सर खोया है उसे<br />
जो मेरे दिल के क़रीब आ जाता है<br />
जब किसी की चाह में भटकता हूँ<br />
यह दिल बहुत समझाता है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">शायद इसी एक वजह से<br />
किसी की हसरत से जी डरता है<br />
बेपनाह प्यार करता है जिससे<br />
तिल-तिलकर उसके लिए मरता है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">कई बार मातम में ख़ुद को<br />
सफ़ेद पोशाक पहने हुए  देखा है मैंने<br />
इसीलिए इक दीवार उठा रखी है<br />
निगाहो-निगाहे-पनाह के बीच मैंने</span></p>
<p><span style="color:#000000;">हर शाम ज़हन के दरवाज़े पर<br />
इक माज़ी की दस्तक होती है<br />
तेरा पुराना पता पूछती ज़िन्दगी<br />
मुझसे रोज़ ही रूब-रू होती है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">वह यह बारहा कहती है मुझसे<br />
मुझे इश्क़ है तुझसे, तुझी से<br />
और मैं आँख चुराके कहता हूँ<br />
मुझे इश्क़ नहीं तुझसे, किसी से</span></p>
<p><span style="color:#000000;">क्यों चली आयी है इस राह<br />
ख़ुशबू के आवारा बादल की तरह<br />
कि नाचीज़ का दिल काला है<br />
तेरी आँखों के काजल की तरह</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[न वह कभी आँखों से उतारा ही गया]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=1058</link>
<pubDate>Sat, 02 Aug 2008 19:35:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=1058</guid>
<description><![CDATA[न वह कभी आँखों से उतारा ही गया
और न कभी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">न वह कभी आँखों से उतारा ही गया<br />
और न कभी लबों से पिया ही गया<br />
वह इक दर्द का बवण्डर था शायद<br />
न जिसे कभी दिल में सँभाला ही गया</span></p>
<p><span style="color:#000000;">इक कहकशाँ की रोशनी भी खप गयी<br />
न ज़रा पलकों को झपकाया ही गया<br />
आधे-आधे दिल से देखा था मैंने उसे<br />
न वह कभी पूरे दिल से देखा ही गया</span></p>
<p><span style="color:#000000;">तारीक़ी ने सिर्फ़ मेरे पाए ही चुने<br />
और न कभी मुझसे भागा ही गया<br />
टुकड़े कर दिये उसने मेरी आँखों के<br />
न यह ग़म मुझसे भिगोया ही गया</span></p>
<p><span style="color:#000000;">धीरे-धीरे वह मुझसे दूर चलता गया<br />
न मुझसे उसके क़रीब जाया ही गया<br />
बारिश ने खनका दीं शीशम की पत्तियाँ<br />
न रोकर इस दिल को बहलाया ही गया</span></p>
<p>पाए:feet,  तारीक़ी: darkness</p>
<hr /> शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दर्द सुलगते क्यों हैं]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=890</link>
<pubDate>Mon, 10 Mar 2008 09:45:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=890</guid>
<description><![CDATA[दर्द सुलगते क्यों हैं जलते क्यों नहीं
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">दर्द सुलगते क्यों हैं जलते क्यों नहीं<br />
मेरी आँखों में अब्र हैं बरसते क्यों नहीं</font></p>
<p><font color="#000000">यह तुमको देखकर ही शायद बरसेंगे...</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति 'नज़र'<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जब प्यार किसी से होता है]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=804</link>
<pubDate>Mon, 18 Feb 2008 14:34:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=804</guid>
<description><![CDATA[एक ख़ुशबू जाने कहाँ से आयी है
कुछ दिनो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">एक ख़ुशबू जाने कहाँ से आयी है<br />
कुछ दिनों से दिल पर छायी है<br />
शायद, शायद ऐसा तब लगता है<br />
जब प्यार किसी से होता है</font></p>
<p><font color="#000000">ख़ाबों में जाने कौन आने लगा है<br />
रातों को नींदें चुराने लगा है<br />
शायद, शायद ऐसा तब होता है<br />
जब प्यार किसी से होता है</font></p>
<p><font color="#000000">जब से वह ख़ाबों में आया है<br />
दिल बेचैन रहने लगा है<br />
उसको सामने हर पल देखने को<br />
दिल बेताब रहने लगा है</font></p>
<p><font color="#000000">शायद, शायद ऐसा तब लगता है<br />
जब प्यार किसी से होता है </font></p>
<p><font color="#000000">अन्जाना नहीं जाना-पहचाना है<br />
सपना है उसको अपना बनाना है<br />
शायद, शायद ऐसा तब होता है<br />
जब प्यार किसी से होता है</font></p>
<p><font color="#000000">अब वह मेरी मंज़िल बन गयी<br />
अब वह मेरा सपना है<br />
वह दिल की धड़कन बन गयी<br />
अब वह मेरी तमन्ना है</font></p>
<p><font color="#000000">शायद, शायद ऐसा तब लगता है<br />
जब प्यार किसी से होता है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शायद एक ही तरह सोचती है वह]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/15/%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a6-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%b5%e0%a4%b9/</link>
<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 18:42:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/15/%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a6-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%b5%e0%a4%b9/</guid>
<description><![CDATA[वह मुझे चाहती है
या यूँ ही मुझसे बात कर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">वह मुझे चाहती है<br />
या यूँ ही मुझसे बात करनी थी उसे<br />
कोशिश तो उसने<br />
मुझ तक पहुँचने की बहुत की थी<br />
और फिर वो मुझे<br />
'नज़र' भी कहने लगी -<br />
'नज़र' उसे अच्छा लगता है<br />
ऐसा भी उसने कहा था<br />
एक बार मुझसे मेरी ही शिक़ायत की थी उसने<br />
ज़हीन तो है वो<br />
और शायद थोड़ी अय्यार भी,<br />
मुझसे उसने कई बार एक ही सवाल पूछा है<br />
बहुत दिनों से उससे बात नहीं हुई<br />
जाने क्यों? जवाब नहीं हैं मेरे पास...<br />
शायद एक ही तरह सोचती है वह</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००५</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पिछला कुछ भी बदला नहीं जा सकता]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/15/%e0%a4%aa%e0%a4%bf%e0%a4%9b%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9b-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%b8/</link>
<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 18:31:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/15/%e0%a4%aa%e0%a4%bf%e0%a4%9b%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9b-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%b8/</guid>
<description><![CDATA[बीते दिनों की गलियों में जब पाँव पड़ते]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">बीते दिनों की गलियों में जब पाँव पड़ते हैं तो<br />
अपने आपको तुझमें ढूँढ़ने लगता हूँ मैं<br />
दिल के ज़ख़्म बर्फ़ की तरह जमने लगते हैं<br />
और उदासियों की नज़्म उन्हें गरमाती रहती है...</font></p>
<p><font color="#000000">मैं जानता हूँ पिछला कुछ भी बदला नहीं जा सकता<br />
फिर भी 'काश!' की परछाईं मेरा पीछा करती है<br />
काश यूँ न होता, काश वैसा न किया होता, काश!<br />
बस यही आवाज़ें मन में गूँजती रहती हैं...</font></p>
<p><font color="#000000">सन्नाटों में झींगुर जाने किसको सदा देते हैं<br />
चाँदनी ज़मीन पर जाने क्या तलाश करती है<br />
मैं बंद कमरे में बैठा खिड़की से बाहर देखता हूँ<br />
तेरी यादें गली में टहलती नज़र आती हैं मुझे...</font></p>
<p><font color="#000000">मेरा उसी राह से आना-जाना है जहाँ तुम्हें देखा था<br />
आज भी नम आँखों में माज़ी की हरी काई जमी है<br />
वहम ही सही मगर दो पल को तेरा साथ मिल जाता है<br />
और तन्हाई के पन्नों पर तेरी तस्वीरें बन जाती हैं...</font></p>
<p><font color="#000000">मेरी ज़िन्दगी में जितने भी सफ़्हे तुमने लिखे थे<br />
उनके हर्फ़ आज भी मैं तन्हाई के साथ चुनता हूँ<br />
कच्ची स्याही से लिखे वह लम्हों में बुने हर्फ़,<br />
लाख कोशिशों के बाद भी मैं भूल नहीं पाया हूँ...</font></p>
<p><font color="#000000">मेरा नाम भूल जाओगी, मेरे ख़त खो जायेंगे तुमसे<br />
शक़्ल तक न याद आयेगी, न मेरी कोई बात<br />
वक़्त की गर्द में तुम मेरे लिए आँखें मूँद लोगी<br />
शायद कभी फ़लाँ कहकर भी न याद करो मुझको...</font></p>
<p><font color="#000000">मुझको भूल जाने वाले लोगों को मैं भूल जाता हूँ<br />
भीड़ में उनके चेहरे तक नहीं याद रखता मैं<br />
तेरा चेहरा ही जानता था, नाम क्या होगा? परवाह न थी<br />
तेरा नाम भूल जाऊँ शायद पर तुझे कैसे भूलूँगा...</font></p>
<p><font color="#000000">मैं हसीन नहीं मगर वह तो फ़िल-हक़ीक़त हसीन होगा<br />
जिसे तुम चाहती हो, जिसके लिए साँस लेती हो तुम<br />
गो मैं यकता हूँ, ज़माने में मुझसा कोई दूसरा नहीं<br />
फिर क्यों लगता है मुझे वह मुझसे बेहतर होगा...</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००५</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मैं खु़द को दो बाँहों में भरकर]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/15/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%bc%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%81%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ad/</link>
<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 13:46:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/15/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%bc%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%81%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ad/</guid>
<description><![CDATA[तुम्हें देखता हूँ तो
तुम्हारी मासूम ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">तुम्हें देखता हूँ तो<br />
तुम्हारी मासूम हँसी से यूँ लगता है कि<br />
तुम मुझे चाहती हो<br />
इन चंद लम्हों में मुझे<br />
यह महसूस होता है शायद<br />
तुम मेरे लिए बनी हो</font></p>
<p><font color="#000000">तुम्हारे रूप का जादू मुझे<br />
तुम्हारी तरफ़ खींचने लगता है<br />
दुनिया थम-सी जाती है<br />
मन बहकने लगता है<br />
जिस्म की सौंधी मिट्टी महक उठती है<br />
तुम्हारी खु़श्बू के साथ...</font></p>
<p><font color="#000000">तुम्हारी अदा तुम्हारा तस्व्वुर<br />
मेरे मन से जाता ही नहीं<br />
मैं खु़द को दो बाँहों में भरकर<br />
बैठा रहता हूँ देर तलक<br />
तुम्हारी याद दिल में पाज़ेब छमकाती रहती है...</font></p>
<p><font color="#000000">तुम्हारा नाम चाँदनी है ना!<br />
मुझे अपनी बाँहों में भर लो तुम<br />
यह उदासी के अँधेरे छँटते नहीं अब...</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तो शायद साँस पड़ जाये इनमें...]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/08/27/%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a6-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%81%e0%a4%b8-%e0%a4%aa%e0%a4%a1%e0%a4%bc-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%87%e0%a4%a8%e0%a4%ae%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Mon, 27 Aug 2007 18:44:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/08/27/%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a6-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%81%e0%a4%b8-%e0%a4%aa%e0%a4%a1%e0%a4%bc-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%87%e0%a4%a8%e0%a4%ae%e0%a5%87/</guid>
<description><![CDATA[एक पानी में भीगी हुई किताब
जाने किसने?
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">एक पानी में भीगी हुई किताब<br />
जाने किसने?<br />
सूखने के लिए रख दी है धूप में</span></p>
<p><span style="color:#000000;">जैसे जैसे नमी भाप बनती है<br />
पन्ने फड़फड़ाकर खुलने लगते हैं<br />
नीली स्याही से लिखे हर्फ़<br />
भीगने से धुँधले पड़ गये हैं और...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">चश्मा लगाकर भी<br />
इन आँखों से पढ़ नहीं मिलते हैं<br />
जाने किसकी ज़िन्दगी के हर्फ़ हैं?<br />
धुँधले, पानी में धुले हुए हर्फ़</span></p>
<p><span style="color:#000000;">वो, वही जिसने लिखे थे<br />
कलम फेर दे अगर<br />
तो शायद साँस पड़ जाये इनमें...</span></p>
<hr />शायिर - विनय प्रजापति 'नज़र'</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
