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	<title>श्रद्धांजलि &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "श्रद्धांजलि"</description>
	<pubDate>Fri, 29 Aug 2008 19:57:37 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[अधूरी गजल छोड़ गए फाकिर]]></title>
<link>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/?p=155</link>
<pubDate>Sat, 01 Mar 2008 08:37:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
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<description><![CDATA[माडल टाउन के आर्य समाज मंदिर में एक छो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>माडल टाउन के आर्य समाज मंदिर में एक छोटे से हाल में श्रद्धांजलि देने वाले कुछ खास लोग शामिल हुए। उन्हें देखकर ऐसा लगता नहीं था कि कोई बहुत ही नामी शायर सुदर्शन फाकिर की रस्म पगड़ी में इकट्ठे हुए हैं लोग। समुद्र से गहरे थे फाकिर बड़े ही सादा समारोह में गुलशन कुंदरा ने माइक संभाला और कहा कि वह फाकिर को उन दिनों से जानते हैं जब फाकिर फिल्म इंडस्ट्री के फाकिर नहीं, बल्कि उनके बहुत ही प्यारे दोस्त फाकिर थे। उन्होंने कहा कि वह गहरा समुद्र थे। साहिर की तरह फाकिर हैं जालंधर की पहचान दीपक जालंधरी ने बताया कि अगर लुधियाना की पहचान साहिर लुधियानवी हैं तो जालंधर की पहचान सुदर्शन फाकिर हैं। कुछ लोग अपवाद होते हैं हंस राज हंस ने अपनी बात के शुरू में ही कहा कि सुना है कल रात मर गया वो..लेकिन उन्होंने कहा यह बात फाकिर साहब पर लागू नहीं होती क्योंकि फाकिर जैसे लोग मरते नहीं बल्कि अपने पैरों के निशान छोड़ कर जाते हैं। अपनी कीमत पर जिए फाकिर सुरेश सेठ ने कहा कि फाकिर हर विधा में पारंगत था। इसमें कोई दो राय नहीं कि फाकिर अपनी कीमत पर जिया जिसका उसे कोई मलाल नहीं था। नए कलाकार को देते थे प्रोत्साहन हिंदी फिल्मों के मशहूर गायक सुरेश सहगल ने बताया कि फाकिर साहब की बात ही निराली थी। नए कलाकार को प्रोत्साहन देते थे। समारोह में प्राण शर्मा, मलिक, सतीश भाखड़ी, जानकी दास, प्रिंसिपल वीके तिवाड़ी, राही व कपिला इत्यादि ने भी फाकिर साहब के लिए प्रार्थना की। पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने दुख प्रकट किया। जरा सी आहट पर लगता था जगजीत सिंह आ गए हाल में जरा सी आहट होती थी तो लोगों की निगाह दरवाजे पर चली जाती थी, लेकिन निराशा ही हाथ लगी क्योंकि जगजीत सिंह नहीं पहुंचे। प्रो. एचके गुप्ता जो फिरोजपुर से आए थे ने बताया कि अगर जगजीत आ जाता तो यह फाकिर का नहीं जगजीत का सम्मान था। उनके जिगरी दोस्त विनोद धीर ने बताया कि जब जगजीत सिंह के बेटे की एक हादसे में मृत्यु हो गई और वे टूट गए थे। फाकिर ने टूटे हुए जगजीत सिंह के शरीर में फिर से प्राण फूंक दिए थे। अधूरा रहा किताब छपवाने का सपना फाकिर इतने अच्छे शायर होने के बावजूद अपनी किताब अपने जीते जी नहीं देख सके। इसकी सिसकियां उनके आखिरी दिनों में साफ तौर पर सुनाई देती थीं। शायद यही कारण है कि कैंसर से लंबे समय से जूझते हुए फाकिर ने अपनी पत्नी सुदेश फाकिर से कई बार कहा, 'मैं अपनी किताब छपवाना चाहता हूं। मैं देखना चाहता हूं जिन गजलों को मैंने अपने बच्चों की तरह पाला-पोसा है वे कैसी हैं।</p>
<p><i>Source: <a href="http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_4223989/">Jagran</a></i></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[चलती राहो में यूं ही आंख लगी है फाकिर]]></title>
<link>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/?p=157</link>
<pubDate>Thu, 21 Feb 2008 08:37:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/?p=157</guid>
<description><![CDATA[वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी.. हे र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://jagjitsinghnews.wordpress.com/2008/02/21/chalti-raho-me-yun-hi-aakh-lagi-hai-fakir/%e0%a4%ab%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b0/" rel="attachment wp-att-156" title="फाकिर"><img src="http://jagjitsinghnews.wordpress.com/files/2008/03/21jal-1_1203596110_m.jpg" alt="फाकिर" border="0" /></a>वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी.. हे राम. व आदमी आदमी को क्या देगा जो भी देगा खुदा देगा.. जैसी कालजयी गजलें लिखने वाले मशहूर शायर सुदर्शन फाकिर सोमवार को इस दुनिया से रुखसत हो लिए। अफसोस कि पंजाब को एक अलग पहचान देने वाले इस शख्स को पंजाबियों और पंजाब ने नहीं पहचाना।</p>
<p>वर्ष 1937 में फिरोजपुर के गुरुहरसहाय कस्बे के रत्ताखेड़ा गांव में डाक्टर बिहारी लाल कामरा के यहां जन्म लेने वाले सुदर्शन फाकिर के परिवार में दो अन्य भाई भी थे। बड़े भाई का देहांत हो चुका है। जालंधर में रहने वाले छोटे भाई विनोद कामरा के यहां फाकिर साहब ने जिंदगी के आखिरी लम्हे बिताए।</p>
<p>फाकिर साहब के अजीज मित्रों कहना है कि उनकी याददाश्त काफी तेज थी। जिस शख्स से वह मिल लेते थे, उसे दोबारा अपना नाम नहीं बताना पड़ता था। यह अलग बात है कि फाकिर साहब को उनके घर का पता कभी याद नहीं रहा। वर्ष 1970 से पहले जालंधर में आल इंडिया रेडियो में नौकरी करने वाले फाकिर साहब को वहां मन नहीं लगा। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और मुंबई चले आए। 2005 में वह मुंबई से वापस आकर जालंधर में अपने छोटे भाई के यहां रहने लगे। सत्तर के करीब गजल लिखने वाले फाकिर की प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन दिनों बेगम अख्तर सिर्फ पाकिस्तान के शायरों की गजल ही गाया करती थीं। मगर, फाकिर साहब पहले भारतीय शायर हैं, जिनकी लिखी गजल बेगम अख्तर ने बुलाकर ली और अपनी आवाज दी। वह मशहूर गजल थी 'इश्क में गैरते जज्बात नेरोने न दिया..'। बाद में चित्रा सिंह ने भी इसे गाया था।</p>
<p>मोहम्मद रफी ने उनकी गजल 'फलसफे इश्क में पेश आए हैं सवालों की तरह..' गाकर दुनिया में धूम मचा दी। इस नज्म ने फाकिर को नई पहचान दी। जब गजल गायक जगजीत सिंह ने उनके द्वारा लिखी गजल 'वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी.' गाया उसके बाद फाकिर केनाम का डंका दुनिया में ऐसा गूंजा कि उसकी खनक आज भी सुनाई देती है। उनके द्वारा लिखित गजल 'जिंदगी मेरे घर आना..' गाकर भूपिंदर सिंह ने फिल्म फेयर अवार्ड जीता। वहीं गुलाम अली ने 'कैसे लिखोगे मोहब्बत की किताब तुम तो करने लगे पल-पल का हिसाब..' गाकर गजलों के इस सम्राट को सलाम किया था। फाकिर का अंतिम शेर जो दुनिया के सामने नहीं आ सका, वह था 'लाश मासूम की हो या कि कातिल की, जनाब हमने अफसोस किया है..'। वर्ष 1982 में गजल की एक कैसेट रिलीज की गई थी, उसमें मीरा व कबीर के सात भजन थे और आठवां भजन फाकिर साहब ने लिखा था। वहीं फाकिर साहिब का एक गीत 'आखिर तुम्हें आना है जरा देर लगेगी..' भी काफी पसंद किया गया था। इसका बालीवुड फिल्म यलगार के लिए इस्तेमाल किया गया था।</p>
<p><i>Source: <a href="http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_4223989/">Jagran</a></i></p>
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<title><![CDATA[ शोक संदेश]]></title>
<link>http://ramadwivedi.wordpress.com/2007/12/12/%e0%a4%b6%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6/</link>
<pubDate>Wed, 12 Dec 2007 05:51:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>ramadwivedi</dc:creator>
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<description><![CDATA[बहुत दु:ख के साथ सूचित कर रही हूं कि हैद]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत दु:ख के साथ सूचित कर रही हूं कि हैदराबाद की वरिष्ठ कवयित्री डा. प्रतिभा गर्ग जी का कल सायंकाल निधन हो गया है जिससे साहित्य जगत  अत्यन्त शोक संतप्त है ।  कुछ ही दिन पहले आपको ’महादेवी वर्मा सम्मान’ से सम्मानित किया गया था एवं २ दिसम्बर को आपने अपना काव्यसंग्रह ’स्नेह सलिला’ का भी उन्होंने लोकार्पण किया था ।आप कादम्बिनी क्लब, हैदराबाद की संरक्षिका एवं आथर्स गिल्ड आफ इंडिया की आजीवन सदस्या थीं लगभग एक दर्जन पुस्तकों की सृजनकर्ता एवं साहित्य सुमन की अध्यक्षा  आज हमारे बीच नहीं हैं ।ईश्वर से हम यही प्रार्थना करते हैं कि उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करें और शोक संतप्त परिवार को इस  असह दु:ख को सहन करने की शक्ति दे। कादम्बिनी क्लब ,हैदराबाद एवं आथर्स गिल्ड आफ इंडिया की ओर से उन्हें शत-शत नमन.....ओम शान्ति......</p>
<p>   डा. रमा द्विवेदी</p>
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</item>
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<title><![CDATA[     परम श्रद्धेय त्रिलोचन जी के निधन से हिन्दी साहित्य जगत की अपूर्णनीय क्षति हुई है,उन्हें कादम्बिनी परिवार,हैदराबाद की ओर से शत-शत नमन।]]></title>
<link>http://ramadwivedi.wordpress.com/2007/12/10/shoksandesh/</link>
<pubDate>Mon, 10 Dec 2007 09:13:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>ramadwivedi</dc:creator>
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<description><![CDATA[
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<br />
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<title><![CDATA[एक थी फूलन]]></title>
<link>http://srijanshilpi.wordpress.com/2006/08/28/phoolan/</link>
<pubDate>Mon, 28 Aug 2006 06:26:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
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<description><![CDATA[नियति जिंदगी में कैसे-कैसे रंग बिखर सक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span><img align="right" width="150" src="http://news.bbc.co.uk/olmedia/1455000/images/_1456441_phoolan_bbc150.jpg" alt="फूलन" height="180" />नियति जिंदगी में कैसे-कैसे रंग बिखर सकती है</span><span>, </span><span>इसे कोई नहीं जानता। फूलन भी नहीं जानती थी। पर नियति ने फूलन की जिंदगी के लिए बहुत-से रंग सजाए थे। जन्म से लेकर मरण तक फूलन का पूरा जीवन सुर्ख</span><span>, </span><span>चटक और स्याह रंगों से भरा था। ये रंग दु</span><span>:</span><span>ख</span><span>,</span><span> यातना</span><span>, </span><span>अपमान</span><span>, </span><span>विद्रोह</span><span>, </span><span>प्रतिशोध और कुख्याति से लेकर सम्मान</span><span>, </span><span>सुविधा</span><span>, </span><span>सत्ता और ग्लैमर तक के थे। इन सभी रंगों को फूलन ने अपने जीवन में देखा और भोगा था। उनकी आधी जिंदगी गोलियों और गालियों की अनगिनत बौछारों से पटी थी और बाकी आधी जिंदगी मीडिया और सिनेमा के कैमरों की क्लिक से। उनकी जिंदगी की असलियत किसी भी बेहतरीन कहानी से ज्यादा कहानीपन के तत्वों से युक्त थी। उनकी जिंदगी पर आधारित किताब और फिल्म ने दुनिया भर के समाजशास्त्रियों</span><span>, </span><span>बुद्धिजीवियों और नारीवादियों को उस सच से रू-ब-रू कराया</span><span>, </span><span>जिसे वे पोथी पढ़-पढ़ कर और सेमिनारों में बहस-मुबाहिसें करके ठीक से समझ नहीं पा रहे थे। फूलन की जिंदगी शुरू से आखिर तक सबक है</span><span>—</span><span>समाज के ठेकेदारों</span><span>, </span><span>बुद्धिजीवियों</span><span>, </span><span>दलितवादियों और नारीवादियों के लिए। वह समकालीन भारतीय समाज में दलित चेतना और नारी चेतना की ज्वालामुखी के प्रस्फुटन का संकेत हैं। संसद में अपनी उपस्थिति से वह सामाजिक न्याय और नारी सम्मान की चेतना का प्रतिनिधित्व करती थीं। </span></p>
<p><span></span><span></span><span>भारत में बाल विवाह का शिकार तो लाखों मासूम लड़कियाँ अब भी होती हैं</span><span>, </span><span>सामंती सनक और आपराधिक प्रवृत्ति के कारण बलात्कार और सामूहिक बलात्कार का कहर हजारों अबलाओं पर अब भी टूटता है</span><span>, </span><span>लेकिन फूलन उनमें से कोई नहीं बनती। वह जीवट</span><span>, </span><span>जूझने का वह माद्दा सबमें नहीं होता</span><span>, </span><span>विद्रोह की वह धधकती आग सबमें नहीं पाई जाती</span><span>, </span><span>जो फूलन में थी। फूलन को नियति ने अपने क्रूर हाथों से गढ़ा था, यातना ने उसे मजबूत किया था, दु:ख ने उसे माँजा था</span><span>, </span><span>क्योंकि दु:ख केवल उन्हीं को माँजता है जो उसके मूल कारण को दूर करने की कोशिश करते हैं। पुण्य केवल उसी का प्रबल होता है जो अपने आँसुओं से धुलता है। यातना केवल उसी को मजबूत करती है जो अन्याय को सहकर चुप नहीं रह जाता</span><span>, </span><span>बल्कि उसका माकूल प्रतिकार करता है। फूलन को फूलन बनाया दु:ख</span><span>,</span><span> यातना और आँसुओं से लड़ने की उसकी अदम्य क्षमता ने और जब वह फूलन बन गईं तो फिर मीडिया की नजर में</span><span>, </span><span>जीवनीकारों की नजर में</span><span>, </span><span>फिल्म निर्माताओं की नजर में</span><span>,</span><span> राजनेताओं की नजर में अचानक बहुत महत्वपूर्ण बन गईं। सबने उन्हें हाथों-हाथ लिया</span><span>,</span><span> सबने उनके बाजार-मूल्य को समझा। उनसे चुनाव लड़वाए गए</span><span>, </span><span>उन पर किताब लिखी गई</span><span>, </span><span>उन पर फिल्म बनाई गई</span><span>, </span><span>उनको विदेश घुमाया गया। वह मीडिया की भाषा नहीं जानती थी</span><span>, </span><span>वह राजनीति की भाषा नहीं जानती थी</span><span>, </span><span>वह बाजार की भाषा नहीं जानती थी। उनकी जिंदगी की दास्तान बेचकर लाखों कमाए गए। उनके प्रति लोगों में कौतूहल के भाव को बेचकर सामाजिक न्याय की राजनीति का झंडा बुलंद किया गया। वह पढ़ी-लिखी नहीं थीं। यदि होतीं तो पता नहीं क्या-क्या कर गुजरतीं। पर उनमें सहज बुद्धि पर्याप्त थी। उन्होंने इन कारोबारियों के नेक इरादे को समझ लिया था। सुना है कि उन्होंने इन कारोबारियों से अपना हिस्सा भी मांगा और लिया था। ठीक ही किया था।</span></p>
<p><span>उनकी जिंदगी से जितना नफा उठाया जा सकता था</span><span>, </span><span>वह लोगों ने उठाया। फिर एक सामंती सोच और सनक वाले व्यक्ति ने उनकी जीवन-लीला समाप्त कर दी। फूलन को मौत तो खैर वैसी ही मिली जैसी वह चाहती थीं। कनपटी पर नजदीक से बस एक गोली</span><span>, </span><span>और खेल खत्म। पोस्टमार्टम से यह बात सामने आ गई थी कि उनकी मौत तो पहली ही गोली से हो चुकी थी</span><span>, </span><span>शेष पाँच गोलियाँ तो बेजान शरीर में ही ठूँसी गई थीं। इस हत्या ने उनका बाजार-मूल्य फिर से बढ़ा दिया। उनकी मौत एक महत्वपूर्ण मौत बन गई। उनकी लाश पर राजनीति का जोर का तांडव भी चला। संसद में कई दिनों तक हंगामा मचता रहा।</span></p>
<p><span>कारोबारियों के लिए फूलन शुरू से आखिर तक लाभ का सौदा थीं। निश्चित रूप से उन पर किताबें और लेख आगे भी लिखे जाएंगे</span><span>, </span><span>फिल्में आगे भी बनाई जाएंगी</span><span>, </span><span>क्योंकि उनकी दास्तान तो अब जाकर मुकम्मल हुई। (उनका हत्यारा नाटकीय ढंग से सर्वाधिक सुरक्षित तिहाड़ जेल से फरार हो गया और अंतत: नाटकीय ढंग से फिर पकड़ा भी गया।) वह अब और बिकेंगी। फूलन बनने से शोहरत मिलती है</span><span>, </span><span>फूलन बनने से राजनीति में जगह मिलती है</span><span>, </span><span>फूलन बनने से पैसा मिलता है</span><span>, </span><span>फूलन बनने से हजार गुनाह माफ हो जाते हैं। इन फायदों को जानकर चंबल की घाटी में फूलन के बाद बहुत-सी दस्यु सुंदरियाँ उतरीं। पर किसी को फूलन बन पाना नसीब नहीं हुआ</span><span>, </span><span>क्योंकि किसी के पास यातना भरी वह दास्तान नहीं थी</span><span>, </span><span>आत्म-सम्मान का वह गुरूर नहीं था</span><span>, </span><span>विद्रोह की वह चिन्गारी नहीं थी। नारीवादियों ने फूलन के महत्व को नहीं समझा</span><span>, </span><span>फूलन ने भी नारीवादियों को नहीं समझा। नारीवादी चाहते तो फूलन को अपनी महानायिका बना सकते थे</span><span>,</span><span> फूलन चाहती तो नारीवादियों की मसीहा बन सकती थीं। लेकिन वह चालाक नहीं थी</span><span>,</span><span> सीधी-सादी औरत थीं। उन्हें कारोबार करना</span><span>, </span><span>सौदेबाजी करना नहीं आता था। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span>फूलन शुरू से आखिर तक सामंतवाद का शिकार रहीं। सामंती सोच वाले ठाकुरों ने उन पर बचपन में अवर्णनीय जुल्म ढाए और वैसे ही सोच वाले लोगों ने उनकी इहलीला समाप्त कर दी। लेकिन सामंतवाद को जो सबक फूलन ने सिखाया</span><span>, </span><span>वह उनसे पहले किसी ने नहीं सिखाया था। उन्होंने सामंतवादियों को उन्हीं की भाषा में सबक सिखाया</span><span>, </span><span>क्योंकि सामंतवादी किसी और भाषा में नहीं सीख सकते। हाँ</span><span>, </span><span>यह सही है कि सामंतवादियों को सबक सिखाने के लिए फूलन की एक जिंदगी पर्याप्त नहीं है। सामंतवाद का जो वट-वृक्ष हजारों साल से तनकर खड़ा रहा है</span><span>, </span><span>उसे झुकाने और काट डालने के लिए फूलन को अभी कई और जन्म लेने पड़ेंगे। फूलन दोबारा जन्म लेंगी</span><span>, </span><span>बार-बार जन्म लेंगी</span><span>, </span><span>तब तक जब तक कि सामंतवाद और नारी का अपमान करने वालों का खात्मा न हो जाए। </span><span> </span></p>
<p><em><span>(स्वर्गीया फूलन देवी को श्रद्धांजलि स्वरूप यह आलेख मैंने 25 जुलाई</span><span>, </span><span>2001 को उनकी हत्या के बाद लिखा था</span><span>,</span><span> जो 4 अगस्त</span><span>, </span><span>2001 को राष्ट्रीय सहारा</span><span>, </span><span>नई दिल्ली में प्रकाशित हुआ था।)</span><span><font face="DVBW-TTYogeshEN"> </font></span> </em></p>
]]></content:encoded>
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