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	<title>श्री-सैलम &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/श्री-सैलम/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "श्री-सैलम"</description>
	<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 10:09:26 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[श्री सैलम यात्रा - २ (अंतिम किस्त)]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/?p=240</link>
<pubDate>Wed, 30 Apr 2008 04:41:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[तेलुगु नव वर्ष (युगादि) पर दोस्तों के स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>तेलुगु नव वर्ष (युगादि) पर दोस्तों के साथ श्रीसैलम जाने का मौका मिला जहाँ भारत के बारह ज्योतिर्लिंग में से एक और शक्तिपीठ हैं। सुबह सवेरे की बस पकड कर छः घंटे के सफर के उपरांत श्री सैलम पहुँचे, ये आपने <a href="http://saptrang.wordpress.com/2008/04/10/sri-sailam-2/" target="_blank">पिछली पोस्ट</a> में पढा। अब आगे....</p>
<p>बस से उतर कर जो आगे का नजारा किया तो भीड देख कर भाई लोग भौंचक रह गये। कन्धे से कन्धा सटा कर चलते लोग। मुझे पूर्णिमा के आसपास गिरिराज जी(गोवर्धन, मथुरा) की परिक्रमा याद आ गई...वैसी ही भीड, रैले का रैला चलता हुआ..२१ किलोमीटर (सात कोस) तक। यहां फर्क ये था कि बस एक किलोमीटर आगे मंदिर तक जाना था...पर दिक्कत ये कि हमें कुछ पता नही था। मित्र रामा एक बार आया था पर इस भीड को देख कर उसका सारा दिशा ज्ञान धरा रह गया। भीड के रेले के साथ साथ चलते हुए मंदिर के पास तक पहुंछे तो बताया गया कि थोडा गलत आ गये हैं...कुछ पीछे से एक मोड मुडना था और दर्शन वाली लाइन उधर ही थी। घूमते फिरते उधर पहुँचे। अभी तक  सडक पर चलती भीड देखी थी...अब दर्शन की लाइन देख कर सांस अटक गई। फ्री दर्शन की लाइन का तो कोई पार नही दिख रहा था और ५० रुपये वाले दर्शन में जो मारा मारी हो रही थे वो देखी नही गई। हार कर एक जगह लाइन में लगे जहां सौ रुपये वाले टिकट मिल रहे बताये गये। सबसे बडी मुश्किल यह कि सूचना देने वाला कोई नही। लोग एक दूसरे से पूंछते और एक दूसरे को जवाब भी दे देते। थोडी देर बाद पता चला कि ये १०० रुपये वाली खिडकी तो बंद पडी है..और टिकट नही मिल रहे हैं। फिर भी खडे रहे। किसी तरह खिडकी तक पहुँचे तो बताया गया कि टिकट अब शाम को ६ बजे मिलेंगे।</p>
<p>३५० वाला...? शाम को।</p>
<p>६०० वाला....? शाम को।</p>
<p>१००० वाला...? ह्म्म्म आपको चाहिये?..मिल सकता है..। नही..शाम को!</p>
<p>मन किया कि आसपास घूम कर दर्शन किये बगैर की लौट जायें..पर नही..आये हैं तो इनसे मिल कर ही जायेंगे। हमें हैदराबाद के अपने पिच्चर हाल याद आये..जहां से हम कभी खाली हाथ नही लौटे चाहे ४० की टिकट ८० में खरीदी हो। अफसोस यहां कोई ब्लेक नही हो रही थी।</p>
<p><a href="http://saptrang.files.wordpress.com/2008/04/p4060099.jpg"><img src="http://saptrang.files.wordpress.com/2008/04/p4060099-thumb.jpg" alt="P4060099" width="243" height="318" /></a> <strong> </strong></p>
<p><strong>(भीड का पहला नजारा)</strong></p>
<p>मुझे समझ नही आ रहा कि क्या मन्दिर में पैसे देकर दर्शन वाली व्यवस्था होनी चाहिये? या सब एक समान हों और दर्शन की कोई बेहतर व्यवस्था हो। माना कि गर्भगृह बहुत छोटा है और एक समय में अधिक लोग नही जा सकते लेकिन कम से कम इंतजाम तो ठीक किये जा सकते हैं? खडे रहने की व्यवस्था, छाया, सूचना एवं जानकारी आदि आधारभूत व्यवथाएं तो प्रशासन उपलब्ध करवा ही सकता है..या फिर सोंचा हुआ है कि राम जी की मरजी राम जी का खेत। भगवान का घर है..यहां हम क्या कर सकते हैं। खैर ये हमें बाद में पता चला कि युगादि का त्यौहार होने की वजह से उन २-३ दिनों में आम दिनों से २-३ गुनी भीड थी अन्यथा समान्यतः इतनी अव्यव्स्था नही होती। फिर भी चूंकि ये बात पहले से पता होती है सो बेहतर इनतजाम तो किये ही जा सकते हैं।</p>
<p>खैर..सोंचा गया कि भगवान से तो शाम को ही मिलेंगे..आसपास घूम लियी जाये। पहले मंदिर का एक चक्कर काटा, इस आस में कि बेकडोर एंट्री का कोई इंतजाम हो। असफल। मंदिर के पीछे प्रसाद वितरण काउंटर थे जहाँ से पाँच-पाँच रुपये के लड्डू खरीदे और स्वयं ने भोग लगाया। बहुत स्वादिष्ट। फिर होटल में खाना खाया और सोंचा कि रात को लौटने के लिये आखिरी बस में टिकट करवा लेते हैं।बस अड्डे पहुँचे तो वहां एक सूचना चिपकी हुई थी...फलां-फलां-फलां दिन बसों के अग्रिम आरक्षण बंद रहेंगे। अव्यवस्था का एक और नमूना। जिस समय सबसे ज्यादा भीड रहे, सबसे ज्यादा जरूरत हो, तब सेवाएं बन्द कर दो। पब्लिक अपने आप निपटेगी।</p>
<p>खैर, अब आसपास घूमने निकलना था। घूमने के लिये २१० रुपये में एक आटो किया गया। तय हुआ कि वो हमें साक्षी गणपति, शिखरम एवं अन्य २-३ मंदिर दिखायेगा। हम इस मुगालते में थे कि आसपास ही कोई झरना भी है,जो कि इस २१० वाले पैकेज में शामिल है। तेलुगु में बात हुई थी सो रामा से कहा कि एक बार कनफर्म कर लो। उसने भी हाँ-हूँ करके टाल दिया। खैर, आटो में बैठकर चले। साक्षी गणपति और एक अन्य मंदिर तो २-३ किलोमीटर की दूरी पर ही निकले। हमें लगा कि बेटा आटो वाले ने ठग लिया। उसके बाद गये एक अन्य स्थल पर, जिसका नाम नही पता चला। वहां काफी नीचे सीढियां जाती थीं और नीचे पहाड में से पानी निकल रहा था। लोकेशन एक छोटे मोटे झरने जैसी ही थी,लेकिन सूखा हुआ। शायद बरसात में आते तो नजारा कुछ और होता। यहाँ खत्म करके पूंछा अब कहां..तो बोले शिखरम। यह इस पर्वत श्रृंखला की सबसे ऊँची चोटी बताई जाती है। यहाँ सबसे ऊपर नंदी की मूर्ति स्थित है। और वहां से श्रीसैलम कस्बा और मुख्य मंदिर भी नजर आता है। नंदी के दोनों सींगों के बीच में से मंदिर को देखने की परंपरा है, शुभ माना जाता है।लोग देख रहे थे और हम लोगों को देख रहे थे। यहाँ से नीचे उतरे तो पता चला कि यह आटो डील का आखिरी पडाव था और अब वापस हमें श्रीसैलम कस्बा जाना था। झरने के बारे में पूंछा तो बताया गया कि वो तो यहाँ से ६०-७० किलोमीटर दूर है, वो इस डील का हिस्सा नही था!</p>
<p><a href="http://saptrang.files.wordpress.com/2008/04/p4060074.jpg"><img style="border-width:0;" src="http://saptrang.files.wordpress.com/2008/04/p4060074-thumb.jpg" border="0" alt="P4060074" width="349" height="271" /></a></p>
<p><strong>(शिखरम से शहर और कृष्णा नदी)</strong></p>
<p><a href="http://saptrang.files.wordpress.com/2008/04/p4060071.jpg"><img style="border-width:0;" src="http://saptrang.files.wordpress.com/2008/04/p4060071-thumb.jpg" border="0" alt="P4060071" width="336" height="258" /></a></p>
<p><strong>(नंदी के इन दो सींगों के बीच में से मंदिर देखने की परंपरा है)</strong></p>
<p>वापस पहुँचे करीब पाँच बजे। अभी छः बजने में एक घंटा था पर फिर भी टिकट मिलने के संभावित स्थल पर जाकर भीड में खडे हो लिये। इस बार भी किसी को पता नही था कि टिकट यहीं मिलेंगे अथवा नही। मिलेंगे तो कितने रुपये वाले मिलेंगे। पर हम डटे रहे। अभी सडक पर ही खडे थे और टिकट खिडकी तक पहुँचने वाली रेलिंग का दरवाजा नही खुला था। पौने छः के करीब वो दरवाजा खुला और जो भगदड मची कि अलवर में पिच्चर हाल के बार हुई धक्का मुक्की और बेल्टें याद आ गईं। कुदते फांदते लाइन में लगे और टिकट खिडकी खुलने का इंतजार करने लगे। आखिरकार खिडकी खुली और लाइन सरकना शुरू हुई।  टिकट खिडकी के करीब पहुँचकर पता चला कि वहां मात्र साढे छः सौ रुपये वाले टिकट मिल रहे थे ये "अभिषेकम" के टिकट थे। अन्य किसी टिकट के बारे में जानकारी नही थी और दर्शन तो आज ही करने थे तो टिकट खरीदे गये..जिसमें २ नारियल, एक गुलाबजल की शीशी और एक गमछा साथ में मिला। मंदिर के अंदर पहुँच कर ऐसा लगा कि आधा लडाई फतह हो गई है। पर यहां अन्दर जाकर कहां जाना है यह कोई जानकारी नही थी। हम अलग तरफ से घुसे थे, दर्शन की लाइन (फ्री और पचास रुपये वाले) अलग जा रही थी। एक जगह कुछ लोगों का झुण्ड दिखा जो हमारा वाला ही सामान लिये हुए थे ..उनसे पूंछा तो पता चला कि हमें भी यहीं बैठना था। यह जगह गर्भगृह से थोडा हट कर थी और यहां हमें भगवान का अभिषेक करना था। आखिरकार एक सज्जन आये और उन्होने लाइन लगवाई..सात सात के ग्रुप में अभिषेक करना था भगवान का। उसके पहले ऊपरी वस्त्र (शर्ट और बनियान ) उतारने का आदेश मिला। सो वो उतार कर साफी गले में डाल ली गई। हमें ये चिन्ता थी कि हम मुख्य मंदिर में दर्शन कर पायेंगे या नही सो अभिषेक करवाने वाले सज्जन से ही पूंछा कि भाईसाहब, मुख्य मंदिर के दर्शन इस पैकेज में शामिल हैं या नहीं। उन्होने हाँ कहा तो तसल्ली हुई। यहां अपना नम्बर आया तो गुलाबजल से भगवान का अभिषेक किया गया, एक नारियल फोडा गया और चल दिये। दर्शन के लिये किधर से जाना है अभी भी यह पता नही थी। एक पुलिसवाले से पूंछा तो उन्होने शार्टकट बताया और हमने एक दरवाजा पार करके सीधे अपने आप को मुख्य मंदिर के अन्दर पाया। चूंकि मंदिर का अंदरूनी भाग बहुत छोटा था और पब्लिक बहुत ज्यादा, सो गर्मी औए उमस भयंकर थी। कुछ AC लगे हुए दिखे पर काम नही कर रहे थे। हमने सोंचा कि हमें तो यहां से चन्द पल में चल देना है, बेचारे भगवान जी का क्या हाल होता था, जो हमेशा यहीं रहते हैं। एकदम मुख्य गृह तो और भी बहुत छोटा था और अंधेरा भी। पंडित लोग खडे थे जो किसी को २ सेकेंड से ज्याद मत्था नही टेकने देते । आप सिर झुकाइये..पीछे से वो आपको झुकायेंगे और उठा देंगे। हमने सिर टिकाया और जो पीछे से धक्का लगा तो भट्ट से सिर टकराया शिवलिंग से। हमने शिवजी से माफी मांगी और निकल लिये। इसके बाद ज्यादा समय नही लगा, शक्तिपीठ के दर्शन किये और थोडी ही देर में हम मंदिर के बाहर थे। बाहर अभी भी भीड जोरदार थी सो हमने निश्चय किया कि अगर भीड में अलग अलग हो गये तो बस स्टेण्ड के पास मिलेंगे। हमें चिन्ता यह थी कि भीड की वजह से लौटती बस में जगह नही मिलेगी। पर ऐसा कुछ नही हुआ। जिस बस में लौटे वो लगभग खाली आई और हम सीट पर लम्बलेट होकर आये। शायद हैदराबाद में हमारे सिवा सबको पता था कि पर श्रीसैलम में कर्नाटक और महाराष्ट्र से आये हुए लोगों की भीड होती है सो अभी ना ही जाया जाये तो बेहतर।</p>
<p><a href="http://saptrang.files.wordpress.com/2008/04/photu471.jpg"><img style="border-width:0;" src="http://saptrang.files.wordpress.com/2008/04/photu471-thumb.jpg" border="0" alt="Photu471" width="317" height="243" /></a></p>
<p><strong>(शाम को दर्शन के समय भीड)</strong></p>
<p>______________________________________________________________</p>
<p><em>पोस्ट कुछ ज्यादा लम्बी हो गई। इस पोस्ट को कुल तीन भागों में बांटने का विचार था पर महसूस कर रहा हूं कि पार्ट में पोस्ट ’कमिट’ तो कर देता हूं..पर एक भाग लिखने के बाद दूसरा भाग लिखना लम्बा खिंच जाता है (या बिल्कुल ही टल जाता है) जो कि गलत है। कम से कम दो पोस्ट्स के दूसरे भाग इस चिट्ठे पर आने की राह देख रहे हैं पर नही आ पा रहे। प्रयास रहेगा कि सीरियल पोस्ट के चक्कर में ना ही पडा जाये।</em></p>
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