<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><!-- generator="wordpress.com" -->
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	>

<channel>
	<title>संविधान-और-विधि &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/संविधान-और-विधि/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "संविधान-और-विधि"</description>
	<pubDate>Wed, 08 Oct 2008 03:35:41 +0000</pubDate>

	<generator>http://wordpress.com/tags/</generator>
	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[सूचना को छिपाने के नौकरशाही के हथकंडे]]></title>
<link>http://srijanshilpi.wordpress.com/2006/08/24/rti_clarification/</link>
<pubDate>Thu, 24 Aug 2006 08:57:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
<guid>http://srijanshilpi.hi.wordpress.com/2006/08/24/right2information_clarification/</guid>
<description><![CDATA[संसद के मानसून सत्र के दौरान सरकार ने ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span>संसद के मानसून सत्र के दौरान सरकार ने नौकरशाही के दबाव के सामने झुकते हुए सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में संशोधन करके फाइल नोटिंग्स को सूचना के दायरे से बाहर निकालने की विफल चेष्टा की। </span>यदि <a target="_blank" href="http://www.persmin.nic.in/RTI/WebActRTI.htm"><span>सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005</span></a> की धारा 2 (च) में दी गई 'सूचना' <span>की निम्नलिखित परिभाषा को देखा जाए,</span></p>
<blockquote><p><i><span><strong>"information"</strong> means any material in any form, including records, documents, memos, e-mails, opinions, advices, press releases, circulars, orders, logbooks, contracts, reports, papers, samples, models, data material held in any electronic form and information relating to any private body which can be accessed by a public authority under any other law for the time being in force;</span></i><span> </span></p></blockquote>
<p><span>तो इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अभिलेख, दस्तावेज, ज्ञापन, अभिमत, सलाह, परिपत्र, आदेश, आदि सहित किसी भी रूप में उपलब्ध सामग्री सूचना के अंतर्गत आती है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न हुई जब भारत सरकार के कार्मिक मंत्रालय ने <a target="_blank" href="http://persmin.nic.in/RTI/WelcomeRTI.htm"><span>अपनी वेबसाइट पर </span><span>'</span><span>सूचना का अधिकार</span><span>'</span></a> के संबंध में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (</span><span><strong>FAQ</strong></span><span>) के अंतर्गत सूचना की परिभाषा को निम्नानुसार स्पष्ट करते समय अपनी ओर से जोड़ दिया कि इसके अंतर्गत फाइल नोटिंग्स नहीं आती है</span><span>:</span><span> </span></p>
<blockquote><p><span></span><span><b><i><span></span><span>3.</span><span> </span></i></b><b><i><span>What does information mean?</span></i></b><b><i><span> </span></i></b></span><span> </span><span><i><span></span><span><strong>   </strong></span><span>Information means any material in any form including records, documents, memos, e-mails, opinions, advices, press releases, circulars, orders, logbooks, contracts, reports, papers, samples, models, data material held in any electronic form and information relating to any private body which can be accessed by a public authority under any other law for the time being in force <strong>but does not include "file notings" [S.2(f)].</strong></span></i></span></p></blockquote>
<p><span>चूँकि भारत सरकार के सरकारी कामकाज से जुड़े नियमों से संबंधित किसी भी भ्रांति के मामले में कार्मिक मंत्रालय का स्पष्टीकरण ही अंतिम और स्वीकार्य माना जाता है, इसलिए कार्मिक मंत्रालय द्वारा मूल अधिनियम की भावना के विपरीत अपनी वेबसाइट पर दिए गए उक्त स्पष्टीकरण से दुविधा उत्पन्न हो गई। जाहिर है कि कार्मिक मंत्रालय, जो भारत सरकार के समूचे नौकरशाही तंत्र को नियंत्रित करता है, द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर और संसद की मर्यादा को भंग करते हुए जब उक्त स्पष्टीकरण के द्वारा सूचना के अधिकार को अप्रभावी करने की कोशिश की गई तो उसे <a target="_blank" href="http://cic.gov.in/"><span>केन्द्रीय सूचना आयोग</span></a> में चुनौती दी गई। इस चुनौती पर सुनवाई करने के बाद मुख्य सूचना आयुक्त श्री वजाहत हबीबुल्लाह ने 31 जनवरी, 2006 को अपने आदेश के द्वारा स्पष्ट किया कि फाइल नोटिंग्स के बगैर कोई भी सूचना अपूर्ण है, इसलिए फाइल नोटिंग्स सूचना का हिस्सा हैं। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अनुसार सूचना का अधिकार संबंधी सभी प्रकार के विवादों के मामले में मुख्य सूचना आयुक्त का निर्णय ही अंतिम और बाध्यकारी होता है, लिहाजा नौकरशाहों के लिए उस आदेश को शिरोधार्य करना बाध्यकारी हो गया है, जिसके अनुसार कोई व्यक्ति फाइल नोटिंग्स को देख सकता है और प्रासंगिक अंशों की फोटोप्रति निर्धारित शुल्क का भुगतान करके हासिल कर सकता है। </span><span></span><span><font face="DVBW-TTYogeshEN"> </font></span></p>
<p class="MsoNormal">फाइल नोटिंग्स को सूचना के अधिकार के तहत उपलब्ध कराना बाध्यकारी बना दिए जाने के बाद नौकरशाहों की नींद हराम हो गई और उसने लॉबिंग करके केन्द्रीय मंत्रिमंडल पर दबाव बनाया कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में एक संशोधन के जरिए फाइल नोटिंग्स को सूचना के दायरे से बाहर कर दिया जाए और इसके लिए बहाना यह किया गया कि मूल अधिनियम से कुछ भ्रांति पैदा हो रही थी जिसे दूर किए जाने के लिए यह संशोधन प्रस्तावित है, जबकि वास्तविकता यह है कि भ्रांति सरकार ने अपनी तरफ से पैदा करने की कोशिश की थी। मंत्रियों को संशोधन संबंधी प्रस्ताव से सहमत करने के लिए नौकरशाहों ने कैबिनेट पेपर्स को भी सूचना के दायरे से बाहर रखे जाने का प्रस्ताव किया, ताकि केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा संसद और जनता को विश्वास में लिए बगैर किए जाने वाले निर्णय के पीछे वास्तविक तथ्यों और कारणों का खुलासा किए जाने की बाध्यता समाप्त की जा सके। सरकार नौकरशाहों के दबाव और चाल में फँस कर झुक गई और उसने नौकरशाही द्वारा वांछित संशोधन करने का फैसला कर लिया। लेकिन इसकी जनता एवं बुद्धिजीवी वर्ग में तीव्र प्रतिक्रिया हुई और भारी जनमत के दबाव के सामने सरकार को प्रस्तावित संशोधन को फिलहाल टालने के लिए बाध्य होना पड़ा। लेकिन नौकरशाही चुप रहने वाली नहीं है, वह टेढ़ी चाल चलकर सूचना के अधिकार को बेमानी बनाने की हर संभव कोशिश कर रही है। एक चाल तो प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों ने 26 जुलाई को यह दिलासा देकर चलने की कोशिश की कि प्रस्तावित संशोधनों से सूचना का अधिकार कानून अधिक मजबूत होगा और सामाजिक एवं विकास परियोजनाओं से संबंधित फाइल नोटिंग्स को देखने का अधिकार जनता के पास होगा। लेकिन जनता नौकरशाहों की चाल में नहीं आई और उसके प्रतिरोध के सामने सरकार को झुकने के लिए फिलहाल बाध्य होना पड़ा है।</p>
<p class="MsoNormal"><span></span></p>
<p><span>अब सरकार जनता द्वारा व्यक्त की गई आपत्तियों का अध्ययन करवा रही है और इस बात की पूरी आशंका है कि भारत सरकार के घाघ नौकरशाह अपने शब्दजाल से ऐसे उपाय निकालने की पूरी कोशिश करेंगे ताकि सूचना के अधिकार संबंधी कानून में उनके लिए वांछित संशोधन किए जा सकें। इसलिए भारत के सजग नागरिकों को सतर्क और एकजुट रहने की आवश्यकता है। भारत की जनता को अगले आम चुनाव के दौरान सूचना के अधिकार पर राजनीतिक दलों की नीति के आधार पर मतदान का फैसला करना होगा। नौकरशाहों और राजनेताओं को यह अहसास करा देना होगा कि भारत में अब ऐसी किसी सरकार को सत्ता में आने नहीं दिया जाएगा जो सूचना के अधिकार में कटौती करने की हिमाकत करने की सोच रही हो। </span></p>
<p><span>आइए, सूचना के अधिकार को बचाने के अभियान में आप भी शामिल होइए और इसके लिए प्रधानमंत्री को भेजे जा रहे <a target="_blank" href="http://www.petitiononline.com/save_rti/petition.html">ऑनलाइन अभ्यावेदन </a>पर हस्ताक्षर कीजिए। सूचना के अधिकार संबंधी भारत सरकार के आधिकारिक वेब पोर्टल </span><a target="_blank" href="http://rti.nic.in/">http://rti.nic.in/</a> <span>अथवा <a target="_blank" href="http://rti.gov.in/">http://rti.gov.in/</a> से</span><span> आप इस अधिकार के बारे में विस्तृत विवरण प्राप्त कर सकते हैं। </span><span></span><span> </span></p>
<p><span>(यह पोस्ट मृत्युंजय जी के प्रश्न के उत्तर के तौर पर लिखी गई है, जिन्होंने सूचना के अधिकार संबंधी मेरी एक पिछली प्रविष्टि पर टिप्पणी करते हुए फाइल नोटिंग्स के मुद्दे पर जिज्ञासा व्यक्त की थी।)</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कब तक चलेगा गठबंधन की राजनीति का दौर]]></title>
<link>http://srijanshilpi.wordpress.com/2006/07/27/%e0%a4%95%e0%a4%ac-%e0%a4%a4%e0%a4%95-%e0%a4%9a%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a4%a0%e0%a4%ac%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5/</link>
<pubDate>Thu, 27 Jul 2006 13:19:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
<guid>http://srijanshilpi.hi.wordpress.com/2006/07/27/colition_government/</guid>
<description><![CDATA[भारतीय जनता लंबे अरसे से राजनीति में ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>भारतीय जनता लंबे अरसे से राजनीति में बेहतर विकल्प के अभाव के कारण विवशता की स्थिति से गुजर रही है। उसे या तो कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को चुनना पड़ता है या भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को। लेकिन गठबंधन की राजनीति से सत्ता हासिल हो सकने की संभावना अब अधिक से अधिक केवल एक बार और है। अगली बार के<font face="Times New Roman"> </font> चुनाव में हो सकता है कि भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता में आ जाए। लेकिन उसके<font face="Times New Roman"> </font>बाद <font face="Times New Roman">2013 </font>के आसपास जो चुनाव होंगे<font face="Times New Roman">, </font>उसमें किसी भी राजनीतिक दल अथवा गठबंधन के लिए<font face="Times New Roman"> </font>लोकसभा में बहुमत सिद्ध कर पाना कठिन होगा और देश में अभूतपूर्व संवैधानिक संकट की<font face="Times New Roman"> </font>स्थिति उभरने के पूरे आसार हैं।<font face="Times New Roman">दरअसल होता यह है कि राजनीतिक दल विचारधारा की सहमति के बजाय<font face="Times New Roman"> </font>सत्ता हासिल करने के लिए गठबंधन करते हैं। गठबंधन के समीकरण का खेल चुनाव के नतीजे<font face="Times New Roman"> </font>आ जाने के बाद शुरू होता है और जिस समीकरण का गणित बहुमत हासिल करने में सफल रहता<font face="Times New Roman"> </font>है वह सत्ता में आ जाता है। वाजपेयी जी के नेतृत्व वाली पहली और दूसरी सरकारें इस<font face="Times New Roman"> </font>समीकरण में नाजुक-सा फेरबदल होते ही धराशायी हो गयी थी। नरसिंह राव के जमाने से<font face="Times New Roman"> </font>लेकर अब तक भारत में सत्ता की राजनीति गठबंधन के इसी नाजुक समीकरण के खेल का नतीजा<font face="Times New Roman"> </font>है। मौजूदा सरकार भी वामपंथी दलों के बाहरी समर्थन पर टिकी हुई है और समाजवादी<font face="Times New Roman"> </font>पार्टी का उसे अपरोक्ष सहयोग भी हासिल है। डी.एम.के.<font face="Times New Roman">, </font>ए.आई.डी.एम.के.<font face="Times New Roman">, </font>पी.एम.के.<font face="Times New Roman">, </font>टी.डी.पी. जैसी क्षेत्रीय पार्टियाँ सत्ता के लिए अपना पाला कब बदल लें<font face="Times New Roman">, </font>कहा नहीं<font face="Times New Roman"> </font>जा सकता।<font face="Times New Roman">  </font>लेकिन ऐसा लंबे समय तक नहीं चल सकेगा।</p>
<p></font>कल्पना कीजिए कि <font face="Times New Roman">2013 </font>के आसपास जो आम चुनाव होंगे उसमें किसी<font face="Times New Roman"> </font>भी राजनीतिक दल या गठबंधन को<font face="Times New Roman">, </font>चाहे वह चुनाव पूर्व हो या पश्चात हो<font face="Times New Roman">, </font>किसी भी समीकरण<font face="Times New Roman"> </font>से बहुमत नहीं मिले तो क्या होगा<font face="Times New Roman">? </font>अगर दोबारा चुनाव कराए जाएँ फिर भी किसी को बहुमत<font face="Times New Roman"> </font>नहीं मिले तब<font face="Times New Roman">? </font>राज्यों में जब ऐसा होता है तब राष्ट्रपति शासन लगा दिए जाने का<font face="Times New Roman"> </font>संवैधानिक प्रावधान है। लेकिन केन्द्र में राष्ट्रपति शासन का कोई संवैधानिक<font face="Times New Roman"> </font>प्रावधान नहीं है। भारत के संविधान में ऐसी किसी स्थिति के लिए कोई प्रावधान नहीं<font face="Times New Roman"> </font>किया गया है।<font face="Times New Roman">एक विकल्प यह हो<font face="Times New Roman"> </font>सकता है कि चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के नेता अथवा किसी सर्वमान्य नेता के<font face="Times New Roman"> </font>नेतृत्व में राष्ट्रीय सरकार बनाया जा सकता है जिसमें सभी दलों के सांसदों को<font face="Times New Roman"> </font>आनुपातिक आधार पर स्थान दिया जाए। लेकिन ऐसे किसी विकल्प के लिए संविधान में<font face="Times New Roman"> </font>अभूतपूर्व परिवर्तन करना पड़ेगा<font face="Times New Roman">, </font>जिसके लिए किसी राजनीतिक दल की मानसिक तैयारी नहीं<font face="Times New Roman"> </font>है। नास्त्रेदमस ने भी भारत में इस तरह के संवैधानिक संकट आने की भविष्यवाणी की थी<font face="Times New Roman"> </font>और मौजूदा परिस्थितयों को देखते हुए इसके सच होने के काफी आसार दिख रहे हैं।</p>
<p></font> भारत में सैनिक शासन की संभावना तो ख़ैर कतई नहीं है<font face="Times New Roman">, </font>लेकिन संसदीय प्रणाली की जगह राष्ट्रपति प्रणाली को अपनाने की दिशा में कुछ अवश्य किया जा<font face="Times New Roman"> </font>सकता है। वर्तमान स्थिति यह है कि संसदीय प्रणाली पर आधारित प्रजातांत्रिक व्यवस्था<font face="Times New Roman"> </font>को उच्चतम न्यायालय ने संविधान की मूलभूत विशेषताओं में शामिल किया हुआ है<font face="Times New Roman">, </font>जिसे<font face="Times New Roman"> </font>बदलने का अधिकार संसद को भी नहीं दिया गया है। यदि संसद इस प्रकार का कोई संशोधन<font face="Times New Roman"> </font>करना भी चाहे तो उसे उच्चतम न्यायालय ख़ारिज कर देगा। लेकिन पहली बात तो यह है कि<font face="Times New Roman"> </font>हमारे राजनेता राष्ट्रपति प्रणाली को अपनाने के विकल्प के बारे में तब तक कुछ नहीं<font face="Times New Roman"> </font>सोचेंगे जब तक संवैधानिक संकट सामने नहीं खड़ा हो जाएगा।<font face="Times New Roman">आम जनता के लिए सोचने की बात यह है कि<font face="Times New Roman"> </font>उसके पास ऐसा कौन-सा नेतृत्व है जो उसे ऐसे संवैधानिक संकट से उबारने में सफल हो<font face="Times New Roman"> </font>सकेगा। वह कौन सा नेतृत्व होगा<font face="Times New Roman">, </font>जो भारत को विकसित राष्ट्रों की पंक्ति में ले<font face="Times New Roman"> </font>जाएगा।<font size="3" face="Times New Roman"> </font></p>
<p></font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नहीं लगने देंगे सूचना के अधिकार में सेंध]]></title>
<link>http://srijanshilpi.wordpress.com/2006/07/25/%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4/</link>
<pubDate>Tue, 25 Jul 2006 06:01:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
<guid>http://srijanshilpi.hi.wordpress.com/2006/07/25/right_to_information/</guid>
<description><![CDATA[फाइल पर नौकरशाहों द्वारा लिखे जाने वा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>फाइल पर नौकरशाहों द्वारा लिखे जाने वाले टिप्पण (नोटिंग्स) दरअसल उनकी असली ताकत हैं। हरे रंग की नोटशीट पर लिखे जाने वाले ये टिप्पण उनके विशेषाधिकार, विवेकाधिकार और निरंकुश सत्ता के मूल स्रोत हैं। अंग्रेजों द्वारा उन्नीसवीं शताब्दी में बनाया गया शासकीय गोपनीयता अधिनियम आज भी सरकारी अधिकारियों के मनमानेपन की वैधता का दस्तावेज बना हुआ है। हरे रंग की नोटशीट पर सरकारी अधिकारियों द्वारा लिखे जाने वाले टिप्पण गोपनीय श्रेणी में आते थे। लेकिन सूचना का अधिकार अधिनियम के द्वारा आम जनता को फाइल नोटिंग्स को देख सकने का अधिकार मिल जाने के बाद नौकरशाहों की नींद हराम हो गई थी। इसलिए शीर्ष पदों पर बैठे तमाम नौकरशाहों ने एक सुर में सरकार पर दबाव बनाया कि फाइल नोटिंग्स को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखा जाए। सरकार ने इस दबाव के सामने घुटने टेक दिए। ये राजनेता और नौकरशाह कभी नहीं चाहते कि आम जनता के हाथ में ताकत आए। सूचना के अधिकार के दायरे से फाइल नोटिंग्स को बाहर रखने संबंधी मंत्रिमंडल के निर्णय को यदि संसद का अनुमोदन हासिल हो गया तो फिर सूचना का अधिकार कानून बेमानी होकर रह जाएगा। ये नौकरशाह गोलमोल बातें बनाकर सच को छिपाने की कला में माहिर हैं। वे नहीं चाहते कि फाइल पर उनके द्वारा लिए गए किसी निर्णय के पीछे वास्तविक कारणों को पारदर्शी बनाया जाए और किसी पक्षपात या चूक के लिए अधिकारियों की जवाबदेही को सुनिश्चित किया जाए। जो लोग सूचना के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत समझते हैं उन्हें सरकार और नौकरशाहों के मंसूबों को विफल करने के लिए तुरंत रणनीतिक उपाय करने चाहिए। सूचना का अधिकार हमारे लोकतंत्र की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है और यह अधिकार हमें लंबे संघर्ष के बाद हासिल हुआ है। आम जनता और प्रेस एवं मीडिया को हर संभव कोशिश करनी चाहिए और भरपूर दबाव बनाना चाहिए ताकि संसद में सूचना का अधिकार अधिनियम में संशोधन पारित नहीं हो सके।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आरक्षण : विरोध के बावजूद]]></title>
<link>http://srijanshilpi.wordpress.com/2006/05/30/%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%a3-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%a7-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%9c%e0%a5%82%e0%a4%a6/</link>
<pubDate>Tue, 30 May 2006 14:35:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
<guid>http://srijanshilpi.hi.wordpress.com/2006/05/30/reservation_despite_demonstration/</guid>
<description><![CDATA[तमाम विरोध प्रदर्शनों और मीडिया द्वा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left">तमाम विरोध प्रदर्शनों और मीडिया द्वारा उसे लगभग एकतरफा एवं पक्षपातपूर्ण ढंग से तूल दिए जाने के बावजूद केन्द्र सरकार ने अगले शैक्षिक सत्र से पिछड़ी जातियों के लिए 27% आरक्षण के प्रावधान को लागू करने का निर्णय कर ही लिया। संवैधानिक प्रतिबद्धताओं को पूरा करने और न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सत्ताधारी गठबंधन के बीच आम सहमति को अमल में लाने के लिए सरकार के पास इसके सिवाय कोई अन्य विकल्प नहीं था। बेहतर होता कि आरक्षण के प्रावधान को वास्तविक रूप से लागू किए जाने से पहले अर्जुन सिंह इसके संबंध में कोई बयान देने से बचते। यह स्वाभाविक है कि आरक्षण के प्रावधान के लागू होने से जिन लोगों के हितों को नुकसान पहुँचेगा वे इसका विरोध करेंगे। लोकतंत्र में उन्हें भी अपनी बात शांतिपूर्वक व्यक्त करने का अधिकार है। लेकिन आरक्षण के विरोध और फिर उसकी प्रतिक्रिया में आरक्षण के समर्थन ने कहीं-कहीं उग्र स्वरूप भी अख्तियार कर लिया और दोनों पक्ष के छात्र-छात्राओं को पुलिस के डंडों का कोपभाजन भी बनना पड़ा। इस मुद्दे पर हमारी युवा पीढ़ी के मानस में हिंसा और तनाव का माहौल पैदा होना निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन उससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण है आरक्षण का विरोध करने वालों द्वारा सामाजिक वास्तविकता को समझने की कोशिश नहीं करना और संविधान की मर्यादा का सम्मान नहीं करना। सरकार के निर्णय के विरोध में आरक्षण-विरोधियों द्वारा राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री महोदय की अपीलों को अनसुना करते हुए अपने आंदोलन को पहले से भी अधिक उग्रता से जारी रखने के फैसले को देखते हुए भारतीय जनमानस में उत्तेजना और अशांति फैलने की आशंका बढ़ गई है। मेरी नजर में इसके लिए सबसे अधिक दोषी है प्रेस और मीडिया, जिसने अपना फ़र्ज़ ईमानदारी और निष्पक्षता से अंजाम नहीं दिया। उसे इस मुद्दे पर दोनों विपरीत पक्षों के बीच सार्थक बौद्धिक बहस का माहौल बनाने की कोशिश करनी चाहिए थी ताकि दोनों पक्ष एक-दूसरे के विचारों, तर्कों और भावनाओं को समझ सकें और उनके बीच परस्पर सहमति एवं सदभाव का माहौल विकसित हो सके। लेकिन समाचार पत्रों और मीडिया संस्थानों में काम करने वाले अधिकांश पत्रकारों ने इस मामले में अपने जातीय दुराग्रह से प्रेरित होकर आहत स्वार्थ की प्रतिक्रिया में इस मामले पर केवल आरक्षण विरोध को सही ठहराने और एक तरह से उसे प्रायोजित भी करने की हर संभव कोशिश की। कहते हैं कि "मँझधार में जब नैया डोले तो माँझी उसे बचाए लेकिन जब माँझी ही नैया डुबोए तो उसे कौन बचाए ?" योग्यता की हत्या का बेवजह हौवा खड़ा किया गया, ओ.बी.सी. की आबादी के मनगढ़ंत आँकड़े ढूँढ़ निकाले गए और आरक्षण के प्रावधान के संवैधानिक महत्व को स्खलित करने के लिए तमाम थोथे तर्क दिए जाते रहे और आरक्षण को टालने के लिए तमाम फिजूल उपाय सुझाये जाते रहे। मीडिया के कैमरे का फोकस 'योग्यता' के मुखर स्वरों पर केन्द्रित रहा जो तरह-तरह के प्रदर्शनों के आयोजन से उनके लिए मसालेदार ख़बरों का तैयार माल उपलब्ध कराता रहा। प्रेस और मीडिया में सवर्ण लोगों का वर्चस्व भारतीय जनमानस और जनमत के लिए कितना असंतुलनकारी हो सकता है यह आरक्षण के मुद्दे पर जाहिर हो गया। यह स्थिति इस क़दर विस्फोटक हुई कि पटना में आरक्षण के समर्थक डॉक्टरों और छात्रों ने मीडिया को कसूरवार मानते हुए उसे अपने आक्रोश का शिकार बना डाला।प्रेस और मीडिया के इस अविवेक पर अंकुश लगाने के लिए कुछ विवेकशील पत्रकारों ने <a target="_blank" href="http://www.hindu.com/2006/04/12/stories/2006041204861000.htm">हस्तक्षेप </a>करने की कोशिश की। <a target="_blank" href="http://srijanshilpi.blogspot.com/2006/05/blog-post.html">कई पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने मुद्दे के दूसरे पहलू से भी जनमानस को अवगत कराने की चेष्टा की। </a>देर से ही सही, मीडिया में विवेक का कहीं-कहीं संचार हुआ भी। कंज्यूमर चैनल आवाज़ पर संजय पुगलिया ने योजना आयोग के सदस्य, <a target="_blank" href="http://planningcommission.nic.in/aboutus/history/mgkrbody.htm">डॉ. भालचन्द मुंगेकर</a> से आरक्षण के मुद्दे पर लंबी बातचीत करके दूसरे पक्ष को अपनी बात रखने का अवसर दिया। हालाँकि इसी चैनल पर शिशिर सिन्हा एक परिचर्चा को प्रायोजित करके आरक्षण के विरोध को एकतरफा ढंग से सही ठहराने की 'बेशर्मी' दिखा चुके थे। समकालीन जनमत पर अल्का सक्सेना ने भी एक परिचर्चा में कुछ इसी तरह की 'बेवकूफी' की थी। हालाँकि इस चैनल ने एक अन्य कार्यक्रम में <a target="_blank" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Udit_Raj"><i>उदित राज</i> </a>को भी आमंत्रित किया था, लेकिन उन्हें आरक्षण समर्थकों के झुंड के बीच में अकेले खड़ा करके कार्यक्रम के संचालन का जिम्मा एक ऐसे अनाड़ी पत्रकार को सौंप दिया गया था जो बात-बात पर उछल-उछल कर आरक्षण का विरोध करने लगता था। 25 मई को <b>ज़ी न्यूज</b> ने <a target="_blank" href="http://www.lokniti.org/people_lokniti_yogendrayadav.htm"><i>योगेन्द्र यादव </i></a>से बात करते हुए मीडिया की इस भूल को स्वीकार किया कि उसने 'शायद' आरक्षण के मसले पर दूसरे पक्ष की आवाज को उचित महत्व नहीं देकर गलती की थी। <b>सीएनएन-आईबीएन</b> पर <i>करन थापर</i> अपने कार्यक्रम <i>'डेविल्स एडवोकेट'</i> में <a target="_blank" href="http://www.ibnlive.com/news/decision-on-quota-is-final-the-chapter-is-closed/11063-4.html"><i>अर्जुन सिंह </i></a>और <a target="_blank" href="http://www.ibnlive.com/news/devils-advocate-kamal-nath/10443-4.html"><i>कमल नाथ</i></a> को एन.एस.एस.ओ. के भ्रामक आँकड़ों के जाल में लपेटकर आरक्षण-विरोध को तार्किक आधार देने की विफल कोशिश कर चुके थे। <b>एनडीटीवी</b> पर <i>विनोद दुआ</i> ने भी आरक्षण-विरोधियों द्वारा सुझाए गए कुछ थोथले उपायों को अपने प्रश्न के उत्तरों का विकल्प बनाकर एसएमएस के द्वारा भारतीय जनमत को जानने और शायद आरक्षण के समर्थकों को <i>'ख़बरदार'</i> करने की कोशिश की, लेकिन <i>नीलोत्पल बसु</i> ने उन्हें कामयाब होने नहीं दिया। अपने चेहरे पर बुरी नीयत और बेशर्मी की परतों को छुपाने के लिए ये स्वनामधन्य पत्रकार श्रोताओं की आवाज के मुखौटे का इस्तेमाल करते हैं। इसी का विरोध करने के लिए 27 मई को दिल्ली में <b><a href="http://in.news.yahoo.com/060528/139/64ltk.html">Journalists for Democracy</a></b> के बैनर तले बड़ी संख्या में जागरूक पत्रकारों ने प्रेस और मीडिया द्वारा आरक्षण के मुद्दे पर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाये जाने के मुद्दे पर एक सेमिनार का आयोजन किया। सेमिनार में पत्रकारों, बुद्धिजीवियों एवं विशेषज्ञों ने प्रेस एवं मीडिया में सवर्णों का वर्चस्व होने और इस वर्चस्व के बल पर आरक्षण के मुद्दे पर एकतरफा, पक्षपातपूर्ण और पूर्वग्रह-प्रेरित रवैया अपनाते हुए आरक्षण-विरोध के आंदोलन को बढ़ावा देने और उसे प्रायोजित करने का आरोप लगाया। इसके साथ ही, यह मांग भी उठाई गई कि मीडिया में भी दलितों एवं पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण होना चाहिए ताकि मीडिया द्वारा लोकतंत्र और संविधान-विरोधी कदम उठाए जाने की किसी कोशिश को नाकाम किया जा सके। <b>एनडीटीवी इंडिया</b> पर 27 मई को 'मुकाबला' कार्यक्रम में भी बहस का मुद्दा यही था कि क्या मीडिया आरक्षण के मुद्दे पर सवर्णों के साथ है, क्या वह आरक्षण-विरोधी आंदोलन का साथ दे रहा है। कार्यक्रम के पैनल में शामिल 6 विशेषज्ञों में से <i>प्रभाष जोशी, अरुण रंजन, निखिल वागले, अपूर्वानन्द</i> जैसे पाँच विशेषज्ञों ने तर्क और सबूत देते हुए यह सिद्ध कर दिया कि मीडिया इस मामले पर सवर्णी पक्षपात की भावना से प्रेरित रहा है और वह पिछड़े वर्गों एवं दलितों के विरोध में सोच-समझकर मुहिम चला रहा है। 'मुकाबला' का संचालन कर रहे दिवांग ने भी यह स्वीकार किया कि आरक्षण के मुद्दे पर अपनी भूमिका के मामले में प्रेस और मीडिया को अपने गिरेबान में झाँकने और निष्पक्ष रवैया अपनाने की जरूरत है। 28 मई को <b>आवाज</b> चैनल पर <i>संजय पुगलिया</i> ने आरक्षण-विरोधियों के तर्कों को प्रत्युत्तर देने के लिए उदित राज को आमंत्रित किया और उन्होंने सारे प्रश्नों का बखूबी उत्तर भी दिया। उसके बाद 29 मई को सीएनएन-आईबीएन के कार्यक्रम <b>'Face The Nation'</b> में भी <b>आउटलुक</b> पत्रिका के संपादक <i>विनोद मेहता</i> ने प्रमाणों एवं तर्कों के बल पर जोरदार तरीके से सिद्ध किया कि आरक्षण के मुद्दे पर प्रेस और मीडिया का रवैया नितांत आपत्तिजनक, पक्षपातपूर्ण और पत्रकारिता के आदर्शों एवं सिद्धांतों के विपरीत रहा है। हालाँकि इस कार्यक्रम के पैनल में आमंत्रित विशेषज्ञों का अनुपात भी संतुलित नहीं था। लेकिन अकेले विनोद मेहता सचाई का बयान करने के मामले में आरक्षण-विरोध के पक्ष में स्टूडियो में बुलाए गए तीनों आरक्षण-विरोधियों पर भारी पड़े और कार्यक्रम की संचालिका <i>सागरिका घोष</i> ने भी यह स्वीकार किया कि मीडिया का रवैया आरक्षण के मुद्दे पर अब तक पक्षपातपूर्ण रहा है। इस कार्यक्रम में इस विषय पर विशेष रपट भी दिखाई गई कि आरक्षण-विरोधी आंदोलन को संगठित और योजनाबद्ध ढंग से चलाए जाने के लिए कहाँ-कहाँ से वित्तीय मदद और प्रायोजन हासिल हो रहा है। इस रिपोर्ट ने <i>उदित राज</i> के उस आरोप को सप्रमाण साबित कर दिया कि निजी क्षेत्र की बड़ी-बड़ी कंपनियाँ और यहाँ तक कि बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ आरक्षण-विरोधी आंदोलन को प्रायोजित कर रही हैं।</p>
<p>वैकल्पिक मीडिया जगत यानी अंतर्जाल (इंटरनेट) और चिट्ठों (ब्लॉग) पर भी लगभग ऐसा ही आलम रहा। टाइम्स ऑफ इंडिया की हिमांशी धवन ने इस मुद्दे पर सबसे पहले <a target="_blank" href="http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/1485666.cms">चिट्ठाकारों की सक्रियता की नब्ज</a> टटोली। चर्चित अंग्रेजी ब्लॉगर रश्मि बंसल ने ओ.बी.सी. होते हुए भी <a target="_blank" href="http://youthcurry.blogspot.com/2006/04/caste-vs-community.html">आरक्षण के विरोध के तर्कों को सही ठहराने के लिए गंभीर कोशिश</a> की। हिन्दी चिट्ठाकारों में भी हर जगह आरक्षण के विरोध का एक सुर में आलाप चल रहा था। अनेक चिट्ठाकारों ने तो बकायदा अपने चिट्ठे पर लोगो बनाकर यह घोषणा चिपका रखी थी कि "मैं शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण का विरोध करता हूँ"। ऐसे में मैंने इस मुद्दे पर दूसरे पक्ष के तर्कों को विनम्रता से रखते हुए <a target="_blank" href="http://srijanshilpi.blogspot.com/2006/04/blog-post_09.html">एक सार्थक बहस शुरू करने की पहल </a>करना जरूरी समझा। मेरी आशंका के मुताबिक आरक्षण संबंधी मेरे पहले आलेख पर तीव्र प्रतिक्रियाएँ आईं। एक-दो मित्रों ने आरक्षण के समर्थन में टिप्पणी करने की दिलेरी दिखाई तो उन्हें <a target="_blank" href="http://rchindi.blogspot.com/2006/04/blog-post_14.html">सामने आने की चुनौती </a>तक दी गई। कुछ दिनों बाद <a target="_blank" href="http://www.blogger.com/profile/20282503">युगल मेहरा</a> ने आरक्षण के समर्थन में कुछ बातें रखने की चेष्टा की। <a target="_blank" href="http://www.hindini.com/fursatiya/?p=131">अनूप शुक्ला</a> ने भी अपने अनुभवों के आधार पर आरक्षण की आवश्यकता और उसके महत्व को रेखांकित करने की प्रभावी कोशिश की, जिसका रवि रतलामी ने अपने <a target="_blank" href="http://www.hindini.com/ravi/?p=181">खास अंदाज में खंडन </a>करने की चेष्टा की। मैंने <a target="_blank" href="http://srijanshilpi.blogspot.com/2006/04/blog-post_22.html">आरक्षण बनाम योग्यता</a> की बहस के तर्काधार की तह में जाने की भी चेष्टा की और आरक्षण विरोध की असलियत को उजागर करने के लिए <a target="_blank" href="http://srijanshilpi.blogspot.com/2006/04/blog-post_14.html">एक आलेख </a>लिखा जिसकी अन्यत्र भी काफी चर्चा हुई। हिन्दी चिट्ठाकारों के बीच परस्पर संवाद के लिए बनाए गए नए मंच <a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/paricharcha/">'परिचर्चा' </a>पर आरक्षण के मुद्दे पर जोरदार बहस शुरू हुई। बहस का आरंभ करते हुए <a target="_blank" href="http://www.jitu.info/merapanna/">जीतेन्द्र चौधरी </a>ने मुझे इस <a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/paricharcha/viewtopic.php?id=65">बहस में शामिल होने की 'चुनौती' </a>दी। मुझे इस चुनौती की सूचना कुछ देर से मिली, तब तक कुछ अन्य मित्र भी आरक्षण के समर्थन में मोर्चा संभाल चुके थे, जिनमें <a target="_blank" href="http://www.blogger.com/profile/7768422">नीरज दीवान </a>विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इस बहस ने कुछ हद तक घमासान रूप ले लिया और दोनों तरफ से जोरदार तर्क और तथ्य प्रस्तुत किए गए। परिचर्चा में जब मैंने आरक्षण-विरोधियों द्वारा दी गई दलीलों का ठोस और तर्कपूर्ण प्रत्युत्तर देना शुरू किया तो उसके बाद वहाँ खामोशी-सी छा गई और फिर उनके पास कोई दलील नहीं बची। यह बहस अब भी जारी है, लेकिन सरकार द्वारा आरक्षण को लागू करने के निर्णय की घोषणा कर दिए जाने और आमिर खान की फिल्म फ़ना के विरोध के मुद्दे के जोर पकड़ लेने के कारण फिलहाल यह बहस कुछ समय के लिए थम-सी गई है। लेकिन शायद यह कहीं बड़े तूफान से पहले की शांति न साबित हो।</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
