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	<title>सच्ची &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/सच्ची/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "सच्ची"</description>
	<pubDate>Sun, 12 Oct 2008 17:13:41 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[सच्ची दोस्ती]]></title>
<link>http://ulatvasi.wordpress.com/2008/03/25/sacchi-dosti/</link>
<pubDate>Tue, 25 Mar 2008 12:12:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://ulatvasi.hi.wordpress.com/2008/03/25/sacchi-dosti/</guid>
<description><![CDATA[दोस्ती की कोई  निश्चित परिभाषा नहीं है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दोस्ती की कोई  निश्चित परिभाषा नहीं है। आज तक मनोवैज्ञानिक भी इस बारे में किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंच सके हैं। एक विचार यह है कि दोस्ती आत्मा के स्तर पर होती है। बच्चों में बड़ी जल्दी दोस्ती हो जाती है क्योंकि वे निश्छल होते हैं, लेकिन बड़ों में समझदारी आ जाती है, इसलिए उनकी दोस्ती भी नकली होती है। आमतौर पर यह समझा जाता है कि एक जैसी रुचि रखने वाले या एक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों में स्वाभाविक रूप से दोस्ती हो जाती है। पर इसे मित्रता कहना ठीक नहीं होगा। यह साहचर्य से उपजा संबंध है जिसमें वह निश्छलता या एक-दूसरे के लिए मर मिटने का भाव नहीं होता। बल्कि कई बार उलटा होता है। एक क्षेत्र के लोग साथ रहते हुए भी प्रतिद्वंद्विता की भावना से ग्रस्त रहते हैं। साथ रहते हुए भी वे एक-दूसरे को पीछे छोड़कर आगे निकल जाने की चाह रखते हैं। ऐसे में वह गर्मजोशी कैसे आ सकती है, जो सच्ची दोस्ती में जरूरी मानी जाती है। इसलिए अलग-अलग क्षेत्र के लोगों की दोस्ती में अधिक ऊष्मा होती है। इसलिए ज्यादा संभावना इस बात की है कि एक राजनेता का सबसे अच्छा दोस्त कोई लेखक हो या कोई डॉक्टर किसी इंजीनियर को सबसे करीबी मानता हो ।<br />
<h5><a href="http://navbharattimes.com" target="_blank"><b>संजय कुंदन</b></a></h5>
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<title><![CDATA[सच्ची इबादत]]></title>
<link>http://pasand.wordpress.com/2006/04/07/%e0%a4%b8%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a5%80-%e0%a4%87%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%a4/</link>
<pubDate>Fri, 07 Apr 2006 11:15:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>प्रेमलता पांडे</dc:creator>
<guid>http://pasand.hi.wordpress.com/2006/04/07/real-worship/</guid>
<description><![CDATA[सिर्फ मंदिर में जाकर ही पूजा नहीं होती]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सिर्फ मंदिर में जाकर ही पूजा नहीं होती,<br />
सच तो यह है कि पूजा कि कोई जगह नहीं होती।<br />
इबादत नहीं है सिर्फ मस्ज़िद में जाकर सर झुकाना,<br />
एक और इबादत है परोपकार के काम में मन लगाना।<br />
गुरुद्वारे में मत्था टेकने से सब कुछ होगा,<br />
अगर गुरुओं की सीख को मन में भरा होगा।<br />
गिरिजाघर में सच्ची प्रार्थना कैसे होगी?<br />
अगर हमारी आत्मा जाग्रत नहीं होगी।<br />
ना समझ बनकर समय ना गवांओ,<br />
सबसे पहले अपने मन को समझाओ।<br />
पृथ्वी पर ही स्वर्ग और नरक है,<br />
इस पर ही समस्त दुर्गंध और महक़ है।<br />
जिसे मानते हो भगवान या ख़ुदा,<br />
वो ही तुम्हारी आत्मा में है नहीं तुमसे ज़ुदा।<br />
सच्ची इबादत है पृथ्वी पर प्रेम बरसाना,<br />
हिंसा और नफ़रत को जड़ से मिटाना।<br />
करनी है सेवा तो करो नदियों की,<br />
बनाए रखो पवित्रता उनकी सदियों की।<br />
रक्षा हो उन वृक्ष देवताओं की,<br />
जो रक्षा करते हैं हमारी सांसारिक वेदनाओं की।<br />
झुकाओ सिर आराध्य सूर्य के भी आगे,<br />
ब्रह्मांड का पिता है जो सृष्टि का आधार लागे।<br />
पवित्र रखो पवन को भाव-भक्ति से,<br />
कभी जीवन नहीं होगा बिन उसकी शक्ति के।<br />
करनी है पूजा अगर भगवान की,<br />
तो बढ़ाओ सामंजस्य और इज़्ज़त इंसान की।<br />
सब प्राणियों में ही ख़ुदा का वास है,<br />
जो करता है प्यार जीवों से वही उसके पास है।</p>
]]></content:encoded>
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