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	<title>सत्य &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/सत्य/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "सत्य"</description>
	<pubDate>Fri, 05 Sep 2008 06:39:56 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[सच को छिपाना कठिन-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=67</link>
<pubDate>Wed, 13 Aug 2008 16:14:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=67</guid>
<description><![CDATA[सत्य से जितनी दूर जाओगे
भ्रम को उतना ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सत्य से जितनी दूर जाओगे<br />
भ्रम को उतना ही करीब पाओगे<br />
खवाब भले ही हकीकत होने लगें<br />
सपने चाहे सामने चमकने लगें<br />
उम्मीदें भी आसमान में उड़ने लगें<br />
पर तुम अपने पाँव हमेशा<br />
जमीन पर ही रख पाओगे</p>
<p>झूठ को  सच साबित करने के लिए<br />
हजार बहानों की बैसाखियों की<br />
जरूरत होती है<br />
सच का कोई श्रृंगार नहीं होता<br />
कटु होते हुए भी<br />
उसकी संगत में सुखद अनुभूति होती हैं<br />
कब तक उससे आंखें छिपाओगे<br />
-------------------------<br />
<strong>लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह कवितापाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
इस लेख के अन्य बेवपत्रक/पत्रिकाएं नीचे लिखी हुईं  हैं<br />
<a href="http://anantrajl.blogspot.com">1. अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://deepakraj.blogspot.com">4.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विश्वास की कभी जंग नहीं होती-हिंदी शायरी ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=452</link>
<pubDate>Sun, 03 Aug 2008 16:08:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=452</guid>
<description><![CDATA[चेले ने पूछा गुरू से
‘भारी मानसिक युद्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>चेले ने पूछा गुरू से<br />
‘भारी मानसिक युद्ध में फंसा हूं<br />
कोई उपाय बताईये<br />
जंग है विश्वास की<br />
उससे मुझे पार लगाईये<br />
एक का निभाता हूं<br />
दूसरे का किसी हालत में तोड़ना होगा विश्वास<br />
इधर जाऊं समझ में नही आता<br />
रास्ता कोई आप ही बताईये<br />
आपके उपदेश पर ही है विश्वास’</p>
<p>गुरू ने कहा<br />
‘किस माया के चक्कर में पड़े हो<br />
उसके हैं तीन रूप धन, शक्ति और प्रतिष्ठा<br />
पहले उसका स्वरूप  बताओ<br />
विश्वास की कभी जंग नहीं होती<br />
हमारी बुद्धि की गली ही तंग होती<br />
तभी हालत ऐसी आती है<br />
सत्य की कोई परीक्षा नहीं है<br />
जिस पर विश्वास है वह निभाएगा भी<br />
पर माया में ही ऐसा होता है<br />
इसलिये जहां माया मोल तोल में भारी हो<br />
वहीं पहुंच जाओ<br />
चाहे जितना माया का ढेर उठा लाओ<br />
नैतिकता का मानदंड कोई<br />
किसी किताब में नहीं लिखा<br />
आज के लोगों में  हमें भी कहीं वह नहीं दिखा<br />
हम तो ठहरे निष्काम<br />
हमें समझ में नहीं आता माया का काम<br />
जिधर ले जाए  वहीं होता विश्वास<br />
जिसे नहीं मिलती वही होता निराश<br />
जमाने को लगी है हवा ऐसी<br />
धन और प्रतिष्ठा में<br />
आदमी की बुद्धि का हो गया निवास<br />
सत्य की राह पर चलते हो तो<br />
अधिक सोचना नहीं<br />
पर माया के रास्ते जाओ तो<br />
कर लेना पहले कम और अधिक का आभास<br />
रास्ते दो ही है इस दुनियां में<br />
एक है सत्य का<br />
दूसरा माया का<br />
इस नियम  पर करना विश्वास<br />
........................................................................</strong><br />
<blockquote><strong>यह मूल पाठ इस ब्लाग <a href="http://rajlekh.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका’</a> पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का शब्दज्ञान-पत्रिका</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इशोपनिषद्]]></title>
<link>http://gyana.wordpress.com/?p=44</link>
<pubDate>Fri, 06 Jun 2008 07:33:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>gyana</dc:creator>
<guid>http://gyana.wordpress.com/?p=44</guid>
<description><![CDATA[ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदंपूर्णात्पूर्णम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:center;">ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदंपूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।</p>
<p style="text-align:center;">पूर्णास्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।</p>
<p style="text-align:center;"><span style='text-align:center; display: block;'><object width='425' height='350'><param name='movie' value='http://www.youtube.com/v/wtOXRchcHek'></param><param name='wmode' value='transparent'></param><embed src='http://www.youtube.com/v/wtOXRchcHek&rel=0' type='application/x-shockwave-flash' wmode='transparent' width='425' height='350'></embed></object></span></p>
<h3 style="text-align:center;">मंत्र एक</h3>
<p style="text-align:center;">इशावास्यदिदम्सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।</p>
<p style="text-align:center;">तेन त्यक्तेन भुञ्जीथामा गृधः कस्य स्विद्धनम् ।।</p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#0000ff;">इश्वर द्वारा नियन्त्रित छ यो संपूर्ण जगत ।<br />
</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#0000ff;">अंश लगाईएको स्विकार्नु, नगर्नु लोभ अरूको धन ।।</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तत् त्वम् असि]]></title>
<link>http://gyana.wordpress.com/?p=33</link>
<pubDate>Fri, 23 May 2008 02:20:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>gyana</dc:creator>
<guid>http://gyana.wordpress.com/?p=33</guid>
<description><![CDATA[तत् त्वम् असि
तिमी त्यही हौ ।
तिमी जे ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:center;font-size:14pt;">तत् त्वम् असि</p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#000080;">तिमी त्यही हौ ।</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#000080;">तिमी जे हौ त्यही नै हौ ।</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#000080;">तिमी बाहेक अरू कुनै सत्य छैन ।</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#000080;">तिमी नै सत्य हौ ।</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#000080;">तिमी नै जीवन हौ ।</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#000080;">तिमी नै ईश्वर हौ ।</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#000080;">तिमी नै सुरूवात हौ ।</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#000080;">तिमी नै अन्त्य हौ ।</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#000080;">.<br />
.<br />
.<br />
</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#000080;">यही नै अन्तिम सत्य हो ।</span></p>
<p style="text-align:right;"><em>छन्दोग्य उपनिषत् (6:8.7)</em></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजं]]></title>
<link>http://gyana.wordpress.com/?p=27</link>
<pubDate>Fri, 04 Apr 2008 12:12:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>gyana</dc:creator>
<guid>http://gyana.wordpress.com/?p=27</guid>
<description><![CDATA[श्रीः
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्ण]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>श्रीः</p>
<p>शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजं ।<br />
प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ।।</p>
<p>अगज्ञानन पद्मार्कं गजाननमहर्निशं ।<br />
अनेकदं तं भक्तानामेकदन्तमुपस्महे ।।</p>
<p>गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।<br />
गुरुस्साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ।।</p>
<p>गुरवे सर्व लोकानं भिषज्ञे भवरोगिणां ।<br />
निधये सर्वविद्यानं दक्षिणामूर्तये नमः ।।</p>
<p>अज्ञानन्तर्गहन पतितानात्मविद्योपदेशैः ।<br />
त्रातुं लोकान् भवदवशिखातापपापच्यमानान् ।।</p>
<p>मुक्त्वा मौनं वटविटपिनो मूलतो निःसरन्ती<br />
शंभोर्मूर्तिश्चरति भुवने शंकराचार्यरूपा ।।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सच से दोस्ती]]></title>
<link>http://ulatvasi.wordpress.com/?p=10</link>
<pubDate>Wed, 26 Mar 2008 12:51:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://ulatvasi.wordpress.com/?p=10</guid>
<description><![CDATA[हमारे आसपास हर कोई सच की तलाश में जुटा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हमारे आसपास हर कोई सच की तलाश में जुटा लगता है। महान संत, ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि वे सत्य की खोज में हैं। एक आम इंसान भी अपने भूत-भविष्य का सच जानने को बेताब दिखता है। सवाल है कि क्या हम वास्तव में सच जानना चाहते हैं? खरा सच कौन सुनना चाहता है? जब सच कड़वा हो, तो वह असहनीय हो जाता है।</p>
<p>यह भी एक सच है कि हम सच के नाम पर सिर्फ उतना सच जानना चाहते हैं, जिसमें हमारे अशुभ की कोई बात न हो। बल्कि, यह कहें कि सच के नाम पर हम में से ज्यादातर अहं को तुष्ट करने वाला झूठ सुनना पसंद करते हैं। हम मन ही मन झूठ या छल में कोई आसरा ढूंढते हैं। चूंकि, कई बार सत्य हमारी अपेक्षाओं से ठीक उलट होता है, इसलिए हम उससे बचने की हर मुमकिन कोशिश करते हैं। कोई असुंदर व्यक्ति आईना देखे, तो इसकी कम ही संभावना है कि वह आईने में दोष न निकाले। चित्रकार यदि किसी कुरूप शहंशाह का वास्तविक चित्र बना दे, तो क्या मजाल, जो चित्रकार की जान बख्श दी जाए। हम सच सुनें, खरे सच को सहन करें, तो शायद हमारा जीवन ही उलट जाए।<br />
<h5><a href="http://navbharattimes.com/" target="_blank"><b>संजय वर्मा </b></a></h5>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ॐ शक्ति है]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=819</link>
<pubDate>Thu, 21 Feb 2008 15:34:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=819</guid>
<description><![CDATA[ॐ शक्ति है ॐ ही ईश्वर प्रतीक है
ॐ नश्वर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">ॐ शक्ति है ॐ ही ईश्वर प्रतीक है<br />
ॐ नश्वर है ॐ ही सर्वत्र एक है<br />
ॐ भक्ति है ॐ ही शान्ति मंत्र है<br />
ॐ जगत है ॐ ही जीवन तंत्र है</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ में तुम हो ॐ हर कण तुम में<br />
ॐ मृदा धातु जल वायु गगन में</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ सत्य है ॐ ही चिंतन मनन है<br />
ॐ आत्मा है ॐ ही प्रभु शरण है<br />
ॐ विष्णु है ॐ ही त्रिकाल महादेव है<br />
ॐ दृष्टि है ॐ ही सुर और रव है</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ विद्यमान है प्राण है हर जीव में<br />
ॐ ही सजीव में ॐ ही निर्जीव में</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ संगीत है ॐ ही श्रेष्ठ मित्र है<br />
ॐ असत्य पर विजय का शस्त्र है<br />
ॐ ब्रह्माण्ड है ॐ उत्पत्ति सूत्र है<br />
ॐ मोक्ष है ॐ ही मुक्ति स्रोत है</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ चहुँ ओर ज्ञान का प्रकाश है<br />
ॐ कष्टकाल अंधकार का विनाश है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शान्ति मन्त्र]]></title>
<link>http://gyana.wordpress.com/2008/01/15/%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Tue, 15 Jan 2008 02:47:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>gyana</dc:creator>
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<description><![CDATA[ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:
पृथि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="font-size:12pt;font-family:Mangal;">ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:<br />
पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति: ।<br />
वनस्पतये: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:<br />
सर्वँ शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि ॥<br />
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शिव महिमा स्तोत्र]]></title>
<link>http://gyana.wordpress.com/2007/11/04/%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b5-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a5%8d/</link>
<pubDate>Sun, 04 Nov 2007 14:15:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>gyana</dc:creator>
<guid>http://gyana.wordpress.com/2007/11/04/%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b5-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a5%8d/</guid>
<description><![CDATA[शिव महिमा स्तोत्र
महिम्नः पारं ते,  पर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="font-size:12pt;font-family:Mangal;">शिव महिमा स्तोत्र</p>
<p style="font-size:12pt;font-family:Mangal;">महिम्नः पारं ते,  परमविदुषो यज्ञसदृशी<br />
स्तुतिर्ब्रह्मादीना मपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ।<br />
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामधि गृणन्<br />
ममाप्येषः स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥१॥<br />
अतीतः पंथानं तव च महिमा वाड् मनसयो<br />
रतद्व्यावृत्यायं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।<br />
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः<br />
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥२॥<br />
मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत<br />
स्तव ब्रह्मन्किं वा गपि सुरगुरोर्विस्मयपदम् ।<br />
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः<br />
पुनामीत्यर्थेस्मिन् पुरमथनबुद्धिर्व्यवसिता ॥३॥<br />
तवैश्चर्यें यत्तद् जगदुदयरक्षाप्रलयकृत<br />
त्रयी वस्तु व्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुषु ।<br />
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं<br />
विहंतुं व्योक्रोशीं विदधत इहै के जडधियः ॥४॥<br />
किमिहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं<br />
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ।<br />
अतकर्यैश्वर्येत्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः<br />
कुतर्कोडयंकांश्चि न्मुखरयति मोहाय जगतः ॥५॥<br />
अजन्मानो लोकाः किमवयवंवतोडपि जगता<br />
मधिष्ठातारं किं भवविधिरनादत्य भवति ।<br />
अनीशो वा कुर्याद भुवनजनने कः परिकरो<br />
यतो मंदास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥६॥<br />
त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति<br />
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ।<br />
रुचीनां वैचित्र्या दजुकुटिलनानापथजुषां<br />
नृणामेको गम्य स्त्वमसि पयमामर्णव इव ॥७॥<br />
महोक्षः खड्वांगं परशुरजिनं भस्म फणिनः<br />
कपालं चेतीय त्तव वरद तंत्रोपकरणम् ।<br />
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भव द्भ्रूप्रणिहितां<br />
नहि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ॥८॥<br />
ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वद्ध्रुवमिदं<br />
परो ध्रोव्याध्रोव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ।<br />
समस्तेडप्येतस्मि न्पुरमथन तैर्विस्मित इव<br />
स्तुवंजिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ॥९॥<br />
तवैश्वर्यं यत्ना द्यदुपरि विरिंचिर्हरिरधः<br />
परिच्छेतुं याता वनलमनलस्कंधवपुषः ।<br />
ततो भक्तिश्रद्धा भरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत्<br />
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिने फलति ॥१०॥<br />
अयत्नादापाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं<br />
दशास्यो यद्बाहू नभृन रणकंडुपरवशान् ।<br />
शिरःपद्मश्रेणी रचितचरणांभोरुहबलेः<br />
स्थिरायास्त्वद्भक्ते स्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम् ॥११॥<br />
अमुष्य त्वत्सेवा समधिगतसारं भुजवनं<br />
बलात्कैलासेडपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः ।<br />
अलभ्यापाताले डप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि<br />
प्रतिष्ठा प्रत्वय्या सीद्ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः ॥१२॥<br />
यदद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सती<br />
मधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयस्त्रिभुवनः ।<br />
न तच्चित्रं तस्मिंन्वरिवसितरि त्वच्चरणयो<br />
र्न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥१३॥<br />
अकाण्डब्रह्माण्डक्षयचकितदेवासुरकृपा<br />
विधेयस्यासीद्यस्त्रिनयविषं संह्रतवतः ।<br />
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो<br />
विकारोडपि श्लाध्यो भुवनभयभंगव्यसनिनः ॥१४॥<br />
असिद्धार्था नैव कवचिदपि सदेवासुरनरे<br />
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः ।<br />
स पश्यन्नीश त्वामितरसरुरसाधारणमभूत्<br />
स्मरः स्मर्तव्यात्मा नहि वशिषु पथ्यः परिभवः ॥१५॥<br />
मही पादाधाताद् व्रजति सहसा संशयपदं<br />
पदं विष्णोर्भ्राम्यद्भुजपरिघरुग्णग्रहगणम् ।<br />
मुहुद्यौंर्दोस्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा<br />
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ॥१६॥<br />
वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः<br />
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदष्टः शिरसि ते ।<br />
जगद् द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमि<br />
त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः ॥१७॥<br />
रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो<br />
रथाडगे चन्द्रार्कौ रथचरणपाणिः शर इति ।<br />
दिधक्षोस्ते कोडयं त्रिपुरतृणमाडम्बरविधिर्<br />
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः ॥१८॥<br />
हरिस्ते साहस्त्रं कमलबलिमाधाय पदयो<br />
यदिकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम् ।<br />
गतो भकत्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा<br />
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम् ॥१९॥<br />
क्रतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां<br />
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते ।<br />
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवं<br />
श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दटपरिकरः कर्मसु जनः ॥२०॥<br />
क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता<br />
मृषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः ।<br />
क्रतुभ्रंषस्त्वत्तः क्रतुफलविधानव्यसनिनो<br />
ध्रुवं कर्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः ॥२१॥<br />
प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं<br />
गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा ।<br />
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतंममुं<br />
त्रसन्तं तेडद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः ॥२२॥<br />
स्वलावण्याशंसाधृतधनुषमह्नाय तृणवत्<br />
पुरः प्लुष्टं दष्टवा पुरमथन पुष्पायुधमपि ।<br />
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरत देहार्धघटना<br />
दवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः ॥२३॥<br />
स्मशानेष्वाक्रीडा स्महर पिशाचाः सहचरा<br />
श्चिताभस्मालेपः स्तगपि नृकरोटीपरिकरः ।<br />
अमंगल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं<br />
तथाडपि स्मर्तृणां वरद परमं मंगलमसि ॥२४॥<br />
मनः प्रत्यक्चित्ते सविधमवधायात्तमरुतः<br />
प्रह्रष्यद्रोमाणः प्रमदसलिलोत्संगितदशः ।<br />
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्ज्यामृतमये<br />
दद्यत्यंतस्तत्त्वं क्रिमपि यमिनस्तत्किल भवान् ॥२५॥<br />
त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवह<br />
स्त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च ।<br />
परिच्छिन्नामेवं त्वयिपरिणता बिभ्रतु गिरं<br />
न विद्मस्तत्तत्वं वयमिह तु यत्त्वं न भवसि ॥२६॥<br />
त्रयीं तिस्त्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरा<br />
नकाराद्यैर्वर्णै स्त्रिभिरभिदधत्तीर्ण विकृतिः ।<br />
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः<br />
समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम् ॥२७॥<br />
भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सहमहां<br />
स्तथां भीमशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् ।<br />
अमुष्मिन्प्रत्येकं प्रवितरति देव श्रुतिरपि<br />
प्रियायास्मै धाम्ने प्रणिहितनमस्योडस्मि भवते ॥२८॥<br />
नमो नेदिष्ठाय प्रियदवदविष्ठाय च नमो<br />
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः ।<br />
नमोवर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठा च नमः<br />
नमः सर्वस्मै ते तदिदमितिशर्वाय च नमः ॥२९॥<br />
बहलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः<br />
प्रबलतमसे तत्संहारे हराय नमो नमः ।<br />
जनसुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः<br />
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥३०॥<br />
कृशपरिणति चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं<br />
क्व च तव गुणसीमोल्लंधिनी शश्वद्रद्धिः<br />
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्<br />
वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम् ॥३१॥<br />
असितगिरिसमंस्यात् कज्जलं सिंधुपात्रे<br />
सुरतरुवरशाखा लेखिनी पत्रमुर्वि ।<br />
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं<br />
तदपि तव गुणाना मीश पारं न याति<br />
असुरसुरमुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दुमौले<br />
र्ग्रथितगुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य ।<br />
सकलगणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानो<br />
रुचिरमलधुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार ॥३३॥<br />
अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्<br />
पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्यः ।<br />
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाडत्र<br />
प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान्कीर्तिमांश्च ॥३४॥<br />
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः ।<br />
अघोरान्नापरो मंत्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥३५॥<br />
ीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः ।<br />
महिम्नस्तवपाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥३६॥<br />
कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः<br />
शिशुशशिधरमौलेर्देव देवस्य दासः ।<br />
स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्<br />
स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्यदिव्यं महिम्नः ॥३७॥<br />
सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुं<br />
पठति यदि मनुष्यः प्रांजलिर्नान्यचेताः ।<br />
व्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः<br />
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥३८॥<br />
आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गंधर्वभाषितम् ।<br />
अनौपम्यं मनोहारिशिवमीश्वरवर्णनम् ॥३९॥<br />
इत्येषा वाडमयी पूजा श्रीमच्छंकरपादयोः ।<br />
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः ॥४०॥<br />
तव तत्त्वं न जानामि कीद्शोडसि महेश्वर ।<br />
याद्सोडसि महादेव ताद्शाय नमो नमः ॥४१॥<br />
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः ।<br />
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते ॥४२॥<br />
श्री पुष्पदंतमुखपंकजनिर्गतेन<br />
स्तोत्रेंण किल्बिहरेण हरप्रियेण ।<br />
कंठस्थितेन पठितेन समाहितेन<br />
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः ॥४३॥</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[गायत्री मंत्र]]></title>
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<pubDate>Thu, 13 Sep 2007 08:05:24 +0000</pubDate>
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<description><![CDATA[ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् ।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् ।</p>
<p>भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।।</p>
<p><font color="#333399">ॐ                        = ब्रह्म;<br />
</font></p>
<p><font color="#333399"> भूर्भुवः                  = पृथ्वी तथा त्यस माथिको सबै;<br />
</font></p>
<p><font color="#333399"> स्वः                      = आफ्नो;<br />
</font></p>
<p><font color="#333399"> तत्सवितुर्वरेण्यं    =</font></p>
<p><font color="#333399">भर्गो                     = </font></p>
<p><font color="#333399"> देवस्य                  = देवताहरूको;<br />
</font></p>
<p><font color="#333399"> धीमहि                 = स्विकार गरून्;<br />
</font></p>
<p><font color="#333399"> धियो                    = ज्ञान, विद्वत्;<br />
</font></p>
<p><font color="#333399"> यो                        = उनि (ईश्वर) ;<br />
</font></p>
<p><font color="#333399"> नः                        = हाम्रो;<br />
</font></p>
<p><font color="#333399"> प्रचोदयात्             = प्रज्वलित गर्नु ;</font></p>
<p><font color="#808080">OM. I adore the Divine Self who illuminates the three worlds --<br />
physical, astral and causal; I offer my prayers to that God who<br />
shines like the Sun. May He enlighten our intellect.</font></p>
<p><a href="http://www.yogausa.com/audio/Gayatri_Mantra.mp3" title="श्लोक वाचन सुन्नुहोस्">श्लोक वाचन</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अद्वैत सिद्धान्त]]></title>
<link>http://gyana.wordpress.com/2007/09/05/%e0%a4%85%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a5%88%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4/</link>
<pubDate>Wed, 05 Sep 2007 10:36:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>gyana</dc:creator>
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<description><![CDATA[एको ब्रह्म द्वितीयोनास्ति
 ब्रह्म मा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एको ब्रह्म द्वितीयोनास्ति<br />
<font color="#333399"> ब्रह्म मात्र छन्, दोश्रो केही छैन ।</font></p>
<p>ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या<br />
<font color="#333399"> ब्रह्म सत्य संसार झुठा ।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सत्यम् शिवम् सुन्दरम्  ]]></title>
<link>http://gyana.wordpress.com/2007/09/04/%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%ae%e0%a5%8d-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%ae%e0%a5%8d-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a5%8d/</link>
<pubDate>Tue, 04 Sep 2007 07:44:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>gyana</dc:creator>
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<description><![CDATA[सत्यम् शिवम् सुन्दरम्   ।
सत्य नै शिव ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सत्यम् शिवम् सुन्दरम्   ।</p>
<p><font color="#333399">सत्य नै शिव हो, शिव नै सुन्दरता हो ।</font></p>
<p><font color="#808080">Shiva is the Truth, Shiva is the beauty.</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सत्य: एकं सत् ]]></title>
<link>http://gyana.wordpress.com/2007/08/16/%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/</link>
<pubDate>Thu, 16 Aug 2007 13:42:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>gyana</dc:creator>
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<description><![CDATA[एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति ।
सत्य एक ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति ।</p>
<p><font color="#101090">सत्य एक छ, ज्ञानीहरू अनेक नामले पुकार्छन्</font>  ।</p>
<p><font color="#505050">Truth is One, saga name it different.</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[असतो मा सद्गमय]]></title>
<link>http://gyana.wordpress.com/2007/08/16/%e0%a4%85%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%97%e0%a4%ae%e0%a4%af/</link>
<pubDate>Thu, 16 Aug 2007 12:52:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>gyana</dc:creator>
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<description><![CDATA[ॐ असतो मा सद्गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ॐ असतो मा सद्गमय ।<br />
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।।<br />
मृत्योर्मामृतं गमय ।<br />
ॐ शान्ति शान्ति शान्ति ।।</p>
<p><span style="color:#101090;">ॐ असत्यबाट सत्य तर्फ,<br />
अंध्यारोबाट उज्यालो तर्फ ।<br />
मृत्युबाट जीवन तर्फ,<br />
ॐ शान्ति शान्ति शान्ति । </span></p>
<p><span style="color:#505050;">Om Lead Us From Untruth To Truth,<br />
Lead Us From Darkness To Light.<br />
Lead Us From Death To Immortality,<br />
Om Let There Be Peace Peace Peace.</span></p>
<p><a title="श्लोक वाचन सुन्नुहोस्" href="http://www.yogausa.com/audio/Om_Asto_Maa_Sadgamaya.mp3" target="_blank">श्लोक वाचन </a></p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
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