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	<title>सन्नाटा &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/सन्नाटा/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "सन्नाटा"</description>
	<pubDate>Sun, 12 Oct 2008 09:31:54 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[रोज़े-शामे-दीवाली कोई नूरे-चराग़ नहीं]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/12/20/%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a5%9b%e0%a5%87-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%88-%e0%a4%a8%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Thu, 20 Dec 2007 23:24:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2007/12/20/roz-e-shaam-e-diiwaalii-koii-noor-e-charaag-nahiin/</guid>
<description><![CDATA[रोज़े - शामे - दीवाली   कोई   नूरे - चराग़  न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">रोज़े - शामे - दीवाली   कोई   नूरे - चराग़  नहीं<br />
चौखट   सूनी   दिल   वीराँ   तन्हा - तन्हा  रहता है</font></p>
<p><font color="#000000">पलकों पर शबनम के क़तरे फीका-फीका चाँद<br />
और गली में सब सूखा-सूखा बंजर-सा रहता है</font></p>
<p><font color="#000000">न   फूल   नकहता   है   न   कोपल   कोई खुलती है<br />
गुलाबी बेलों पर सब बेरंग ख़ुश्क - सा रहता है</font></p>
<p><font color="#000000">काली रातों-सी तेरी लटें वो जिनमें जी उलझा था<br />
उनका तो अब आँखों पर कुछ साया-सा रहता है</font></p>
<p><font color="#000000">मज़ा कहाँ अब आतिश में कहाँ पटाखों में वो धूम<br />
मेरे कानों में सन्नाटा-सा कुछ चीखता रहता है</font></p>
<p><font color="#000000">मंदिर में जब हाथ जोड़कर मेरा सिर झुकता है<br />
मेरा   यह   मन  बस   तुमको   ही   माँगता   रहता   है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[पिछला कुछ भी बदला नहीं जा सकता]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/15/%e0%a4%aa%e0%a4%bf%e0%a4%9b%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9b-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%b8/</link>
<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 18:31:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2007/09/15/pichhalaa-kuchh-bhii-badalaa-nahiin-jaa-sakata-hai/</guid>
<description><![CDATA[बीते दिनों की गलियों में जब पाँव पड़ते]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">बीते दिनों की गलियों में जब पाँव पड़ते हैं तो<br />
अपने आपको तुझमें ढूँढ़ने लगता हूँ मैं<br />
दिल के ज़ख़्म बर्फ़ की तरह जमने लगते हैं<br />
और उदासियों की नज़्म उन्हें गरमाती रहती है...</font></p>
<p><font color="#000000">मैं जानता हूँ पिछला कुछ भी बदला नहीं जा सकता<br />
फिर भी 'काश!' की परछाईं मेरा पीछा करती है<br />
काश यूँ न होता, काश वैसा न किया होता, काश!<br />
बस यही आवाज़ें मन में गूँजती रहती हैं...</font></p>
<p><font color="#000000">सन्नाटों में झींगुर जाने किसको सदा देते हैं<br />
चाँदनी ज़मीन पर जाने क्या तलाश करती है<br />
मैं बंद कमरे में बैठा खिड़की से बाहर देखता हूँ<br />
तेरी यादें गली में टहलती नज़र आती हैं मुझे...</font></p>
<p><font color="#000000">मेरा उसी राह से आना-जाना है जहाँ तुम्हें देखा था<br />
आज भी नम आँखों में माज़ी की हरी काई जमी है<br />
वहम ही सही मगर दो पल को तेरा साथ मिल जाता है<br />
और तन्हाई के पन्नों पर तेरी तस्वीरें बन जाती हैं...</font></p>
<p><font color="#000000">मेरी ज़िन्दगी में जितने भी सफ़्हे तुमने लिखे थे<br />
उनके हर्फ़ आज भी मैं तन्हाई के साथ चुनता हूँ<br />
कच्ची स्याही से लिखे वह लम्हों में बुने हर्फ़,<br />
लाख कोशिशों के बाद भी मैं भूल नहीं पाया हूँ...</font></p>
<p><font color="#000000">मेरा नाम भूल जाओगी, मेरे ख़त खो जायेंगे तुमसे<br />
शक़्ल तक न याद आयेगी, न मेरी कोई बात<br />
वक़्त की गर्द में तुम मेरे लिए आँखें मूँद लोगी<br />
शायद कभी फ़लाँ कहकर भी न याद करो मुझको...</font></p>
<p><font color="#000000">मुझको भूल जाने वाले लोगों को मैं भूल जाता हूँ<br />
भीड़ में उनके चेहरे तक नहीं याद रखता मैं<br />
तेरा चेहरा ही जानता था, नाम क्या होगा? परवाह न थी<br />
तेरा नाम भूल जाऊँ शायद पर तुझे कैसे भूलूँगा...</font></p>
<p><font color="#000000">मैं हसीन नहीं मगर वह तो फ़िल-हक़ीक़त हसीन होगा<br />
जिसे तुम चाहती हो, जिसके लिए साँस लेती हो तुम<br />
गो मैं यकता हूँ, ज़माने में मुझसा कोई दूसरा नहीं<br />
फिर क्यों लगता है मुझे वह मुझसे बेहतर होगा...</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००५</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नज़्म का कोई सिरा मिले...]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/15/%e0%a4%a8%e0%a5%9b%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%88-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 16:34:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2007/09/15/nazm-ka-koii-siraa-mile/</guid>
<description><![CDATA[टूटा हुआ चाँद है मटमैली-सी रात में
बुझ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">टूटा हुआ चाँद है मटमैली-सी रात में<br />
बुझती हुई रोशनी है जैसे शाम की</font></p>
<p><font color="#000000">एक-एक ख़िज़ाँ के पत्तों पर लिखा था नाम तेरा<br />
कुछ अब भी पड़े होंगे... सूखे, टूटे हुए</font></p>
<p><font color="#000000">किरने भीगे हुए सूरज की हैं जाविदाँ<br />
कुछ एक रखी होंगी दिल की दराज़ों में</font></p>
<p><font color="#000000">कहानी अधूरी सही अपने प्यार की<br />
मगर लम्सो-उन्स हैं पानी की तरह</font></p>
<p><font color="#000000">गोशा-ए-दिल में कौन बैठा है मेरे ज़ख़्मों<br />
हरा रंग अपना उसको भी दिखाओ ज़रा</font></p>
<p><font color="#000000">मंज़र यह शाम का और आँसुओं के साहिल<br />
सब एक ज़र्द की तह में दब गये हैं</font></p>
<p><font color="#000000">कुछ शहद-सी बूँदे हैं तेरी आवाज़ों की<br />
आज भी गूँजती हैं दिल के सन्नाटों में</font></p>
<p><font color="#000000">मैं ख़ला में भटकता रहा सय्यारों की जैसे<br />
मुझे तुम जैसा चाँद नसीब न हुआ</font></p>
<p><font color="#000000">मुझे सौदाई समझे यह ज़माने वाले<br />
दोस्तों में भी रहा अजनबी की तरह</font></p>
<p><font color="#000000">मेरी हर दुआ और आह में तेरा नाम निकला<br />
रश्क़ इस बात पे मैंने खु़दा का भी देखा</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[धरती तुम!]]></title>
<link>http://pasand.wordpress.com/2006/04/09/%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae/</link>
<pubDate>Sun, 09 Apr 2006 04:16:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>प्रेमलता पांडे</dc:creator>
<guid>http://pasand.hi.wordpress.com/2006/04/09/earth-beauty/</guid>
<description><![CDATA[रात को इतनी सुंदर क्यों लगती हो?
ऎसा लग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>रात को इतनी सुंदर क्यों लगती हो?<br />
ऎसा लगता है पूरा श्रंगार करती हो।<br />
अंधकार की गहरी साड़ी फबती है,<br />
उस पर तारों जड़ी चुंनरी भी जंचती है,<br />
चुंनरी में छापे जैसे बादलों के टुकड़े लगतेहैं,<br />
उस पर चांदनी के रंग भी उभरते हैं,<br />
जो और अधिक सुंदरता में वृद्धि करते हैं।<br />
सन्नाटे में तुम्हारी छवि मुग्ध करती है,<br />
लगता है सारी स्त्रियां<br />
तुम्हें देखकर सजतीहैं।<br />
छलना का रुप धर लेती हो,<br />
सारी सृष्टि के होश छीन लेती हो।<br />
संपूर्ण अस्तित्व शांत हो जाता है,<br />
बस तुम्हारा व्यक्तित्व ही आभास जताता है।</p>
]]></content:encoded>
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