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	<title>सम्मान &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/सम्मान/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "सम्मान"</description>
	<pubDate>Sat, 06 Sep 2008 02:56:24 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[शब्द हमेशा अंतरिक्ष  में लहराते-हिंदी कविता]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=64</link>
<pubDate>Mon, 04 Aug 2008 14:51:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=64</guid>
<description><![CDATA[हर शब्द अपना अर्थ लेकर ही
जुबान से बाह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>हर शब्द अपना अर्थ लेकर ही<br />
जुबान से बाहर आता<br />
जो मनभावन हो तो<br />
वक्ता बनता श्रोताओं का चहेता<br />
नहीं तो खलनायक कहलाता<br />
संस्कृत हो या हिंदी<br />
या हो अंग्रेजी<br />
भाव से शब्द पहचाना जाता है<br />
ताव से अभद्र हो जाता </p>
<p>बोलते तो सभी है<br />
तोल कर बोलें ऐसे लोगों की कमी है<br />
डंडा लेकर सिर पर खड़ा हो<br />
दाम लेकर खरीदने पर अड़ा हो<br />
ऐसे सभी लोग साहब शब्द से पुकारे जाते  ं<br />
पर जो मजदूरी मांगें<br />
चाकरी कर हो जायें जिनकी लाचार  टांगें<br />
‘अबे’ कर बुलाये जाते हैं<br />
वातानुकूलित कमरों  में बैठे तो  हो जायें ‘सर‘<br />
बहाता है जो पसीना उसका नहीं किसी पर असर<br />
साहब के कटू शब्द करते हैं शासन<br />
जो मजदूर प्यार से बोले<br />
बैठने को भी नहीं देते लोग  उसे आसन<br />
शब्द का मोल समझे जों<br />
बोलने वाले की औकात की औकात देखकर<br />
उनके समझ में सच्चा अर्थ कभी नहीं आता </p>
<p>शब्द फिर भी अपनी अस्मिता नहीं खोते<br />
चाहे जहां लिखें और बोले जायें<br />
अपने अर्थ के साथ ही आते हैं<br />
जुबान से बोलने के बाद वापस नहीं आते<br />
पर सुनने और पढ़ने वाले<br />
उस समय चाहे जैसा समझें<br />
समय के अनुसार उनके अर्थ सबके सामने आते<br />
ओ! बिना सोचे समझे बोलने और समझने वालों<br />
शब्द ही हैं यहां अमर<br />
बोलने और लिखने वाले<br />
सुनने और पढ़ने वाले मिट जाते<br />
पर शब्द अपने सच्चे अर्थों के साथ<br />
हमेशा अंतरिक्ष में लहराता<br />
...........................................................................</strong><br />
<strong><br />
<blockquote>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://razlekh-hindi.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com">4.अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://rajdpk2.wordpress.com">लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</a></p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अमीरी का यहां बसेरा बसाया-लघुकथा]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=211</link>
<pubDate>Sun, 03 Aug 2008 12:15:21 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=211</guid>
<description><![CDATA[एक धनी परिवार के लोगों ने अपने  मुखिया ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक धनी परिवार के लोगों ने अपने  मुखिया की स्मृति में कार्यक्रम आयोजन करना चाहते थे। आमंत्रण पर कविता छपवानेे के लिये उन्होंने एक हास्य कवि से संपर्क किया और उसे अपने मुखिया के जीवन का संक्षिप्त परिचय देते हुए एक कविता लिखने का आग्रह किया। बदले में कार्यक्रम के दौरानं उसको सम्मानित करने का लोभ भी दिया। वह कवि तैयार हो गया। उसने कविता लिखी और देने पहुंच गया। उस कविता मे कुछ इस तरह भी था।</p>
<p><strong>पहले उन्होंने गरीबों के पुराने<br />
घरों के येनकेन प्रकरेण हथियाया<br />
जो नहीं हट रहे थे उनको<br />
अपनी ताकत से हटवाया<br />
अपना निजी बुलडोजर  चलाया<br />
जमकर बरपाया कहर<br />
पर  लगन से किसी भी तरह<br />
अपनी कल्पानाओं का  नया शहर बसाया<br />
इतने महान थे वह कि<br />
एक गरीब जो अपने मकान से<br />
निकलने के बाद बीमारी में मर गया<br />
उसके नाम पर नये शहर का<br />
नामकरण करवाया<br />
शहर के लिये देखा था जो सपना<br />
उन्होंने पूरा कर दिखाया </strong><br />
उसकी कविता पढ़कर परिवार वाले हास्य कवि पर बहुत बिफरे और उसे धक्के देकर बाहर निकाल दिया। जब उसके प्रतिद्वंद्वी कवि को यह पता लगी तो उनके पास अपनी कविता बेचने को पहुंच गया। उसने जो कविता लिखी उसमे कुछ सामग्री इस तरह थी।</p>
<p><strong>शहर से गरीबी हटाने का<br />
उनका एक ख्वाब था<br />
जो उन्होंने पूरा कर बताया<br />
कैसे अपनी सोच को जमीन पर<br />
लायें यह  उन्होंने बताया<br />
कभी यहां फटेहाल और कंगाल लोगों की<br />
बस्ती हुआ करती थी<br />
चारों तरफ गंदगी और बीमारी<br />
बसेरा करती थी<br />
उस पर जो डाली उन्होंने अपनी तीक्ष्ण दृष्टि<br />
सब साफ हो गयी<br />
उनके तेज का यह परिणाम था कि<br />
गरीबी की रेखा यहां आफ हो गयी<br />
आज खड़े हैं यहां महल और कारखाने<br />
पेड़ पौधो के थे यहां कभी जमाने<br />
आज पत्थरों और ईंट के बुत खड़े हैं<br />
उनके विकास की धारा का परिणाम है<br />
अब यहां आदमी नहीं मिलता<br />
लोग देते हैं घर के नौकरों के लिये विज्ञापन<br />
देखो अब यहां कितना काम है<br />
उन्होंने इस तरह गरीबी को भगाकर<br />
अमीरी का यहां बसेरा बसाया</strong><br />
उसकी कविता से उस धनी परिवार के सदस्य प्रसन्न हो गये और उसे स्मृति कार्यक्रम में सर्वश्रेष्ठ  कवि का सम्मान दिया।<br />
...........................</p>
<p><strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपनी कविताओं से दूसरों के ईमेल कूड़ेदान की तरह नहीं सजाते-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=575</link>
<pubDate>Sat, 02 Aug 2008 12:36:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=575</guid>
<description><![CDATA[दनदनाता आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बाप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दनदनाता आया फंदेबाज और बोला<br />
‘दीपक बापू, आज मिल गया<br />
तुम्हारे हिट होने का मंतर<br />
अपने फ्लाप होने का दर्द भूल जाओ<br />
अपने ब्लाग लिखकर दूसरों के ईमेल में<br />
जबरन भिजवाओ<br />
हर कोई एक उड़ाने से पहले एक बार<br />
जरूर देखेगा<br />
इस तरह अपना हिट भेजेगा<br />
चलो आज से जमकर लिखो कविता<br />
और हिट की सीढि़या चढ़ जाओ’</p>
<p>सुनते ही उठ खड़े हुए और<br />
चिल्लाते हुए बोले महाकवि दीपक बापू<br />
‘निकल यहां से जल्दी<br />
वरना देख इन जबरन घुसे ईमेल संदेशों की तरह<br />
तुम्हारा नाम भी दोस्तों की लिस्ट से उड़+ा देंगे<br />
क्या समझ रखा है कि<br />
जिस बात से स्वयं परेशान है<br />
वह व्यवहार दूसरे से करेंगे<br />
कमबख्त, जवां दिलों को पटाने के लिये<br />
यह कविताएं नहीं शायरों का नुस्खा है<br />
जैसे उनके लिये तंबाकू का गुटका है<br />
न दिमाग की सोच से इसका वास्ता<br />
न दिल की तरफ जाता शब्दों का रास्ता<br />
यह शब्द भोजन की तरह हैं<br />
आदमी स्वयं दाना खाकर पेट भरता<br />
मछली को खिलाकर फांसता<br />
इन शब्दों में भाव कम<br />
किसी को बहलाने और हिट होने का<br />
ताव है ज्यादा<br />
अपने लेखक और कवि होने का भ्रम<br />
उसे सच बनाने का है इरादा<br />
कविता ऐसे लिखी है जैसे लिखना हो नाश्ता<br />
साहित्य में बहुत जल्दी हिट होने का<br />
साजिश से निकाल रहे है रास्ता<br />
असली लिखने वाले कभी<br />
पाठकों के दरवाजे नहीं  बजाते<br />
ईमेल को कूड़ेदान की तरह नहीं सजाते<br />
लिखा जाये दिन और दिमाग से<br />
तो लेखक और कवि लिखने का ही<br />
सुख बहुत उठा लेते<br />
कोई पढ़े या नहीं इस चिंता से मूंह फेर लेते<br />
भेज रहे हैं जो जबरन कवितायें<br />
दूसरों के गुलदस्ते को कूड़ेदान की तरह सजायें<br />
हम फ्लाप है फिर को परवाह नहीं<br />
हिट होने का ऐसा मोह नहीं कि<br />
दूसरों के सामने हिट के लिये भीख मांगें<br />
हर लिखे गये शब्द कविता या कहानी नहीं हो जाते<br />
जब तक पढ़ने वाले उसे हृदय से नहीं अपनाते<br />
अरे, फैंक रहे हैं जो<br />
कूड़ें की तरह अपनी रचनायें<br />
भला वह कहां सम्मान पायें<br />
पल भर में ईमेल से उड़ा दी जायें<br />
अपनी पत्रिका ही है वह किला<br />
जहां रचना चमकते  रहे शब्द सोने की तरह<br />
पढ़े जो वह सम्मान दें<br />
जो न पढ़ें, वह नहीं करते गिला<br />
किसी दूसरे के आगे जाकर<br />
उनको क्या मिलेगा<br />
जब आदमी को प्यार नहीं मिला<br />
तुम निकल लो यहां से<br />
साथ में अपना मंतर भी ले जाओ<br />
.....................................................</p>
<blockquote><p><strong>यह मूल पाठ इस ब्लाग <a href="http://deepakbapukahin.wordpress.com">‘दीपक बापू कहिन’</a> पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का शब्दज्ञान-पत्रिका</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[काले सौदे पर भी सफेद होने के प्रमाण होते-हास्य कविता]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=60</link>
<pubDate>Sat, 02 Aug 2008 07:59:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=60</guid>
<description><![CDATA[घर भरा है समंदर की तरह
दुनियां भर की ची]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>घर भरा है समंदर की तरह<br />
दुनियां भर की चीजों से<br />
नहीं है घर मे पांव रखने की जगह<br />
फिर भी इंसान बेचैन  है</p>
<p>चारों तरफ नाम फैला है<br />
जिस सम्मान को भूखा है हर कोई<br />
उनके कदमों मे पड़ा है<br />
फिर भी इंसान  बेचैन  है</p>
<p>लोग तरसते हैं पर<br />
उनको तो हजारों सलाम करने वाले<br />
रोज मिल जाते हैं<br />
फिर भी इंसान  बेचैन है</p>
<p>दरअसल बाजार में कभी मिलता नहीं<br />
कभी कोई तोहफे में दे सकता नहीं<br />
अपने अंदर ढूंंढे तभी मिलता चैन है<br />
---------------------</p>
<p>अर्थशास्त्र के ‘मांग और आपूर्ति का नियम’<br />
उन्होंने कुछ इस तरह समझाया<br />
‘जब कारखाने में चीज बनती हो<br />
पर बाजार में नहीं दिखती हो<br />
तो समझो मांग कुछ ज्यादा है<br />
अगर मिलती हो वह काला बाजार में तो<br />
समझ लो आपूर्ति है कम<br />
सफेद बाजार को उन्होंने<br />
आज के अर्थशास्त्र से बाहर का विषय बताया<br />
.............................................</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह कविता/लघुकथा पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk2.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
इस लेख के अन्य बेवपत्रक/पत्रिकाएं नीचे लिखी हुईं  हैं<br />
<a href="http://anantrajl.blogspot.com">1. अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://deepakraj.blogspot.com">4.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
<p>बाजार भी भला कभी<br />
काले और सफेद होते<br />
सौदागर की नीयत जैसी<br />
वैसे ही उसके नाम होते<br />
छिपकर कोई नहीं करता अब<br />
हर शय के सौदे सरेआम होते<br />
खरीददार की मजी नहीं चलती<br />
सफेद बाजार में माल नहीं मिलता</p>
<p>चाहे दूने और चौगुने दाम होते<br />
.....................................</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह कविता/लघुकथा पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk2.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
इस लेख के अन्य बेवपत्रक/पत्रिकाएं नीचे लिखी हुईं  हैं<br />
<a href="http://anantrajl.blogspot.com">1. अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://deepakraj.blogspot.com">4.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हार पहनाया मुझे !]]></title>
<link>http://hariharjhahindi.wordpress.com/2007/12/20/%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%9d%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Thu, 20 Dec 2007 23:05:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>Harihar Jha हरिहर झा</dc:creator>
<guid>http://hariharjhahindi.wordpress.com/2007/12/20/%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%9d%e0%a5%87/</guid>
<description><![CDATA[मिला सम्मान उसे नकारुं कैसे?
हार पहनाय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मिला सम्मान उसे नकारुं कैसे?<br />
हार पहनाया मुझे,  हार उतारुं कैसे?</p>
<p>हाय! क्षणभंगुर इन फूलों का जीवन<br />
कुम्हलाकर सब व्यर्थ हो जायगा<br />
दिखा दिखा कर अकड़ रहा हूं<br />
क्षण गया यह तो अनर्थ हो जायगा</p>
<p>बिना तृप्त किये अहं मन मारूं कैसे?<br />
हार पहनाया मुझे, हार उतारुं कैसे?</p>
<p>धन भाग हुये इस माला के<br />
मुझ महामहिम का कण्ठ पाया<br />
धनभाग हुये इस धागे के<br />
जो मेरी देह को छू पाया</p>
<p>जीत ली सारी दुनियां उसे हारूं कैसे?<br />
हार पहनाया मुझे,  हार  उतारुं कैसे?</p>
<p>पहनाओ मुझे हार बाद मे<br />
दुनियां भर के लफड़े दे जाओ<br />
भले ही मुर्ख बना कर पहना दो<br />
बाद मे पहने कपड़े उतार जाओ</p>
<p>डूबा मन बिन माला के उबारुं  कैसे?<br />
हार पहनाया मुझे,  हार  उतारुं कैसे?</p>
<p>                     -हरिहर झा</p>
<p>Are you in a paper-made-boat? Read<br />
<a href="http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/15/my-paper-made-boat/">http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/15/my-paper-made-boat/</a><br />
OR<br />
<a href="http://hariharjha.wordpress.com/">http://hariharjha.wordpress.com</a></p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
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