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	<title>सितारे &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/सितारे/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "सितारे"</description>
	<pubDate>Wed, 08 Oct 2008 03:29:30 +0000</pubDate>

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<item>
<title><![CDATA[क्या वादा करूँ तुझसे]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=1066</link>
<pubDate>Mon, 11 Aug 2008 13:25:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/08/11/kyaa-waada-karoom-tujh-se/</guid>
<description><![CDATA[क्या वादा करूँ तुझसे सितारे तोड़ लाऊँ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">क्या वादा करूँ तुझसे सितारे तोड़ लाऊँगा<br />
मेरी जान ऐसे वादों का रिवाज़ भी पुराना हुआ<br />
लोग अपने महबूब को चाँद बताते थे<br />
मेरी जान आज तो यह अंदाज़ भी पुराना हुआ</span></p>
<p><span style="color:#000000;">यह रात उलझी हुई है तेरी लटों में ओ जानम<br />
आग की रेशमी लपक-सा तेरा उजला चेहरा है<br />
सुर्ख़ तेरे लब हैं जैसे दहकते हुए अंगारे<br />
छलकते पैमाने जैसी आँखों में गुलाबी कोहरा है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">तंग पोशाक में उभरे हुए जिस्म की कशिश<br />
तेरा दीवाना आज ख़ुद तेरे हुस्न का शिकार है<br />
गोरे गालों पर काला तिल उफ़ क़ायमत हो<br />
मैं सैद तू सैय्याद यह रिश्ता भी निभाना हुआ</span></p>
<p><span style="color:#000000;">अदाएँ ख़ूब हैं मेरे जल्वागर जाँ-निसार की<br />
वह हर एक रंग में घुलता है निखरता है<br />
जब भी खिलती है उसके चेहरे पर ख़ुशी<br />
वह एक हसीं ख़ाब में भिगोया हुआ लगता है</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यूँ तो दिल में इक ख़ला बसा रखी है]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=1041</link>
<pubDate>Thu, 24 Jul 2008 13:07:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/07/24/yuum-to-dil-mein-ik-khalaa-basaa-rakhii-hai/</guid>
<description><![CDATA[यूँ तो दिल में इक ख़ला बसा रखी है हमने, ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">यूँ तो दिल में इक ख़ला बसा रखी है हमने, लेकिन<br />
कभी-कभी सितारों के टुकड़े भी गुज़रते हैं इधर से</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मैंने उसका दिल तोड़ा था पर उससे कुछ माँगा नहीं!</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=964</link>
<pubDate>Sun, 13 Apr 2008 09:33:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/04/13/saams-rafta-rafta-pighal-rahii-hai/</guid>
<description><![CDATA[साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है
मोहब्बत म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है<br />
मोहब्बत मुझे मसल रही है<br />
ख़्यालों की राह-राह जल रही है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">चाँद से मुझको शिकवे बहुत हैं<br />
आप से मेरे शादो-फ़रहत हैं<br />
ख़ामुशी उसकी मुझे छल रही है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">एजाज़े-चाँदनी बिखरा हुआ है<br />
मुझको तस्व्वुर तेरा हुआ है<br />
तन्हाई हर दम ख़ल रही है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">सितारे अपनी पलकें झपक रहे हैं<br />
तेरा हुस्न बेसुध तक रहें हैं<br />
बुझी-बुझी मेरी नब्ज़ चल रही है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">तुमको हर चेहरे में ढूँढ़ते हैं<br />
बार-बार दिल के टुकड़े टूटते हैं<br />
मंज़र यह शाम की ढल रही है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मैं हूँ चाँद है तुम भी होगी कहीं]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=864</link>
<pubDate>Fri, 29 Feb 2008 15:19:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/29/main-hoon-chaand-hai-tum-bhii-hogii-kahiin/</guid>
<description><![CDATA[मैं हूँ, चाँद है, तुम भी होगी कहीं
मैं द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">मैं हूँ, चाँद है, तुम भी होगी कहीं<br />
मैं देखता हूँ जो चाँद को...<br />
तुम भी इसे देखती होगी कहीं</font></p>
<p><font color="#000000">माहे-कामिल ने देखा है मुझे<br />
तेरे पाँव के निशाँ पे सजदा करते हुए<br />
सहर उस वक़्त दरक रही थी<br />
सूरज आ रहा था कमसिन किरनें लिए</font></p>
<p><font color="#000000">यह हवा यह घटाएँ<br />
सभी से मैंने कहा था, कहना<br />
मुझे प्यार है तुमसे<br />
जाने तुमने मेरी सदा को<br />
महसूस किया होगा कि नहीं</font></p>
<p><font color="#000000">मैं तन्हा ही तन्हाइयों को दोहराता हूँ<br />
दिल की सदाओं से तुमको बुलाता हूँ<br />
तुम चले आओ सुनकर मेरी सदा<br />
मैं रोज़ ही गीली पलकें सुखाता हूँ</font></p>
<p><font color="#000000">मेरी आँखों ने देखे हैं<br />
कई टूटते हुए सितारे<br />
जिनको तुमने भी देखा होगा<br />
जाने उन्होंने तुमको मेरी<br />
क़िस्मत में लिखा होगा कि नहीं</font></p>
<p>माहे-कामिल= full moon, पूर्णिमा का चाँद</p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १८ मई २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ज़हर पीकर जीने चले]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=854</link>
<pubDate>Wed, 27 Feb 2008 16:52:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/27/zahar-peeke-jeene-chale/</guid>
<description><![CDATA[ज़हर पीकर जीने चले
कच्चे-पक्के ज़ख़्म सी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">ज़हर पीकर जीने चले<br />
कच्चे-पक्के ज़ख़्म सीने चले</font></p>
<p><font color="#000000">आँसू सूखे हुए थे<br />
पलकों से बरसते हैं<br />
सितारे सारी रात<br />
चाँद को तरसते हैं</font></p>
<p><font color="#000000">एक पूरा दिन पीने चले<br />
कच्चे-पक्के ज़ख़्म सीने चले</font></p>
<p><font color="#000000">महके-महके लगते हैं<br />
गीले पलाश के पल<br />
उड़ती फिरती रहती है<br />
तेरी प्यास की धूल</font></p>
<p><font color="#000000">काग़ज़ी यह आइने जले<br />
कच्चे-पक्के ज़ख़्म सीने चले</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अंधी ख़ला में]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=839</link>
<pubDate>Tue, 26 Feb 2008 03:46:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/26/andhii-khalaa-mein/</guid>
<description><![CDATA[हमने तो कभी दिल की अंधी ख़ला में
किसी च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">हमने तो कभी दिल की अंधी ख़ला में<br />
किसी चाँद को रोशन होते नहीं देखा</font></p>
<p><font color="#000000">शायद आतिशी इंतकाल था सितारे का</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गिरते सितारे को]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=837</link>
<pubDate>Tue, 26 Feb 2008 03:28:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/26/girate-sitaare-ko/</guid>
<description><![CDATA[हमने आसमाँ से टूटके
गिरते सितारे को
ज़म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">हमने आसमाँ से टूटके<br />
गिरते सितारे को<br />
ज़मीं पे आते देखा है<br />
आसमाँ पे था तो चमकता था<br />
ज़मीं पे है तो दहकता है</font></p>
<p><font color="#000000">फ़र्क़ है बस थोड़ा-सा<br />
'कितना है?' इतना है!<br />
जाओ उठा लाओ उसे...</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चढ़ गयी रे मस्ती]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2008/02/18/chadhh-gayii-re-mastii/</link>
<pubDate>Mon, 18 Feb 2008 11:33:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/18/chadhh-gayii-re-mastii/</guid>
<description><![CDATA[चढ़ गयी रे मस्ती चढ़ गयी रे
चढ़ गयी रे त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">चढ़ गयी रे मस्ती चढ़ गयी रे<br />
चढ़ गयी रे तेरे हुस्न की मस्ती<br />
चढ़ गयी रे मस्ती चढ़ गयी रे<br />
तेरे हुस्न की मस्ती चढ़ गयी रे</font></p>
<p><font color="#000000">लग गया काँटा फँस गया बाँका<br />
बन्धु बात तेरी तो बन गयी रे<br />
चढ़ गयी रे मस्ती चढ़ गयी रे<br />
तेरे हुस्न की मस्ती चढ़ गयी रे</font></p>
<p><font color="#000000">तन गयी रे, देख तो तन गयी रे<br />
पंतग उड़ी थी ओह कट गयी रे<br />
चढ़ गयी रे मस्ती चढ़ गयी रे<br />
तेरे हुस्न की मस्ती चढ़ गयी रे</font></p>
<p><font color="#000000">मिली हज़ारों में चाँद-सितारों में<br />
देख के उसे धड़कन बढ़ गयी रे<br />
चढ़ गयी रे मस्ती चढ़ गयी रे<br />
तेरे हुस्न की मस्ती चढ़ गयी रे</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल के ख़ाब दिल में ही सुलगते हैं]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=734</link>
<pubDate>Sat, 09 Feb 2008 11:04:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/09/dil-ke-khaab-dil-mein-hii-sulagate-hain/</guid>
<description><![CDATA[दिल के ख़ाब दिल में ही सुलगते हैं
हक़ीक़]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">दिल के ख़ाब दिल में ही सुलगते हैं<br />
हक़ीक़त के निशाँ अभी दूर लगते हैं<br />
हल्की-हल्की आवाज़ें कानों में गुनगुनाती हैं<br />
लगता है कहीं दूर हवाएँ गीत गाती हैं</font></p>
<p><font color="#000000">देखो न कितनी भोली-भाली सूरतें हैं<br />
हवा के संग फूलों के गुच्छे झूलते हैं<br />
दिल के ख़ाब दिल में ही सुलगते हैं<br />
हक़ीक़त के दर्मियाँ अभी फासलें लगते हैं</font></p>
<p><font color="#000000">रातों में सितारों की बारातों आती हैं<br />
लहू से मुहब्बत की कुरानें लिखी जाती हैं<br />
गुलों से ही सारे चमन महकते हैं<br />
पत्थरों से नहीं मुहब्बत भरे दिल टूटते हैं</font></p>
<p><font color="#000000">दिल के ख़ाब दिल में ही सुलगते हैं<br />
हक़ीक़त के निशाँ अभी दूर लगते हैं<br />
दिल के ख़ाब दिल में ही सुलगते हैं<br />
हक़ीक़त के दर्मियाँ अभी फासले लगते हैं</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मीठी-मीठी बातें]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=727</link>
<pubDate>Fri, 08 Feb 2008 16:58:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/08/meethii-meethii-baatein/</guid>
<description><![CDATA[मीठी-मीठी बातें
वह शबनमी रातें
सब याद ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">मीठी-मीठी बातें<br />
वह शबनमी रातें<br />
सब याद हैं हमें<br />
वह रस्ते वह रिश्ते<br />
जो हमने क़ायम किये थे<br />
वादे जो हमने किये थे<br />
सब वैसे के वैसे हैं<br />
कल के जैसे-<br />
सब कुछ आज है</font></p>
<p><font color="#000000">हम तो चले तेरी डगर<br />
कुछ यादें लिए<br />
कुछ वादे लिए<br />
महकी हवाओं से<br />
बातें करते हुए<br />
हम तो चले तेरी डगर</font></p>
<p><font color="#000000">मीठी-मीठी बातें<br />
वह शबनमी रातें<br />
सब याद हैं हमें<br />
हम तो चले तेरी डगर</font></p>
<p><font color="#000000">हसीन नज़ारें हैं,<br />
अम्बर में सितारे हैं<br />
फिर भी तेरी कमी है<br />
दिल में कोई बात है<br />
उलझे हुए जज़्बात हैं<br />
सुलझायेंगे उनसे मिलके<br />
जो उलझे हुए...</font></p>
<p><font color="#000000">हम तो चले तेरी डगर<br />
कुछ वादे लिए<br />
कुछ इरादे लिए<br />
जाती बहारों से<br />
कुछ सीख लिए<br />
हम तो चले तेरी डगर</font></p>
<p><font color="#000000">मीठी-मीठी बातें<br />
वह शबनमी रातें<br />
सब याद हैं हमें<br />
हम तो चले तेरी डगर</font></p>
<p><font color="#000000"></font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ज़िन्दगी के हर्फ़ बदल गये हैं]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/08/27/%e0%a5%9b%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%97%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a5%9e-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2-%e0%a4%97%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Mon, 27 Aug 2007 18:32:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2007/08/27/zindagii-ke-harf-badal-gaye-hain/</guid>
<description><![CDATA[आइने रातभर रोते रहे
तस्वीरें रातभर जा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">आइने रातभर रोते रहे<br />
तस्वीरें रातभर जागती रहीं<br />
लम्हे उम्रभर सिसकते रहे<br />
ख़ामोशियाँ उम्रभर ख़ाक फाँकती रहीं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">यादें धूप में सूख रही हैं<br />
बातें सब मुरझा गयी हैं<br />
आँखों में दरार पड़ रही है<br />
सपने बंजर हो गये हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">आँसू बर्फ़ बन गये हैं<br />
ख़ाहिशें तिनके चुन रही हैं<br />
आरज़ू के पाँव थक चुके हैं<br />
ख़्याल ज़मीन में दफ़्न हो गये हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">साँसें सीने में भीग गयी हैं<br />
उदास सावन टपक रहा है<br />
जंगल तन्हाई में सुलगता है<br />
फूल पलकें झुकाये हुए हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">ख़ुशबू बे-सदा गल रही है<br />
पलाश के फूल हँस रहे हैं<br />
जड़ें मिट्टी सोख रही हैं<br />
पत्ते सूखी बेलों ने डस लिये हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">उजाले पत्थरों में जज़्ब हो गये हैं<br />
चाँद धुँध हो रहा है<br />
रात रेत हो गयी है<br />
सितारे रेत के दरया में बह रहे हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">दर्द तेज़ाब हो गया है<br />
और खु़शी मग़रूर रहती है<br />
मैं शब्द उगलता रहता हूँ<br />
ज़िन्दगी के हर्फ़ बदल गये हैं</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[निहारिका मे सितारों का जन्म]]></title>
<link>http://vigyan.wordpress.com/2007/01/23/starbirth/</link>
<pubDate>Tue, 23 Jan 2007 12:17:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://vigyan.hi.wordpress.com/2007/01/23/starbirth/</guid>
<description><![CDATA[﻿ब्रम्हाण्डीय नर्सरी जहाँ तारों का ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>﻿ब्रम्हाण्डीय नर्सरी जहाँ तारों का जन्म होता है एक धूल और गैसों का बादल होता है जिसे हम <strong>निहारीका </strong>(Nebula) कहते है। सभी तारों का जन्म निहारिका से होता है सिर्फ कुछ दुर्लभ अवसरो को छोड़कर जिसमे दो <strong>न्यूट्रॉन </strong>तारे एक <strong>श्याम विवर</strong> बनाते है। वैसे भी न्यूट्रॉन तारे और श्याम विवर को मृत तारे माना जाता है।</p>
<p>निहारिका दो अलग अलग कारणों से बनती है। एक तो ब्रह्माण्ड की उतपत्ती से ही है। ब्रह्माण्ड के जन्म के बाद ब्रह्माण्ड मे परमाणुओं का निर्माण हुआ और इन परमाणुओं से धूल और गैस के बादलों का निर्माण हुआ। इसका मतलब यह है कि गैस और धूल जो इस तरह से बनी है उसका निर्माण तारे से नही हुआ है बल्कि यह ब्रह्माण्ड के निर्माण के साथ निर्मित मूल पदार्थ है।</p>
<p>निहारिका के निर्माण का दूसरा तरीका किसी विस्फोटीत तारे से बने सुपरनोवा से है। इस दौरान सुपरनोवा से जो पदार्थ उत्सर्जित होता है उससे भी निहारिका बनती है। इस दूसरे तरीके से बनी निहारिका का उदाहरण <strong>वेल(</strong>Veil) और <strong>कर्क </strong>(Crab) निहारिकाये है। ध्यान रखे कि निहारिकाओ का निर्माण इन दोनो तरीकों के मिश्रण से भी हो सकता है।</p>
<p><strong>निहारिकाओ के प्रकार</strong></p>
<p><strong>उत्सर्जन निहारिका (Emission): </strong>इस तरह की निहारिकाये सबसे सुंदर और रंग बिरंगी होती है। ये नये बन रहे तारों से प्रकाशित होती है। विभिन्न तरह के रंग भिन्न तरह की गैसों और धूल की संरचना के कारण पैदा होते है। सामान्यतः एक बड़ी दूरबीन (8+ इंच) से उत्सर्जन निहारीका के लगभग सभी रंग देखे जा सकते है। तस्वीर मे सभी रंगो को देखने के लिये लम्बे-एक्स्पोजर से तस्वीर लेनी पढ़ती है।</p>
<p><strong>चील निहारिका(M16)</strong> और <strong>झील निहारिका (Lagoon या M8)</strong> इस तरह की निहारिका के उदाहरण है। <strong>M16 </strong>मे तीन अलग अलग गैसों के स्तंभ देखे जा सकते है। यह तस्वीर हब्बल से ली गयी है और इसे साधारण दूरबीन से इतना स्पष्ट नही देखा जा सकता। इस स्तंभो के अंदर नये बने तारे है, जिनसे बहने वाली सौर वायु आसपास की गैस और धूल को दूर बहा रही है। इसमे सबसे बड़ा स्तंभ १० प्रकाश वर्ष उंचा और १ प्रकाश वर्ष चौड़ा है। इसकी खोज १७६४ मे हुयी थी और यह हमसे ७००० प्रकाश वर्ष दूर है।<br />
<img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0610/eagleend_hst_big.jpg" alt="चील निहारिका" border="1" height="450" width="460" /></p>
<p align="center"><strong>चील निहारिका</strong></p>
<p>निचले दी गयी <strong>M 8 </strong>की तस्वीर भी हब्बल दूरबीन से ली गयी है। यह ५२०० प्रकाश वर्ष दूर है। इसकी खोज १७४७ मे हुयी थी। इसका आकार १४०X६० प्रकाश वर्ष है।</p>
<p><img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0303/lagoon_hst.jpg" height="300" width="390" /></p>
<p align="center"><strong>M8 निहारिका</strong></p>
<p><strong>परावर्तन निहारिका (Reflection): </strong>यह वह निहारीकाये है जो तारों के प्रकाश को परावर्तित करती है, ये तारे या तो निहारिका के अंदर होते है या पास मे होते है।  <strong>प्लेइडेस </strong>निहारिका इसका एक उदाहरण है। इसके तारों का निर्माण लगभग १००० लाख वर्ष पूर्व हुआ होगा। हमारे सूर्य का निर्माण ५०,००० लाख वर्ष पूर्व हुआ था। ये सितारे धीरे धीरे निहारिकाओ से बाहर आ रहे है।</p>
<p><img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0610/ngc1333spitzerrollover_f70_01.jpg" border="1" height="300" width="450" /></p>
<p align="center"><strong>NGC 1333 - परावर्तन निहारीका</strong></p>
<p><strong>श्याम निहारिका (Dark): </strong>ऐसे तो सभी निहारिकाये श्याम होती है क्योंकि ये प्रकाश उत्पन्न नही करती है। लेकिन विज्ञानी उन निहारिकाओ को श्याम कहते है जो अपने पीछे से आने वाले प्रकाश को एक दीवार की तरह रोक देती है। यही एक कारण है कि हम अपनी आकाशगंगा से बहुत दूर तक नही देख सकते है।</p>
<p>आकाशगंगा मे बहुत सारी श्याम निहारीकाये है, इसलिये विज्ञानियों को प्रकाश के अन्य माध्यमों का(x किरण, CMB) सहारा लेना होता है।<br />
निचले चित्र मे प्रसिद्ध <strong>घोड़े के सर </strong>के जैसी निहारिका दिखायी दे रही है। यह निहारिका एक अन्य उत्सर्जन निहारिका <strong>IC434 </strong>के सामने स्थित है।<br />
<img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0012/kellyhenden_horsehead_c.jpg" border="1" height="260" width="370" /></p>
<p align="center"><strong>घोडे के सर जैसी निहारिका</strong></p>
<p><strong>ग्रहीय निहारिका (Planetary): </strong>इन निहारिकाओ का निर्माण उस वक्त होता है जब एक सामान्य तारा एक <strong>लाल दानव</strong> (red gaint)तारे मे बदल कर अपने बाहरी तहों को उत्सर्जित कर देता है। इस वजह से इनका आकार गोल होता है। चित्र मे <strong>बिल्ली की आंखो</strong> जैसी निहारिका(Cat's Eye NGC 6543) दिखायी दे रही है। इस तस्वीर मे तारे के बचे हुये अवशेष भी दिखायी दे रहे है।<br />
<img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0611/catseye_hst.jpg" border="1" height="360" width="460" /></p>
<p align="center"><strong>बिल्ली की आंखो वाली निहारिका</strong></p>
<p>दूसरी तस्वीर <strong>नयनपटल निहारिका(Retina IC 4406) </strong>मे वृताकार चक्र उसके बाजु मे दिखायी दे रहा है। तारे का घूर्णन और चुम्बकिय क्षेत्र इसे वृताकार बना रहा है ना कि एक गोलाकार।<br />
ग्रहीय यह शब्द निहारिकाओ के लिये सही नही है। यह शब्द उस समय से उपयोग मे आ रहा है जब युरेनस और नेप्च्यून की खोज जारी थी। उस समय हमारी आकाशगंगा के बाहर किसी और आकाशगंगा के अस्तित्व की भी जानकारी नही थी।<br />
<img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0206/ic4406_hst.jpg" height="285" width="375" /></p>
<p align="center"><strong>नयनपटल निहारिका</strong></p>
<p><strong>सुपरनोवा अवशेष: </strong>ये निहारिकाये सुपरनोवा विस्फोट के बाद बचे हुये अवशेष है। सुपरनोवा किसी विशाल तारे की मृत्यु के समय उनमें होने वाले भयानक विस्फोट की स्थिति को कहते है। कर्क (Crab) निहारीका इसका एक उदाहरण है।<br />
<img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0512/crabmosaic_hst_c80.jpg" height="346" width="384" /></p>
<p align="center"><strong>कर्क निहारिका</strong></p>
<p><strong>सितारों के जन्म की प्रक्रिया</strong></p>
<p>सितारों के जन्म के पहली स्थिति है , इंतजार और एक लम्बा इंतजार। धूल और गैस के बादल उस समय तक इंतजार करते है जब तक कोई दूसरा तारा या भारी पिंड इसमे कुछ हलचल ना पैदा कर दे! यह इंतजार हजारों लाखों वर्ष का हो सकता है।</p>
<p>जब कोई भारी पिंड निहारीका के पास से गुजरता है वह अपने गुरुत्वाकर्षण से इसमे लहरे और तरंगे उत्पन्न करता है। कुछ उसी तरह से जैसे किसी प्लास्टिक की बड़ी सी चादर पर कुछ कंचे बिखेर देने के बाद चादर मे एक किनारे पर से या बीच से एक भारी गेंद को लुढका दिया जाये। सारे कंचे भारी गेंद के पथ की ओर जमा होना शुरु हो जायेंगे। धीरे धीरे ये सारे कंचे चादर मे एक जगह जमा हो जाते है।</p>
<p>ठीक इसी तरह निहारिका मे धूल और गैस के कण एक जगह पर संघनित होना शुरु हो जाते है। पदार्थ का यह ढेर उस समय तक जमा होना जारी रहता है जब तक वह एक महाकाय आकार नही ले लेता।</p>
<p>इस स्थिति को पुर्वतारा( protostar) कहते है। जैसे जैसे यह पुर्वतारा बड़ा होता है गुरुत्वाकर्षण इसे छोटा और छोटा करने की कोशिश करता है, जिससे दबाव बढते जाता है, पुर्वतारा गर्म होने लगता है। जैसे साईकिल के ट्युब मे जैसे ज्यादा हवा भरी जाती है ट्युब गर्म होने लगता है।</p>
<p>जैसे ही अत्यधिक दबाव से तापमान १०,०००,००० केल्विन तक पहुंचता है नाभिकिय संलयन(Hydrogen Fusion) की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है। अब पुर्वतारा एक तारे मे बदल जाता है। वह अपने प्रकाश से प्रकाशित होना शुरू कर देता है। सौर हवाये बचे हुये धूल और गैस को सुदूर अंतरिक्ष मे धकेल देती है।</p>
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