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	<title>सैर-सपाटा &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/सैर-सपाटा/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "सैर-सपाटा"</description>
	<pubDate>Fri, 05 Sep 2008 06:55:41 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[वरंगल का महल]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=443</link>
<pubDate>Sat, 09 Aug 2008 04:44:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ वरंगल के खंडहर हुए क़िले के सामने है मह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">वरंगल के खंडहर हुए क़िले के सामने है महाराजा रूद्रदेव की बहन का महल।</p>
<p>महल क्या है, सिर्फ़ ढांचा सा रह गया है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/07/mahal1.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/07/mahal1.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-534" /></a></p>
<p>खुले मैदान मे रह गए इस ढांचे को देख कर लग रहा था कि काले पत्थरों से बना यह महल बहुत ही आकर्षक रहा होगा। अब तो स्तम्भ और कमानें रह गई है। यह है पिछले अंतिम छोर की कमान -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/07/artht1.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/07/artht1.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-577" /></a></p>
<p>पर अब भी काकतीय वंश की लोकप्रिय वास्तुकला देखने योग्य है जिसे काकतीय कला कहते है -  </p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/07/mahal4.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/07/mahal4.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-536" /></a></p>
<p>और यह टूटा हुआ कलात्मक भाग -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/07/mahal3.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/07/mahal3.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-538" /></a></p>
<p>यह है महारानी का सिंहासन -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/07/artht2.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/07/artht2.jpg?w=300" alt="" width="300" height="224" class="alignnone size-medium wp-image-575" /></a></p>
<p>जो बड़ा सा सादे पत्थर जैसा है जिसके किनारे नक्काशीदार स्तम्भ है।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वरंगल का क़िला]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=543</link>
<pubDate>Thu, 07 Aug 2008 03:51:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ आन्ध्र पदेश का वरंगल ज़िला हैदराबाद से]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">आन्ध्र पदेश का वरंगल ज़िला हैदराबाद से चार घण्टे की दूरी पर है। </p>
<p>11 वीं शताब्दी में यहाँ काकतीय वंश का राज था। इस वंश के राजा रूद्रदेव का क़िला अब खंडहर हो चुका है। </p>
<p>क़िले की चढाई भी मैदानी भाग से की जा सकती है जो कठिन भी नहीं है। यह है मैदानी भाग -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/07/artht4.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/07/artht4.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-570" /></a></p>
<p>क़िले की ऊपरी छोर पर गोलाकार खुला भाग है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/07/artht31.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/07/artht31.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-573" /></a></p>
<p>यहाँ पहुँचने के लिए घुमावदार संकरी सीढियाँ है जिनकी संख्या अधिक नहीं है।</p>
<p>मैदानी भाग को कुछ-कुछ बगीचे की शकल दे दी गई है,  कुछ झूले भी है यानि बच्चों का पार्क जैसा बन गया है।</p>
<p>क़िले के प्राँगण में दाहिने कोने में मन्दिर है जहाँ जाने के लिए दस-बारह सीढियाँ नीचे उतरना पड़ता है। मन्दिर खुला हुआ है। यह है मन्दिर का कलात्मक स्तम्भ -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/07/mahal5.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/07/mahal5.jpg?w=225" alt="" width="225" height="300" class="alignnone size-medium wp-image-549" /></a></p>
<p>मन्दिर कुछ टूटा-फूटा सा है पर यहाँ स्थापित गणेश जी, शिवलिंग और नन्दी की कलात्मक मूर्तियाँ अच्छी दशा में है।</p>
<p>इस क़िले के सामने ही महाराज रूद्रदेव की बहन का महल है। कहा जाता है कि अपनी बहन के लिए ही महाराज ने क़िले के प्राँगण में यह मन्दिर बनवाया था जिसमें वह प्रतिदिन पूजा किया करती थी।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[श्रीशैलम में सावन और श्रावण]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=161</link>
<pubDate>Wed, 23 Jul 2008 04:07:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
<guid>http://purvaai.wordpress.com/?p=161</guid>
<description><![CDATA[ सावन में नदी, पर्वत, घाटियाँ, हरियाली ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">सावन में नदी, पर्वत, घाटियाँ, हरियाली बहुत लुभाते है। सावन के महीने में ऐसे स्थानों पर जाना और नंगे पैर हरियाली पर चलना अच्छा माना जाता है। </p>
<p>तीज मनाना, झूला झूलना इन्हीं दिनों में होता है। सावन शब्द वास्तव में श्रावण है। श्रीशैलम में सावन और श्रावण दोनों है। </p>
<p>कृष्णा नदी की पहली झलक देखते हुए हम आगे बढे और देखा कृष्णा बाँध जो कृष्णा डैम या कृष्णा रीवर डैम के नाम से मशहूर है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/sailam3.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/sailam3.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-239" /></a></p>
<p>रूई के गोलों की तरह पानी जो आगे बढ कर सफ़ेद धुँआ हो जाता है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/sailam4.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/sailam4.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-240" /></a></p>
<p>नदी में गिरते पानी का शोर अच्छा लगता है। सफ़ेद झक लगता है गिरता पानी और यहाँ नदी भी दुधिया लगती है जिस पर हल्की धूप पड़ने से नदी में इन्द्रधनुष दिखने लगता है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/sailam5.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/sailam5.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-241" /></a></p>
<p>यही है पहला नरीमन प्वाइंट। यहाँ आइसक्रीम,  कूल ड्रिंक जैसी सभी चीज़े मिलती है। पूरी चढाई में ऐसे चार नरीमन प्वाइंट्स है।</p>
<p>यह देखिए पूरी रवानगी से बहती कृष्णा नदी जो यहाँ मटमैली लग रही है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/sailam6.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/sailam6.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-242" /></a></p>
<p>मटमैलेपन का कारण है इसमें जाल डालकर मछलियाँ पकड़ना, बोटिंग करना। </p>
<p>इसी सारे रास्ते में मन्दिर और पवित्र स्थल भी है पर पहले चोटी पर स्थित मुख्य मन्दिर में पूजा-अर्चना की जाती है फिर लौटते समय उन पुण्य स्थलों को देखा जाता है। इस तरह जाते समय सावन का आनन्द और लौटते समय श्रावण का आनन्द लिया जाता है।</p>
<p>जो सिर्फ़ पिकनिक के लिए श्रीशैलम आते है वे पहले या दूसरे नरीमन प्वाइंट्स तक ही आते है। इसीलिए यहीं पर ठहरने के लिए लाँज और एकाध होटल भी है और इसके बाद ऊपर प्रमुख मंदिर तक कुछ भी नहीं है। </p>
<p>यहाँ मैं आपको एक बात बता दूँ कि आन्ध्रप्रदेश में विशेषकर हैदराबाद में स्कूल, काँलेज और घर-परिवार से भी सिर्फ़ पिकनिक के लिए भी श्रीशैलम जाते है।</p>
<p>अगले चिट्ठे में श्रावण का आनन्द।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[श्रीशैलम]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=212</link>
<pubDate>Mon, 21 Jul 2008 03:59:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ पिछले सावन में हमने श्रीशैलम की यात्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">पिछले सावन में हमने श्रीशैलम की यात्रा की। </p>
<p>हमने तभी ब्लोगिंग की दुनिया में क़दम रखा था इसीलिए चिट्ठा लिख नहीं पाए थे। अब तो हम रोज़ चिट्ठा लिख लेते है तो सोचा कि क्यों न इस सावन में प्रस्तुत किया जाए उस यात्रा का वर्णन।</p>
<p>आन्ध्र प्रदेश के कर्नूल ज़िले में है श्रीशैलम। वास्तव में देश की पूर्वी घाटियों से समुद्र के कारण पर्वत मालाएं दक्षिण की ओर खिसक आई है। इसमें सात पर्वत है जिनका आकार शेषनाग की तरह माना जाता है जिसका पुच्छ पर्वत यानि की सबसे पीछे नीचे की ओर यानि दक्षिण का पर्वत श्री शैल पर्वत कहलाता है। इसे ही दक्षिण की भाषा में श्रीशैलम कहते है। </p>
<p>श्रीशैलम पर्वत पर बने मन्दिर में स्थापित शिवलिंग मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग है जिसका बारह ज्योतिर्लिंगों में चौथा स्थान है। इसे मल्लिकार्जुन स्वामी कहते है। सावन या श्रावण मास में शिवजी की पूजा की जाती है इसीलिए इस महीने में श्रीशैलम की यात्रा की जाती है।</p>
<p>हैदराबाद से श्रीशैलम की यात्रा छह घण्टे में पूरी होती है। हैदराबाद के पुराने शहर बारकस की तंग गलियों को पार करने के बाद जैसे ही शहर और गाँव छूट जाते है आगे का रास्ता अच्छा है। सड़क अच्छी है और दोनों ओर बड़े-बड़े पत्थर देख कर यह अंदाज़ा हो जाता है कि हम पहाड़ी क्षेत्र में बढ रहे है।</p>
<p>अब यह सीधा रास्ता श्रीशैलम ही जाता है। सावन के महीने में श्रीशैलम की यात्रा अच्छी मानी जाती है। इसीलिए इस महीने में बहुत से लोग यात्रा करते है। सड़क पर लगभग सभी तरह के वाहन नज़र आ रहे थे।</p>
<p>रास्ता सिर्फ़ रास्ता ही है, खाने-पीने की कोई दुकान या ढाबा कुछ नहीं है। मगर इसका भी अपना एक सुखद अनुभव रहा। लग रहा था सभी की गाड़ियों में खाने-पीने का सामान है। वैसे भी छह घण्टे तक लगातार गाड़ी नहीं चलाई जा सकती।</p>
<p>रास्ते भर हमने देखा सभी गाड़ियाँ कुछ दूरी के बाद रूकती और किनारे पत्थरों और कुछ बिखरी हरियाली पर कुछ देर बैठते कुछ खाने-पीने का आनन्द लेते और फिर आगे बढ जाते। पूरा रास्ता चढाव है पर असली चढाई तो श्रीशैलम क्षेत्र में प्रवेश के बाद ही शुरू होती है।</p>
<p>जैसे ही प्रवेश करते है सड़क संकरी हो जाती है और दोनों ओर घने जंगल नज़र आते है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/sailam1.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/sailam1.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-235" /></a></p>
<p>कुछ दूर आगे जाने के बाद दाहिनी ओर वन क्षेत्र है जहाँ शेर है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/sailam2.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/sailam2.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-236" /></a></p>
<p>इस क्षेत्र में केवल वन विभाग में काम करने वाले और विभाग की ही गाड़ियाँ भीतर जा सकती है। भीतर क्षेत्र कितना बड़ा है कितने शेर है इसकी जानकारी वहाँ के बोर्ड पर नहीं लिखी गई है और पूछने पर भी नहीं बताई गई।</p>
<p>कुछ दूर आगे बढे तो पहली झलक मिली कृष्णा नदी की -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/sailam7.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/sailam7.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-237" /></a></p>
<p>आगे का विवरण अगले चिट्ठे में…</font> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भुवनगिरि क़िले की चढाई]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=409</link>
<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 03:53:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
<guid>http://purvaai.wordpress.com/?p=409</guid>
<description><![CDATA[ भुवनगिरि क़िले का पहला पहाड़ हमने चढ कर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">भुवनगिरि क़िले का पहला पहाड़ हमने चढ कर पार किया फिर सीढियाँ चढने लगे। </p>
<p>सीढियाँ चढते हुए दो-तीन बार मोड़ आए जहाँ चढना दुर्गम लगा -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/bhongi41.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/bhongi41.jpg?w=300" alt="" width="300" height="224" class="alignnone size-medium wp-image-427" /></a></p>
<p>यहाँ कक्ष जैसा है। कुछ देर यहाँ विश्राम किया जा सकता है। इसकी पत्थरों से बनी कमान और क़िले की बनावट देखिए साथ ही नीचे शहर भी देखा जा सकता है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/bhongi21.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/bhongi21.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-429" /></a></p>
<p>कुछ देर रूक कर फिर इन पत्थर से बनी सीढियों पर हम चढने लगे। वैसे भी पत्थर की सीढियों पर चढना कठिन होता है फिर यहाँ सफ़ाई भी अधिक नहीं थी जो हमारी दीदी को बहुत ही ख़राब लग रहा था। </p>
<p>यहाँ तक अधिकांश सीढियाँ चढ लेने के बाद जिस जगह हम आए उसे कहते है भूल-भुलैया।</p>
<p>यह जगह ऊबड़-खाबड़ है। यहाँ झाड़-झंखाड़ है, गड्ढे है। सामने नज़र आता है क़िले का ऊपरी छोर और वहाँ तक पहुँचने के लिए तीन अलग-अलग स्थानों पर सीढियाँ दिखाई देती है जिनमें से दो स्थानों की सीढियाँ आगे जा कर समाप्त हो जाएगी और किसी एक स्थान की सीढियाँ ऊपर तक जाएगी पर इन सीढियों तक पहुँचने के लिए रास्ता तलाशना है। इसीलिए इसे कहते है भूल-भुलैया -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/bhongi31.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/bhongi31.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-431" /></a></p>
<p>आगे का रास्ता हमने पहचान लिया जो चित्र में दिखाई दे रहा है। इस रास्ते को पार करने के बाद आगे अंतिम सीढियाँ है पर इन सीढियों पर चढना बहुत ही कठिन है और कठिन होना भी चाहिए क्योंकि यह अंतिम पड़ाव है।</p>
<p>यहाँ सीढियाँ बहुत ही संकरी है। कुछ सीढियाँ इतनी ऊँची है कि बैठ कर चढना पड़ा। दाहिनी ओर बड़े-बड़े पहाड़ी पत्थर बिखरे पड़े है और झाड़ियाँ भी है। सीढियों के अलावा इसी मैदानी चढाव से भी आगे बढा जा सकता है।</p>
<p>यहाँ है अंतिम पहाड़ जिसे चढ कर ही पार किया जाना है -</p>
<p><a href="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/100_3067.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/100_3067.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-368" /></a></p>
<p>सामने पहाड़ के ऊपरी छोर पर नज़र आ रहे थे पाँच कक्ष जो शायद दरबार हाँल और दरबारी कक्ष है क्योंकि हम ऊपर गए नहीं। हमें बताया गया कि इस अंतिम पहाड़ पर चढना कठिन है और उतरना और भी कठिन है। </p>
<p>इस तरह हम चोटी पर पहुँचे बिना ही नीचे उतर आए और एक घण्टे का सफ़र तय कर हैदराबाद लौट आए।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भुवनगिरि का क़िला]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=294</link>
<pubDate>Thu, 03 Jul 2008 03:56:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
<guid>http://purvaai.wordpress.com/?p=294</guid>
<description><![CDATA[ सुरेन्द्रपुरी से बाहर निकल कर हम हैदर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">सुरेन्द्रपुरी से बाहर निकल कर हम हैदराबाद लौटने लगे। </p>
<p>रास्ते में एक शहर है - भोन्गिर वास्तविक नाम है भुवनगिरि। पहले यह शहर बर्फ़ की फ़ैक्ट्रियों के लिए मशहूर था। लगभग बीस-पच्चीस साल पहले तक हैदराबाद के बर्फ़ के छोटे बड़े सभी व्यापारियों को बर्फ़ यहीं से भेजी जाती थी। </p>
<p>विशेषकर रेलवे स्टेशन और बस अड्डे के पास बर्फ़ के छोटे-छोटे बहुत से कारख़ाने हुआ करते थे ताकि हैदराबाद और वरंगल से कारख़ानों में काम करने के लिए आने वालों को सुविधा रहे। सुबह धूप तेज़ होने से पहले बर्फ़ की लारियाँ हैदराबाद की ओर दौड़ने लगती थी पर अब यहाँ ऐसा कुछ भी नज़र नहीं आया। </p>
<p>यहाँ भी आधुनिकता का रंग चढ गया है। बाज़ार बस गए है लेकिन नहीं बदला तो भुवनगिरि का क़िला। बस अड्डे के ठीक सामने। पहले सामने ही नज़र आ जाया करता था पर अब बाज़ार बसने से दुकानों के पीछे से और ऊपर से नज़र आता है। हमने भी क़िला देखने की सोची और बस अड्डे के सामने थोड़ा आगे जाकर बाईं ओर मुड़ गए। </p>
<p>थोड़ा ही आगे बढने पर नज़र आया क़िले का फाटक -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/bhongi1.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/bhongi1.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-397" /></a></p>
<p>बड़ा फाटक हमेशा ही बन्द रहता है। पास लगे छोटे से दरवाज़े से रास्ता है। फाटक से ही सामने दिखाई दे रहे है पहाड़ और दाहिनी ओर पहाड़ के नीचे हनुमान जी का छोटा सा मन्दिर है।</p>
<p>मन्दिर जाने के लिए फाटक के भीतर जाने की आवश्यकता नहीं है। फाटक से आगे एक रास्ता भीतर की ओर जाता है। मोड़ पर मन्दिर की कमान भी लगी है। थोड़ा आगे बढते ही बाईं ओर मन्दिर है। हमने मन्दिर में दर्शन किए फिर आ गए फाटक पर।</p>
<p>छोटे दरवाज़े से भीतर गए। दरवाज़े पर ही टिकट बाबू बैठा था। तीन रूपए टिकट है। टिकट देकर उसने हमें समझाया कि कैसे जाना है।</p>
<p>सामने दिखाई दे रहे पहाड़ पर चढ कर आगे बढना है। पहाड़ के बीचों-बीच एक मूर्ति है जो चित्र में फाटक के पीछे धुँधली सी नज़र आ रही है। यहाँ तेलुगु में कुछ लिखा है जो हम ठीक से समझ नहीं पाए। मूर्ति के पास तक जा सकते है पर बहुत पास नहीं जा सकते क्योंकि हमें बताया गया कि यहाँ करंट है। ख़ैर हम समझ नहीं पाए कि मूर्ति है किसकी… </p>
<p>कोई और बोर्ड भी वहाँ नहीं था जिससे हमें पता नहीं चला कि यह किस राजा का क़िला है और किसने कब बनवाया। यह जानकारी टिकट बाबू से भी नहीं मिली और वहाँ टिकट बाबू के अलावा और कोई अधिकारी या कर्मचारी नज़र नहीं आया।</p>
<p>टिकट बाबू के बताए अनुसार हम आगे बढे और पहला पहाड़ चढ कर पार किया -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/bhongi6.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/bhongi6.jpg?w=300" alt="" width="300" height="224" class="alignnone size-medium wp-image-403" /></a></p>
<p>इसके बाद बाईं ओर सीढियाँ है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/bhongi5.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/bhongi5.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-405" /></a></p>
<p>तीन सौ से कुछ अधिक ही सीढियाँ है। आगे की चढाई अगले चिट्ठे में…</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[स्वाद की चर्चा]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=199</link>
<pubDate>Sat, 07 Jun 2008 03:53:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
<guid>http://purvaai.wordpress.com/?p=199</guid>
<description><![CDATA[ यात्रा का मज़ा तब बढ जाता है जब हम वहाँ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">यात्रा का मज़ा तब बढ जाता है जब हम वहाँ के विशेष खाने-पीने का आनन्द लेते है। इस मामले में हमारी बैंग्लोर-मैसूर की यात्रा कुछ बदमज़ा ही रही।</p>
<p>शुरूवात करते है सुबह के नाश्ते से। हमने कर्नाटक के बिसिबिल भात के बारे में सुना था पर इसे खाना तो दूर हमने कभी इसे देखा भी नहीं। सोचा यहाँ तो ज़रूर मिलेगा। मीनू कार्ड में था भी पर जब आर्डर दिया तो बताया गया कि नहीं है। हमने सोचा शायद किसी और रेस्तराँ में मिले पर नहीं मिला। </p>
<p>आखिर हमने रेलवे स्टेशन पर यहाँ तक कि गली के नुक्कड़ के खोमचे वाले से भी पूछा तो वहाँ भी नहीं मिला। हमें खेद है कि यह हमारे लिए सुनी-सुनाई बात ही रह गई न हम इसे चख़ पाए और न ही देख पाए।</p>
<p>कुछ ऐसी ही स्थिति रही मैसूर भजिए की। हैदराबाद में हम बहुत खाते है मैसूर भजिए। यह दाल से बनाए जाते है। नरम-नरम गोल-गोल भजिए नारियल की चटनी के साथ शाम की चाय के साथ खाए जाते है। हमने सुना कि यह कर्नाटक की विशेषता है जैसा कि इसका नाम ही है जहाँ यह और बड़े और ज्यादा नरम होते है। पर बिसिबिल भात की ही तरह यह मीनू कार्ड पर ही रहे देखने को भी नहीं मिले, गली नुक्कड़ पर भी नहीं।</p>
<p>सुबह के नाश्ते में हमने इडली खाई। स्वाद तो वैसा ही है जैसा आन्ध्रा में होता है और खाने का तरीका भी वही है नारियल की चटनी के साथ पर देखने में इडली कुछ अलग है। आकार बड़ा गोल है पर सपाट है जबकि आन्ध्रप्रदेश में आकार में छोटी गोल और ऊपर की ओर उभार तथा किनारे दबे होते है।</p>
<p>जब बात चली है इडली की तो साँभर की भी बात हो जाए। यहाँ का साँभर भी कुछ अलग ही रहा। इसमें अरहर की दाल ज्यादा थी और सब्जियाँ कम और तीख़ापन भी कम ही था जबकि आन्ध्रा के साँभर में दाल कम होती है और टमाटर के साथ सहजन की फली और कुछ दूसरी सब्जियाँ अधिक होती है और सूखे धनिए के अधिक प्रयोग से तीख़ा भी बहुत होता है।</p>
<p>दक्षिण के भोजन की एक और खास चीज़ है दही-चावल। हैदराबाद में जो दही-चावल हम खाते है वो एकदम सफ़ेद होते है क्योंकि इसमें दही-चावल के अलावा थोड़ी सी उड़द की दाल और कभी-कभार सूखा धनिया मिलाया जाता है पर कर्नाटक के दही-चावल हमें देखने में बहुत ख़ूबसूरत लगे क्योंकि यहाँ बारीक कटे हरे धनिए का प्रयोग किया जाता है। सफ़ेद झक दही-चावल पर बारीक कटा हरा धनिया बिखरा हुआ… है न खूबसूरत…</p>
<p>अब कुछ फलों की बात करें। हैदराबाद की ही तरह हमें यहाँ भी जगह-जगह केले बिकते नज़र आए। हैदराबाद में केले को मौज़ कहते है। मौज़ के छिलकों पर काले छीटे हो तो यह छीटें वाले मौज़ अच्छे माने जाते है। इन छीटों में नैसर्गिक शक्कर होती है। कर्नाटक के केलों के छिलकों पर एक भी छींटा नज़र नहीं आया। आकार भी बहुत छोटा था पर बहुत मीठे थे इसीलिए बहुत अच्छे लगे।</p>
<p>हैदराबाद में अमरूद को जाम कहते है वैसे आन्ध्रप्रदेश में या तेलुगु भाषा में जाम पन्ड्लु कहते है। पन्ड्लु का अर्थ है फल। सभी जाम भीतर से सफेद होते है। भीतर से गहरे गुलाबी या जिसे लाल अमरूद कहते है हमने बचपन में कभी-कभार खाए थे पर कर्नाटक में तो सभी अमरूद लाल थे।</p>
<p>इस तरह खट्टी-मीठी यादें लेकर हम हैदराबाद लौट आए।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वृन्दावन गार्डन]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=206</link>
<pubDate>Thu, 05 Jun 2008 03:50:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ मैसूर में जिस अन्तिम स्थल की हमने सैर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">मैसूर में जिस अन्तिम स्थल की हमने सैर की वो है वृन्दावन गार्डन</p>
<p>यहाँ पहुँचते ही गाड़ियों का काफ़िला देख कर हम हैरान हो गए - अररे !  इतने लोग आए है सैर के लिए !</p>
<p>हमने टिकट लिया साथ में कैमरे के लिए भी पचास रूपए का टिकट लिया और भीतर जाने के लिए लाइन में खड़े हो गए। कुछ देर बाद भीतर पहुँचे।</p>
<p>बाईं ओर से आगे बढते गए। बहुत सुन्दर संवारा गया बगीचा और फव्वारे। कुछ देर रूक कर फिर आगे कुछ सीढियाँ चढते गए और देखते गए कुछ और सुन्दर बगीचे और फव्वारे। </p>
<p>फिर हमने देखा बीचों-बीच छोटी-छोटी सी सीढियाँ और उस पर पानी का रेला। देखते ही हमें याद आ गए महमूद और उनकी फ़िल्म पड़ोसन -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/05/garden1.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/05/garden1.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-219" /></a></p>
<p>सबसे ज्यादा याद आ गया वह सीन जहाँ सायरा बानो ज़ोर से पुकारती है - मास्टरजी !  और महमूद इंगेमा कहते हुए एक हाथ से लुंगी पकड़ कर तेज़ चलते हुए पूरे बगीचे का चक्कर लगाते हुए सायरा बानो के पास पहुँचते है।</p>
<p>हमें लगता है इस फ़िल्म के बाद से ही शायद यह गार्डन अधिक लोकप्रिय हुआ। ख़ैर…</p>
<p>अँधेरा होते ही पूरा गार्डन रंग-बिरंगी रोशनी में नहा गया -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/05/garden2.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/05/garden2.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-220" /></a></p>
<p>फव्वारों को देखकर लग रहा था जैसे लाल पीला हरा नीला पानी झिलमिला रहा हो -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/05/garden3.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/05/garden3.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-221" /></a></p>
<p>ऊपर कुछ फव्वारों में सुन्दर मूर्तियाँ भी लगी थी। इसके बाद हम नीचे लौट कर आने लगे और प्रवेश द्वार के पहले दूसरी ओर सैर के लिए पुल की ओर बढ गए। बीच में छोटा सा पुल दाहिनी ओर पानी जिसमें लोग बोटिंग का आनन्द ले रहे थे पर बाईं ओर पानी भी नहीं था और इस जगह को संवारा भी नहीं गया था।  </p>
<p>पुल पर सैर कर ठंडी हवा का आनन्द लेकर हम लौट आए। यहाँ चाय, काँफ़ी, फलों के रस, कूल ड्रिंक, कटे फल, आइसक्रीम जैसा सभी बिक रहा था। </p>
<p>वाकई यह अंतिम सैर बहुत ही अच्छी रही। लेकिन कोई भी यात्रा का विवरण तब तक अधूरा रहता है जब तक हम वहाँ के खान-पान की बात न करें। तो अगले चिट्ठे में हम करेगें इसकी चर्चा।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मैसूर पैलेस]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=195</link>
<pubDate>Sat, 31 May 2008 03:43:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ फिलोमिना चर्च देखने के बाद हमने दोपहर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">फिलोमिना चर्च देखने के बाद हमने दोपहर का भोजन किया। अब कार्यक्रम था महल देखने का यानि मैसूर का मशहूर पैलेस।</p>
<p>यह राजमहल मैसूर के कृष्णराजा वाडियार चतुर्थ का है। यह पैलेस बाद में बनवाया गया। इससे पहले का राजमहल चन्दन की लकड़ियों से बना था। एक दुर्घटना में इस राजमहल की बहुत क्षति हुई जिसके बाद यह दूसरा महल बनवाया गया। </p>
<p>पहले महल को बाद में ठीक किया गया जहाँ अब संग्रहालय है। हम पहुँचे इस दूसरे महल को देखने जो ज्यादा बड़ा और अच्छा है। यह है प्रवेश द्वार -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/05/palace5.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/05/palace5.jpg?w=300" alt="" width="300" height="224" class="alignnone size-medium wp-image-215" /></a></p>
<p>प्रवेशद्वार से भीतर जाते ही मिट्टी के रास्ते पर दाहिनी ओर एक काउंटर है जहाँ कैमरा और सेलफोन जमा करना है। इसका तरीका हमें बहुत अच्छा लगा। </p>
<p>कैमरा और सेलफोन लेकर वो उसे एक लाँकर में रख देते है और उस लाँकर की चाभी आपको दे देते है। हर पर्यटक का एक लाँकर और हर सेलफोन और कैमरे के लिए शुल्क पाँच रूपए। यह मैनें पहली बार देखा। </p>
<p>काउंटर के पास है सोने के कलश से सजा मन्दिर -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/05/palace3.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/05/palace3.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="aligncenter size-medium wp-image-197" /></a></p>
<p>दूसरे छोर पर भी ऐसा ही एक मन्दिर है जो नीचे दी गई तस्वीर में दूर धुँधला सा नज़र आ रहा है यानि दोनों छोरों पर है मन्दिर जो मिट्टी के रास्ते पर है और विपरीत दिशा में है महल का मुख्य भवन तथा बीच में है उद्यान -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/05/palace4.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/05/palace4.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="aligncenter size-medium wp-image-198" /></a></p>
<p>महल की इस तस्वीर को देखिए जिसमें बाईं ओर कम ऊँचाई का जो अहाता नज़र आ रहा है वहीं है महल के भीतर जाने का प्रवेश द्वार पर यहाँ बड़े से काउंटर पर जूते-चप्पल रखवाने है और नंगे पैर महल के भीतर जाना है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/05/palace24.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/05/palace24.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="aligncenter size-medium wp-image-205" /></a></p>
<p>भीतर हम पहुँचे विशाल कक्ष में जिसके किनारों के गलियारों में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर स्तम्भ है। इन स्तम्भों और छत पर बारीक सुनहरी नक्काशी है। दीवारों पर क्रम से चित्र लगे है। हर चित्र पर विवरण लिखा है।</p>
<p>कृष्णराजा वाडियार परिवार के चित्र। राजा चतुर्थ के यज्ञोपवीत संस्कार के चित्र। विभिन्न अवसरों पर लिए गए चित्र। राजतिलक के चित्र। सेना के चित्र। राजा द्वारा जनता की फ़रियाद सुनते चित्र। एक चित्र पर हमने देखा प्रसिद्ध चित्रकार राजा रवि वर्मा का नाम लिखा था। लग रहा था लगभग सभी चित्र रवि वर्मा ने ही तैयार किए।</p>
<p>चित्रों में मैसूर का दशहरा उत्सव दर्शाया गया है। पहले चित्र में सामने एक ऊँट पर मंत्री झंडा लिए है जिसका अर्थ है कि राजा का जुलूस आ रहा है। मुख्य चित्र तो बहुत ही बड़ा और बहुत सुन्दर है जिसमें हाथी पर सिंहासन पर राजा विराजमान है साथ में जनता का हुजूम चल रहा है और घरों की खिड़कियों से महिलाएँ झाँक कर जुलूस देख रही है। </p>
<p>कक्ष के बीचों-बीच छत नहीं है और ऊपर तक गुंबद है जो रंग-बिरंगे काँचों से बना है। ऐसे लग रहा था इन रंग-बिरंगे काँचों का चुनाव सूरज और चाँद की रोशनी को महल में ठीक से पहुँचाने के लिए किया गया था।</p>
<p>निचला विशाल कक्ष देखने के बाद हम सीढियाँ चढते हुए पहले तल पर पहुँचे। सीढियाँ इतनी चौड़ी कि एक साथ बहुत से लोग चढ सकें। वैसे उस दिन वहाँ भीड़ भी बहुत थी जिनमें स्थानीय लोग भी बहुत नज़र आए।</p>
<p>पहला तल पूजा का स्थान लगा। यहाँ सभी देवी-देवताओं के चित्र लगे थे। साथ ही महाराजा और महारानी द्वारा यज्ञ और पूजा किए जाने के चित्र लगे थे। बीच का गुंबद यहाँ तक था।</p>
<p>फिर हम पहुँचे दूसरे तल पर जो दरबार हाँल है। बीच के बड़े से भाग को चारों ओर से कई सुनहरे स्तम्भ घेरे थे। इस घेरे से बाहर बाएँ और दाएँ गोलाकार स्थान है। शायद एक ओर महारानी और दरबार की अन्य महिलाएँ बैठा करतीं थी और दूसरी ओर से शायद जनता की फ़रियाद सुनी जाती थी क्योंकि यहाँ से बाहरी मैदान नज़र आ रहा था और बाहर जाने के लिए दोनों ओर से सीढियाँ भी है जहाँ अब बाड़ लगा दी गई है।</p>
<p>इसी तल पर पिछले भाग में एक छोटे से कक्ष में सोने के तीन सिंहासन है - महाराजा, महारानी और युवराज के</p>
<p>आज भी इतना आकर्षक है यह महल - </p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/05/palace1.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/05/palace1.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="aligncenter size-medium wp-image-196" /></a></p>
<p>तो उस समय कैसा रहा होगा यही सोचते हुए हम बाहर निकल आए।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शेर-ए-दक्कन टीपू  सुल्तान]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=176</link>
<pubDate>Mon, 26 May 2008 03:53:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ हम उस टीपू सुल्तान के महल में घूम रहे थ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">हम उस टीपू सुल्तान के महल में घूम रहे थे जिसे शेर-ए-दक्कन का ख़िताब दिया गया था। </p>
<p>टीपू सुल्तान की जाँबाज़ी के बहुत से क़िस्से है जिनमें से एक है उनकी शेर से लड़ाई। एक बार शिकार के दौरान जंगल में टीपू सुल्तान के सामने शेर आ गया और एक जाँबाज़ सिपाही की तरह टीपू सुल्तान उससे  भी भिड़ गए। </p>
<p>जिन्होनें बहुत पहले दूरदर्शन पर संजय ख़ान का धारावाहिक द सोर्ड आँफ टीपू सुल्तान देखा हो उन्हें याद होगा कि इस घटना को संजय ख़ान पर बहुत अच्छी तरह से फ़िल्माया गया था। पर्यटकों के लिए बेचे जा रहे चित्रों में भी एक चित्र ऐसा है जिसमें टीपू सुल्तान को शेर से लड़ता हुआ दिखाया गया है।</p>
<p>यही सब देखते जानते शहर हो चुके महल में हम वाटर हाउज़ यानि स्नानघर देख कर थोड़ा ही आगे बढे कि हमने देखा यह बोर्ड लगा था   </p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/05/tipu-d1.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/05/tipu-d1.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="aligncenter size-medium wp-image-182" /></a></p>
<p>यही वह स्थल है जहाँ अंग्रेज़ों ने उस पर फायर किया था और टीपू सुल्तान के मृत शरीर को यहीं छोड़ गए थे। जहाँ उनकी मृत देह मिली उस स्थान को रेखांकित किया गया है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/05/tipu-d2.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/05/tipu-d2.jpg?w=300" alt="" width="300" height="224" class="aligncenter size-medium wp-image-183" /></a></p>
<p>यहाँ एक पत्थर लगा है जिस पर अंग्रेज़ी में खुदा है कि टीपू सुल्तान का मृत शरीर यहाँ पाया गया - द बाँडी आँफ टीपू सुल्तान वाज़ फाउंड हियर</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/05/tipu-d3.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/05/tipu-d3.jpg?w=300" alt="" width="300" height="224" class="aligncenter size-medium wp-image-184" /></a></p>
<p>हम सोचने लगे कि इतिहास का वह क्या पल रहा होगा जब सैनिक अपने सुल्तान को ढूंढते हुए वहाँ पहुँचे और वहाँ पाया अकेला पड़ा मृत शरीर उस सुल्तान का जो शेर से अकेला ही भिड़ गया था पर अपने आपको अंग्रेज़ सैनिकों से नहीं बचा पाया।</p>
<p>वहाँ से थोड़ा ही आगे बढने पर कमान नज़र आई जो कभी महल का द्वार हुआ करती थी। जैसा पहले होता था हर महल के चार दिशाओं में चार द्वार हुआ करते थे। और हम इस कमान से, महल के इस द्वार से बाहर निकल आए और आगे बढ गए मैसूर की ओर।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शहर बना टीपू सुल्तान का महल]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=175</link>
<pubDate>Fri, 23 May 2008 04:00:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ टीपू सुल्तान का मकबरा देख कर हम बाहर न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">टीपू सुल्तान का मकबरा देख कर हम बाहर निकले। आस-पास नज़र दौड़ाई तो माहौल देख कर लगा कि यह पुराना शहर है। </p>
<p>आगे बढे तो गलीनुमा सड़कें दिखाई दी। इक्का-दुक्का ताँगें भी दौड़ रहे थे। हमें पता चला कि यह टीपू सुल्तान का महल ही है जिसमें अब शहर बस गया है। </p>
<p>कुछ दूर आगे बढे तो दाहिनी ओर नज़र आई मस्जिद जिस पर अंग्रेज़ी और उर्दू मे लिखा था जामी मस्जिद। इसी मस्जिद में टीपू सुल्तान नमाज़ अदा करते थे। इस मस्जिद को सजाया संवारा गया है क्योंकि खंडहर जैसी नहीं लगी।</p>
<p>आगे बहुत दूर निकल आने पर बाईं ओर पत्थरों से बना बड़ा घर जैसा लगा जो खंडहर हो चला था। यहाँ अंग्रेज़ी में किखा था वाटर हाउज़। बताया गया कि यह टीपू सुल्तान का स्नानघर था।</p>
<p>वाटर हाउज़ से थोड़ा आगे वह स्थान है जहाँ टीपू सुल्तान ने यह संसार छोड़ा जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में…</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[टीपू सुल्तान की समाधि]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=173</link>
<pubDate>Wed, 21 May 2008 04:04:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ संगम से हम लौट कर आए। जहाँ सड़क समाप्त ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">संगम से हम लौट कर आए। जहाँ सड़क समाप्त हुई वहीं है टीपू सुल्तान का मकबरा (समाधि)</p>
<p>यहाँ तीन-चार घोड़े खड़े थे और घोड़े वाले पर्यटकों से घुड़सवारी के लिए कह रहे थे। शायद कुछ दूर तक घुड़सवारी कराई जाती है, शायद बच्चों को ही, वैसे जितनी देर हम बाहर थे हमने कोई घुड़सवारी नहीं देखी।</p>
<p>तीन-चार दुकानें सजी थी जहाँ खिलौने, गुब्बारे, टोपियाँ, चूड़ियाँ आदि बिक रहे थे। एक दुकान पर समाधि पर चढाई जाने वाली चादरें बिक रही थी।</p>
<p>हम भीतर पहुँचे। ऊँचे-ऊंचे पेड़ जिनमें से सामने ही कैरियों से लदे आम के पेड़ थे। दोनों ओर हरियाली भी थी, बाग़ की तरह संवारा भी गया था पर सामने की ओर मकबरे तक जाने वाला सीधा रास्ता मिट्टी का ही था।</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/05/makaba1.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/05/makaba1.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="aligncenter size-medium wp-image-174" /></a></p>
<p>भीतर बीच के कक्ष में तीन समाधियाँ है - बाईं ओर टीपू सुल्तान की माँ शायद आमेना या अमीना बेगम बीच में पिता हैदर अली और दाहिनी ओर टीपू सुल्तान। तीनों समाधियों पर श्रृद्धालुओं द्वारा चढाई गई रंग-बिरंगी चादरें थी। कक्ष में नीम अँधेरा था और शान्त वातावरण। देखभाल करने वाले दो-तीन व्यक्ति वहाँ मौजूद थे।</p>
<p>कक्ष से बाहर पीछे की ओर टीपू सुल्तान के परिवार वालों की समाधियाँ थी। हर समाधि पर नाम और रिश्ता लिखा था। वहाँ से हम नीचे आँगन में उतर आए।</p>
<p>आँगन में ख़ास सिपहसलारों और मंत्रियों की समाधियाँ थी जो बहुत ही व्यवस्थित क्रम में थी। दाहिनी ओर बड़ी समाधि सेनापति की थी। प्रमुख मंत्रियों की समाधियाँ थी और बाईं ओर क्रम से सिपहसलारों की। हर समाधि पर नाम, पदनाम और वो कारनामा लिखा था जिससे उन्हें वीरगति मिली थी। </p>
<p>मुझे खेद है कि एक भी नाम याद नहीं आ रहा। तुर्की नाम वैसे भी याद रखना कठिन ही होता है।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[टीपू सुल्तान के जीवन की झलक]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=167</link>
<pubDate>Thu, 15 May 2008 04:06:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
<guid>http://purvaai.wordpress.com/?p=167</guid>
<description><![CDATA[ श्रीरंगपट्टनम में टीपू सुल्तान द्वा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">श्रीरंगपट्टनम में टीपू सुल्तान द्वारा बनवाया गया रंगनाथ स्वामी मन्दिर देखने के बाद हम पहुँचे टीपू सुल्तान का म्यूज़ियम देखने। </p>
<p>बस यूँ समझिए पौराणिक काल से निकल कर हम ऐतिहासिक काल में पहुँच गए।</p>
<p>यह संग्रहालय विशाल हरे-भरे परिसर में स्थित है। बीचों-बीच सीधी कतार में रंग-बिरंगे फूलों की बहार भी है जिनमें संग्रहालय के पास लाल-लाल फूल धूप में दमक रहे थे।</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/05/museum1.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/05/museum1.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="aligncenter size-medium wp-image-168" /></a></p>
<p>संग्रहालय बाहर से सामान्य है पर भीतर पहुँचने पर लगता है जैसे किसी महल में आ गए। दीवारों और छत पर सुनहरी महीन नक्काशी। महीन नक्काशीदार सुनहरी कमानें भी थी। </p>
<p>संग्रहालय में चित्रों के माध्यम से टीपू सुल्तान के जीवन की झलक बताई गई है। जीवन की सभी महत्वपूर्ण घटनाओं के चित्र है - नन्हें टीपू से लेकर गद्दीनशीं सुल्तान तक और हर चित्र के साथ लिखा है विवरण। पिता हैदर अली,  माँ,  दादी,  अभिन्न मित्र पंडित पूर्णय्या के साथ बिताए पल भी चित्रों में है। </p>
<p>सबसे अच्छा चित्र मुझे लगा क़िले पर दुर्गम चढाई का। बड़े से कैनवैस पर क़िले के ऊपरी छोर से लेकर नीचे ज़मीन तक फैला भाग और क़िले पर कई-कई सैनिक चढाई कर रहे है। सचमुच यह चित्र उस समय के युद्ध की जीवन्त तस्वीर है।</p>
<p>सबसे मार्मिक चित्र है टीपू सुल्तान के दो राजकुमारों को अंग्रेज़ों द्वारा बन्दी बनाए जाने पर टीपू सुल्तान की ओर से सेनापति की गवर्नर से चर्चा का। दोनों राजकुमार सामने खड़े है,  उनके सामने बैठे सेनापति गवर्नर से वार्तालाप कर रहे है।</p>
<p>सबसे आकर्षक चित्र है ताजपोशी के बाद गद्दीनशीं टीपू सुल्तान। </p>
<p>एक कक्ष में हथियार प्रदर्शित किए गए है। विभिन्न बादशाहों और राजाओं द्वारा टीपू सुल्तान को भेंट किए गए छोटे-बड़े तुर्की सैनिक हथियार जैसे चाकू, कटार आदि यहाँ रखे गए है। यह छोटे आकार के चाकू टीपू सुल्तान हमेशा अपने पास रखा करते थे। इन्हीं के साथ रखी है टीपू सुल्तान की प्रसिद्ध ऐतिहासिक तलवार।</p>
<p>संग्रहालय देख कर हम बाहर परिसर में आ गए। ऊँचे पेड़ों की छाया में हरियाली पर हाथों में चप्पलें उठाए हम नंगे पैर चलने लगे तभी सुना एक महिला स्वर। नज़रे वहाँ गई तो देखा एक महिला छोटी सी कुर्सी पर बैठी है,  हाथ में पुस्तक है,  सामने तीन कतार में बच्चे अर्धगोलाकार बैठे है और सुन रहे है।</p>
<p>वाह !  क्या कक्षा है। इस तरह से टीपू सुल्तान का पाठ पढेगें तो फ़ेल होना तो दूर की बात रही बच्चों के तो इतिहास में नम्बर भी कम नहीं होंगें।</p>
<p>और हमें याद आ गई जितेन्द्र की कक्षा। बूँद जो बन गई मोती फ़िल्म में जितेन्द्र क्लास रूम में कविता न पढाकर बच्चों को प्रकृति की गोद में ले आते है और गूँज उठती है मुकेश की आवाज -</p>
<p>हरी भरी वसुन्धरा पे नीला-नीला ये गगन<br />
ये किसके बादलों की पालकी उड़ा रहा पवन<br />
दिशाएं देखो रंग भरी चमक रही उमंग भरी<br />
ये किसने फूल फूल पे किया श्रृंगार है<br />
ये कौन चित्रकार है</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रेशम और चन्दन की बहार]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=149</link>
<pubDate>Tue, 06 May 2008 04:06:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ बैंग्लोर में तकनीकी संग्रहालय देखने ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">बैंग्लोर में तकनीकी संग्रहालय देखने के बाद हमारा ख़रीददारी का कार्यक्रम था। ख़रीदने के लिए यहाँ की ख़ास दो ही चीज़े है - रेशम और चन्दन</p>
<p>यहाँ की रेशम की पारम्परिक साड़ियाँ सभी को बहुत अच्छी लगती है। प्यूर सिल्क की साड़ियाँ बहुत ही मुलायम होती है। पारम्परिक नमूने में यह बहुत अच्छी लगती है जैसे सादी (प्लेन) साड़ी पर चार इंच की बार्डर और बार्डर की ही तरह पल्लू। कुछ साड़ियों में बीच में बूटे भी है। इन साड़ियों के दाम ढाई तीन हज़ार रूपए से शुरू होते है।</p>
<p>इसके अलावा हल्के रेशम की साड़ियाँ भी थी जो कम मुलायम थी मगर अच्छी थी। डिज़ाइन भी प्यूर सिल्क की साड़ियों की तरह ही थे। यह साड़ियाँ 400 से लेकर 1200  रूपए तक मिल जाती है।  </p>
<p>इस तरह की हल्की रेशमी साड़ियाँ छोटे-छोटे कारख़ानों में भी तैयार होती है। ऐसे कारख़ाने कुछ लोग अपने घर में भी चलाते है। एक ऐसा ही कारख़ाना हमने देखा जहाँ एक कमरे में चार कोनों पर फ्रेम लगे है जिन पर साड़ी बुनी जा रही है। एक फ्रेम देखिए जहाँ कामगार साड़ी बुन रहा है -  </p>
<p><a href='http://purvaai.files.wordpress.com/2008/04/resham.jpg'><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/04/resham.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="aligncenter size-medium wp-image-151" /></a></p>
<p>सामने रेशमी धागे लटक रहे है। जो गहरा रंग दिखाई दे रहा है वो बुनी हुई साड़ी है और आगे लम्बे धागे है जिस पर धागों की आड़ी बुनाई कर साड़ी बुनी जा रही है।</p>
<p>रेशमी साड़ियों के अलावा कर्नाटक की दूसरी ख़ास चीज़ है चन्दन और चन्दन से बनी मूर्तियाँ।</p>
<p>चन्दन का उपयोग शुभ कार्यों में किया जाता है। दक्षिण में और जहाँ तक मेरी जानकारी है मुस्लिम समुदाय में भी शुभ कार्यों में महिलाएं इसे एक-दूसरे की गर्दन पर लगाती है। मुस्लिम समुदाय में शायद इसे सन्दल के नाम से जाना जाता है।</p>
<p>चन्दन पूजा सामग्री है। विशेषकर अक्षय तृतीया पर महादेव जी का श्रृंगार चन्दन से किया जाता है। चन्दन का पाउडर यहाँ पैकेटों में बिक रहा था। 100 ग्राम का पैकेट 100 रूपए में। </p>
<p>चन्दन सौन्दर्य का साथी भी है। पुराने ज़माने में हल्दी चन्दन के ही तो लेप उबटन लगाए जाते थे। यहाँ भी चन्दन के फेस पैक बहुत बिक रहे थे। 100 ग्राम के फेस पैक का डिब्बा 150 रूपए में।</p>
<p>चन्दन की जप करने की मालाएँ भी छोटे-बड़े सभी आकार के मनकों की बिक रही थी। </p>
<p>चन्दन की मूर्तियाँ एक इंच से लेकर पाँच फीट तक हमने देखी। गणपति, शिव, कृष्ण और रधाकृष्ण की ही मूर्तियाँ हमने देखी। बहुत सुन्दर मूर्तियाँ जिनकी कीमत आकार के अनुसार आठ-नौ लाख रूपए तक थी। </p>
<p>मूर्तियों के अलावा चन्दन की लकड़ी से बने ख़ूबसूरत झूले भी थे। एक झूले की कीमत तो बारह लाख रूपए तक थी। </p>
<p>इसके अलावा और कुछ ख़ास चीज़ वहाँ के बाज़ारों में हमने नहीं देखी। शेष वही था जो हमें हैदराबाद में भी मिल जाता है। बाज़ार का चक्कर लगाते-लगाते धूप भी कम हो गई थी और हम बढ गए आगे लाल बाग़ की ओर।</font></p>
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<title><![CDATA[बैंग्लोर का तकनीकी संग्रहालय]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=140</link>
<pubDate>Fri, 02 May 2008 03:57:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ शिव मंदिर से निकल कर हमने दोपहर का भोज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">शिव मंदिर से निकल कर हमने दोपहर का भोजन किया फिर तकनीकी संग्रहालय देखने गए। </p>
<p>सबसे पहले हमने देखें पुराने इंजन। एक गाड़ी का माडल देखिए </p>
<p><a href='http://purvaai.files.wordpress.com/2008/04/wagan1.jpg'><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/04/wagan1.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="aligncenter size-medium wp-image-155" /></a></p>
<p>फिर ऊपर पहले तल पर पुराने ज़माने में उपयोग में आने वाली मशीनें देखी। सिलाई मशीनों पर एक नज़र</p>
<p><a href='http://purvaai.files.wordpress.com/2008/04/machine.jpg'><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/04/machine.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="aligncenter size-medium wp-image-154" /></a></p>
<p>पुराने माडल के टेलीफोन </p>
<p><a href='http://purvaai.files.wordpress.com/2008/04/phone.jpg'><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/04/phone.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="aligncenter size-medium wp-image-153" /></a></p>
<p>पुरानी तकनीक का अच्छा संग्रह है यहाँ पर आधुनिक तकनीक देख कर हमें बहुत निराशा हुई। एक ही माडल अच्छा लगा - डायनासोर शो जिसमें एक कक्ष में एक डायनासोर रखा है। यहाँ आवाज़ की इलेक्ट्रानिक पद्धति का अच्छा प्रयोग हुआ है। </p>
<p>तेज़ आवाज़ के साथ डायनासोर का मुख आपकी ओर बढता हुआ खुलने लगता है। ऐसे लगता है जैसे डायनासोर आपको खाने आ रहा है। फिर कुछ समय बाद धीरे से गर्दन पीछे हटती है और मुँह बन्द हो जाता है। </p>
<p><a href='http://purvaai.files.wordpress.com/2008/04/dynosaur.jpg'><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/04/dynosaur.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="aligncenter size-medium wp-image-152" /></a></p>
<p>इसके अलावा भौतिकी के सिद्धान्तों पर आधारित खेल भी है। 45  मिनट का 3 डी शो भी है।</p>
<p>लेकिन आधुनिक तकनीक हैदराबाद में बिरला मंदिर परिसर में विज्ञान प्रदर्शनी में यहाँ से अधिक अच्छी तरह से प्रदर्शित की गई है।</font></p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[बैंग्लूर का लाल बाग़]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=131</link>
<pubDate>Mon, 21 Apr 2008 04:47:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ पिछले सप्ताह मैं बैंग्लूर और मैसूर घू]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">पिछले सप्ताह मैं बैंग्लूर और मैसूर घूमने गई थी। वहाँ लिए गए कुछ चित्र और जानकारी आपसे बाँटना चाहती हूँ।</p>
<p>सबसे पहले हम बैंग्लूर पहुँचे। वहाँ भी गर्मी वैसी ही रही जैसी हैदराबाद में थी, 38 डिगरी के आसपास। पहला अनुभव यही हुआ कि बैंग्लूर का मौसम भी बिगड़ गया है। सुना था यहाँ धूप तेज़ नहीं होती और हमेशा सुहावना मौसम रहता है, तो यह भ्रम टूट गया।</p>
<p>दूसरा भ्रम टूटा बैंग्लूर की सड़को का। सुना था बहुत चौड़ी सड़के है पर इतना ट्रैफिक की सड़के भी संकरी लगने लगी। कोई भी सिग्नल हम बिना रूके पार नहीं कर पाए। </p>
<p>शाम के समय हम पहुँचे लाल बाग़ जो एक व्यस्त सड़क पर है। भीतर पहुँचते ही हमने पहली यह तस्वीर ली जिसे देख कर आपको पता चलेगा कि हम पाँच बजने में पाँच मिनट कम रहने पर वहाँ पहुँचे।</p>
<p><a href='http://purvaai.wordpress.com/files/2008/04/lal-bagh1.jpg'><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/04/lal-bagh1.jpg?w=480" alt="" width="480" height="287" class="alignnone size-medium wp-image-132" /></a></p>
<p>पहली नज़र में तो लगा ही नहीं कि यह वास्तविक घड़ी है। फिर एचएमटी के बैनर के सामने इसका गहरा लाल सेकेण्ड का काँटा घूमते देखा। लकड़ी की तरह लगने वाले दोनों काँटे समय बता रहे थे। काँटों पर किसी तरह का फ्रेम नहीं। </p>
<p>हरियाली पर यह घड़ी बराबर चल रही थी और हरियाली देख कर लग रहा था कि यहाँ नियमित पानी दिया जाता है। किस धातु के बने है यह वाटर प्रूफ काँटे और हरियाली के नीचे दबी मशीन कैसे जुड़ी है इसकी तकनीकी जानकारी देने वाला वहाँ कोई नहीं था। किसी बोर्ड पर भी नहीं लिखा था। पास से भी इसे नहीं देखा जा सकता। एक निश्चित दूरी पर बाड़ बनी है इसी से इसे छू कर भी कुछ जाना नहीं जा सका। </p>
<p>240 एकड़ में फैले इस बाग़ में जगह-जगह फव्वारे लगे है। इस फव्वारे के पीछे दोनों ओर है बोनसई गार्डन जिसमें ऊँचे-ऊँचे पेड़ निश्चित दूरी पर लगे है जिससे यह सैर करने वाले बगीचे के साथ वनस्पति शास्त्र की जानकारी देने वाला उद्यान भी लगा। निश्चित रूप से यह वैज्ञानिक सलाह पर बना है।</p>
<p><a href='http://purvaai.wordpress.com/files/2008/04/lal-bagh2.jpg'><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/04/lal-bagh2.jpg?w=480" alt="" width="480" height="289" class="alignnone size-medium wp-image-133" /></a></p>
<p>इसके दाहिनी ओर लोटस गार्डन है यानि कमल की बहार। यहाँ एक बात हम आपको बता दे कि बाग़ कहने से जिस तरह फूलों के बहार की हम कल्पना करते है वो रंग-बिरंगी बहार यहाँ नज़र नहीं आई पर चारों ओर हरियाली थी।</p>
<p>आगे बढने पर एक और वैज्ञानिक दृष्टि। ग्रीन हाउज़ का नाम सुना होगा जिसकी दीवारें और छत काँच से बने होते है जिससे छन कर आने वाले प्रकाश में पौधों पर विभिन्न शोध किए जाते है।</p>
<p>ऐसा ही यह काँच का गलियारा है पर इसमें पौधे नहीं है। बीच में से गुज़र भी नहीं सकते।</p>
<p><a href='http://purvaai.wordpress.com/files/2008/04/lal-bagh3.jpg'><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/04/lal-bagh3.jpg?w=480" alt="" width="480" height="289" class="alignnone size-medium wp-image-134" /></a></p>
<p>यह बाग़ इतना लंबा चौड़ा है कि इसमें कुछ-कुछ सड़कों जैसा भी है। दोनों किनारों पर हरियाली, ऊँचे पेड़ और बीच में सड़क। शायद इसीलिए इस सड़क का नाम है ठंडी सड़क।</p>
<p><a href='http://purvaai.wordpress.com/files/2008/04/lal-bagh4.jpg'><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/04/lal-bagh4.jpg?w=480" alt="" width="480" height="290" class="alignnone size-medium wp-image-135" /></a></p>
<p>मैं चौंक गई यहाँ आ कर। बोर्ड पर ऊपर कन्नड़ भाषा में और नीचे अंग्रेज़ी में लिखा है ठंडी सड़क। शब्द हिन्दी का है पर हिन्दी में लिखा नहीं है। शायद इस जगह के लिए हिन्दी में ही उपयुक्त शब्द है।</p>
<p>मुझे अचानक यहाँ याद आ गया कि 14 वीं सदी में कर्नाटक में सरकारी काम-काज हिन्दी में होता था। आज भी हिन्दी लोकप्रिय है और कुछ ऐसे निशां हिन्दी प्रेम की गवाही देते है।</p>
<p>सबसे पीछे बीच में हरियाली समाप्त होती है और पत्थरों का टीला है जहाँ सबसे ऊपर चार पत्थर है। माना जाता है यह पत्थर  सबसे पुराने पत्थरों में से है। इस टीले से नीचे पूरा शहर नज़र आता है।</p>
<p>बाग़ में बीच में आइसक्रीम, चिप्स जैसी चीज़ें भी खरीद कर खाई जा सकती है। यानि एक लम्बा समय आप यहाँ आराम से गुज़ार सकते है।</font></p>
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