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	<title>हास्य-आलेख &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/हास्य-आलेख/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "हास्य-आलेख"</description>
	<pubDate>Fri, 29 Aug 2008 14:31:31 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[ब्लाग लिखने में दहाड़ना कहां होता है,पूछों (टैगों)के फटकारने में बहुत दम होता है-व्यंग्य आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=222</link>
<pubDate>Sat, 23 Aug 2008 07:15:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक वरिष्ठ ब्लागर ने आज एक पाठ लिखा। उस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक वरिष्ठ ब्लागर ने आज एक पाठ लिखा। उसमें उनकी शिकायत थी कि हमारे पाठ दहाड़ते बिल्कुल नहीं है पर पूंछें (टैग) उनमें अधिक लगी होती हैं। वह वरिष्ठ ब्लागर हैं,और उनके प्रति मेरे मन में मैत्री भाव है। सच तो यह है कि वह एक विद्वान व्यक्ति हैं और कम से कम मैं मानता हूं कि वह अध्ययन करने वाले व्यक्ति हैं। यही कारण है कि उनके सभी पाठ ब्लागवाणी पर तत्काल शीर्ष पर पहुंच जाते हैं। वह एक सज्जन व्यक्ति हैं और इन हिट के बारे में शायद उनका अधिक अध्ययन नहीं है और इसलिये उन्होंने ऐसे विषय पर लिखा जिसके बारे में उनको विस्तृत रूप से जानकारी लेनी  चाहिए थी। वह अपने पाठ में तमाम तरह के संशय से भरे लगते हैं। एक तरफ वह लिखते हैं कि सुरेश चिपलूनकर आक्रामक लिखते हैं दूसरी तरफ उनको दहाड़ कम दिखाई देती है। जहां तक मेरा सवाल है मैं तो हमेशा ही लिखता आया हूं कि ऐसं दहाड़ने वाले पाठ लिखने का कोई लाभ नहीं है जो फोरमों पर हिट दिलवायें और आम पाठक के लिये किसी मतलब के न हों। वैसे उन वरिष्ठ ब्लागर  के पाठों पर भी बहुत कुछ लिखने लायक मेरे पास है पर वह जल्दी निराश हो जाते हैं, और इसलिये मैं उनका नाम भी नहीं दे रहा।  केवल इस पाठ के माध्यम से अपने ब्लाग मित्रों और पाठकों को समझाना भर है कि अंतर्जाल एक बड़ा व्यापक मायाजाल भी है। ब्लाग स्पाट पर सक्रिय ब्लागर लेखक कभी भी वर्डप्रेस के ब्लाग को नहीं समझ पाते। उनको यह पता ही नहीं कि वहां के लेखक क्या कर रहे हैं और क्यों नहीं उनकी परवाह करते? वर्डप्रेस के ब्लागर फोरमों से जुड़े हैं पर उनके लिखने और पढ़ने का दायरा बहुत व्यापक है। अभी एक अंग्रेजी ब्लागर ने मेरा नाम लिये बिना लिखा था कि हिंदी का एक ब्लागर वहां की श्रेणियों और टैगों का सर्वाधिक उपयोग कर रहा है और अन्य ब्लाग लेखकों को ऐसा ही करना चाहिए था। उसका यह पाठ ब्लागस्पाट के ब्लाग नहीं देख सकते थे क्योंकि वह वर्डप्रेस के डेशबोर्ड के बारे में जानते तक नहीं हैं<br />
............................................................................................</p>
<blockquote><p><strong>मेरे द्वारा उस ब्लाग पर लिखी गयी टिप्पणी<br />
आपने बहुत अच्छा सवाल किया है। दरअसल मैंने ब्लाग के बारे में सवा दो वर्ष पहले मैंने एक पत्रिका में पढ़ा था। उस समय कंप्यूटर और इंटरनेट कनेक्शन होने के बावजूद मेरा इरादा ब्लाग बनाने का नहीं था क्योंकि मुझे बनाना ही नहीं आता था। जब बनाया तो जो उसमें पढ़ा था उसकी खास बातें मुझे याद रहीं जो यहां आपको संक्षिप्त में बता देता हूं क्योंकि उसमें बताये गये निर्देशों पर ही मैं चल रहा हूं।<br />
1.अपने ब्लाग पर नियमित रूप से लिखते रहें। इस बात की परवाह न करें कि उसकी लंबाई चैड़ाई कितनी है। कुछ पोस्ट पाठकों को नापसंद भी आ सकते हैं, पर आप लिखें।<br />
2.अपने ब्लाग पर अधिक से टैग या श्रेणियां लगायें क्योंकि वही आपके लिखे पाठ को वहां ले जायेंगी जहां आप भेजना चाहते हैं। अगर आप अंग्रेजी में नहीं लिखते तो भी अंग्रेजी के टैग लगायें क्योंकि आम पाठक अंग्रेजी शब्दों से सर्च करता है। जितने आप टैग लगाते हैं उतने ही शब्दों पर आपका ब्लाग खुलता है।<br />
3.टिप्पणियेां की चिंता बिल्कुल न करें न इस बात की परवाह करें कि कितने लोगों ने इसे पढ़ा। आप तो यह सोचिये कि कितने लोग इसे पढ़ने वाले हैंं।<br />
4.अखबार एक दिन बाद कबाड़ हो जाता है और  किताबें अल्मारी में बंद हो जाती हैं पर आपका ब्लाग हमेशा ही हवा में तैरता रहेगा। यही सोचकर लिखते रहें।<br />
5.आने वाला समय ब्लाग लेखकों के लिये उज्जवल है। </p>
<p>संयोगवश सुरेश चिपलूनकर और मैं मध्य प्रदेश के हैं, और लिखने में कहां हैं यह तो आप मित्र तय करते हैं। मैं तो लकीर का फकीर हूं। जिस बात का मुझे ज्ञान है उस विषय पर मैं किसी की नहीं सुनता और जिस बात का नहीं हैं उसके बारे में    दूसरे का सुनकर या पढ़कर उसी राह पर ही चल पड़ता हूं जब तक कोई विपरीत ज्ञान प्राप्त न हो क्योंकि जीवन में आगे बढ़ने के लिये इतना तो करना ही पड़ता है।  अधिक टैग लगाने का कोई लाभ नहीं है अगर यह बात आप या कोई अन्य ब्लाग लेखक मुझे समझा दे तों ऐसा नहीं करूंगा। वैसे जिस ब्लाग को आपने दिखाया है उसमें सबसे अधिक टैग और श्रेणियां हैं ओर पाठक भी अधिक यहीं हैं। आपका लिखा बहुत अच्छा लगा। सच तो यह है कि मैं आपसे भी बहुत सीखता हूं। आपके इस प्रयास की सराहना करता हूं।<br />
दीपक भारतदीप<br />
 </strong></p></blockquote>
<p>.................................................................<br />
मार्च में (शायद आठ मार्च) को उन वरिष्ठ ब्लाग लेखक महोदय ने  अपने ब्लाग पर टिप्पणियां न आने पर निराशा व्यक्त की। सारे के सारे ब्लागर टिप्पणी की रस्म अदायगी करने पहुंच गये। आज भी इस समय तक इस 12 टिप्पणियां उनके पास हैं और शाम तक यह संख्या बढ़ जायेगी। यह पाठ जो मै लिख रहा हूं हो सकता है कि एक  टिप्पणी के लिये भी  तरस जाये। ब्लागवाणी पर उनके पाठ को पांच पसंद लगी हुईं हैं और यह शायद मेरा यह  एक को तरस जाये। हां, मैं जाकर एक पसंद का बटन दबाकर आऊंगा। आमतौर से मैं ऐसा नहीं करता।  मतलब साफ है कि हम लोग फ्लाप ब्लागर है इसलिये हिट के लिये अधिक टैग लगाते हैं और वह मिलती भी हैं। मेरे पांच पाठ ऐसे हैं जिन्होंने किसी भी एक फोरम पर एक टिप्पणी भी नहीं पायी वह अब दो हजार पाठक संख्या को पार करने वाले हैं। छह ऐसे ही पाठ 1000 हजार को पार करने वाले है। पूरा देश दहाड़ रहा है। टीवी चेनल दहाड़ रहे हैं। मगर होता क्या है जब तक आदमी के दिलोदिमाग पर प्रभाव न हो। अभी चार दिन पहले तक देश के सब टीवी चैनल दहाड़ रहे थे कि अमुक मुक्केबाज स्वर्ण पदक लायेगा मगर हुआ क्या? दहाड़ने से एनर्जी जाती है भइया! शांति से अपनी बात कहने में जो प्रभाव होता है वह दहाड़ने में नहीं होता।</p>
<p>           यह आश्चर्य की बात है कि कई बार समझाने के बावजूद मेरे महापुरुषों के संदेश वाले ब्लाग से लोग छेड़छाड़ करते हैं आज भी इस ब्लाग का मनस्मृति का पाठ लिया गया है। अब बताईये क्या मैं उनके संदेशों को लेकर दहाड़ता! फिर भई दहाड़ने वाले पाठ लिखता हूं तो लोग कहते हें कि -’आप तो छोडि़ये कहां चक्कर में पड़ गये।<br />
दिलचस्प बात यह है कि मेरे पाठ को उन्होंने लिंक किया एक पाठक  ने उसे पढ़ा है बाकी नौ लोगों ने देखा भी नहीं और टिप्पणी लगा दी। इनमें मेेरे सबसे प्रिय मित्र उड़न तश्तरी ने यह भी नहीं देखा कि वहा क्या पढ़ रहे हैं और क्या लिख रहे हैं। दरअसल मैं पूरे प्रकरण में हंस रहा हूं और ऐसे ही यह पाठ लिख रहा हूं। मैं भी अपनी टिप्पणी लिख कर लौट आया पर बाद में देखा कि मेरे इसी ब्लाग से आठ महीने बाद फिर छेड़छाड़ की गयी है। पिछली जनवरी में जब इस पर पंद्रह पाठ भी नहीं थे इसे पांच अंक की रेटिंग देखकर प्रचारित किया गया था।  अब जब मैंने यह पाठ देखा तो लगा कि  प्रतिवाद आवश्यक हैं वरना तो कोई भी मेरे इन अध्यात्म ब्लाग से छेड़छाड़ कर सकता है। <a href="http://teradeep.blogspot.com"><strong>अंतर्जाल पत्रिका,</strong></a> <a href="http://dpkraj.blogspot.com"><strong>शब्दलेख सारथी </strong></a>और यह शब्दलेख पत्रिका मेरे तीन ऐसे ब्लाग हैं जिन पर मैं बहुत संवेदनशील रहता हूं इसलिये यह सभी अलग रख दिये हैं इन पर अन्य कोई सामग्री नहीं लिखता। शायद यह पाठ पच्चीस पाठक ब्लागवाणी पर जुटा लेगा क्योंकि इससे अधिक तो मुझे भी छद्म और फर्जी लगेंगे। पसंद शायद एक ही मेरा किया होगा। मुझे फोरमों पर नकली हिट की परवाह भी नहीं हैं। हमारे पाठ ब्लागवाणी पर सिंहासन नहीं मांगते इसलिये  अपनी पूंछों पर ही बैठते हैं क्योंकि वह कभी जमीन पर कभी आसमान पर उड़ते है। 195 या 120 हिट प्रतिदिन भला ब्लागवाणी पर कौन दिला सकता है? यह पूंछें ही हैं जो पाठक का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती हैं। हां देखते हैं जरा उड़न तश्तरी के चरण कमल कहों है? उन्होंने अपनी टिप्पणी में वहां यही मांग रखी थी। फिर उनको यही जवाब है कि महाराज पूंछे अधिक लगाने वाले थोड़े ही दहाडते हैं बल्कि दहाड़ने वाले तो मूंछों को लंबा चैड़ा रखते हैं। मूंछे यानि हिट तो उनके पाठों के पास हैं फिर काहे हमारे पाठों की पूछों से हैरान होते है।</p>
<p>.................................................................<br />
.........</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है। इस ब्लाग से संबद्ध अन्य यह ब्लाग भी संबद्ध हैं<br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com">1.शब्दलेख सारथी</a><br />
<a href="http://terahdeep.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blgospot.com">3.दीपक भारतदीप की चिंतन पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अंतर्जाल पर प्रयोग के विकल्प अधिक हैं-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=137</link>
<pubDate>Wed, 28 May 2008 17:36:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=137</guid>
<description><![CDATA[यहां हर कोई दूसरे को उपदेश देने में मा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>यहां हर कोई दूसरे को उपदेश देने में माहिर है। मुझे अपने हिंदी ब्लाग जगत के साथियों पर बहुत हंसी आती है। जब वह स्वयं तो यहां के साथियों को सलाह देते हैं और फिर उनको कोई बाहर से सलाह देता है तो यहां आकर उसे डाल देते हैं। ऐसा लिखो, ऐसा दिखो वगैरह वगैरह। </p>
<p>मैं यह कभी नहीं कहता कि यह मत लिखो या ऐसे मत दिखो। हां, अगर किसी के लिखे से संतुष्ट नहीं हूं या असहमत हूं तो उस पर लिख सकता हूं। अगर मैं आपसे किसी विषय पर असहमत हूं तो यह नहीं कहूंगा कि‘ऐसा दोबारा मत लिखना’। मैं तो आपके लिखे पर अपनी प्रतिक्रिया आपके ब्लाग पर भी लिख सकता हूं या अपने ब्लाग पर प्रतिवाद रूप से पाठ भी लिख सकता हूं। आपको यह सलाह नहीं दूंगा कि इस विषय पर मत लिखो। हां, कभी यह आग्रह कर सकता हूं कि इस विषय पर लिखे। अंतर्जाल पर कंप्यूटर पर लिखना  और बाहर लिखने में बहुत अंतर है। यहां आपको गागर में सागर भरनी ही है। मैं अक्सर यही कहता हूं कि हिंदी का स्वर्णकाल-जिसे भक्ति काल भी कहा जाता है-  शायद इसलिये ही भारत में लोकप्रिय हुआ क्योंकि तत्कालीन कवियों और संतों ने अपनी बात संक्षिप्त रूप से कही पर उसका प्रभाव इतना है कि आज भी उनकी रचनाओं की लोकप्रिय में कमी नहीं आई। मुझे तो हैरानी इस बात की है कि कबीर और रहीम के दोहे केवल यहां टंकित कर देने से ही उनके लिए इतने सारे पाठक मिल जाते हैं जितने कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। हां, मुझसे कुछ लोगों ने कहा कि मैं उनकी व्याख्या अपनी तरफ से अवश्य किया करें। मैंने उनकी वर्तमान संदर्भ में व्याख्या प्रारंभ की तो लोगों के प्रतिक्रिया और भी अधिक सकारात्मक रहीं </p>
<p>इसके अलावा हमारे संस्कृत में हमारे प्राचीन ग्रंथों में जो श्लोक हैं वह भी गागर में सागर का प्रतीक हैं। कोई इस बात को माने या माने चाणक्य, विदुर नीति, और भृतहरि शतक की लोकप्रियता चैंकाने वाली है। यह ब्लाग जिस पर मैं लिख रहा हूं वह केवल 101 वीं पोस्ट है और इस पर पढ़े जाने वाले पाठों की संख्या 10 हजार के पार कल हो जायेगी-ऐसा अनुमान है-और इसमें केवल वही संदेश हैं जो सदियों से इस देश में मौजूद हैं।  इतनी कम पोस्ट में यह आंकड़ा पार होना मेरी सफलता का नहीं बल्कि उन महापुरुषों की तपस्या और सिद्धि का प्रतीक है जिन्होंने ऐसी महान रचनाएं प्रस्तुत कीं। आशय यह है कि पढ़ने वाले अपनी सुविधानुसार अपना विषय ढूंढ लेते हैं। आप जो विषय लिख रहे हैं उसको पढ़ने वाला पढ़ेगा। साथ ही यह भी है कि आप जिस विषय को नहीं पढ़ते इसका आशय यह नहीं है कि कोई और नहीं पढ़ेगा। </p>
<p>अगर हम किसी से कहते हैं कि ब्लाग लेखकों को संंबोधित करते हुए पाठ कम लिखें जायें मगर सवाल यह है कि वह पढ़े जाते हैं।  सच तो यह है कि ब्लाग पर लिखे गये विषयों को भी मैं खोलता हूं। वहंा आपसी चर्चाओं और विवादों को मैं भी पढ़ता हूं। उनको ब्लागवाणी पर हिट मिले हुए होते हैं फिर भी पढ़ता हूं। साहित्यकारों पर छींटाकसी हुई उसके प्रतिवाद में मैंने लिखा। अगर वह पाठ नहीं लिखा जाता तो मैं भी नहीं लिखता। मैंने फिर भी उसमें यह कहीं नहीं लिखा कि ‘यह पाठ नहीं लिखा जाना चाहिए‘। अगर कोई ऐसा पाठ फिर लिखा गया और मेरी दृष्टि में आया तो फिर लिखूंगा। मैंने ब्लाग लेखकों पर एक व्यंग्य लिखा था ‘तेरे विरह में हास्य कविता लिखता हूं।‘ इसे एक पत्रिका को भेजा तो उसने ब्लाग लेखक को बंदा लिख कर प्रकाशित किया। मेरे इसी व्यंग्य को अभी तक पांच सौ लोग पढ़ चुके हैं। इसी तरह सास बहु का ब्लाग भी पाठकों द्वारा पढ़ा जा रहा है। मैं जब कोई ब्लागर पर व्यंग्य लिखता हूं तो वह किसी कवि या लेखक पर भी हो सकता है। वह किसी धनपति पर भी सकता है।  मतलब वह ब्लागर के व्यक्तिगत जीवन पर  हो सकता है और वह सभी का एक जैसा होता है। मैं अपने व्यंग्यों में ब्लागर को इसलिये लाता हूं ताकि   मेरे पाठ दोनों तरफ के रास्तों पर जाकर अपना लक्ष्य प्राप्त करें। जब पत्रिका ब्लागर की जगह बंदा कर काम चला सकती है तो पाठक भी ब्लागर को को कोई पात्र मानकर व्यंग्य और कहानी का आनंद उठा सकता है। </p>
<p>ब्लाग लेखकों के लिखे पर टिप्पणियां करना आसान है पर कोई स्वयं वैसा लिखकर बताये तो जाने। अगर आप हमेशा  तीन सौं या चार सौ शब्दों में अपना पाठ  लिखें और आलोचना उसकी करें जो  हजार शब्दों का पाठ लिखता हैं तो जमता नहीं है। तीन सौ चार सौ शब्दों के पाठ से याद आया कि कृतिदेव के यूनिकोड टूल आने के बाद अब लोग संभवतः बड़े पाठ लिखने सहजता से लिखने लगे हैं। इसलिए कुछ लोग अधिक आक्रामक हो रहे हैं और हम यह मान लें कि धीरे-धीरे सभी संभल जायेंगें। वैसे यहां किसी का किसी पर बस नहीं है पर नकारात्मक विचारों के साथ चलने वाले अधिक लंबी पारी नहीं खेल पाते। दूसरा यह भी एक थककर बैठेगा तो दूसरा आयेगा। हां, सकारात्मक विचार वालों को थोड़ा धीरज रखना पड़ेगा। उनको ऐसे आते जाते लोगों को देखना और पढ़ना होगा। यह आशा करना तो बेकार है कि हमेशा ही सुंदर शब्दों के फूल यहां बरसेंगे। कभी कभी अभद्र शब्दों के कांटे भी दिखेंगे। इसके बावजूद जो मुझे अपना मित्र समझते हैं उन्हें भी यह समझना चाहिए कि यहां कोई दूसरा ब्रह्मा नहीं हैं। हो सकता है कि कभी अब एक दूसरे के पाठों पर असहमति वाली टिप्पणियां करें तो उसको कभी अन्यथा लेना चाहिए। दूसरा यह कि अगर आप असहमत हैं तो भी टिप्पणी लगा जरूर दीजिये न कि यह सोचें कि ब्लाग लेखक नाराज हो जाये। </p>
<p>अंतर्जाल पर प्रयोग की बहुत गुंजायश है यह बात मैंने बहुत पहले समझ ली थी। अक्सर लोग मेरे अधिक ब्लाग होने की बात करते हैं। कुछ लोगों ने यह टिप्पणी भी है कि ‘लोग इधर उधर से सफल होने के लिए अधिक ब्लाग बना रहे हैं। वह कभी सफल नहीं हो सकते।‘ मैं ऐसा नहीं कहता कि उन्होंने एसा क्यों  कहा। हां उनकी बात का जवाब यह है किःजनाब यह अंतर्जाल है। ब्लाग एक हों या बारह वह एक ही है। मेरे मित्रों ने चार-चार ब्लाग का पता लेकर केवल एक-एक   ब्लाग ही  पकड़ा है उससे वह सभी पर जाते हैं-इतना ही नहीं मेरे मित्र उन सब ब्लाग लेखकों के नाम तक याद रखते है जो मेरे ब्लाग पर लिंक है। </p>
<p>इसके अलावा इन अलग अलग ब्लाग से जो अनुभव प्राप्त हुए हैं वह ऐसे हैं जो शायद वही प्राप्त कर सकते हैं जो अधिक ब्लाग बनाते हुए सब पर सक्रिय रहते हैं। अंतर्जाल पर कई ब्लाग लेखक ऐसे हैं जो मुझे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। मेरे कुछ ब्लाग तो ऐसे हैं जो फोरमों पर न होने के बावजूद अपने लिए पाठक जुटा रहे है। तकनीकी रूप से दक्ष कुछ ब्लाग लेखक मेरे सभी ब्लाग से परिचित हैं। मेरी इस चेतावनी के बावजूद कि मेरे यह ब्लाग प्रयोग के लिए हैं कुछ फोरमों ने अपने कब्जे में लिए हैं। इन प्रयोगों के निकले निष्कर्षों पर चर्चा फिर कभी करूंगा। बहरहाल इतना अवश्य कहना चाहता हूं कि बिना सोचे समझे किसी पर टिप्पणी मत करो। यहां ऐसे प्रयोगों की गुंजायश बहुत हैं और उनके लिए कौन क्या कर रहा है पता नहीं। उसके क्या ध्येय और निष्कर्ष वही जानता है जो ऐसा कर रहा है।  </p>
<p>दूसरी बात ऐसी टिप्पणियां करने वाले वेब साइटों वाले ब्लाग  लेखक हैं जिनके ब्लाग की क्षमता अधिक है और वह अपने आप निर्भर है जबकि ब्लाग की क्षमता उससे कम होती है और फिर यह दूसरे पर निर्भर है। कई बार ऐसा भी होता है कि ब्लाग स्पाट या वर्ड प्रेस का एक ब्लाग नहीं खुलता तो दूसरा खुल जाता है। सर्च इंजिनों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है यह अधिक ब्लाग होने के कारण ही पता चला। कुल मिलाकर हमें अपने लिखे पर ध्यान देना चाहिए। लिखों और जरूर लिखों। में बहुत रूढ़ किस्म का आदमी हूं। कोई चीज अगर पढ़ लेता हूं तो तब तक उस पर चलता हूं जब तक उसके विपरीत नहीं चलता जब तक दूसरी बात सामने न आये। अपने ब्लाग बनाने से छह महीने पहले मैंने कहीं पढ़ा था कि अपने ब्लाग पर नियमित रूप से लिखो। चाहे जो लिखो पर लिखते रहो। मैंने यही राह चुनी। इसके विपरीत अभी तक कोई बात मेरे सामने नहीं आयी। इसलिये यह भी लिख दिया जो मेरे मन में था। मेरे यही ब्लाग कल दस हजार की संख्या पार कर सकता है और इस पर आज मुझे अपना पाठ रखना ही  था और यही विषय मेरे समझ में आया।  </p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[होली के रंग फीके, मन है बेरंग-पर्यावरण पर चिंतन ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=116</link>
<pubDate>Sat, 22 Mar 2008 06:36:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=116</guid>
<description><![CDATA[पिछले वर्ष होली का लिखा चिंतन कल मैंने]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले वर्ष होली का लिखा चिंतन कल मैंने अपने एक ब्लोग पर छापा तो आज कोई दूसरा चिंतन लिखने का मन ही  नहीं हुआ। वैसे देखा जाये तो कल ही कई ब्लोगरों ने होली मनाकर अपने सारे रंग खर्च कर दिए और आज लग रहा है सब खाली हो गए हैं। इसलिए सब पोस्टों पर कोई व्यंग्य की  धार  नजर नहीं आ रही है। मैंने भी कल हास्य कवितायेँ तो लिख दीं पर आज मन नहीं कर रहा है। आज मैं अकेले में बैठकर चितन  करता हूँ  वह हो नहीं रहा और जो हास्य है उसके लिए मन नहीं है। </p>
<p>अनेक लोगों में मुझे अपने ब्लोग पर होली की बधाई दी है पर मेरे संस्कारों में अलग-अलग पर्वों पर लोगों से खुशी से मिलने की आदत तो है पर मुहँ से या लिखकर देने की नहीं है। हाँ दीपावली मेरा मन पसंदीदा त्यौहार है और उस पर कई दिन पहले ही मेरा मन प्रफुल्लित हो उठता है जबकि होली आते आने वाली परेशानियों का सामना करने की सोचता हूँ। इसकी वजह यह हो सकती  है कि  दीपावली पर सूर्य नारायण  दक्षिणायन होते हैं और इस धरती पर शीतलता की वृद्धि होती है जबकि  होली के बाद सूर्य उत्तरायण होते हैं और ग्रीष्म ऋतू बढ़ने वाली होती है। बिगड़ते हुए पर्यावरण, महंगाई, सामाजिक तनावों और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों ने लोगों के मन में सभी पर्वों के प्रति उत्साह कम  कर दिया है। आज से डेढ़ वर्ष पूर्व दीपावली पर चिकन गुनिया जैसी बिमारियों  का प्रकोप इतना था कि उससे त्रस्त लोग दीपावली भी नहीं मना सके थे। शहर के जिस घर में जाता लोग  बीमार मिलते-सच तो यह है कि उस समय शहर में किसी के घर जाना नरक जैसा लगता था। हम शहर के बाहर रहते हैं इसलिए उसका प्रकोप न के बराबर था। उससे मुझे यह बात समझ में आयी कि आक्सीजन की उपलब्धता घनी बस्तियों में कम होने के कारण भी कई बीमारियाँ फैलतीं हैं। </p>
<p>इस बार होली से पहले ही मौसम ने कई लोगों को बीमार कर दिया। दिन में मई जैसी लू की अनुभूति होने और शाम को ठंड होने से लोगों के लिए बहुत सारी परेशानी हुई। पानी की दिक्कत जब सर्दियों में दिखाई देती हो तो गर्मी में क्या होगा? शहरों में जनजीवन का हाल यह है कि थोडा से दिनचर्या में बदला पूरे दिन को बर्बाद कर देता है। मैं अपनी बोरिंग को लेकर संशय में हूँ और गर्मी में वह कितना साथ देगी यह सोचकर चिंतित हो रहा हूँ। फिर कल अखबार में छपा था कि  इस वर्ष की गर्मी पिछले कई रिकार्ड तो देगी। पर्यावरण से आदमी बेखटके खिलवाड़ कर रहा है।जब भीषण गर्मी होती है और सांस लेने में परेशानी होती है तब  ऐसे में अपने घर के बाहर खडे  उस वृक्ष का ही सहारा मिलता है-वह  गर्मी में शीतलता देता है। हमारे घर के बाहर एक सरकारी विभाग ने दो पेड़ लगाए थे। एक को पशु खा गए थे दूसरे को बचाने के लिए चारों तरफ बबूल के ढेर लगा दिए। वह बच गया और आज उसका जो सहारा है वह हमें पता है। कई लोगों ने पेड़ों की जमीन पर पक्के चबूतरे बनवा लिए हैं और अब वह इस पर्यावरण के प्रदूषित होने के लिए दूसरों पर जिम्मेदारियां  थोपते नजर आते हैं। उनकी बातें मजाक लगतीं हैं। अक्सर सोचता हूँ कि अब होली पर मजाक लिखने की क्या जरूरत है लोग तो साल भर ऐसा सुख प्रदान करते हैं।</p>
<p>पिछले कई वर्षों से बरसात प्रयाप्त नहीं हो रही और पेड़ों और पशुओं के स्थानों पर आदमी कब्जा करने में लगा है। हाय-हाय सब मचाये हुए हैं।जो प्राणवायु(ऑक्सीजन) और जल हमारे जीवन का आधार है उसकी कोई चिंता नहीं करता। एक परिचित  सज्जन से मैं इस विषय पर चर्चा कर रहा था तो उनके साथ खडे  दूसरे सज्जन बोले-''हमारे गुरु कहते हैं कि अधिक चिंता न करो। नहीं हो रही बरसात तो न हो। पेड़ काटने से ऑक्सीजन कम हो रही है, पानी का जल स्तर कम हो रहा है, इनकी चिंता करने आदमी और अधिक बीमार होता है। हम तो पहले ही बीमारियों से परेशान है और अगर इस बात की फिक्र करेंगे तो और बीमारी बढ़ जायेगी।''<br />
मैं उन सज्जन से परिचित नहीं था इसलिए हंस दिया पर मेरे परिचित  सज्जन ने उससे कहा--'तुम्हारे गुरु ने तुम्हें यह नहीं बताया कि अपने घर के बाहर खडे पेड़ को कटवाकर बीडी-सिगरेट बेचने वालों की दूकान मत लगवाओ। यह नहीं बताया कि पेड़ों में देवताओं का वास होता है। कौनसे गुरु हैं तुम्हारे जो तुम्हें कहते हैं कि  भविष्य की चिंता मत करो। तुम्हें दीपक की बात कड़वी लग रही हैं क्योंकि इसकी बात में कोई सच  है जो तुम्हारी पोल खोल रहा है। मुझे तो बहुत आनंद आ रहा है।''<br />
फिर तो वह दोनों विवाद करने लगे और मैं अपने परिचित  सज्जन से  विदा लेकर चला आया। यह एक वास्तविकता है कि पर्यावरण प्रदूषण के लिए सब दोषी हैं और इसलिए सब इससे कतराते हैं। पर्यावरण का मामला मेरी दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है और इस होली पर इसी पर ही अधिक विचार होना  चाहिए। सब कहते हैं कि मौत तो सबको एक दिन आनी है पर मौत से पहले ही शरीर का खराब स्वास्थ्य आदमी को इतना लाचार बना देता है कि उसका जीवन नरक हो जाता है। लोग अपने मन और शरीर की विकारों को साथ लिए हुए फिर रहे हैं और दूसरों को त्रास देने वाली बातें क्यों करते हैं. यह सोचने का विषय है।होली के रंग अब बिलकुल फीके हो चुके हैं और जो एक-दूसरे पर डाल  रहे हैं उनके मन भी बेरंग हैं। लोग दिखाने के लिए यह पर्व माना रहे हैं पर उनके दिल कितने खुश है? किसी दूसरे पर दृष्टिपात करने की बजाय यह आत्ममंथन का विषय है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक बेकार खबर को खींचने की कोशिश-आलेख ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=80</link>
<pubDate>Sun, 03 Feb 2008 10:03:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=80</guid>
<description><![CDATA[कल आस्ट्रेलिया के हावर्ड में श्री लंक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कल आस्ट्रेलिया के हावर्ड में श्री लंका के स्पिनर मुरलीधरन  की टांग में किसी लड़के द्वारा अंडे मारने की घटना हुई थी. यह खबर भारतीय टीवी चैनलों द्वारा दिखाई गयी थी. इसमें एक चैनल के संवाददाता जो ब्रिस्बेन थी उसने अपने चैनल को जो जानकारी दी उसके अनुसार कुछ लड़के आपस में एक दूसरे को अंडे मार रहे थे उसमें से एक मुरली की टांग में लगा और यह एक मामूली बात थी.</p>
<p>इसी संवाददाता के कथानुसार उसने मुरली से बात की थी और उसने बताया कि यह कोई ऐसी बात नहीं है जिस पर कुछ कहा जाये.  शुरू में वह चैनल जो इसे नस्लवाद और आस्ट्रेलिया के दर्शकों द्वारा एशियाई खिलाडियों की बदतमीजी के इतिहास से जोड़ रहा था अपनी खबर से पीछे हट गया. इस खबर को सुनने के बाद पहले मेरे को भी लगा के अब यह दूसरा बवाल मचेगा पर उस संवाददाता की जानकारी के बाद  इस बात की संभावना ख़त्म हो गयी लगी. </p>
<p>उस चैनल ने फिर इस खबर को आगे नहीं बढाया, पर दूसरे समाचार चैनल इसे रात तक सुनाते रहे. नस्लवाद के साथ अन्य  तमाम तरह की विवेचना करते रहे. तब मुझे हैरानी हो रही थी कि क्या वह एक दूसरे पर नजर नहीं रखते कि हो सकता है कुछ वहाँ से भी मिल जाये-ऐसे ही आत्म मुग्ध होकर भागे जा रहे हैं. कल की इस घटना से एक बात साफ हो गयी है कि अपने देश में पैसा और प्रतिष्ठा खूब अर्जित कर लें पर उनमें व्यवसायिकता का अभाव है. ऐसा नहीं होता तो यह खबर अन्य चैनल रात तक नहीं घसीटते. </p>
<p>यह व्यवसायिकता का तकाजा है कि अपने प्रतिदंद्वी पर भी नजर रखो और देखो वह किस तरह की रणनीति अपना रहा है. जो खबर भारतीय समयानुसार दोपहर १२ बजे तक अपना महत्त्व खो चुकी थी एक चैनल के अलावा बाकी  चैनल रात नो बजे तक ताजा रखने का प्रयास किया यह इस बात का प्रमाण है कि उनमें काम करने वाले लोग अधिक कुशल नहीं है.<br />
आप चाहे किसी क्षेत्र में रहें अपने प्रतिद्वंदियों और मित्रों दोनों पर दृष्टि रखो तभी उसमें आप निरंतर प्रदर्शन करते रह सकते हैं. भले ही हम लोगों को ब्लाग से पैसा नहीं मिल रहा पर फिर भी हमें अपना ब्लोग लिखने के साथ दूसरों का भी पढ़ते रहना चाहिए.  अभी तक मेरा आंकलन तो यही कहता है कि वही लेखक बहुत अच्छा लिख रहे हैं जो दूसरों को पढ़ते हैं और उस पर अपनी एक राय कायम करते हैं. जो लोग दूसरों का लिखा हुआ ब्लोग नहीं देखते वह अभी तक इस विधा को पूरी तरह समझ नहीं पाए और इसलिए उनके नैराश्य का भाव उनकी पोस्टों पर भी झलकता है. मुझे तो देखते ही पता लगता है कि कौन ब्लोगर दूसरों को पढता है और कौन नहीं. लिखने के लिए कई ब्लोगों पर भी विषय मिलते हैं और इसके लिए कहीं बाहर जाने की जरूरत नही. ब्लोग पर भी कई लोग बाहर से लिए गए विषयों पर लिखते हैं और यहाँ उनको पढ़ने का मतलब यह है कि आपको बाहर उसके जाने के लिए जरूरत नहीं है.</p>
<p>बहरहाल चाहे कोई भी काम क्यों न करें उसमें अपने कार्य को लेकर आत्ममुग्ध नहीं होना चाहिए के हम ही श्रेष्ठ हैं और न ही अपने ह्रदय में कुंठा पालना चाहिए कि हम ऐसा नहीं कर सकते. दोनों स्थितियों में हम न कुछ नया सीख पाते है न कर पाते हैं. भारतीय चैनल पैसा तो खूब कमा रहे हैं पर आज भी बी.बी.सी. और सी.एन.एन. का मुकाबला नहीं कर पाते क्योंकि उनमें वैसी व्यवसायिकता नहीं है. आखिर नौ घंटे तक ऐसी मुर्दा खबर में  प्राण फूँकने की कोशिश करने को किसी  भी प्रकार से  कार्य कुशलता नहीं कहा जा सकता.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कैसे करते हैं वारे-न्यारे-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=79</link>
<pubDate>Sat, 02 Feb 2008 15:00:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[आया फंदेबाज फिर घर और बोला
&#8221;दीपक बाप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आया फंदेबाज फिर घर और बोला<br />
''दीपक बापू यह भी भला क्या<br />
किताबों की  नक़ल छापते हो<br />
कभी लिखते किसी के समझ में<br />
न आने वाला चिंतन<br />
और कभी हास्य कविता लिखकर<br />
बस उसे ही झांकते हो<br />
कभी गरीबों पर भी लिखो<br />
भले ही उनका कल्याण मत करो<br />
पर उनके झंडाबरदार बनते दिखो<br />
तभी बनोगे नंबर वन ब्लोगर<br />
अभी तो खाली-पीली हांकते हो'</p>
<p>सुनकर चौंके और फिर  कीबोर्ड पर<br />
नाचती उंगलियाँ रोकी<br />
उतारी सिर से टोपी<br />
और चश्में को किया नाक पर<br />
कहैं दीपक बापू<br />
''अभी टीवी पर देखी थी हमने  एक खबर<br />
तुम तो होगे उससे भी बेखबर<br />
किया था एक डाक्टर ने<br />
फिर फिल्म में पुलिस वाले का रोल किसी टाईम<br />
करता था इधर गरीबों की किडनी उखाड़कर<br />
अमीरों को लगाने का क्राईम<br />
सब धंधों में हैं उसका नाम<br />
भले आदमी के लिए बचा है कोई काम<br />
इधर गरीबो के कल्याण के लिए  नारे लगाते<br />
उधर उसके लिए आती मदद अपनी<br />
जेब में ही कर जाते<br />
क्या उनकी तरह हम भी नारे लगाकर<br />
करें गरीबों का कल्याण<br />
हमारे यहाँ वर्जित हैं बताना किया गया दान<br />
रहा हमारे लिखने का सवाल<br />
उससे भला क्या मचेगा बवाल<br />
गरीबी पर लिखा या फिल्म में रचा<br />
अमीर देशों में अंग्रेजी में ही बिकता<br />
वहाँ नहीं है दर्द इस देश के गरीबों जैसा<br />
इसलिए लिखने वाले कमा लेते<br />
उन पर लिख कर पैसा<br />
हम लिखें क्या जिन्होंने लिया<br />
उनके दर्द को बेचने का ठेका<br />
वह भी हारने लगे  है<br />
अमीरों का राज  चलेगा<br />
यह वह भी मानने लगे<br />
गरीबों के दर्द पर लिखने से<br />
उनकी गरीबी दूर होती तो हम भी<br />
कई वाद चलकर नारे लगाते<br />
अपने लिए बहुत सारे सामान  जुटाते<br />
पर ऐसे में अपने से दूर हो जाते<br />
तुम ने भी खूब सुने हैं वाद और नारे<br />
देखा होगा कैसे करतें हैं लोग<br />
गरीब की जमीन और किडनी छीनकर<br />
अपने वारे-न्यारे<br />
फिर अब इसके लिए हमारे<br />
कीबोर्ड पर क्यों झांकते हो<br />
------------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मैं बिकने लायक नहीं लिख सकता-चिंतन और कहानी ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=77</link>
<pubDate>Fri, 01 Feb 2008 16:33:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=77</guid>
<description><![CDATA[उसने कहा-&#8221;तुम अच्छा लिखो!&#8221;
मैंने पू]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>उसने कहा-''तुम अच्छा लिखो!''<br />
मैंने पूछा-''क्या अच्छा लिखूं<br />
उसने कहा-''वह जो लोगों को अच्छा लगे.''<br />
मैंने पूछा-लोगों को क्या अच्छा लगता है.''<br />
उसने कहाँ-''ऐसा जिससे मजा आये.''<br />
मैंने पूछा-''मजा कैसे आता है.''<br />
उसने कहा-''जैसे लगा हो कि कुछ लिखा है!''<br />
मैंने कहा-''कैसे लगेगा!''<br />
उसने कहा-''अगर सब मैंने बताया तो तुम्हारे लेखक  होने का क्या मतलब रह जायेगा?''<br />
मैंने कहा-''मैं तो बिना मतलब का लेखक हूँ.<br />
उसने कहा-''इसलिए तुम्हें कोई पूछता नहीं है.<br />
मैंने कहाँ-''पर मैंने कब चाहा कि कोई मुझे पूछे.<br />
उसने पूछा-''फिर लिखते क्यों हो?<br />
मैंने कहा-''क्योंकि मैं  लिख सकता हूँ.<br />
उसने कहा-''इससे तुम्हें क्या फायदा?<br />
मैंने कहा-''फायदा यानि क्या?''<br />
उसने कहा-''तुम्हें कुछ पैसे मिलते हैं?''<br />
मैंने कहा-'' मुझे पैसे चाहिए क्यों?''<br />
उसने कहा-''तुम जानते हो पैसे बिना सम्मान नहीं होता."<br />
मैंने कहा-''पर जिनके पास पैसा हैं उनका क्या सम्मान है?''<br />
उसने कहा--''सारी दुनिया उनके इर्द-गिर्द घूमती हैं. सब उनको सलाम करते हैं.<br />
मैंने कहा-''पर मैं नहीं चाहता कि दुनिया मेरे इर्द-गिर्द घूमे, सब मुझको सलाम करें.<br />
उसने कहा-''फिर तुम पैदा क्यों हुए?''<br />
मैंने कहा-''मरने के लिए.''<br />
उसकी बौखलाहट बढ़ गयी-''तुम कुछ नहीं कर सकते. जैसा चाहते हो लिखो. मेरा विचार था कि मेरे कहे अनुसार लिखो तो कुछ तुम्हें पैसे दूं.''<br />
मैंने कहा-''तुम क्लर्क कम लेखक  ढूंढ लो, वही सिर्फ तुम्हारे कहे अनुसार लिख सकते हैं.<br />
उसने कहा-''तुम क्यों नहीं लिखते?''<br />
मैंने कहा''अगर तुमने या तुम जैसे किसी शब्द की व्यापारी ने ही  ही कुछ पैसे दिए होते तो तुम्हारे कहे अनुसार लिखता. अब आजाद लिखते-लिखते गुलामों जैसा लेखन मेरे बस का नहीं.''<br />
उसके चेहरे पर हताशा के भाव थे, उसने पूछा-''तुम्हें भूख नहीं लगती. तुम नहीं चाहते रोटी कमाना.''<br />
मैंने कहा-''तुम मेरी फिक्र क्यों करते हो.''<br />
उसने कहा-''तुम अच्छा लिखते हो, पर कुछ लोगों के पढ़ने के  लिए लिखो.ताकि मैं  उसे बाजार मैं  बेच सकूं.<br />
मैंने कहा-'' बिकने लायक लिख पाता तो तुम मुझसे बात कर सकते थे? क्या तुम मुझसे बिना तय किये मिल सकते थे? तब मैं तय करता था कि किसको मुझसे मिलना चाहिऐ कि नहीं. और यकीनन तुम्हारा नाम उसमें नहीं होता. तुम जैसे धनपति तो सड़क पर  कारों  में मारे-मारे  पर फिर रहे हैं.<br />
उसने खामोशी  ओढ़ ली.<br />
मैंने कहा-''तुम जाओ, बहुत लोगों को तुम्हारी जरूरत है? बिकने वाले लोगों की भीड़ तुम्हारा इन्तजार कर रही है  मैं बिकने लायक भी लिख सकता हूँ पर तुम उसकी कीमत नहीं चुका सकते. मुझे प्यार की भूख है, जो तुम्हारे दिल में कभी नहीं हो सकता. तुम उसका भी व्यापार कर सकते हो. तुम चाहते हो कि मैं कोई लड़के-और लडकी के प्यार पर लिखूं और तुम उसे बेच सके. तुम्हें बहुत लिखने वाले मिल जायेंगे. ''<br />
जाते हुए उसने कहा-''तुम लिखते तो अच्छा था, पर मैं भी शब्दों का व्यापारी हूँ और तुम्हारे कहे अनुसार पैसे नहीं दे सकता.<br />
मैंने कहा-''तुम मेरे कहे अनुसार पैसे नहीं दे सकते और मैं तुम्हारे कहे अनुसार लिख नहीं सकता. फिर मेरे पास आये क्यों?''</p>
<p>उसने मेरी तरह देखा और फिर मैंने उसके वापस जाते हुए क़दमों की आहट सुनीं.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ बाप-बेटे का होता झगडा-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=73</link>
<pubDate>Tue, 29 Jan 2008 15:42:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=73</guid>
<description><![CDATA[एक आदमी ने दूसरे से पूछा
&#8221;क्या टीवी प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक आदमी ने दूसरे से पूछा<br />
''क्या टीवी पर सास-बहु के सीरियल से<br />
तुम्हारी माँ-और पत्नी के बीच भी<br />
कभी झगडा होता<br />
दूसरे ने जवाब दिया<br />
''घर में हैं दो ही टीवी<br />
मेरी पत्नी और माँ ही<br />
बैठकर देखती<br />
दोनों के पसंद<br />
अलग-अलग धारावाहिक<br />
मुझे और पिताजी को तो<br />
कभी भी  अपनी पसंद का धारावाहिक<br />
देखना कहाँ नसीब होता<br />
शोर से दूर तीसरे कमरे में<br />
अपने पिताजी के पास बैठता<br />
इस वजह से सास-बहु का तो नहीं<br />
हम बाप-बेटे के ही बीच<br />
रोज  किसी बात पर  झगडा होता<br />
----------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[या इसे भ्रमवश लिखा मान लेना- हास्य आलेख  ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/23/yaa-ise-bhram-vash-likha-man-lena-hasy-aalekh/</link>
<pubDate>Wed, 23 Jan 2008 16:46:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/23/yaa-ise-bhram-vash-likha-man-lena-hasy-aalekh/</guid>
<description><![CDATA[हमारा देश भी अजीब है लोग लिखते हैं और स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>हमारा देश भी अजीब है लोग लिखते हैं और सोचते हैं कि कोई सम्मान मिलेगा पर जब उनको कोई सम्मानित नहीं करता तो निराश हो जाते हैं. कई पुरस्कार आते हैं और लोग उनको अपनी झोली में आता देखना चाहते हैं. आखिर ऐसा क्यों है लोग स्वान्त सुखाय लिखें तो उनके लेखन में जो धार आयेगी  उसे तभी महसूस कर सकते हैं जब ऐसा करें .</strong></p>
<p>लीजिये साहब एक और पुरस्कार आ गया, मैंने कहा था कि ऐसे पुरस्कार आते-जाते रहेंगे. ३५ बरसों से साहित्य जगत में रहे हैं इसलिए ऐसे पुरस्कारों को बारे में अपनी एक राय है और इसे अपने ब्लोगों पर लिखता रहा हूँ. जिन लोगों का चयन किया गया है उनमें सबको बधाई देता हूँ और उनके लिखी पोस्टें मैंने देखीं हैं और सब बढिया लिखते हैं. मेरा इन सब महानुभावों से निवेदन हैं कि मेरी इस पोस्ट को अपने ऊपर कोई कटाक्ष के रूप में न लें. कम से कम इनमें जो वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं उनसे तो कतई ऐसी आशा नहीं करूंगा कि वह इससे रुष्ट होंगे. जी हाँ मैं माननीय आलोक पुराणिक का नाम ले रहा हूँ. वह इन ब्लोग पर  मेरे सबसे  प्रिय लेखक हैं. लिखने में उनका कोई सानी इस हिन्दी ब्लोग में तो नहीं है.<br />
आखिर मैं  भी व्यंग्यकार हूँ  और जानता  हूँ  कि व्यंग्य लिखना कितना कठिन है और हमारे लिए तो और भी मुश्किल है क्योंकि यूनिकोड में सीधे लिखते हैं तो वैसा नहीं लिख पाते, पर जैसे भी है अपना यह व्यंग्य तो पूरा करेंगे ही.<br />
सबसे पहले नारद के ही कर्णधार एक  कथन की बात करें जो  एक चर्चा में  हमारे पास आया था शब्दश: हमें  याद नहीं पर उसका आशय यह था कि  वेब साईट को ब्लोग नहीं माना जा सकता. समय भी बता देते हैं उन दिनों चिट्ठाजगत में ब्लोग के वर्ग में बांटने की बात चल रही थी और उसी समय नारद के इन कर्णधार ने अपनी बात रखी  थी-अगर वह मुकर जाएं तो इस बात को हमारी तरफ से समझ लेना. हम ब्लोग जगत में अपनी बात लादने में यकीन  नहीं करते पर जब हमें लगता है कि कोई गड़बड़ है तो लिखते हैं अपनी बात  अपनों से.<br />
हम केवल  पुरुष वर्ग के चिट्ठों की ही बात कर रहे हैं क्योंकि उसमें ही कुछ विचारणीय मुद्दे हैं. उसमें दस नहीं छ: ब्लोगर हैं. अगर इस पुरस्कार का नाम अंतर्जाल पर लिखने वाले सर्वश्रेष्ठ लेखक के रूप में होता तो शायद हम कुछ नहीं कहते. मगर जनाब आपने लिखा है सर्वश्रेष्ठ चिट्ठाकार. क्या बात है चिट्ठाकार मिलते  नहीं क्या? या वेब साईटों को उनके कंधे पर रखकर चलना चाहते हो? दूसरा क्या वर्डप्रेस पर कोई अच्छा ब्लोगर ही नहीं है या यह मान  लिया गया है कि वहाँ तो लिखने वाले फ्री फंड में लिख रहे हैं तो उनका क्या? हाँ. वह के लिखने वालों में में सबको जानता हूँ और सच यह है कि वहाँ ऐसे लेखक हैं जो लिखते अच्छा हैं पर किसी को कतिपय कारणों से रास नहीं आते तो अलग बात है. पहले एक कतिपय पुरस्कार में भी हमारे ब्लोग को इसलिए जलील किया गया था.हम किसी के लिखे में भेद नहीं करते पर हमें दिख रहा है कि कुछ और भी मामले हमें समझ में नहीं आये. </p>
<p>खैर मेरे नये और फ्लॉप ब्लोगर साथियों, ऐसे पुरस्कारों से विचलित होने की आवश्यकता नहीं है. ऐसे और भी बहुत सारे पुरस्कार आयेंगे और जायेंगे. अपना लिखना जारी रखो. हिन्दी साहित्य लिखते ३० वर्ष से अधिक हो गया है. ठीक से याद नहीं आता पर हमने जैसे ही हिन्दी सीखी वैसे ही  वैसे ही साहित्य वह भी गद्य में लिखना शुरू किया. इन ब्लोगों में हमने व्यंग्य लिखें हैं पर लोग शिकायत करते हैं कि बडे हैं और जो वास्तविक रूप में हैं वह सदा फॉण्ट में हैं और इनामों के विषय  पर लिखने का खास शौक है. कुछ वर्ष पत्रकारिता में काम के अनुभव की वजह से ऐसी बातें हमें याद रह जातीं हैं जो सामान्य लोग याद नहीं रख सकते और ऐसे तथ्य भी आ जाते हैं जिस पर दूसरों की नजर नहीं जाती. आम ब्लोगरों को लिखते रहना चाहिए. अगर उनको सम्मान चाहिऐ तो किसी लाबी से जुड़ें या इनाम चाहिऐ तो उसके दो   तरीके हैं कि  आर्थिक रूप से फायेदेमंद होना पडेगा या आप उसके प्रचार में सहभागी  बने. मैंने अपने साथ के कई ऐसे लेखकों देखा है जो बिना सम्मान और पुरस्कार के खुद के सुख के लिए लिखते हैं.<br />
सब अपने चिट्ठे के मालिक हैं और यहाँ किसी की जागीर नहीं है. आपके पुरस्कार देने के अधिकार को में चुनौती नहीं देता पर जब इतने सारे ब्लोगर हैं और देश के कोने-कोने से हैं उनको सन्देश देना भी मैं  ठीक समझता हूँ ताकि उनका मनोबल बना रहे, आखिर कोई यह व्यक्तिगत  बात नहीं है. यह ब्लोग जगत मेरी जागीर नहीं है और यह किसी की  भी नहीं है, पर ऐसी चालाकियाँ देश के अन्य हिन्दी ब्लोगरों का मनोबल गिरा सकतीं है उन्हें अपने काम में लगे रहने का सन्देश देती मेरी यह  एक पोस्ट. सभी चयनित व्यक्तियों को बधाई सन्देश के साथ. उम्मीद करते हैं कि इस विषय पर कोई दूसरी पोस्ट लिखनी नहीं पड़ेगी. आज ही एक बढिया आलेख लिख कर लाये थे सोचा उसे टाईप करेंगे, पर लगता है कि २६ जनवरी तक हमें ऐसे ही पुरस्कारों से जूझना पडेगा. कई जगह झगडे चल रहे हैं. हमने यह मुद्दे विवाद खडे करने के लिए नहीं उठाये हैं और अगर आप इसे अंतर्जाल पर सर्वश्रेष्ठ लेखक का पुरस्कार कर दें तो वाकई  कोई मुद्दा नहीं है और वर्डप्रेस का मामला तो माना भी जा सकता है कि दस में नहीं आया होगा पर यह मैं  अपनी तरफ से कह रहा हूँ बाकी दुसरे लेखकों की वही जाने.  यह पोस्ट वहीं जाने वाली है, मेरे अपने हलके और फ्लॉप ब्लोग पर.   </p>
<p>   हमने पहला पैरा भी ऐसा लिखा है कि लगे ही नहीं कि कोई खास बात है और शीर्षक  भी ऐसे ही लगाया है कि अधिक लोग इसे न पढना चाहें और विवाद न बढे. चिट्ठजगत का चजई भी नहीं लगा रहे कि इनाम देने के चक्कर में कोई इसे पढे नहीं और फिर भी अगर विवाद खडा हो गया तो हमारी जिम्मेदारी नहीं है.<br />
खैर मेरे नये और फ्लॉप ब्लोगर साथियों, ऐसे पुरस्कारों से विचलित होने की आवश्यकता नहीं है. ऐसे और भी बहुत सारे पुरस्कार आयेंगे और जायेंगे. अपना लिखना जारी रखो. हिन्दी साहित्य लिखते ३० वर्ष से अधिक हो गया है. ठीक से याद नहीं आता पर हमने जैसे ही हिन्दी सीखी वैसे ही  वैसे ही साहित्य वह भी गद्य में लिखना शुरू किया. इन ब्लोगों में हमने व्यंग्य लिखें हैं पर लोग शिकायत करते हैं कि बडे हैं और जो वास्तविक रूप में हैं वह सदा फॉण्ट में हैं और इनामों के विषय  पर लिखने का खास शौक है. कुछ वर्ष पत्रकारिता में काम के अनुभव की वजह से ऐसी बातें हमें याद रह जातीं हैं जो सामान्य लोग याद नहीं रख सकते और ऐसे तथ्य भी आ जाते हैं जिस पर दूसरों की नजर नहीं जाती. आम ब्लोगरों को लिखते रहना चाहिए. अगर उनको सम्मान चाहिऐ तो किसी लाबी से जुड़ें या इनाम चाहिऐ तो उसके दो   तरीके हैं कि  आर्थिक रूप से फायेदेमंद होना पडेगा या आप उसके प्रचार में सहभागी  बने. मैंने अपने साथ के कई ऐसे लेखकों देखा है जो बिना सम्मान और पुरस्कार के खुद के सुख के लिए लिखते हैं.<br />
सब अपने चिट्ठे के मालिक हैं और यहाँ किसी की जागीर नहीं है. आपके पुरस्कार देने के अधिकार को में चुनौती नहीं देता पर जब इतने सारे ब्लोगर हैं और देश के कोने-कोने से हैं उनको सन्देश देना भी मैं  ठीक समझता हूँ ताकि उनका मनोबल बना रहे, आखिर कोई यह व्यक्तिगत  बात नहीं है. यह ब्लोग जगत मेरी जागीर नहीं है और यह किसी की  भी नहीं है, पर ऐसी चालाकियाँ देश के अन्य हिन्दी ब्लोगरों का मनोबल गिरा सकतीं है उन्हें अपने काम में लगे रहने का सन्देश देती मेरी यह  एक पोस्ट. सभी चयनित व्यक्तियों को बधाई सन्देश के साथ. उम्मीद करते हैं कि इस विषय पर कोई दूसरी पोस्ट लिखनी नहीं पड़ेगी. आज ही एक बढिया आलेख लिख कर लाये थे सोचा उसे टाईप करेंगे, पर लगता है कि २६ जनवरी तक हमें ऐसे ही पुरस्कारों से जूझना पडेगा. कई जगह झगडे चल रहे हैं. हमने यह मुद्दे विवाद खडे करने के लिए नहीं उठाये हैं और अगर आप इसे अंतर्जाल पर सर्वश्रेष्ठ लेखक का पुरस्कार कर दें तो वाकई  कोई मुद्दा नहीं है और वर्डप्रेस का मामला तो माना भी जा सकता है कि दस में नहीं आया होगा पर यह मैं  अपनी तरफ से कह रहा हूँ बाकी दुसरे लेखकों की वही जाने.  यह पोस्ट वहीं जाने वाली है, मेरे अपने हलके और फ्लॉप ब्लोग पर.   </p>
<p>   हमने पहला पैरा भी ऐसा लिखा है कि लगे ही नहीं कि कोई खास बात है और शीर्षक  भी ऐसे ही लगाया है कि अधिक लोग इसे न पढना चाहें और विवाद न बढे. चिट्ठजगत का चजई भी नहीं लगा रहे कि इनाम देने के चक्कर में कोई इसे पढे नहीं और फिर भी अगर विवाद खडा हो गया तो हमारी जिम्मेदारी नहीं है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चजई-चिट्ठा जगत ने दी इस ब्लोग को स्थाई सुरक्षा-हास्य आलेख ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/22/is-blog-ka-sthai-surksha/</link>
<pubDate>Tue, 22 Jan 2008 16:36:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/22/is-blog-ka-sthai-surksha/</guid>
<description><![CDATA[ चलो अपना यह ब्लोग http://rajdpk.wordpress.com अब फिर सं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> चलो अपना यह ब्लोग http://rajdpk.wordpress.com अब फिर संकट में अब नहीं आयेगा. आज  चिट्ठा जगत वालों ने हमें एक ईमेल भेजा कि  अपने-अपने चिट्ठे छांट लो और उन्हें पढो. हमें बड़ी तसल्ली हुई, अब ख़तरा टल  गया. यह काम अपने सलाहकारों से मिलकर पहले ही कर लेना चाहिए था. हमारा ब्लोग गलती से उनके पास चला गया. वैसे चिट्ठाजगत वाले भी हमारा ब्लोग नहीं पढ़ते होंगे. नहीं तो अपने सलाहकारों से कुछ अधिक रेटिंग जरूर दिला देते. उन्होने अपने इस बदलाव में  दो लोगों के नाम लिए हैं उनमें से एक को मैं  जानता हूँ उनमें एक नारद के कर्णधार हैं  और मैंने उनके हाल ही में एक आलेख पढा था उसमें उन्होने कुछ ऐसी टिप्पणियाँ की थी जो...................अब चिट्ठाजगत वाले ही बता सकते हैं. किसके कहने पर किया है भईया  यह परिवर्तन  ज़रा चेक कर लेना क्योंकि हम नारद के इन कर्णधार को बहुत मानते हैं. अगर उन्होने सलाह दी है तो अच्छी बात है. हम इस हिन्दी ब्लोग में उन्हें सबसे अधिक तकनीकी जानकारी रखने वाले मानते हैं. </p>
<p>यह नारद के कर्णधार भले और सहृदय है. अगर उन्होने सलाह दी है तो ठीक ही दी होगी. सोचा होगा कि यह दीपक भारतदीप १२ ब्लोग बनाए बैठा है और गलती से इसके ब्लोग कहीं भी चले जाते हैं, और पिटकर लौट आते हैं और फिर यह शोर मचाता है और हास्य कविताओं की बौछार करता है जिससे कुछ  ब्लोगरों को एलर्जी है. जहाँ तक मेरी जानकारी है उनके आलेख में मुझे कोई ऐसी बात नहीं लगी थी कि वह इस तरह की दीवार उठाने की बात कर रहे हों वह तो लिख रहे थे कि  अपनी मनपसंद ब्लोगरों को भी ऐसे ही पढा जा सकता है. इस बदलाव के उन्होने कोई वकालत नहीं की थी, हो सकता है कि हमें ''तकनीकी ज्ञान' कुछ कम है और   हमारे समझ में नहीं आया हो. </p>
<p>वैसे चिट्ठाजगत वाले अपनी मर्जी के मालिक हैं. पर  हम उनको याद दिला दें कि  हम उन अपने सहृदय मित्र के ब्लोग पर कमेन्ट भी लगा कर आये थे कि ''तकनीकी ज्ञान होने से सींग नहीं लग जाते और वह भी प्रमाणित होना बाकी है'. मुझे नहीं लगता कि यह उनकी सलाह के अनुसार है. तुम्हारे कोई और सलाहकार हों तो  वह आप जानो. यह आपका परिवर्तन उन्हीं के काम का  हो सकता है. कम से कम एक बात है कि वह हमारे ब्लोग पर दृष्टिपात नहीं करेंगे और हम भी मनचाहे लिख सकेंगे. सम्मान-फम्मान गया तेल लेने.वैसे भी जो चिट्ठे  जो ब्लोग मेरे  प्रिय मित्रों के हैं उनको लिंक करने की सुविधा सभी वेब साईटों ने यह जानते हुए कि यह भारत का सबसे तेज होने के साथ तकनीकी और व्यवसायिक  दृष्टि से संपन्न ब्लोगर हैं मुझे ब्लोगों पर उपलब्ध करा  दी थी और मैं इनका इस्तेमाल अपने और अपने पाठकों के लिए कर ही रहा हूँ मेरे सामान्य मित्र भी इन ब्लोगरों को पढ़ते हैं और उनको सराहते हैं, आपकी यह सुविधा उन ब्लोगरों के लिए ठीक है जिनको वेब साईटों ने यह सुविधा अपने ब्लोग पर नहीं दी है.इसलिए हमें सभी फोरम पर जाते रहते हैं. अलबता चिट्ठजगत पर आकर कुछ असुविधा होती है पर क्या कर सकते हैं?  हमें तो यहाँ कोई किसी ब्लोग पर कूडा नहीं लगता. हम तो सबको पढेंगे और अपने लिए लिखने के लिए सामग्री तलाशेंगे.<br />
जब से हमारे एक  व्यंग्यकार ब्लोगर  मित्र ने हमें भारत का सबसे तेज ब्लोगर की उपाधि और अधिक पढ़ने लगे हैं ताकि वह और अच्छा लिखें और वह इस पदवी को वापस न ले सके. चाणक्य महाराज भी कह गए हैं कि कूड़े में भी  अगर सोना मिल जाये तो उठा लेना चाहिए. हमारा दुर्भाग्य यही रहा है कि हमें सोना भी वहीं मिलता है विषय के रूप में. आप यह ताज्जुब करेंगे हमें ढेर सारा व्यंग्य का विषय (जो हमारे लिए सोना है) वहीं से मिल रहा है जहाँ से  हमारा मजाक उडाया गया   था. </p>
<p>हमारी और चिट्ठाजगत की बात बननी नहीं है. अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार साहित्य की कहानी, व्यंग्य और कविता  की श्रेणी बननी नहीं है और अंग्रेजी पैटर्न पर ही इस फोरम को चलना है तो फिर हमें क्या? बस एक काम कर देना कि अपने सलाहकारों को मेरे ब्लोग की सूची  जरूर देना  कि उनसे दूर रहें. उनके लेखन और तकनीकी दोनों प्रकार के ज्ञान पर मुझे संशय है. मेरे ब्लोगों का बोझ आपका फोरम तो उठा सकता है पर उसके  सलाहकार नहीं उठा सकते. हालांकि इसे संचालक भले हैं पर उनको आगे बढ़ना है तो अन्य लोगों की सलाह भी लेना चाहिए. इनके यह परिवर्तन   सामान्य और नये और ब्लोग लेखकों के लिए किसी काम के नहीं हैं और अपने  निजी स्वार्थी  तत्व अब अपने लिए इसका इस्तेमाल कर कुछ और करना चाहते हैं? आप जानना चाहेंगे कि मैंने यह आलेख क्यों लिखा? एक लेखक के रूप में यह बताने के लिए कि इस ब्लोग जगत में में रेटिंग मांगने नहीं पाठक ढूँढने आया हूँ और हर बात पर मेरी दृष्टि रहती है और अपने अपमान को भूला नहीं हूँ औसत से नीचे के ब्लोगर मेरे ब्लोग का मूल्यांकन करने बैठे और उसका प्रचार करें यह कैसे सहन कर सकता था. फिर भी चिट्ठजगत वालों को मेरी शुभकामनाएं. अब मेरे ब्लोग इधर-उधर नहीं जा पायेंगे.</p>
]]></content:encoded>
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<item>
<title><![CDATA[चजई- क्या  सब चलेगा पटकथा पर-हास्य व्यंग्य ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/21/%e0%a4%9a%e0%a4%9c%e0%a4%88-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ac-%e0%a4%9a%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%9f%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Mon, 21 Jan 2008 16:16:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[भारत की  क्रिकेट टीम जीत गयी तो भारत के ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>भारत की  क्रिकेट टीम जीत गयी तो भारत के  पूरे  मीडिया  ने उसको  हाथ-हाथ  उठा लिय और हारने वाली आस्ट्रेलिया  की टीम को एक विलेन साबित  करने की कोशिश की। 'मजा चखाया' 'रौंदा ' और  'बद्ला लिया' जैसे शब्दों का प्रयोग सामान्य मौके पर करते हैं पर उनका इस्तेमाल समाचार के रूप में अब बहुत होने लगा है जो कि मुझे लगता  है कि ठीक नहीं है।</p>
<p>पर्थ में जो पांच दिवसीय मैच था वह इस श्रंखला  का तीसरा टेस्ट मैच था और इससे पहले दोनों मैच भारत हार गया। अगर मान  लीजिये दूसरे मैच में सब कुछ ठीक्-ठाक चलता  और भारत मैच जीतता तो क्या पूरे  विश्व का  मीडिया उसे भुना सकता ? नहीं! वैसे भी भारत  में क्रिकेट का खेल इतना लोकप्रिय  नहीं रहा   जितना पहले था। जिस समय लोकप्रिय था तब भी गावों और शहरों के पढे-लिखे लोगों के अलावा इसे कोई और नहीं देखता था पर उनकी संख्या इतनी थी कि वह इसके लिये एक बहुर बडा बाजार बन गया। हो सकता है कुछ पाठक मेरी इस बात से सहमत न  हों क्योंकि यह लेख अंतर्जाल पढा जायेगा जो जिसमें अनेक  क्रिकेट प्रेमियों में होंगे। यह एक वास्तविकता   है और मैं देख रहा हूं। मेरे कई मित्र जो क्रिकेट के दीवाने थे इससे दूर हो गए हैं और रूचि  लेते भी हैं तो कोई लगाव अब इस खेल से नहीं है। मैं अन्य लोगों की तरह नहीं हूं जो सोचते हैं के हमारे विचारों से अलग भी कहीं लोग होंगे जो अलग  ढंग से सोचते हैं। मेरा विचार यही है कि हर आदमी का   मन एक जैसे ही हिलोरें लेता है और जो हम यहां सोच रहे हैं दूसरी जगह पर भी लोग ऐसा ही सोचते हैं। अगर आप कोई अंतरजल पर ब्लोग लिखते हैं तो आप इसे अनुभव कर सकते हैं कि अगर आप मध्य्प्रदेश एक शहर में बैठकर लिखते हैं तो आपसे सहमति जताते  हुए कोई कमेन्ट दिल्ली, बिहार या अन्य प्रदेश से समर्थन करता है. इसी तरह लोग जैसे मेरे साथ हैं वैसे ही सब जगह होंगे और मुझे लगता है कि क्रिकेट का अब कोई आकर्षण अधिक नहीं रहा है. मुझे क्रिकेट के बार में अपने आलेखों पर आई कमेंटों से भी यह पता लगता है.</p>
<p>इसलिए ऐसा लगता है कि कहीं कोई पटकथा लिखकर तो क्रिकेट नहीं हो रहा. अगर ऐसा नहीं है तो लगता है कि मीडिया मैदान पर होने वाली  घटनाओं से पटकथा गढ़ लेता है और उसे सुनाता है. टीम हारे तो भी देश के लोगों की सहानुभूति पाए और जीते तो वाह-वाही पाए. अपने  प्रचार में खिलाडियों को फिल्म के हीरों की तरह पिटवाओ और फिर अगर जीत जाएं तो उन्हें फिल्मी हीरों की तरह प्रस्तुत करो. जब से फिल्म और क्रिकेट का आपस में तालमेल हुआ है तब से ऐसी उठापठक देखकर कोई भी ऐसा सोच सकता है.    </p>
<p>इधर कुछ हमारे साथ भी हुआ था. किसी को हिट ब्लोगर  दिखाने के प्रयास में हमारे हलके ब्लोग को पिटने के लिए दिखा दिया. हमें पढ़ते होते तो ऐसी गलती नहीं करते. ऐसी फिक्सिंग को हम जानते हैं. आज ही एक  कथित निर्णायक का ब्लोग देखा. किसी खबर की कटिंग थी. खबर वाकई दिलचस्प थी, पर उसके साथ कोई विचार होता कि देखो यह भी फिक्सिंग हो सकती है. हम लिख आये कि भाई कुछ लिखा करो. पर लिखे तो तब जब पढें. हमारे विचार पढे होते तो कुछ लिख जरूर पाते. मगर बिना पढे ही नंबर देंगे. बहरहाल हम अब खूब मजा लेंगे. एक नहीं तीन लोग मिल गए हैं यह समझाने के लिए भाई आजकल तो जीवन ही क्रिकेट है. कहीं वह बकनर हैं तो कहीं तुम. पर यार वहाँ लिखने से क्या फायदा. अपना ब्लोग है. पढ़ते तो हैं नहीं. हम ही बताएं कि भाई हमें तो ऐसा लगता है  हर चीज आजकल पटकथा लिखकर हो रहा है. अब ब्लोगिंग हो या क्रिकेट.</p>
<p>हमने तो अपने नियम बना लिए हैं कि जब क्रिकेट की टीम जीते तो इंडिया कि और हारे तो बीसीसीआई की. ब्लोगिंग का भी बना लिया है कि हमें जो दस के दस दे हमारा और जो काम दे उसे अपने शब्द प्रहार के निशाने पर ले आओ. जब सब पटकथा लिखकर चल रहे हैं तो भी हम उनसे अधिक माहिर हैं. अधिकतर लोग क्रिकेट देखते हैं समझते हैं नहीं ब्लोगिंग में भी कुछ ऐसा ही है जो निर्णायक बन रहे हैं उनको यह पता ही नहीं कि दीपक भारतदीप कौन चीज है? पढ़ते होते तो समझते. लिखते रहो अब सब पटकथा हम भी लिखेंगे चितकथा-ताकि लोगों का मन जब  क्रिकेट से ऊबे तो हमारे लिखे का मजा ले.  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जो कार लायक नहीं है वह भी दहेज़ में  मांगेंगे ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/16/jo-kaar-laayak-naheen-hai-vah-bhee-maagenge/</link>
<pubDate>Wed, 16 Jan 2008 14:09:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[बाजार में सस्ती कार आने से पहले ही तमा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बाजार में सस्ती कार आने से पहले ही तमाम तरह की चर्चाएं शुरू हो गयीं है और देखा जाये तो आजकल प्रचार माध्यम अब समाचारों में भी विज्ञापन ही भर रहे हैं. मैंने अनंत शब्दयोग ब्लोग  पर पहले ही दिन अपनी हास्य कविता में जिन समस्या का जिक्र किया था लगभग वैसे ही समाचार पत्रों में अनेक लोगों के विचार प्रकाशित हुए हैं इससे साफ लगता है कि लोग  अब जागरूक है और  अपने विचार खुलकर रखने लगे हैं. </p>
<p>शुरुआत में मुझे लगा कि शायद बहुत जल्दी हमें सड़कों पर उससे भी अधिक जाम की स्थिति का सामना करना पड़ेगा जिसे आज भी झेल रहे हैं. देश के समस्त महानगरों के कुछ खास हिस्सों को छोड़ दें तो शायद ही कोई शहर हो जहाँ की सड़कें युवा और स्वस्थ हों. मैंने अपने शहर में बहुत बेहतर सड़कों पर कम लोगों की भीड़ देखी थी और अब वह बढ़ती जा रही पर सड़कें दिन-ब-दिन बूढातीं देखीं हैं. वैसे इस कार के अभी छः: सात माह बाद  बाजार में आने की संभावना है पर रेट को लेकर अब भी संशय बना हुआ है. एक लाख की कार तो बता रहे हैं पर इसकी संभावना व्यक्त कर रहे हैं कि इसके रेट बढे हुए भी सकते हैं. मुझे तो पता नहीं पर एक  मित्र बता रहा था कोई कार है जो अभी भी १ लाख ८५ हजार रूपये में आ रही है. कुछ लोग बता रहे थे कि जब  भी कोई सस्ती  कार बाजार में आयेगी तो १ लाख ३० हजार से कम नहीं होगी. यानी आज की  कार के मूल्य  से ५५ या साथ हजार का अंतर  बहुत अधिक नहीं है पर जिस तरह इन सस्ती कारों की चर्चा हो रही है उनका आकर्षण बढ रहा है. मुझे लगता है कि इस कार के भी ग्राहक वही होंगे जो अधिक रेट में भी कार खरीद सकते हैं. बाजार के जानकार कुछ  भी कहते हैं पर अर्थशास्त्र का विद्यार्थी होने के नाते में जानता हूँ कि देश में धन के असमान वितरण की जो समस्या है वह भी कम गहरी नहीं है. हवा में बातें करना अलग बात है जिनके पास पैसा है बहुत है और जिसके सामने अर्थाभाव है उसका स्तर बहु नीचे है,  और मैं  अपने आसपास के लोग देख रहा हूँ वह चर्चा करते हैं पर रास्ते में लगने वाले जामों की. जिनके पास आज  कार खरीदने और उसके संचालन के लिए व्यय करने की क्षमता है वही प्रचार के लिए इस कार को खरीदेंगे. कारें तो आज भी बिक रहीं है और कल भी बिकेंगी और सस्ती कार न भी आये तो सड़कों पर चलना दूभर होने वाला ही है.</p>
<p>अलबत्ता इस बारे में एक आदमी को मैंने एक दूकान पर यह टिप्पणी करते सूना कि-''कार का रेट एक लाख बता दिया है और बाद में चाहे कितने की भी आये पर जिनको लडकी की शादी करानी है उनकी मुसीबत हो जायेगी और लड़के वाले तो यहीं कहेंगे कि 'भई, कार दे दो एक लाख की ही तो आ रही है.' यानी अब वह लोग भी कार  मांगेंगे जो अभी तक स्वयं को  कार मांगने लायक नहीं समझेंगे?</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[फ्लॉप हैं तो बेफिक्र हैं ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/14/flop-hain-to-befikra-hain/</link>
<pubDate>Mon, 14 Jan 2008 14:20:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[गणों के तंत्र में मचा है घमासान
जैसे ग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>गणों के तंत्र में मचा है घमासान<br />
जैसे गण का दिन आ रहा है<br />
बडे लोग अख़बार पढ़ते हो रहे परेशान<br />
शायद कोई पुरस्कार आ जाये कहीं से<br />
बढ़ जाये समाज में मान सम्मान<br />
कही रत्ना के लिए मचा है<br />
तो कहीं कोई चाहता श्री उपाधि का सम्मान </p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
हम बैठे हैं आराम से कहीं<br />
कोई नहीं रखा अपने पास ताम-झाम<br />
ऐसे ही लिख-लिखकर चले जा रहे<br />
लोगों का प्यार पा रहे<br />
मिल जाता कोई पुरस्कार हमें भी<br />
करते रहते    चाटुकारिता  का काम<br />
पत्रकारिता से चिट्ठाकारिता तक<br />
तीन  हजार से अधिक रचनाएं<br />
भी नहीं जोड़  सकीं किसी उपाधि का नाम<br />
वैसे भी क्या कोई कम  बोझ है सिर पर<br />
जो किसी उपाधि और पुरस्कार का बोझ उठाते<br />
अपने दोस्त कम दुश्मन अधिक बनाते<br />
कितने पंगेबाज पीछे पड़ जाते<br />
अपने व्यंग्यों में हमारा मजाक बनाते<br />
फ्लॉप हैं तो बेफिक्र हैं<br />
हिट होते तो और बढ़ने के चक्कर में<br />
अपनी ही भद्द पिटवाते<br />
चाहे जो लिख रहे हैं<br />
नहीं किसी से डर रहे हैं<br />
ऐसे ही हिट हो रहे हैं<br />
हमें चाहिए पाठको और मित्रों का प्यार<br />
इससे बड़ा कोई नहीं हमारे लिए मान<br />
--------------------------------------<br />
नोट-यह एक काल्पनिक हास्य-व्यग्य रचना है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कब कौन सा रंग सामने आयेगा ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/13/kab-kaunsaa-rang-saamne-aayegaa/</link>
<pubDate>Sun, 13 Jan 2008 17:12:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/13/kab-kaunsaa-rang-saamne-aayegaa/</guid>
<description><![CDATA[जो तुम चाहते हो देखना
वही तो सामने आये]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जो तुम चाहते हो देखना<br />
वही तो सामने आयेगा<br />
इस दुनिया में जो भी<br />
तस्वीर बनती  है<br />
उसे बनाता है सर्वशक्तिमान<br />
या आदमी की सोच से बनती है<br />
मुश्किल यहीं से शुरू होती हैं<br />
बचता है आदमी अपनी बुद्धि विलास से<br />
और फंसता जाता है दूसरों के जाल  में<br />
देखता वही जो दूसरा दिखाए<br />
समझे वही जो दूसरा समझाए<br />
हमेशा नया और अच्छा देखने की चाह<br />
पर जब सोच में नहीं जो आदमी के<br />
वह सच बनकर आंखों के सामने<br />
कहाँ से आएगा<br />
---------------------------------------------<br />
पल-पल रंग बदलती इस दुनिया  में<br />
कब कौन सा रंग सामने आयेगा<br />
कोई नहीं जानता<br />
देख लेता है जो पल जिन्दगी के<br />
उसे ही हमेशा बने रहने की आशा में<br />
हो जाता है विलासी<br />
खो देता है सब उसे बिताने में<br />
भूल जाता है यह<br />
फिर कोई अगला पल भी<br />
होगा उसके सामने प्रस्तुत जो<br />
रंग बदल कर आयेगा<br />
-----------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[देवनागरी में लिखा और रोमन में पढा ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/09/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%ae%e0%a4%a8/</link>
<pubDate>Mon, 08 Oct 2007 16:16:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[मुझे हिंदी ब्लोगों का रोमन में दिखने म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मुझे हिंदी ब्लोगों का रोमन में दिखने में कोई आपति नहीं है, और न ही लोगों के रोमन लिखने पढने में कोई दिलचस्पी है. मेरी प्रतिबद्धता अपनी हिंदी भाषा और देवनागरी से है पर इसका मतलब यह नहीं है कि मैं अपनी मर्जी पर दूसरों को चलने के लिए कहूं. बहुत कडी लगने के बावजूद वह  यह कहने में मुझे कोई हर्ज नहीं है कि मैं रोमन लिपि में पढने वालों के लिए नहीं लिखता और अगर वह पढेंगे तो ठीक न ही पढ़ें तो ठीक है. </p>
<p>         पहले एक चुटकुला  लिखना सही लगता है. एक छोटा बच्चा बोलना नहीं सीख रहा था तो उसकी मां की सहेली ने उससे कहा'मैं तुम्हारे यहां अपना तोता छोड जाती हूँ वह तुम्हारे बच्चे को खेलते हुए बोलना सिखा देगा.'</p>
<p>                 वह अपना तोता वहीं छोड गयी. एक महीने बाद वह लौटी तो उसने देखा कि सहेली का बच्चा तो कुछ नहीं सीखा था बल्कि तोता ही राम-राम भूल गया और हुंगु....हुंगु बोल रहा था. </p>
<p>               इधर जिस तरह रोमन पर चिट्ठा दिखने का प्रचार हो रहा है उससे तो डर लगता है कि कहीं वाकई अंतर्जाल पर देवनागरी लिपि का प्रचार ही बंद न हो जाये. ऐसा लगता है कि देवनागरी लिपि में शायद पाठक न मिल पाने की वजह से धीरज खत्म हो रहा है और अब रोमन लिपि पर ज्यादा ही भरोसा होने लगा है. मुझे इसमें भी कोई आपति नहीं है पर पिछले कुछ माह से वर्ड प्रेस के पाठकों का अध्ययन का रहा हूँ उससे लगता है कि मैं उन्हें सजग करता चलूँ कि मेरा चिट्ठा भी रोमन लिपि में दिख रहा है पर मैने उसे देवनागरी में ही लिखा है. अगर आप इसे रोमन में पढ़ रहे है और उसे देवनागरी में भी पढ़ सकते हैं तो वैसे ही पढे, यह मेरे ऊपर मेहरबानी होगी. </p>
<p>             मुझे लगता है कि रोमन लिपि में इतने पाठक नहीं हो सकते जितने देवनागरी में मिलेंगे. मुझे तो लग रहा है कि कहीं लोगों के दिमाग में रोमन लिपि में हिंदी पढ़कर यह गलतफहमी न हो जाये कि यहाँ हिंदी ऐसे ही लिखी जाती है. कैसे? इसका जवाब यह है कि वर्डप्रैस के व्यूज देखकर पता लगता है कि अधिकतर पढने वाली रोमन लिपि में कबीर, चाणक्य, रहीम और आध्यात्म, लिखकर वहां आ रहे हैं. यह पिछले चार महीने से मैं देख रहा हूँ. और तो और मेरे चौपालों पर अपन्जीकृत ब्लोग भी इनकी पकड़ में आते हैं.इन सब लोगों को देवनागरी से अनजान मानना गलत होगा क्योंकि अभी यह सब लोगों को नहीं मालुम कि कोई हिंदी टूल भी उपलब्ध है.  अब मैं सोच रहा हूँ कि  कहीं इन जानकार लोगों को भी अगर वही रोमन लिपि वाली जगह दिखी और  पढ़कर आधा-अधूरा आनंद लाकर तसल्ली करते रहे तो देवनागरी का प्रचार उतनी तेजी से नहीं होगा जितना हम समझ रहे हैं-होगा तो यह मेरा दावा है. अब एक संदेह और होता है कि अंग्रेजी में उनके लिखने के बाद उनके सामने हमारा कौनसा ब्लोग आयेगा-रोमन वाला  या देवनागरी वाला. </p>
<p>            हालांकि मैं ज्यादा चिंतित नहीं हूँ, क्योंकि हर भाषा की आत्मा उसकी लिपि होती है, तिस पर हिंदी तो और भी गजब की है उसे देवनागरी लिपि में ही लिखा और पढा जा सकता है. कमल कमल  कमल और  दीपक दीपक दीपक यह ऐक जैसे दिख रहे हैं, इन दोनों शब्दों को तीन अलग प्रकार से लिखा गया है. पर इन्हें रोमन में करें तो कोई भी कहेगा कि जिसने लिखा है वह अंग्रेजी में पैदल है. अपने ही ब्लोग को जब मैं पढ़ रहा था हो लग रहा था कि कई एसे शब्द  हैं जिनकी स्पेलिंग रोमन में ग़लत है और गूगल वालों का हिंदी टूल हम हिंदी वालों पर तरस  खाकर हिंदी में सही अनुवाद कर देता है. अभी यहाँ  देंता शब्द चला जाता पर मुझे रोमन वालों का ख़्याल आया कि क्या  पढेंगे? चलो इस बहाने भाषा में शुद्धिकरण  की प्रवृति बढेगी. </p>
<p>       अगर हिंदी की आत्मा  देवनागरी है वैसे ही अंग्रेजी की आत्मा रोमन  है. अगर मुझे कहीं अंग्रेजी का कोई शब्द देवनागरी में मिल जाता है तो थोडा दिक्कत आती है. कभी कुछ कहानियों में अंग्रेजी के वाक्य देवनागरी में पढने को मिल जाते हैं तो थोडा ध्यान से सोचकर पढते है  पर अगर वही वाक्य रोमन में हो तो कोई समय नहीं लगता. हिंदी को रोमन में लिखना शायद कुछ लोगों को आसान लगता है पर पढ़ना उससे ज्यादा मुश्किल है. फिर उसकी गेयता का भी प्रश्न है. कम से कम मैं तो यही कह  सकता हूँ कि अभी कोई निष्कर्ष निकालने से पहले यह देखना जरूरी है आगे इसका क्या स्वरूप सामने आता है. हिंदी चिट्ठों का रोमन में लिखने से ज्यादा गूगल का इंडिक ट्रांसलिटरेशन टूल की खुशी हुई. और यह लेख मैं उसी पर लिख रहा हूँ. साथ ही यह भी सोच रहा हूँ कि कहीं रोमन में पढने वाले स्पेलि