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	<title>हिंदु-धर्म &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "हिंदु-धर्म"</description>
	<pubDate>Sun, 20 Jul 2008 10:48:31 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[संत कबीर वाणी: ऐसे ही राम की सौगंध खाते हैं ]]></title>
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<pubDate>Wed, 31 Oct 2007 03:52:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[आजकल के लोग हैं, मिलिके बिछुरी जाहिं
ल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आजकल के लोग हैं, मिलिके बिछुरी जाहिं<br />
लाहा कारण आपने, सोगंद रामकि खाहिं </strong></p>
<p>संत शिरोमणि संत कबीर दास जी कहते हैं कि आजकल के लोग ऐसे हैं कि वह निश्चित रूप से कभी न कभी बिछड़ जायेंगे। हर कोई किसी न किसी कारण से अपने संबंध जोडे बैठा है और ऐसे ही राम की सौगंध खाते हैं कि हम कभी नहीं छोड कर जायेंगे। </p>
<p><strong>कबीर हमारा कोई नहिं, हम काहू के नाहिं<br />
परि पहुंची नाव ज्यों, मिलिके बिछुरी जाहिं</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं यहाँ कोई नहीं है और हम भी किसे के नहीं है। जिस प्रकार नाव में बैठाकर यात्री नदी के पार जाकर एक दूसरे से बिछड़ जाते हैं, इसी तरह इस संसार में जब लोग हैं तो साथ है पर एक समय आने पर सब एक दूसरे से अलग हो जायेंगे।</p>
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<title><![CDATA[रहीम के दोहे:भक्त का मन तो भगवान् में ही रमता है ]]></title>
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<pubDate>Wed, 31 Oct 2007 04:02:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[दादुर, मोर, किसान मन, लग्यो रहैं धन माहि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दादुर, मोर, किसान मन, लग्यो रहैं धन माहिं<br />
रहिमन चातक रटनि हूँ, सर्वर को कोऊ नाहिं </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि मेंढक, मोर और किसान का मन बादलों को ही निहारता रहता है पर चातक स्वाती नक्षत्र की बूँद को ही रटता रहता है और तालाब के जल को नहीं पीता।<br />
इसका आशय यह कि एक भक्त के लिए भगवान का ही महत्व होता है और वह किसी अन्य की कामना नहीं करता है। किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति से वह प्रेम कर ही नहीं सकता। वह तो बस अपनी साधना में लीन रहता है। </p>
<p><strong>दिव्य दीनता के रसहिं, का जाने जग अंधु<br />
भली बिचारी दीनता, दीनबंधु से बंधु</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि भगवान् के प्रति दैन्य भाव से की गयी भक्ति करने पर जो आनन्द प्राप्त होता है उसे इस भौतिक जगत से प्रेम करने वाले क्या समझ पाएगे। दीनता अपने आप में एक एसा गुण है जिससे दीनबंधु (परमात्मा) से बंधुत्व का आभास होता है।<br />
तात्पर्य यह है कि दीनता का भाव रखकर ही ईश्वर को पाया जा सकता है, जो लोग अपने पद, पैसे और प्रतिष्टा के अहंकार में हैं उन्हें ईश्वर से क्या वास्ता क्यों कि ईश्वर ने उन्हें पहले ही मोह माया के जंजाल में डाल दिया है।</p>
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