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	<title>हिंदू &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "हिंदू"</description>
	<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 10:16:46 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[गुरुनानक जी का सन्देश आज भी प्रासंगिक ]]></title>
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<pubDate>Sat, 24 Nov 2007 05:48:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[आज गुरु नानक जी का जन्मदिन है। इसे प्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज गुरु नानक जी का जन्मदिन है। इसे प्रकाश पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। मैं जब अपने देश के महापुरुषों के बारे में जब कोई अपना विचार व्यक्त करता हूँ तो उसमें आमतौर से जो बातें कहीं जातीं है उससे अलग हटकर इसलिए लिख पाता  हूँ क्योंकि मुझे लगता है की जो आज तक उनके बारे में लिखा जाता है वह  एकदम सतही हैं। गुरुनानक देव जी के बारे में मेरा स्पष्ट  मत है कि वह भारतीय आध्यात्म के वह स्तंभ है जिन्होंने अपना प्रकाश पूरे विश्व में फैलाया। </p>
<p>श्री गुरुनानक देव जी को सिख धर्म का संस्थापक माना जाता है। आम तौर से कहा जाता है की सिख धर्म का प्रादुर्भाव हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए हुआ है यह सत्य है पर इसका आशय यह नहीं है  कि केवल तलवार के आक्रमण से इसकी रक्षा के लिए हुआ है क्योंकि हमारी दुश्मन दूसरों की तलवार कम हमारे अंधविश्वास रूधियाँ अधिक हैं। जिस समय इस देश और धर्म पर तलवार से  आक्रमण हुए और उसमें यह देश पराजित हुआ तो केवल शत्रुओं की वीरता से नहीं अपने अंध विश्वास से उपजी कायरता से हारा। शत्रु अपनी तलवार लेकर चला आ रहा था और यहाँ उसका सामना करने के लिए तलवार उठाने के बजाय  यज्_ंज-हवं  किये जाते थे-इतिहास में ऐसी कई  घटनाएँ हैं जो देश में फैले अंधविश्वास को दर्शातीं हैं। वीरता की कमी नहीं थी पर अंधविश्वास और अति आत्मविश्वास  की वजह से कोई रणनीति नहीं बनी  और न आपस में एकता हुई और यह देश धीरे-धीरे गुलामी की जंजीरों में जकड़ता गया।  अगर आप समझदार लोगों से बाते करें तो वह हिन्दू धर्म को बाहर से कम अन्दर से अधिक खतरा बताते हैं और वह है अंधविश्वास और रूढ़वादिता। पूज्य गुरूनानक जी ने हमेशा ही हिन्दू धर्म में फैले अंधविश्वासों, कुरीतियों, और दोषपूर्ण परंपराओं  का विरोध किया। </p>
<p>उनके बारे में कई काथाएं प्रचलित हैं और जो मुझे सबसे ज्यादा पसंद आती है वह यह कि एक बार गुरुनानक जी घूमते हुए गंगा के किनारे पहुंच गए और उसमे डुबकी लगाने लगे। तब उन्होने देखा कि कुछ लोग अपने अंजुली में पानी भरकर आकाश की तरह उसका रुख कर नीचे गिराने  लगे। तब गुरुनानक जी ने एक आदमी से इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि 'अपने पितरों को पानी दे रहे हैं'।</p>
<p>इस महान संत ने थोडी भी देरी नहीं कि और अपने हाथ में पानी लेकर पश्चिम दिशा की तरफ पानी देने लगे तो वहाँ खडे लोग हंसने लगे और उनको बताया कि वह गलत कर रहे हैं तो इस मस्तमौला संत ने उत्तर दिया कि'' मैं अपने खेतों को पानी दे रहा हूँ। जब आकाश में स्थित  धरती से इतनी अधिक  दूर तुम्हारे पितरों तक यह जल पहुंच रहा है तो क्या इस धरती पर स्थित  मेरे खेतों तक नहीं पहुंचेगा।''</p>
<p>श्री गुरुनानक जी के दर्शन को इस घटना से समझा जा सकता है। जिस समय उनका जन्म हुआ उस समय इस देश में राजनीतिक और सामाजिक रूप से संक्रमण काल था और भारतीय आध्यात्म  सत्य के निकट होते हुए भी विस्मृत हो रहा था और उसकी रक्षा के लिए अंधविश्वासों और रूढियों की स्थापना हो रही थी और उसके उल्टे परिणाम सामने आ रहे थे, विदेशी लोग इन्हीं अंधविश्वासों और रूढियों को अतार्किक और कठिन बताकर अपने मायावी सिद्धांत इसे देश पर थोपते जा रहे थे। श्री गुरुनानक जी बाल्यकाल से आध्यात्म प्रवृति  के थे और उन्हें सदा ही इन अंधविश्वासों और रूढियों में दिलचस्पी नहीं थी। मैं सिख नहीं हूँ पर मेरी नानी मुझे कई बार गुरुद्वारे ले जाती और उनके चरित्र के बारे में सुनाती और हम मेरे हृदय में इष्ट के रूप में विधमान हो गए। मैं जब भी अपने घर में उनकी तस्वीर देखता हूँ मेरा मन प्रुफुल्लित हो उठता है। मैं अपने देश के आध्यात्म के प्रभावी होने की बात  लिखता हूँ तो उसमें पूज्य गुरुनानक जी के अमृत वचनों से रचा गया दर्शन भी शामिल रहता है। और मेरा मानना है कि जब तक हमारा समाज गुरुनानक जी का  सन्देश मानकर अंधविश्वास, रूढ़वादिता, छूआछूत, जाति-पाति और आर्थिक आधार पर भेदभाव जैसी प्रवृतियों से नहीं निकलेगा तब तक वह विजेता नहीं बन सकेगा। खतरे बाहर से काम अन्दर से अधिक हैं। उनका मुकाबाला आत्मिक और वैचारिक स्तर पर हृदय को  स्वच्छ और पवित्र बनाकार ही किया जा सकता है। इस देश के धर्म की रक्षा करने और पूरे विश्व में आध्यात्म का प्रकाश बिखेरने  वाले  ऐसे महान और पवित्र व्यक्तित्व के स्वामी श्री गुरुनानक जी को मेरा नमन।</p>
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<title><![CDATA[राम मिथक हैं तो यहाँ सत्य कौन है ]]></title>
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<pubDate>Mon, 05 Nov 2007 16:15:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[राम अगर मिथक हैं तो यहाँ सत्य कौन है? शा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>राम अगर मिथक हैं तो यहाँ सत्य कौन है? शायद इस बात का उत्तर वह लोग भी नहीं दे सकते जो राम को मिथक मानते हुए भी उन्हें मानने को तैयार हैं। एक तरफ वह लोग हैं जो कहते हैं कि राम एक कल्पना हैं दूसरी तरफ वह हैं जो उनके आस्तित्त्व को सत्य मानते हैं। इन दोनों के बीच वह लोग भी जो कहते हैं कि अगर वह मिथक भी हैं तो हम उन्हें मानेंगे-क्योंकि उन्हें लगता है कि भगवान श्री राम के अस्तित्व का कोई वैज्ञानिक प्रमाण जुटाना तो कठिन है पर राम को काल्पनिक बताने वालों का सामना कराने के लिए यही एक तर्क है।</p>
<p>मैं प्रतिदिन इस विषय पर चल रही बहस को देख रहा हूँ, और तब मुझे आश्चर्य होता है कि राम को हृदय नायक मानने वालों द्वारा  देश में राम के विषय में सही ढंग से तर्क प्रस्तुत नहीं किये जा रहे है-भावावेश में आकर अपनी प्रतिक्रिया देने से नकारात्मक सोच वालों को संतुष्ट नहीं किया जा सकता है. हमारे अध्यात्म में इतना गूढ़ ज्ञान  है की हम किसी भी ऐसे तर्क का उत्तर दे सकते हैं जिसका प्रतिकार कोई  नहीं कर सकता,  जो मैंने यह  प्रश्न किया है कि राम अगर मिथक है तो सत्य कौन हैं तो इसके पीछे मेरा ध्येय केवल यही है कि मैं जिस धर्म को मानता हूँ और जिस तरह समझ पाया हूँ उसे लेकर अपनी बात कह सकूं। प्रश्न का जवाब भी मैं देता हूँ कि हम राम के अस्तित्त्व का प्रमाण किसे दें? जो माँग रहे हैं पहले वह यह तो साबित करें कि वह स्वयं मिथक या कल्पना नहीं हैं? चक्कर में डाल देने वाली इस बात में कोई चुनौती नहीं है बल्कि सीधा विज्ञान हैं जो हमारे धर्म ग्रंथों में मौजूद हैं। मैं यह दावा नहीं करता कि मैं सही हूँ और मुझे अपनी गलती मानने में कोई झिझक भी नहीं है।</p>
<p>पहले तो यह जानना जरूरी हैं कि हम क्या हैं? इस शरीर को लेकर हम यह कहते हैं 'हम हैं'। पर आंखों का काम है देखना वह देखती हैं, कानों का काम सुनना है वह सुनते और नाक का काम हैं सांस लेना और सूंघना वह भी करती है। मुख से भोजन को ग्रहण करने से लेकर उसके कचडे में परिवर्तित होकर देह से निष्कासन तक सारा काम शरीर में मौजूद इन्द्रियां करती हैं, अत: एक बात तो रही कि हम यह इन्द्रियां नहीं हैं। पांच तत्वों से बने इस शरीर में 'मन, बुद्धि और अहंकार' यह तीन प्रकार की प्रकृतियां होती हैं जिनके सहारे इस धरती पर समस्त देहधारी जीव अपने साथ मौजूद इन्द्रियों के समूह को लेकर विचरण करते हैं। मतलब एक चक्र है जो घूम रहा है और कहते हैं कि इसे हम घुमा रहे हैं। पंच तत्वों के समूह में स्थापित होने के बाद तीनों प्रकृतियां उस पर शासन करती हैं। मैं तो नहीं ढूँढ पाया कि हम कौन हैं पर रामजी के अस्तित्व पर सवाल उठाने वाला पहले इन सब से अलग होकर देख ले तो अपने आप जवाब मिल जाएगा कि राम मिथक थे या सत्य ।</p>
<p>इस धरती पर कुछ भी स्थिर नहीं है, सारा जगत चलायमान है इसलिये इसे मिथ्या और माया के स्वरूप भी कहा जाता है क्योंकि जो हम अपने को समझ रहे हैं वह हैं नहीं और जो हैं उसे जानते नहीं। चलते। फिरते और उठते-बैठते बस यही अहसास कि हम कर रहे हैं पर कर तो रहे हैं पर कर रही है यह देह अपने अन्दर मौजूद इन्द्रियों और प्रकृतियों की सहायता से वह भी उनके वशीभूत होकर। अब पलट कर हम सवाल करेंगे कि पूछ कौन रहा है और जवाब कौन दे?</p>
<p>अब रहा भौतिक प्रमाणों का सवाल। यह धरती कई करोड़ वर्ष से अस्तित्त्व में हैं इसके स्वरूप में परिवर्तन आते रहे हैं। हम ज्यादा दूर क्यों जाएँ अपने ही देश में देख ले ऐसे ढ़ेर सारे महल आज भी दिख जाते हैं जिनमें बैठे राजाओं ने अपने राज्य पर शासन किया और आज वह खँडहर हो गए। जिस समय वहाँ राजा रहते थे और वहाँ परिंदा भी नहीं आ सकता था वहां आज श्वान, गाय और भैसों का भी विचरण आसान हो गया है-और ऐसे महल पचास से पांच सो वर्ष से ज्यादा पुराने भी नहीं होंगे। आशय यह है कि इस धरती के स्वरूप में परिवर्तन आते हैं और मोहन-जोडदो और हडप्पा सभ्यता के अवशेषों से पता चलता है कि विकसित सभ्यता तब भी थी। अब कोई लोग अगर रामजी के होने के अस्तित्व के लिए भौतिक प्रमाण मांग रहे हैं तो उसे अज्ञानता के अलावा और क्या कहा जा सकता है? आखिर में यह बात कहना चाहता हूँ की हम देह या भौतिकता को महत्व नहीं देते इसलिए ही तो हमारे देश में शव को जला देने की प्रथा है ताकि पंचतत्वों से बने शरीर को लेकर कोई अंधविश्वास निमित न हो. यह भौतिक देह नश्वर  है पर इसमें विचरने वाली आत्मा अमर है इसी शाश्वत सत्य पर आधारित है हमारा आध्यात्म. </p>
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<title><![CDATA[मनुस्मृति:दुस्साहसी को क्षमा राज्य के लिए ख़तरा  ]]></title>
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<pubDate>Sun, 21 Oct 2007 07:34:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.अपनी क्षीण वृति, अर्थात आय की कमी से त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.अपनी क्षीण वृति, अर्थात आय की कमी से तंग होकर जो व्यक्ति  रास्ते में पड़ने  वाले खेत से कुछ कंद-मूल अथवा गन्ना  ले लेता हैं उस पर दंड नहीं लगाना चाहिए.</p>
<p>२.जो व्यक्ति दुसरे के पशुओं को बांधता है, बंधे हुए पशुओं को खोल देता है तथा दासों, घोडों और रथों को हर लेता है, वह निश्चय ही दंडनीय है.</p>
<p>३.इस प्रकार जो राज्य प्रमुख चोरों को दण्डित कर चोरी का निग्रह करता है वह इस लोक में यश प्राप्त करता है तथा परलोक में दिव्य सुखों को भोगता है.</p>
<p>४.जो राज्य प्रमुख  इस लोक में अक्षय यश व मृत्यु के बाद  दिव्य लोक चाहता है  उसे चोरों और डकैतों के अपराध को कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए.</p>
<p>५. वह व्यक्ति जो अप्रिय वचन बोलता है, चोरी करता है और हिंसा में लिप्त होता है. उसे महापापी मानना चाहिए.</p>
<p>६.यदि राज्य  दुस्साहस करने वाले व्यक्ति को क्षमा कर देता है या उसके कृत्य को अनदेखा कर देता है तो अतिशीघ्र उसका विनाश हो जाता है क्योंकि लोगों को उसके प्रति  विद्वेष की भावना पैदा हो जाती है.</p>
<p>७.राज्य प्रमुख को चाहिए के वह स्नेह वश अथवा लालच वश भी प्रजाजन में डर उत्पन्न करने वाले अपराधियों को बन्धन मुक्त न करे.</p>
<p>८.यदि गुरु, बालक,वृद्ध व विद्वान भी किसी पर अत्याचार करता है तो उसे बिना विचार किये  उपयुक्त दंड दिया जाना चाहिए.   </p>
<p>९.अपने  आत्म रक्षार्थ तथा  किसी स्त्री और विद्वान पर संकट आने पर उसकी रक्षा के लिए जो व्यक्ति किसी दुष्ट व्यक्ति का संहार करता है उसे हत्या के पाप का भागीदार नहीं माना जाता.</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:भक्त में अहंकार नहीं होता ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/09/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80%e0%a4%ad%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%85%e0%a4%b9%e0%a4%82/</link>
<pubDate>Tue, 09 Oct 2007 02:43:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
जब लग नाता जाति का, तब लग भक्ति न होय
ना]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
जब लग नाता जाति का, तब लग भक्ति न होय<br />
नाता तोड़े गुरू भजै, भक्त कहावै सोय</strong></p>
<p>कविवर कबीर दास जी कहते हैं कि जाति-पांति का अभिमान है तब तक भक्ति नहीं हो सकती। अहंकार और मोह को त्यागा कर, सभी नाते-रिश्तों को तोड़कर भक्ति करो तभी भक्त कहला सकते हो।<strong></p>
<p>भक्ति बिना नहिं निस्तरै, लाख कराइ जो कोय<br />
शबद हृँ सनेही रहै, घर को पहुंचे सोय</strong></p>
<p>भक्ति के बिना उद्धार नहीं हो सकता, चाहे लाख प्रयत्न करो, वे सब व्यर्थ ही सिद्ध होंगे, जो केवल सदगुरु के प्रेमी हृँ, उनके सत्य-ज्ञान का आचरण करने वाले हैं वही अपने उद्देश्य को पा सकते हैं, अन्य कोई नहीं। </p>
]]></content:encoded>
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