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	<title>हितोपदेश &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "हितोपदेश"</description>
	<pubDate>Wed, 14 May 2008 11:01:40 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[परोपकार की भावना]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/?p=165</link>
<pubDate>Mon, 05 May 2008 10:33:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[पुराने जमाने की बात है। एक राजा ने दूस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पुराने जमाने की बात है। एक राजा ने दूसरे राजा के पास एक पत्र और सुरमे की एक छोटी सी डिबिया भेजी। पत्र में लिखा था कि जो सुरमा भिजवा रहा हूं, वह अत्यंत मूल्यवान है। इसे लगाने से अंधापन दूर हो जाता है। राजा सोच में पड़ गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि इसे किस-किस को दे। उसके राज्य में नेत्रहीनों की संख्या अच्छी-खासी थी, पर सुरमे की मात्रा बस इतनी थी जिससे दो आंखों की रोशनी लौट सके। </p>
<p>राजा इसे अपने किसी अत्यंत प्रिय व्यक्ति को देना चाहता था। तभी राजा को अचानक अपने एक वृद्ध मंत्री की स्मृति हो आई। वह मंत्री बहुत ही बुद्धिमान था, मगर आंखों की रोशनी चले जाने के कारण उसने राजकीय कामकाज से छुट्टी ले ली थी और घर पर ही रहता था। राजा ने सोचा कि अगर उसकी आंखों की ज्योति वापस आ गई तो उसे उस योग्य मंत्री की सेवाएं फिर से मिलने लगेंगी। राजा ने मंत्री को बुलवा भेजा और उसे सुरमे की डिबिया देते हुए कहा, 'इस सुरमे को आंखों में डालें। आप पुन: देखने लग जाएंगे। ध्यान रहे यह केवल 2 आंखों के लिए है।' मंत्री ने एक आंख में सुरमा डाला। उसकी रोशनी आ गई। उस आंख से मंत्री को सब कुछ दिखने लगा। फिर उसने बचा-खुचा सुरमा अपनी जीभ पर डाल लिया। </p>
<p>यह देखकर राजा चकित रह गया। उसने पूछा, 'यह आपने क्या किया? अब तो आपकी एक ही आंख में रोशनी आ पाएगी। लोग आपको काना कहेंगे।' मंत्री ने जवाब दिया, 'राजन, चिंता न करें। मैं काना नहीं रहूंगा। मैं आंख वाला बनकर हजारों नेत्रहीनों को रोशनी दूंगा। मैंने चखकर यह जान लिया है कि सुरमा किस चीज से बना है। मैं अब स्वयं सुरमा बनाकर नेत्रहीनों को बांटूंगा।' </p>
<p>राजा ने मंत्री को गले लगा लिया और कहा, 'यह हमारा सौभाग्य है कि मुझे आप जैसा मंत्री मिला। अगर हर राज्य के मंत्री आप जैसे हो जाएं तो किसी को कोई दुख नहीं होगा।' </p>
<p><em>संकलन: त्रिलोक चंद्र जैन<br />
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[दर्पण की सीख]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/?p=164</link>
<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 05:58:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[पुराने जमाने की बात है। एक गुरुकुल के ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पुराने जमाने की बात है। एक गुरुकुल के आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। विद्या पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करते समय उन्होंने आशीर्वाद के रूप में उसे एक ऐसा दिव्य दर्पण भेंट किया, जिसमें व्यक्ति के मन के भाव को दर्शाने की क्षमता थी। शिष्य उस दिव्य दर्पण को पाकर प्रसन्न हो उठा। उसने परीक्षा लेने की जल्दबाजी में दर्पण का मुंह सबसे पहले गुरुजी के सामने कर दिया। वह यह देखकर आश्चर्यचकित हो गया कि गुरुजी के हृदय में मोह, अहंकार, क्रोध आदि दुर्गुण परिलक्षित हो रहे थे। इससे उसे बड़ा दुख हुआ। वह तो अपने गुरुजी को समस्त दुर्गुणों से रहित सत्पुरुष समझता था। </p>
<p>दर्पण लेकर वह गुरुकूल से रवाना हो गया। उसने अपने कई मित्रों तथा अन्य परिचितों के सामने दर्पण रखकर परीक्षा ली। सब के हृदय में कोई न कोई दुर्गुण अवश्य दिखाई दिया। और तो और अपने माता व पिता की भी वह दर्पण से परीक्षा करने से नहीं चूका। उनके हृदय में भी कोई न कोई दुर्गुण देखा, तो वह हतप्रभ हो उठा। एक दिन वह दर्पण लेकर फिर गुरुकुल पहुंचा। उसने गुरुजी से विनम्रतापूर्वक कहा, 'गुरुदेव, मैंने आपके दिए दर्पण की मदद से देखा कि सबके दिलों में नाना प्रकार के दोष हैं।' तब गुरु जी ने दर्पण का रुख शिष्य की ओर कर दिया। </p>
<p>शिष्य दंग रह गया. क्योंकि उसके मन के प्रत्येक कोने में राग,द्वेष, अहंकार, क्रोध जैसे दुर्गुण विद्यमान थे। गुरुजी बोले, 'वत्स यह दर्पण मैंने तुम्हें अपने दुर्गुण देखकर जीवन में सुधार लाने के लिए दिया था दूसरों के दुर्गुण देखने के लिए नहीं। जितना समय तुमने दूसरों के दुर्गुण देखने में लगाया उतना समय यदि तुमने स्वयं को सुधारने में लगाया होता तो अब तक तुम्हारा व्यक्तित्व बदल चुका होता। मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह दूसरों के दुर्गुण जानने में ज्यादा रुचि रखता है। वह स्वयं को सुधारने के बारे में नहीं सोचता। इस दर्पण की यही सीख है जो तुम नहीं समझ सके।' </p>
<p><em>संकलन : चंद्र सैन<br />
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[अहंकार कुबेर का]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2008/03/27/%e0%a4%85%e0%a4%b9%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Thu, 27 Mar 2008 06:16:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[अहंकार
यह एक पौराणिक कथा है। कुबेर तीन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अहंकार</p>
<p>यह एक पौराणिक कथा है। कुबेर तीनों लोकों में सबसे धनी थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि हमारे पास इतनी संपत्ति है, लेकिन कम ही लोगों को इसकी जानकारी है। इसलिए उन्होंने अपनी संपत्ति का प्रदर्शन करने के लिए एक भव्य भोज का आयोजन करने की बात सोची। उस में तीनों लोकों के सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया। </p>
<p>भगवान शिव उनके इष्ट देवता थे, इसलिए उनका आशीर्वाद लेने वह कैलाश पहुंचे और कहा, प्रभो! आज मैं तीनों लोकों में सबसे धनवान हूं, यह सब आप की कृपा का फल है। अपने निवास पर एक भोज का आयोजन करने जा रहा हूँ, कृपया आप परिवार सहित भोज में पधारने की कृपा करे। </p>
<p>भगवान शिव कुबेर के मन का अहंकार ताड़ गए, बोले, वत्स! मैं बूढ़ा हो चला हूँ, कहीं बाहर नहीं जाता। कुबेर गिड़गिड़ाने लगे, भगवन! आपके बगैर तो मेरा सारा आयोजन बेकार चला जाएगा। तब शिव जी ने कहा, एक उपाय है। मैं अपने छोटे बेटे गणपति को तुम्हारे भोज में जाने को कह दूंगा। कुबेर संतुष्ट होकर लौट आए। नियत समय पर कुबेर ने भव्य भोज का आयोजन किया। </p>
<p>तीनों लोकों के देवता पहुंच चुके थे। अंत में गणपति आए और आते ही कहा, मुझको बहुत तेज भूख लगी है। भोजन कहां है। कुबेर उन्हें ले गए भोजन से सजे कमरे में। सोने की थाली में भोजन परोसा गया। क्षण भर में ही परोसा गया सारा भोजन खत्म हो गया। दोबारा खाना परोसा गया, उसे भी खा गए। बार-बार खाना परोसा जाता और क्षण भर में गणेश जी उसे चट कर जाते। </p>
<p>थोड़ी ही देर में हजारों लोगों के लिए बना भोजन खत्म हो गया, लेकिन गणपति का पेट नहीं भरा। वे रसोईघर में पहुंचे और वहां रखा सारा कच्चा सामान भी खा गए, तब भी भूख नहीं मिटी। जब सब कुछ खत्म हो गया तो गणपति ने कुबेर से कहा, जब तुम्हारे पास मुझे खिलाने के लिए कुछ था ही नहीं तो तुमने मुझे न्योता क्यों दिया था? कुबेर का अहंकार चूर-चूर हो गया।</p>
<p><em>संकलन : सुरेश सिंह<br />
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्या वाकई भगवान हमें देख रहा है]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/?p=152</link>
<pubDate>Fri, 14 Mar 2008 06:02:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[हमारे घर के पास एक डेरी वाला है. वह डेरी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हमारे घर के पास एक डेरी वाला है. वह डेरी वाला एसा है कि आधा किलो घी में अगर घी 50२ ग्राम तुल गया तो 2 ग्राम घी निकाल लेता था.</p>
<p>एक बार मैं आधा किलो घी लेने गया. उसने मुझे 90 रूपय ज्यादा दे दिये. मैंने कुछ देर सोचा और पैसे लेकर निकल लिया. मैंने मन में सोचा कि 2-2 ग्राम से तूने जितना बचाया था बच्चू अब एक ही दिन में निकल गया. मैंने घर आकर अपनी गृहल्क्षमी को कुछ नहीं बताया और घी दे दिया. उसने जैसे ही घी डब्बे में पलटा आधा घी बिखर गया. मुझे झट से "बेटा चोरी का माल मोरी में" वाली कहावत याद आ गयी. और साहब यकीन मानीये वो घी किचन की सिंक में ही गिरा था.</p>
<p>इस वाकये को कई महीने बीत गये थे. परसों शाम को मैं एग रोल लेने गया. उसने भी मुझे सत्तर रूपय ज्याद दे दिये. मैंने मन ही मन सोचा चलो बेटा आज फिर चैक करते हैं की क्या वाकई भगवान हमें देखता है. मैंने रोल पैक कराये और पैसे लेकर निकल लिया. आश्चर्य तब हुआ जब एक रोल अचानक रास्ते में ही गिर गया. घर पहुँचा, बचा हुआ रोल टेबल पर रखा, जूस निकालने के लिये अपना मनपसंद काँच का गिलास उठाया... अरे यह क्या गिलास हाथ से फिसल कर टूट गया. मैंने हिसाब लगाय करीब-करीब सत्तर में से साठ रूपय का नुकसान हो चुका था. मैं बडा आश्चर्यचकित था.</p>
<p>और अब सुनिये ये भगवान तो मेरे पीछे ही पड गया जब कल शाम को सुभिक्षा वाले ने मुझे तीस रूपय ज्याद दे दिये. मैंने अपनी धर्म-पत्नी से पूछा क्या कहती हो एक ट्राई और मारें. उन्होने मुस्कुराते हुये कहा - जी नहीं. और हमने पैसे वापस कर दिये. बाहर आकर हमारी धर्म-पत्नी जी ने कहा - वैसे एक ट्राई और मारनी चाहिये थी. बस इतना कहना था कि उन्हें एक ठोकर लगी और वह गिरते-गिरते बचीं.</p>
<p>मैं सोच में पड गया कि <strong>क्या वाकई भगवान हमें देख रहा है</strong>.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[त्याग भावना]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2008/03/12/%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%97-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a8%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Wed, 12 Mar 2008 04:33:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[शिबि अपनी त्याग बुद्धि के लिए बहुत प्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>शिबि</strong> अपनी त्याग बुद्धि के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। उनकी त्याग भावना तात्कालिक और अस्थायी है या उनके स्वभाव का स्थायी गुण, इसकी परीक्षा करने के लिए इंद्र और अग्नि ने एक योजना बनायी। अग्नि ने एक कबूतर का रूप धारण किया और इन्द्र ने एक बाज का। कबूतर को अपना आहार बनाने के लिए बाज ने उसका शिकार करने के लिए पीछा किया। कबूतर तेजी से उड़ता हुआ राजा शिबि के चरणों में जा पड़ा और बोला, मेरी रक्षा कीजिए। शिबि ने उसे रक्षा का आश्वासन दिया। पीछे-पीछे बाज भी आ पहुंचा। उसने शिबि से कहा, महाराज! मैं इस कबूतर का पीछा करता आ रहा हूं और इसे अपना आहार बना कर अपनी भूख मिटाना चाहता हूं, यह मेरा भक्ष्य है। आप इसकी रक्षा न करें। </p>
<p>शिबि ने बाज से कहा, मैंने इस पक्षी को अभय प्रदान किया है। इसे कोई मारे यह मैं कभी बर्दाश्त नहीं करूंगा। तुम्हें अपनी भूख मिटाने के लिए मांस चाहिए, सो मैं तुम्हें अपने शरीर से इस कबूतर के वजन के बराबर मांस काटकर देता हूं। उन्होंने एक तराजू मंगवाई और उसके एक पलड़े में कबूतर को रख दिया। दूसरे पलड़े में महाराज शिबि अपने शरीर से मांस काटकर डालने लगे। काफी मांस काट डाला किंतु कबूतर वाला पलड़ा तनिक भी नहीं हिला और अंत में महाराज शिबि स्वयं उस पलड़े पर जा बैठे और बाज से बोले, मेरा पूरा शरीर तुम्हारे सामने है, आओ भोजन करो। </p>
<p>महाराज शिबि की त्याग बुद्धि को स्वीकार करते हुए अग्नि और इंद्र अपने स्वाभाविक रूप में प्रकट हुए और महाराज शिबि को भी उठा कर खड़ा कर दिया। उन्होंने शिबि की त्याग भावना की बड़ी प्रशंसा की, आशीर्वाद दिया और फिर चले गए। </p>
<p>त्याग से मनुष्य लाभ प्राप्त करता है। महाराज शिबि ने अपने शरीर को सहर्ष समर्पित कर दिया। अग्नि और इंद्र ने उनकी कितनी कठोर परीक्षा ली। मनुष्य सोचता है कि उसके जीवन में कोई कष्ट न आये। लेकिन जीवन में कोई कष्ट न आये, तो जीवन जड़ हो जाता है। भगवान हमारी परीक्षा लेते हैं जिससे कि हम अपने गुण और शील को संस्कारित कर उन कष्टों का सफलता के साथ सामना कर सकें और भगवान का अनुग्रह प्राप्त कर सकें। </p>
<p><em>संकलन : सुभाष चंद्र शर्मा<br />
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मन की आवाज़]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/?p=148</link>
<pubDate>Fri, 08 Feb 2008 05:11:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक बुढ़िया बड़ी सी गठरी लिए चली जा रही ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक बुढ़िया बड़ी सी गठरी लिए चली जा रही थी। चलते-चलते वह थक गई थी। तभी उसने देखा कि एक घुड़सवार चला आ रहा है। उसे देख बुढ़िया ने आवाज दी, 'अरे बेटा, एक बात तो सुन।' घुड़सवार रुक गया। उसने पूछा, 'क्या बात है माई?' बुढ़िया ने कहा, 'बेटा, मुझे उस सामने वाले गांव में जाना है। बहुत थक गई हूं। यह गठरी उठाई नहीं जाती। तू भी शायद उधर ही जा रहा है। यह गठरी घोड़े पर रख ले। मुझे चलने में आसानी हो जाएगी।' उस व्यक्ति ने कहा, 'माई तू पैदल है। मैं घोड़े पर हूं। गांव अभी बहुत दूर है। पता नहीं तू कब तक वहां पहुंचेगी। मैं तो थोड़ी ही देर में पहुंच जाऊंगा। वहां पहुंचकर क्या तेरी प्रतीक्षा करता रहूंगा?' यह कहकर वह चल पड़ा। कुछ ही दूर जाने के बाद उसने अपने आप से कहा, 'तू भी कितना मूर्ख है। वह वृद्धा है, ठीक से चल भी नहीं सकती। क्या पता उसे ठीक से दिखाई भी देता हो या नहीं। तुझे गठरी दे रही थी। संभव है उस गठरी में कोई कीमती सामान हो। तू उसे लेकर भाग जाता तो कौन पूछता। चल वापस, गठरी ले ले। ' </p>
<p>वह घूमकर वापस आ गया और बुढ़िया से बोला, 'माई, ला अपनी गठरी। मैं ले चलता हूं। गांव में रुककर तेरी राह देखूंगा।' बुढ़िया ने कहा, 'न बेटा, अब तू जा, मुझे गठरी नहीं देनी।' घुड़सवार ने कहा, 'अभी तो तू कह रही थी कि ले चल। अब ले चलने को तैयार हुआ तो गठरी दे नहीं रही। ऐसा क्यों? यह उलटी बात तुझे किसने समझाई है?' </p>
<p>बुढ़िया मुस्कराकर बोली, 'उसी ने समझाई है जिसने तुझे यह समझाया कि माई की गठरी ले ले। जो तेरे भीतर बैठा है वही मेरे भीतर भी बैठा है। तुझे उसने कहा कि गठरी ले और भाग जा। मुझे उसने समझाया कि गठरी न दे, नहीं तो वह भाग जाएगा। तूने भी अपने मन की आवाज सुनी और मैंने भी सुनी।' </p>
<p><em>नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ढाई आखर प्रेम का भेद न जाने कोय]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/?p=146</link>
<pubDate>Mon, 28 Jan 2008 06:16:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[कृष्ण गोकुल से मथुरा आ गए। उनको मथुरा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कृष्ण</strong> गोकुल से मथुरा आ गए। उनको मथुरा में कुछ भी अच्छा नहीं लगता। वहां मथुरा में उद्धव भगवान कृष्ण के मित्र थे। बड़े भारी विद्वान चिंतक। पर अपने ज्ञान का अभिमान भी उतना ही था। कृष्ण ने उद्धव को कहा- </p>
<p><strong>उधो ब्रज मोहि बिसरत नाहीं</strong></p>
<p>लेकिन उद्धव को यह पीड़ा कहाँ समझ में आने वाली थी। वे तो ज्ञान-ध्यान की बातें करते थे। कृष्ण को माया-मोह को भुलाने की बात कहते थे। </p>
<p>कृष्ण ने उद्धव को अपना संदेशवाहक बनाकर मथुरा भेज दिया और एक पत्र भी ग्वाल बाल के नाम लिख भेजा। उधर उद्धव कृष्ण के सन्देशवाहक बनकर ब्रज पहुंचे और इधर ब्रज में कोहराम मच गया। जिसने जहां भी सुना वहीं अपना कामकाज छोड़कर उद्धव को मिलने पहुंच गया। यशोदानंदन के मित्र को सबने घेर लिया। उधो जी कृष्ण का क्या संदेश लाए हैं? </p>
<p>क्या लाए थे, उद्धव जी तो अपने ज्ञान की पोटली लेकर आए थे। कृष्ण का दिया हुआ तो बस एक पत्र ही था, सो हाथ का लिखा हुआ वह रुक्का बढ़ा दिया। सोचा, पढ़ लें, स्थिर चित्त हो जाएँ, तब समझाऊंगा इन्हें जीवन का तत्व भेद। </p>
<p>सो पत्र उनको दे दिया। लेकिन यह क्या, जिसके हाथ में पत्र आया, उसी के आँसुओं से वह भीगने लगा, कागज गल गया, स्याही फैल गई, पढ़ने को तो कुछ बचा ही नहीं। इसके बाद छीना-झपटी मच गई, जरा हम भी देखें, हम भी पढ़ें उनका संदेश। पत्र के टुकड़े-टुकड़े हो गया। छीना-झपटी में जिसके हाथ जितना छोटा टुकड़ा आया, उसी फटे हुए टुकड़े को वह लेकर रोने लगा। अपने माथे से लगाने लगा, छाती से लगाने लगा। कृष्ण की स्मृति में खो गया। पत्र पढ़ने की तो जरूरत ही नहीं रही। </p>
<p>सभी गोपी-ग्वाल बालकृष्ण की याद में रोते-सिसकते और आँसू बहाते रहे। उद्धव उनके प्रेमाश्रुओं की बहती हुई गंगा की धारा को पार नहीं कर सके। प्रेम भक्ति के इस हृदयस्पर्शी मार्मिक दृश्य में किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े रहे। बिलखते हुए गोपियों ने कहा- उधो, अँखियाँ हरिदर्शन की प्यासी। </p>
<p>उद्धव ने उन्हें आत्मतत्व का महत्व समझाया, ज्ञान-ध्यान का रस पिलाया किन्तु कौन सुनता है। किसी को इसमें कोई स्वाद नहीं आया। नीरस ज्ञान किसी के मन को नहीं भाया। फिर उन सब को भगवान की व्यापकता का परिचय दिया। योग का मूल सूत्र बताया। किन्तु गोपियाँ तो उस कृष्ण की याद में आँसू बहाती रहीं, जो उनके साथ खेलता था। कहा, </p>
<p><strong>उधो! मन नाहीं दस-बीस, एकहुतो सो गयो श्याम संग, को आराधो ईश</strong></p>
<p>महाराज, यह मन 10-20 तो हैं नहीं। हमारे पास हमारा एक ही मन था और वह कृष्ण के संग चला गया। तुम्हारे ज्ञान की बातें सुनने के लिए अब हमारे पास हमारा मन नहीं है। </p>
<p>गोपियों और ग्वाल बाल के प्रेम के सामने उद्धव निरुत्तर हो गए। ज्ञान की पोटली खुल कर बिखर गई, मूल्यहीन हो गई। उन्हें मथुरा वापस लौटना पड़ा। प्रेम का सम्बन्ध तर्क-वितर्क से नहीं होता, उसका सम्बन्ध तो हृदय से होता है। </p>
<p>प्रेम के रहस्य को कोई भी नहीं जान पाया। मीरा कृष्ण के प्रेम में व्याकुल होकर एक बार कहती हैं- मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई, जाको सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई। फिर अगले ही पल कहती थी, जो मैं ऐसा जानती प्रेम करे दुख होय। नगर ढिंढोरा पीटती, प्रेम करो मत कोय। </p>
<p>प्रेम शब्द का बड़ा व्यापक अर्थ है। यह प्रभु का ही अनन्त रूप है। यह निष्काम, नि:स्वार्थ, पावन पवित्र शब्द है। यह भगवान की महिमा का व्यापक रूप है। जिसने भी इस प्रेम शब्द को जान लिया-पहचान लिया, वह भगवानमय बन जाता है। जब भक्तगण भगवान को याद करते हैं, उनका मनन-चिन्तन-स्मरण करते हैं, भावविभोर होकर गुणगान करते हैं, भगवान के लिए करुण क्रंदन करते हैं, तो भगवान का हृदय भी उनकी भाव भक्ति से दवित हो जाता है। और भगवान भी अपने भक्तों को याद करते हैं। भक्ति भाव भी उसी प्रेम का एक रूप है। </p>
<p><em>नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विचार की पवित्रता]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2008/01/17/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Thu, 17 Jan 2008 06:08:21 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक राजा और नगर सेठ में गहरी मित्रता थी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक राजा और नगर सेठ में गहरी मित्रता थी। वे रोज एक दूसरे से मिले बिना नहीं रह पाते थे। नगर सेठ चंदन की लकड़ी का व्यापार करता था। एक दिन उसके मुनीम ने बताया कि लकड़ी की बिक्री कम हो गई है। तत्काल सेठ के मन में यह विचार कौंधा कि अगर राजा की मृत्यु हो जाए, तो मंत्रिगण चंदन की लकडि़यां उसी से खरीदेंगे। उसे कुछ तो मुनाफा होगा। शाम को सेठ हमेशा की तरह राजा से मिलने गया। उसे देख राजा ने सोचा कि इस नगर सेठ ने उससे दोस्ती करके न जाने कितनी दौलत जमा कर ली है, ऐसा कोई नियम बनाना होगा जिससे इसका सारा धन राज खजाने में जमा हो जाए। </p>
<p>दोनों इसी तरह मिलते रहे, लेकिन पहले वाली गर्मजोशी नहीं रही। एक दिन नगर सेठ ने पूछ ही लिया, 'पिछले कुछ दिनों से हमारे रिश्तों में एक ठंडापन आ गया है। ऐसा क्यों?' राजा ने कहा, 'मुझे भी ऐसा लग रहा है। चलो, नगर के बाहर जो महात्मा रहते हैं, उनसे इसका हल पूछा जाए।' उन्होंने महात्मा को सब कुछ बताया। महात्मा ने कहा, 'सीधी सी बात है। आप दोनों पहले शुद्ध भाव से मिलते रहे होंगे, पर अब संभवत: एक दूसरे के प्रति आप लोगों के मन में कुछ बुरे विचार आ गए हैं इसलिए मित्रता में पहले जैसा सुख नहीं रह गया।' </p>
<p>नगर सेठ और राजा ने अपने-अपने मन की बातें कह सुनाईं। महात्मा ने सेठ से कहा,' तुमने ऐसा क्यों नहीं सोचा कि राजा के मन में चंदन की लकड़ी का आलीशान महल बनवाने की बात आ जाए? इससे तुम्हारा चंदन भी बिक जाता। विचार की पवित्रता से ही संबंधों में मिठास आती है। तुमने राजा के लिए गलत सोचा इसलिए राजा के मन में भी तुम्हारे लिए अनुचित विचार आया। गलत सोच ने दोनों के बीच दूरी बढ़ा दी। अब तुम दोनों प्रायश्चित करके अपना मन शुद्ध कर लो, तो पहले जैसा सुख फिर से मिलने लगेगा।'</p>
<p><em>नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[विश्वास की शक्ति]]></title>
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<pubDate>Tue, 08 Jan 2008 05:47:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक बार नारदजी एक पर्वत से गुजर रहे थे। ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक बार <strong>नारदजी </strong>एक पर्वत से गुजर रहे थे। अचानक उन्होंने देखा कि एक विशाल वटवृक्ष के नीचे एक तपस्वी तप कर रहा है। उनके दिव्य प्रभाव से वह जाग गया और उसने उन्हें प्रणाम करके पूछा कि उसे प्रभु के दर्शन कब होंगे। नारदजी ने पहले तो कुछ कहने से इनकार किया, फिर बार-बार आग्रह करने पर बताया कि इस वटवृक्ष पर जितनी छोटी-बड़ी टहनियां हैं उतने ही वर्ष उसे और लगेंगे। नारदजी की बात सुनकर तपस्वी बेहद निराश हुआ। उसने सोचा कि इतने वर्ष उसने घर-गृहस्थी में रहकर भक्ति की होती और पुण्य कमाए होते तो उसे ज्यादा फल मिलते। वह बोला, 'मैं बेकार ही तप करने आ गया।' नारदजी उसे हैरान-परेशान देखकर वहां से चले गए। </p>
<p>आगे जाकर संयोग से वह एक ऐसे जंगल में पहुंचे, जहां एक और तपस्वी तप कर रहा था। वह एक प्राचीन और अनंत पत्तों से भरे हुए पीपल के वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था। नारदजी को देखते ही वह उठ खड़ा हुआ और उसने भी प्रभु दर्शन में लगने वाले समय के बारे में पूछा। नारदजी ने उसे भी टालना चाहा, मगर उसने बार-बार अनुरोध किया। इस पर नारदजी ने कहा कि इस वृक्ष पर जितने पत्ते हैं उतने ही वर्ष अभी और लगेंगे। हाथ जोड़कर खड़े उस तपस्वी ने जैसे ही यह सुना, वह खुशी से झूम उठा और बार-बार यह कहकर नृत्य करने लगा कि प्रभु उसे दर्शन देंगे। उसके रोम-रोम से हर्ष की तरंगें उठ रही थीं। </p>
<p>नारदजी मन ही मन सोच रहे थे कि इन दोनों तपस्वियों में कितना अंतर है। एक को अपने तप पर ही संदेह है। वह मोह से अभी तक उबर नहीं सका और दूसरे को ईश्वर पर इतना विश्वास है कि वह वर्षों प्रतीक्षा के लिए तैयार है। तभी वहां अचानक अलौकिक प्रकाश फैल गया और प्रभु प्रकट होकर बोले, 'वत्स! नारद ने जो कुछ बताया वह सही था पर तुम्हारी श्रद्धा और विश्वास में इतनी गहराई है कि मुझे अभी और यहीं प्रकट होना पड़ा।'</p>
<p><em>नवभारत टाईम्स में प्रकाशित</em></p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[आत्मा की ज्योति]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/12/25/%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%bf/</link>
<pubDate>Tue, 25 Dec 2007 04:48:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक दिन राजा जनक ने महर्षि याज्ञवल्क्य ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक दिन राजा जनक ने महर्षि याज्ञवल्क्य से पूछा, 'महात्मन्! बताइए कि एक व्यक्ति किस ज्योति से देखता है और काम लेता है?' याज्ञवल्क्य ने कहा, 'यह तो बिल्कुल बच्चों जैसी बात पूछी आपने महाराज। यह तो हर व्यक्ति जानता है कि मनुष्य सूर्य के प्रकाश में देखता है और उससे अपना काम चलता है।' इस पर जनक बोले, 'और जब सूर्य न हो तब?' </p>
<p>याज्ञवल्क्य बोले, 'तब वह चंद्रमा की ज्योति से काम चलाता है।' तभी जनक ने टोका, 'और जब चन्द्रमा भी न हो तब।' याज्ञवल्क्य ने जवाब दिया, 'तब वह अग्नि के प्रकाश में देखता है।' जनक ने फिर कहा, 'और जब अग्नि भी न हो तब।' याज्ञवल्क्य ने मुस्कराते हुए कहा, 'तब वह वाणी के प्रकाश में देखता है।' जनक ने गंभीरतापूर्वक उसी तरह पूछा, 'महात्मन् यदि वाणी भी धोखा दे जाए तब।' याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया, 'राजन् तब मनुष्य का मार्ग प्रशस्त करने वाली एक ही वस्तु है-आत्मा। सूर्य, चंद्रमा, अग्नि और वाणी चाहे अपनी आग खो दें पर आत्मा तब भी व्यक्ति के मार्ग को प्रशस्त करती है।' इस बार जनक संतुष्ट हो गए।</p>
<p><em>नवभारत टाईम्स में प्रकाशित</em></p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[क्रोध का कलंक]]></title>
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<pubDate>Tue, 18 Dec 2007 03:51:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[विश्वामित्र अत्यंत क्रोधी स्वभाव के ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>विश्वामित्र अत्यंत क्रोधी स्वभाव के थे। उन्हें इस बात का दुख सताता रहता था कि ऋषि वशिष्ठ उन्हें ब्रह्मार्षि नहीं मानते। एक दिन उन्होंने सोचा, 'आज मैं वशिष्ठ को मारकर ही रहूंगा। तब फिर कोई मुझे ब्रह्मार्षि की जगह राजर्षि कहने वाला नहीं रहेगा।' वह एक तलवार लेकर उस वृक्ष पर जा बैठे जिसके नीचे महर्षि वशिष्ठ अपने शिष्यों को पढ़ाते थे। थोड़ी देर के बाद वशिष्ठ अपने शिष्यों के साथ उस वृक्ष के नीचे आ बैठे। पूर्णिमा का चांद निकल आया। विश्वामित्र ने सोचा कि छात्रों के जाते ही वह वशिष्ठ को मार डालेंगे। तभी एक छात्र बोल उठा, 'कितना सलोना चांद है। कितनी सुंदरता है उसके भीतर।' वशिष्ठ बोले, 'यदि तुम ऋषि विश्वामित्र को देखो तो इस चांद को भूल जाओगे। यह चांद सुंदर अवश्य है, पर ऋषि विश्वामित्र इससे भी ज्यादा सुंदर हैं। यदि उनके भीतर क्रोध न हो तो वह सूर्य की भांति चमक उठें।' </p>
<p>छात्र बोला, 'गुरुदेव ऐसा आप कह रहे हैं, पर वह तो आपके शत्रु हैं। सदैव आपकी निंदा करते रहते हैं।' वशिष्ठ ने कहा, 'जानता हूं, मगर मैं इन बातों पर ध्यान नहीं देता। सच तो यह है कि वह मुझसे ज्यादा विद्वान हैं। उन्होंने मुझसे ज्यादा तप किया है। तुम्हें नहीं मालूम मैं उनका कितना सम्मान करता हूं।' </p>
<p>पेड़ पर बैठे विश्वामित्र यह सुनकर हैरान रह गए। वह पश्चाताप से भर उठे। वह वशिष्ठ को मारना चाहते थे पर वशिष्ठ तो उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे। वह उसी समय पेड़ से कूदे। उन्होंने तलवार फेंकी और वशिष्ठ के चरणों में गिरकर बोले, 'मुझे क्षमा करें ऋषिवर।' वशिष्ठ ने उन्हें उठाते हुए कहा, 'उठिए ब्रह्मार्षि।' विश्वामित्र ने आश्चर्य से कहा, 'ब्रह्मार्षि! आपने मुझे ब्रह्मार्षि कहा? पर आप तो मुझे ब्रह्मार्षि का दर्जा देते नहीं। आप तो सदैव मुझे राजर्षि कहते हैं।' वशिष्ठ ने कहा, 'आज से आप ब्रह्मार्षि हुए। आप ने अपने क्रोध पर विजय पा ली है। आप में एकमात्र दोष यही था, अब उसे भी आपने दूर कर लिया।' यह कहकर वशिष्ठ ने विश्वामित्र को गले लगा लिया।</p>
<p><em>नवभारत टाईम्स में प्रकाशित</em></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[मैं तुम्हें केवल भय दे सका]]></title>
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<pubDate>Mon, 17 Dec 2007 04:42:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[महात्मा बुद्ध किसी उपवन में विश्राम क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>महात्मा बुद्ध किसी उपवन में विश्राम कर रहे थे। तभी बच्चों का एक झुंड आया और पेड़ पर पत्थर मारकर आम गिराने लगा। एक पत्थर बुद्ध के सिर पर लगा और उससे खून बहने लगा। बुद्ध की आंखों में आंसू आ गए। बच्चों ने देखा तो भयभीत हो गए। उन्हें लगा कि अब बुद्ध उन्हें भला-बुरा कहेंगे। बच्चों ने उनके चरण पकड़ लिए और उनसे क्षमायाचना करने लगे। उनमें से एक ने कहा, 'हमसे भारी भूल हो गई है। हमने आपको मारकर रुला दिया।' इस पर बुद्ध ने कहा, 'बच्चों, मैं इसलिए दुखी हूं कि तुम ने आम के पेड़ पर पत्थर मारा तो पेड़ ने बदले में तुम्हें मीठे फल दिए, लेकिन मुझे मारने पर मैं तुम्हें केवल भय दे सका।'</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[मृत्यु का भय]]></title>
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<pubDate>Mon, 19 Nov 2007 16:08:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक-
एक व्यक्ति चाहकर भी अपने दुर्गुणों]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक-</p>
<p>एक व्यक्ति चाहकर भी अपने दुर्गुणों पर काबू नहीं कर पा रहा था. एक बार उसके गाँव में संत फरीद आये. उसने उनसे अपनी परेशानी बतायी. फरीद ने कहा, 'द्ढ सकंल्प से ही दुर्गुण छूटते हैं. यदि तुम इच्छाशक्ति मजबूत कर लोगे तो तुम्हें अपने दोषों से मुक्ति मिल जाएगी'. वह व्यक्ति प्रयास करके थक गया मगर उसे सफलता नहीं मिली. वह फिर फरीद के पास गया. फरीद ने पहले उसके माथे रेखाएं देखने का नाटक किया, फिर बोले, 'अरे तुम्हारी जिंदगी के चालीस दिन ही शेष हैं. अगर इन बचे दिनों में तुमने दुर्गुण त्याग दिये तो तुम्हें सद्गति मिल जाएगी'. यह सुनकर वह आदमी परेशान हो गया. वह किसी तरह घर पहुँचा और व्यसनों की बात तो दूर, खाना-पीना तक भूल गया. वह हर पल ईश्वर को याद करता रहा. उसने गलत कार्य नहीं किया. चालीस दिन बीतने पर वह फरीद के पास पहुँचा. उन्होंने पूछा,'इतने दिनों में तुमने कितने गलत कार्य किये?' उस व्यक्ति ने जवाब दिया,'मैं क्या करता. मैं तो हर पल ईश्वर को याद करता रहा.' संत फरीद मुस्कराते होए बोले,'जाओ अब तुम पूरी तरह सुरक्षित हो. तुम अच्छे इंसान बन गये हो. जो व्यक्ति हर समय मृत्यु को ध्यान रखकर जीवनयापन करता है वह भला इंसान बन जाता है.'</p>
<p>दो-</p>
<p>एक फकीर ने अपना अंत समय देख अपने शिष्यों से कहा,'मेरे पास जो भी धन-संपत्ति है उसे मैं सबसे गरीब व्यक्ति को दूंगा.' अगले दिन उसकी कुटिया के आगे निर्धनों की भीड लग गयी पर फकीर ने उन्हें कुछ नहीं दिया. तभी उधर से अपने रथ पर राजा निकला. फकीर ने धन की थैली उसकी ओर फेंक दी. राजा ने हँसकर कहा,'तुम पागल हो गये हो क्या? मैं तो यहाँ का राजा हूँ' फकीर बोला,'तुम्हारे पास अपार धन-दौलत है पर संतोष नहीं. तुम लालची हो इसलिये मैं तुम्हें सबसे ज्यादा गरीब मानता हूँ.' राजा शर्मिंदा हो गया और उस दिन से प्रजा की भलाई में जुट गया.</p>
<p><em><strong>साभारा </strong>: नवभारत टाइमस, दिनांक १९.११.२००७ में प्रकाशित</em></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्षणिकाएँ - जानवर]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/10/24/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%a3%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%8f%e0%a4%81-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Wed, 24 Oct 2007 07:03:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[सभी क्षणिकाएँ, के.पी. सक्सेना ’दूसरे’ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सभी क्षणिकाएँ, के.पी. सक्सेना ’दूसरे’ द्वारा रचित। </p>
<p>- जानवर -<br />
(१)<br />
जानवर की कोख से<br />
जनते न देखा आदमी<br />
आदमी की नस्ल फिर क्यों<br />
जानवर होने लगी।</p>
<p>(२)<br />
गो पालतू है जानवर<br />
पर आप चौकन्ने रहें<br />
क्या पता किस वक़्त वो<br />
इन्सान बनना ठान ले।</p>
<p>(३)<br />
पड़ोसी मर गया, अब यह खबर अखबार देते हैं<br />
सोच लो किस तज़&#124; में हम ज़िन्दगी का बोझ ढोते हैं,<br />
अब तो मैं भी छोड़ता बिस्तर सुनो तस्दीक़ कर,<br />
नाम मेरा तो नहीं था कल ’निधन’ के पृष्ठ पर।</p>
<p><a href="http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/K/KPSaxsena/kshanikayen.htm">साहित्य कुंज के आभार से</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गुरू का सम्मान]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/10/20/%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8/</link>
<pubDate>Sat, 20 Oct 2007 09:49:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[गुरू धौम्य का बहुत बडा आश्रम था।आश्रम ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>गुरू धौम्य का बहुत बडा आश्रम था।आश्रम में कई शिष्य थे। उनमें अरूणि गुरू का सबसे प्रिय शिष्य था। आश्रम के पास खेती की बहुत ज़मीन थी। खेतों में फसल लहलहा रही थी। एक दिन शाम को एकाएक घनघोर घटा घिर आई और थोडी देर में तेज वर्षा होने लगी। उस समय ज्यादातर शिष्य उठ कर चले गए थे। अरूणि गुरूदेव के पास बैठा था। गुरू धौम्य ने कहा, अरूणि तुम खेतों की तरफ चले जाओ और मेडों की जाँच कर लो। जहाँ कहीं से पानी बह रहा हो और मेड कमजोर हो तो वहाँ मिट्टी डाल कर ठीक कर देना। अरूणि चला गया। कई जगह मेड के ऊपर से पानी बह रहा था। उसने मिट्टी डाल कर ठीक किया। एक जगह मेड में बडा छेद हो गया था। उससे पानी तजी से बह रहा था। वह उस छेद को बंद करने के लिये मिट्टी का लौदां उठा-उठा कर भरने लगा, लेकिन ज्योंही एक लौंदा रखकर दुसरा लेने आता, पहले वाला लौंदा भी बह जाता। उसका बार-बार क प्रयास बेकार जा रहा था कि उसे एक उपाय सूझा। उसने मिट्टी का एक लौंदा उठाया और छेद को बंद करके स्व्यं मेड के सहारे वहीं लेट गया, जिससे पानी बहना बंद हो गया। रात होने लगी थी। अरूणि लौट कर आश्रम नहीं आया था, जिसकी वजह से गुरू को चिंता हो रही थी। वे कुछ शिष्यों को लेकर खेत की तरफ गये। खेत के पास पहुँच कर पुकारा, अरूणि तुम कहाँ हो। वह बोला, गुरूवर मैं यहाँ हूँ। गुरूवर उस जगह गए। उन्होंने देखा कि अरूणि मेड  से चिपटा हुआ है। गुरूदेव बोले, वत्स तुम्हें इस तरह यहाँ पडे रहने की जरूरत क्या थी&#124; तुम्हें कुछ हो जाता तो ...।</p>
<p>अरूणि बोले, गुरूवर, यदि मैं अपना कर्तव्य अधूरा छोड कर चला आता तो वह गुरू का अपमान होता। जहाँ तक कुछ होने की बात है तो जब तक गुरू का आशिर्वाद शिष्य के सिर पर है तब तक शिष्य को कुछ नहीं होगा। गुरू का दर्जा तो भगवान से बडा है। इस पर महर्षि बोले, वत्स, मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुमने आज गुरू-शिष्य के संबधों की अनूठी मिसाल कायम की है जो हमेशा के लिये जनमानस में एक मिसाल बनी रहेगी। तुमने अंतिम परीक्षा पास कर ली है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समस्या]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/10/18/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Thu, 18 Oct 2007 04:12:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक गाँव में एक फकीर आए। वे किसी की भी सम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक गाँव में एक फकीर आए। वे किसी की भी समस्या दूर कर सकते हैं। सभी लोग जल्दी से जल्दी अपनी समस्या फकीर को बताकर उपाय जानना चाहते थे। नतीजा यह हुआ कि हर कोई बोलने लगा और किसी को कुछ समझ में नहीं आया। अचानक फकीर चिल्लाए. 'खामोश'। सब चुप हो गए। फकीर ने कहा, "मैं सबकी समस्या दूर कर दूंगा। एक साथ बोलने के बजाय सब लोग एक-एक कागज पर अपनी समस्या लिख लाएं और मुझे दें।</p>
<p>कुछ ही देर में फकीर के सामने कागजों का ढेर लग गया। फकीर ने कागजों को एक टोकरी में रखा और सबसे गोला बनाकर बैठ ने को कहा। गोले के बीच में टोकरी रख दी।<br />
एक आदमी की तरफ इशारा करके कहा, "यहाँ से शुरू करके सब बारी-बारी से आएंगे और एक-एक कागज़ उठा लेंगें।" ध्यान रहे किसी को अपना कागज़ नहीं उठाना है। लोग एक-एक कर आए कागज उठा-उठा कर अपनी-अपनी जगह बैठ गए। फकीर ने कहा,"अब इस कागज़ में लिखी किसी दूसरे की समस्या पढो। अगर चाहो तो मैं तुम्हारी समस्या दूर कर दूँगा पर उसके बदले कागज़ पर लिखी समस्या तुम्हारी हो जाएगी। तुम्हें लगता है कि तुम्हारी समस्या बडी है तो उसे दूर करवाकर कागज़ पर लिखी दूसरे की छोटी-सी समस्या अपना लो। चाहो तो आपस में कागज़ बदल लो। जब तय कर लो कि अपनी समस्या के बदले कौन सी समस्या लोगे तब मेरे पास आ जाना।</p>
<p>लोगों ने जब कागज़ पर लिखी समस्या पढी तो वे घबरा गए। लोग एक दूसरे से कागज़ बदल-बदल कर पढ रहे और बार-बार उन्हें लगता कि उनकी समस्या तो जैसी है वैसी है, पर इस नई समस्या का सामना वे कैसे कर पाएंगे। कुछ देर में हर किसी को समझ में आ गया कि उनकी समस्या जैसी भी है उनके अपने जीवन का हिस्सा है और वे उसी का सामना कर सकते हैं। एक-एक कर के लोग चुपचाप वहाँ से चले गये।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्रोध पर विजय]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/08/17/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%a7-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a4%af/</link>
<pubDate>Fri, 17 Aug 2007 08:15:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक व्यक्ति के बारे में यह विख्यात था क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक व्यक्ति के बारे में यह विख्यात था कि उसको कभी क्रोध आता ही नहीं है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें सिर्फ बुरी बातें ही सूझती हैं। ऐसे ही व्यक्तियों में से एक ने निश्चय किया कि उस अक्रोधी सज्जन को पथच्युत किया जाये और वह लग गया अपने काम में। उसने इस प्रकार के लोगों की एक टोली बना ली और उस सज्जन के नौकर से कहा - "यदि तुम अपने स्वामी को उत्तेजित कर सको तो तुम्हें पुरस्कार दिया जायेगा।" नौकर तैयार हो गया। वह जानता था कि उसके स्वामी को सिकुडा हुआ बिस्तर तनिक भी अच्छा नहीं लगता है। अत: उसने उस रात बिस्तर ठीक ही नहीं किया।</p>
<p>प्रात: काल होने पर स्वामी ने नौकर से केवल इतना कहा - "कल बिस्तर ठीक था।"</p>
<p>सेवक ने बहाना बना दिया और कहा - "मैं ठीक करना भूल गया था।"</p>
<p>भूल तो नौकर ने की नहीं थी, अत: सुधरती कैसे? इसलिये दूसरे, तीसरे और चौथे दिन भी बिस्तर ठीक नहीं बिछा।</p>
<p>तब स्वामी ने नौकर से कहा - "लगता है कि तुम बिस्तर ठीक करने के काम से ऊब गये हो और चाहते हो कि मेरा यह स्वभाव छूट जाये। कोई बात नहीं। अब मुझे सिकुडे हुए बिस्तर पर सोने की आदत पडती जा रही है।"</p>
<p>अब तो नौकर ने ही नहीं बल्कि उन धूर्तों ने भी हार मान ली।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हाथियों का झुंड और बूढ़े शशक की कहानी]]></title>
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<pubDate>Fri, 11 May 2007 09:42:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[किसी समय वर्षा के मौसम में वर्षा न होन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>किसी समय वर्षा के मौसम में वर्षा न होने से प्यास के मारे हाथियों का झुंड अपने स्वामी से कहने लगा -- हे स्वामी, हमारे जीने के लिए अब कौन- सा उपाय है? छोटे- छोटे जंतुओं को नहाने के लिए भी स्थान नहीं है और हम तो स्नान के लिए स्थान न होने से मरने के समान है। क्या करें? कहाँ जाएँ? हाथियों के राजा ने समीप ही जो एक निर्मल सरोवर था, वहाँ जा कर दिखा दिया। फिर कुछ दिन बाद उस सरोवर के तीर पर रहने वाले छोटे- छोटे शशक हाथियों के पैरों की रेलपेल में खुँद गये। बाद में शिलीमुख नामक शशक सोचने लगा -- प्यास के मारे यह हाथियों का झुंड, यहाँ नित्य आएगा। इसलिए हमारा कुल तो नष्ट हो जाएगा। फिर विजय नामक एक बूढ़े शशक ने कहा -- खेद मत करो। मैं इसका उपाय कर्रूँगा। फिर वह प्रतिज्ञा करके चला गया, और चलते- चलते इसने सोचा -- कैसे हाथियों के झुंड के पास खड़े हो कर बातचीत करनी चाहिए।</p>
<p><strong>स्पृशन्नपि गजो हन्ति जिघ्रन्नयि भुजंगमः।<br />
पालयन्नपि भूपालः प्रहसन्नपि दुर्जनः।।</strong></p>
<p>अर्थात हाथी स्पर्श से ही, साँप सूँघने से ही, राजा रक्षा करता हुआ भी और दुर्जन हँसता हुआ भी मार डालता है।</p>
<p>इसलिए मैं पहाड़ की चोटी पर बैठ कर झुंड के स्वामी से अच्छी प्रकार से बोलूँ। ऐसा करने पर झुंड का स्वामी बोला -- तू कौन है? कहाँ से आया है? वह बोला -- मैं शशक हूँ। भगवान चंद्रमा ने आपके पास भेजा है। झुंड के स्वामी ने कहा -- क्या काम है बोल? विजय बोला :-</p>
<p><strong>उद्यतेष्वपि शस्रेषु दूतो वदति नान्यथा।<br />
सदैवांवध्यभावेन यथार्थस्य हि वाचकः।</strong></p>
<p>अर्थात, मारने के लिए शस्र उठाने पर भी दूत अनुचित नहीं करता है, क्योंकि सब काल में नहीं मारे जाने से (मृत्यु की भीति न होने से) वह निश्चय करके सच्ची ही बात बोलने वाला होता है।</p>
<p>इसलिए मैं उनकी आज्ञा से कहता हूँ, सुनिये -- जो ये चंद्रमा के सरोवर के रखवाले शशकों को निकाल दिया है, वह अनुचित किया। वे शशक हमारे बहुत दिन से रक्षित हैं, इसलिये मेरा नाम "शशांक" प्रसिद्ध है। दूत के ऐसा कहते ही हाथियों का स्वामी भय से यह बोला -- सोच लो, यह बात अनजानपन की है। फिर नहीं करुँगा। दूत ने कहा -- जो ऐसा है तो उसे सरोवर में क्रोध से काँपते हुए भगवान चंद्रमाजी को प्रणाम कर और प्रसन्न करके चला जा। फिर रात को झुंड के स्वामी को ले जा कर ओर जल में हिलते हुए चंद्रमा के गोले को दिखला कर झुंड के स्वामी से प्रणाम कराया और इसने कहा-- हे महाराज, भूल से इसने अपराध किया है, इसलिए क्षमा कीजिये, फिर दूसरी बार नहीं करेगा। यह कह कर विदा लिया।</p>
<p>साभार - <a href="http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/hitop303.htm">इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[नारद जी पर ज़रा सोचिए...]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/05/08/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a6-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a5%9b%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%8f/</link>
<pubDate>Tue, 08 May 2007 06:11:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[प्रसंग-१
एक बार नारद जी घुमते हुए डाकू ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>प्रसंग-१</strong><br />
एक बार नारद जी घुमते हुए डाकू रत्नाकर के इलाके में पहुँचे। रत्नाकर ने उन्हें लूटने के लिये रोका। नारद जी बोले "भैया मेरे पास तो यह वीणा है, इसे ही रख लो। लेकिन एक बात तो बताओ, तुम यह पाप क्यों कर रहे हो?" रत्नाकर ने कहा,"अपने परिवार के लिये।" तब नारद जी बोले, "अच्छा, लेकिन लूटने से पहल एक सवाल जरा अपने परिवार वालों से पूछ आओ कि क्या वह भी तुम्हारे पापों में हिस्सेदार हैं?" </p>
<p>रत्नाकर दौडे-दौडे घर पहुँचे। जवाब मिला, "हमारी देखभाल तो आपका कर्तव्य है, लेकिन हम आपके पापों में भागीदार नहीं हैं। लुटे-पिटे से रत्नाकर लौट कर नारद जी के पास आए और डाकू रत्नाकर से वाल्मीकि हो गए। बाद में उन्हें रामायण लिखने की प्रेरणा भी नारद जी से ही मिली।</p>
<p><strong>प्रसंग-२</strong><br />
सरस्वती नदी के किनारे अपने आश्रम में व्यास उदासी में इधर-उधर घुम रहे थे। आश्रम में जब उदासी नहीं मिटी, तो वह नदी की ओर चल दिए। लेकिन बेचैनी तो खत्म ही नहीं हो रही थी। जब उन्हें कुछ भी नहीं सूझ रहा था, तो देवर्षि नारद चले आए। देवर्षि ने उनके माथे पर चिंता की रेखाएं देख पूछा, 'आप तो महाज्ञानी हैं। महाभारत जैसी महान रचना करने के बाद भी आप खुश नहीं दिख रहे?'</p>
<p>उदास-परेशा व्यास ने कहा,'ज्ञान की गहराई में डूब जाने के बाद भी न जाने उदास क्यों हूं मैं? आप तो सब जानते हैं। मेरी इस उदासी की वजह बताइए?'</p>
<p>मुस्कराते हुए नारद जी बोले,'व्यासजी, आपने ज्ञान की अतल गहराइयों में डुबकी लगाई है। लेकिन मन की डुबकी कभी नहीं लगाई। यह उदासी उसी वजह से है।'</p>
<p>व्यास जी ने पूछा,'तो मैं क्या करूं देवर्षि?' नारदजी ने जवाब दिया,'तुम प्रभु का गान क्यों नहीं करते?'</p>
<p>नारद जी 'नारयण-नारयण' करते हुए चले गए। इसी घटना के बाद व्यास जी ने भागवत की रचना की।</p>
<p><strong>प्रसंग-३</strong><br />
अपने राजमहल में दक्ष तिलमिला रहे हैं। वह नारद को रह-रह कर कोस रहे हैं। तभी नारद जी अपनी वीणा बजाते "नारयण नारयण" कहते आ जाते हैं। नारद जी को देखते ही वह भडक जाते हैं। 'हे नारद तुमने मेरे सारे बेटों को बहका दिया। तुमने उन्हें राजमहल छुडा कर ब्रह्मचारी बना दिया।' नारद जी बोले,'मैंने तुम्हारे आवार बेटों को परम सच की ओर मोड दिया है। तुम भी बेटों की राह पर चले जाओ?' गुस्से से भभकते हुए दक्ष सीधे शाप देने पर उतर आए। 'हे नारद, तुमने मेरे बेटों को भटकाया है, तुम आजीवन भटकते रहो।' नारद जी कोई विरोध नहीं करते। वह चुपचाप एक हताश पिता का शाप स्वीकार कर जीवन भर भटकने के लिये चल पडते हैं।</p>
<p>ऐसे थे नारद जी, किंतु हम लोग नारद जी का नाम लेते ही हँसना शुरु कर देते हैं। ३ मई को नारद जी की जयंती थी। क्या आप भी उन्हें विदुषक समझते हैं? जरा सोचिए तो नारद जी के बारे में...</p>
<p>साभार-हिन्दुस्तान दैनिक</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[प्रंशसा से परोपकार]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/04/20/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%82%e0%a4%b6%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Fri, 20 Apr 2007 08:40:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[दूसरे महायुद्ध की बात है। एक जापानी सै]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दूसरे महायुद्ध की बात है। एक जापानी सैनिक गंभीर रूप से घायल हो गया था, काफी रक्त बह चुका था, ऐसा लग रहा था, वह कुछ ही क्षणों का मेहमान है। एक भारतीय सैनिक की मानवता जागी, शत्रु है तो क्या? मरते हुये को पानी देना, मानवता के नाते धर्म है। म्रत्यु के आखिरी क्षणों में शत्रुता कैसी? उसने अपनी बोतल से पानी निकाला, घायल सैनिक के मुँह से लगाया बोला-मित्र बुद्ध के देश में इस सैनिक के हाथों की वीरता, युद्ध भूमि में देख चुके हो। अब स्नेह भी देखो, जल पीओ।</p>
<p>किन्तु उस दुष्ट ने दया का बदला यह दिया कि अपने चाकू से भारतीय सैनिक को घायल कर दिया। रक्त की धार बह चली, घायल हो भारतीय सैनिक गिर पडा। दोनों ही सैनिकों को भारतीय अस्पताल पहुँचाया गया। दोनों ही की मरहम पट्टी की गई। धीरे-धीरे दोनों ही ठीक हो गये।</p>
<p>ठीक होने पर फिर भारतीय सैनिक, जापानी सैनिक से मिलने चला गया। उसकी कुशलक्षेम पूछी और फिर चाय का प्याला दिया, गरम-गरम चाय पिलाई। जापानी सैनिक का मन पश्चाताप से भर उठा, उसे अपने किये पर आत्मग्लानी हो रही थी। उसने भारतीय सैनिक से कहा दोस्त अब मैं समझा कि बुद्ध का जन्म तुम्हारे देश में क्यों हुआ था।</p>
<p>मनुष्य की सोई हुई मानवता कभी भी जाग्रत हो कर परोपकार के अदभुत कर्म करा सकती है। वे कार्य जो मनुष्य किसी भी सांसारिक लोभ के वश में होकर नहीं करता, अन्तरात्मा के दैवी प्रभाव में एकाएक कर बैठता है। अन्दर की अन्तरात्मा जाग कर उसे परोपकार के शुभकार्यों की ओर तीव्रता से प्रेरित करती है।</p>
<p>वस्यो भूयाय वसुमान यज्ञ वसु वंशिषीय, वसुमान भूयासं वसु मयि धेहि..</p>
<p>मनुष्यों, ईश्वर पर पूर्ण आस्था रखो और इस संसार में परोपकार करते हुए श्रेष्ठ पद प्राप्त करो। परोपकार की पूंजी सदा अक्षय कीर्ती देने वाली दैवी विभूति है। परोपकारी इस लोक में प्रसन्न रहता है और मरने के बाद भी सदा याद किया जाता है।</p>
<p>अधा नो देव सवितः<br />
प्रजावत सावीः सौबगम्<br />
परा दुःस्वप्नय सुव।।</p>
<p>जो ईश्वर की आराधना के साथ साथ पुरूषार्थ और परोपकार करते हैं, उनके दुख दारिद्रय दूर होते हैं और ऐश्वर्य बढता है।</p>
<p>कहा जाता है कि संसार में कोई भी व्यक्ति बुरा नहीं होता, श्रेष्टता का अंश सभी में होता है। जरूरत बस एक ऐसे व्यक्ति की होती है, जो अच्छाई को लगातार प्रोत्साहन देता रहे, अच्छे काम करने वालों को बढावा दे। बस दूसरों को अपने उत्तम गुण सक्रिय करने का मौका दिजीए, किसी में कोई भली बात या श्रेष्टता नजर आती है तो दिल खोलकर प्रशंसा कीजिए, प्रोत्साहन से उसका दैवीय पक्ष जाग उठेगा।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भैरव नामक शिकारी, मृग, सुअर और गीदड़ की कहानी]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/04/12/%e0%a4%ad%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a4%b5-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%83%e0%a4%97-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%85%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Thu, 12 Apr 2007 06:19:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[कल्याणकटक बस्ती में एक भैरव नामक व्या]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कल्याणकटक बस्ती में एक भैरव नामक व्याध (शिकारी) रहता था। वह एक दिन मृग को ढ़ूढ़ता-ढ़ूंढ़ता विंध्याचल की ओर गया, फिर मारे हुए मृग को ले कर जाते हुए उसने एक भयंकर सुअर को देखा। तब उस व्याध ने मृग को भूमि पर रख कर सुअर को बाण से मारा। सुअर ने भी भयंकर गर्जना करके उस व्याध के मुष्कदेश मे ऐसी टक्कर मारी कि, वह कटे पेड़ के समान जमीन पर गिर पड़ा।</p>
<p>क्योंकि जल, अग्नि, विष, शस्र, भूख, रोग और पहाड़ से गिरना इसमें से किसी-न-किसी बहाने को पा कर प्राणी प्राणों से छूटता है।</p>
<p>उन दोनों के पैरों की रगड़ से एक सर्प भी मर गया। इसके पीछे आहार को चाहने वाले दीर्घराव नामक गीदड़ ने घूमते घूमते उन मृग, व्याध, सर्प और सुअर को मरे पड़े हुए देखा और विचारा कि आहा, आज तो मेरे लिए बड़ा भोजन तैयार है।</p>
<p>अथवा, जैसे देहधारियों को अनायास दु:ख मिलते हैं वैसे ही सुख भी मिलते हैं, परंतु इसमें प्रारब्ध बलवान है, ऐसा मानता हूँ। जो कुछ हो, इनके माँसों से मेरे तीन महीने तो सुख से कटेंगे।</p>
<p>एक महीने को मनुष्य होगा, दो महीने को हिरण और सुअर होंगे और एक दिन को सर्प होगा और आज धनुष की डोरी चाबनी चाहिये।</p>
<p>फिर पहले भूख में यह स्वादरहित, धनुष में लगा हुआ तांत का बंधन खाउँ। यह कह कर वैसा करने पर तांत के बंधन के टूटते ही उछटे हुए धनुष से हृदय फट कर वह दीर्घराव नामक गिदड मर गया। इसलिए कहा गया है, संचय नित्य करना चाहिये।</p>
<blockquote><p><em>शास्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा, यस्तु क्रियावान पुरुषः स विद्वान्।<br />
सुचिन्तितं चौषधमातुराणां , न नाममात्रेण करोत्यरोगम्।।</em></p></blockquote>
<p>शास्त्र पढ़ कर भी मूर्ख होते हैं, परंतु जो क्रिया में चतुर हैं, वहीं सच्चा पण्डित है, जैसे अच्छे प्रकार से निर्णय की हुई औषधि भी रोगियों को केवल नाममात्र से अच्छा नहीं कर देती है।</p>
<p>शास्त्र की विधि, पराक्रम से डरे हुए मनुष्य को कुछ गुण नहीं करती है, जैसे इस संसार में हाथ पर धरा हुआ भी दीपक अंधे को वस्तु नहीं दिखा सकती है।</p>
<p>इस शेष दशा में शांति करनी चाहिये और इसे भी अधिक क्लेश तुमको नहीं मानना चाहिये। क्योंकि राजा, कुल की वधु, ब्राह्मण, मंत्री, स्तन, दंत, केश, नख और मनुष्य ये अपने स्थान से अलग हुए शोभा नहीं देते हैं। यह जान कर बुद्धिमान को अपना स्थान नहीं छोड़ना चाहिये। यह कायर पुरुष का वचन है।</p>
<blockquote><p><em>स्थानमुत्सृज्य गच्छन्ति: सिंहा: सत्पुरुषा गजा:।<br />
तत्रैव निधनं यान्ति काका: कापुरुषा मृगा:।।</em></p></blockquote>
<p>क्योंकि, सिंह, सज्जन पुरुष और हाथी ये स्थान को छोड़ कर जाते हैं और काक, कायर पुरुष और मृग ये वहाँ ही नाश होते हैं।</p>
<p>वीर और उद्योगी पुरुषों को देश और विदेश क्या है? अर्थात जैसा देश वैसा ही विदेश। वे तो जिस देश में रहते हैं, उसी को अपने बाहु के प्रताप से जीत लेते हैं। जैसे सिंह वन में दांत, नख, पूँछ के प्रहार करता हुआ फिरता है, उसी वन में (अपने बल से) मारे हुए हाथियों के रुधिर से अपने प्यास बुझाता है।</p>
<p>और जैसे मैण्डक कूप के पास पानी के गड्ढ़े में और पक्षी भरे हुए सरोवर को आते हैं, वैसे ही सब संपत्तियाँ अपने आप उद्योगी पुरुष के पास आती हैं।</p>
<blockquote><p><em>सुखमापतितं सेव्यं दु:खमापतितं तथा।<br />
चक्रवत् परिवर्तन्ते दु:खानि च सुखानि च।।</em></p></blockquote>
<p>और आए हुए सुख और दु:ख को भोगना चाहिये। क्योंकि सुख और दु:ख पहिये की तरह घुमते हैं (यानि सुख के बाद दुख और दुख के बाद सुख आता जाता है।)</p>
<p>और दूसरे- उत्साही तथा आलस्यहीन, कार्य की रीति को जानने वाला, द्यूतक्रीड़ा आदि व्यसन से रहित, शूर, उपकार को मानने वाला और पक्की मित्रता वाला ऐसे पुरुष के पास रहने के लिए लक्ष्मी आप ही जाती है।</p>
<p>सौजन्य : <a target="_blank" href="http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/hitop104.htm">इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हितोपदेश ]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/03/22/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8b%e0%a4%aa%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6/</link>
<pubDate>Thu, 22 Mar 2007 11:49:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[मित्रलाभ - कबुतर, काग, कछुआ, मृग और चूहे ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मित्रलाभ - कबुतर, काग, कछुआ, मृग और चूहे की कहानी</strong> </p>
<p>गोदावरी के तीर पर एक बड़ा सैमर का पेड़ है। वहाँ अनेक दिशाओं के देशों से आकर रात में पक्षी बसेरा करते हैं। एक दिन जब थोड़ी रात रह गई ओर भगवान कुमुदिनी के नायक चंद्रमा ने अस्ताचल की चोटी की शरण ली तब लघुपतनक नामक काग जगा और सामने से यमराज के समान एक बहेलिए को आते हुए देखा, उसको देखकर सोचने लगा, कि आज प्रातःकाल ही बुरे का मुख देखा है। मैं नहीं जानता हूँ कि क्या बुराई दिखावेगा।</p>
<p><em>शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च।<br />
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम।।</em></p>
<p>"सहस्रों शोक की और सैकड़ों भय की बातें मूर्ख पुरुष को दिन पर दिन दुख देती है, और पण्डित को नहीं।"</p>
<p>फिर उस व्याध ने चावलों की कनकी को बिखेर कर जाल फैलाया और खदु वहाँ छुप कर बैठ गया। उसी समय में परिवार सहित आकाश में उड़ते हुए चित्रग्रीव नामक कबूतरों के राजा ने चावलों की कनकी को देखा, फिर कपोतराज चावल के लोभी कबूतरों से बोला-- इस निर्जन वन में चावल की कनकी कहाँ से आई ? पहले इसका निश्चय करो। मैं इसको कल्याणकारी नहीं देखता हूँ। अवश्य इन चावलों की कनकी के लोभ से हमारी बुरी गति हो सकती है।</p>
<p><em>सुजीर्णमन्नं सुविचक्षणः सुतः,<br />
सुशासिता स्री नृपति: सुसेवितः।<br />
सुचिन्त्य चोक्तं सुविचार्य यत्कृतं,<br />
सुदीर्घकालेsपि न याति विक्रियाम्।।</em></p>
<p>"अच्छी रीति से पका हुआ भोजन, विद्यावान पुत्र, सुशिक्षित अर्थात आज्ञाकारिणी स्री, अच्छे प्रकार से सेवा किया हुआ राजा, सोच कर कहा हुआ वचन, और विचार कर किया हुआ काम ये बहुत काल तक भी नहीं बिछड़ते हैं।"</p>
<p>यह सुनकर एक कबूतर घमंड से बोला ,""अजी, तुम क्या कहते हो</p>
<p><em>वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्युपस्थिते।<br />
सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेsप्यप्रवर्तनम्।।</em></p>
<p>"जब आपत्तिकाल आए तब वृद्धों की बात माननी चाहिए, परंतु उस समय सब जगह मानने से तो भोजन भी न मिले।"</p>
<p><em>शंकाभि: सर्वमाक्रान्तमन्नं पानं च भूतले।<br />
प्रवृत्ति: कुत्र कर्त जीवितव्यं कथं नू वा ?</em></p>
<p>"इस पृथ्वी तल पर अन्न और पान संदेहोंसे भरा है, किस वस्तु में खाने- पीने की ईच्छा करे या कैसे जिये ?"</p>
<p><em>ईर्ष्यी घृणी त्वसंतुष्ट: क्रोधनो नित्यशड्कितः।<br />
परभाग्योपजीवी च षडेते दुखभागिनः।।</em></p>
<p>"ईष्या करने वाला, घृणा करने वाला, असंतोषी, क्रोधी, सदा संदेह करने वाला और पराये आसरे जीने वाला ये छः प्रकार के मनुष्य हमेशा दुखी होते हैं।"</p>
<p>यह सुनकर भी सब कबुतर बहेलिये के चावल के कण जहाँ छीटे थे, वहाँ बैठ गये।</p>
<p><em>सुमहान्त्यपि शास्राणि धारयन्तो बहुश्रुतः।<br />
छेत्तारः संशयानां च क्लिश्यन्ते लोभमोहितः।।</em></p>
<p>"क्योंकि अच्छे बड़े- बड़े शास्रों को पढ़ने तथा सुनने वाले और संदेहों को दूर करने वाले भी लोभ के वश में पड़ कर दुख भोगते हैं।"</p>
<p><em>लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभात्कामः प्रजायते।<br />
लोभान्मोहश्च नाशश्च लोभः पापस्य कारणम।</em></p>
<p>"लोभ से क्रोध उत्पन्न होता है, लोभ से विषय भोग की इच्छा होती है और लोभ से मोह और नाश होता है, इसलिए लोभ ही पाप की जड़ है।"</p>
<p><em>असंभव हेममृगस्य जन्म ,<br />
तथापि रामो लुलुभे मृगाय।<br />
प्रायः समापन्नविपत्तिकाले,<br />
धियोsपि पुंसां मलिना भवन्ति।।</em></p>
<p>"सोने के मृग का होना असंभव है, तब भी रामचंद्रजी सोने के मृग के पीछे लुभा गये, इसलिये विपत्तिकाल आने पर महापुरुषों की बुद्धियाँ भी बहुधा मलिन हो जाती है।"</p>
<p>दाना पाने के लालच से उतरे सब कबूतर जाल में फँस गये और फिर जिसके वचन से वहाँ उतरे से उसका तिरस्कार करने लगे।</p>
<p><em>न गणस्याग्रतो गच्छेत्सिध्दे कार्ये समं फलम।<br />
यदि कार्यविपत्ति: स्यान्मुखरस्तत्र हन्यते।।</em></p>
<p>"समूह के आगे मुखिया होकर न जाना चाहिये। क्योंकि यदि काम सिद्ध हो गया तो फल सबों को बराबर प्राप्त होगा, और अगर काम बिगड़ गया तो मुखिया ही मारा जाएगा।"</p>
<p>सबको उसकी निंदा करते देख चित्रग्रीव बोला-- "" इसका कुछ दोष नहीं है।'</p>
<p>हितकारक पदार्थ भी आने वाली आपत्तियों का कारण हो जाती है, जैसे गोदोहन के समय माता की जाँघ ही बछड़े के बाँधने का खूँटा हो जाती है।</p>
<p><em>स बंधुर्यो विपन्नानामापदुद्धरणक्षमः।<br />
न तु भीतपरित्राणवस्तूपालम्भपण्डितः।।</em></p>
<p>"बंधु वह है, जो आपत्ति में पड़े हुए मनुष्यों को निकालने में समर्थ हो और जो दुखियों की रक्षा करने के उपाय बताने की बजाय उलाहना देने में चतुराई समझे, वह बंधु नहीं है।"</p>
<p>आपत्ति से घबरा जाना तो कायर पुरुष का चिन्ह है, इसलिये इस काम में धीरज धर कर उपाय सोचना चाहिए।</p>
<p><em>विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा,<br />
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।<br />
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ,<br />
प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम।</em></p>
<p>"आपदा में धीरज, बढ़ती में क्षमा, सभा में वाणी की चतुरता, युद्ध में पराक्रम, यश में रुचि और शास्र में अनुराग ये बातें महात्माओं में स्वाभाव से ही होती है।"</p>
<p>जिसे संपत्ति में हर्ष और आपत्ति में खेद न हो और संग्राम में धीरता हो, ऐसा तीनों लोक में तिलक का जन्म विरला होता है और उसको विरली माता ही जनती है।</p>
<p>इस संसार में अपना कल्याण चाहने वाले पुरुष को निद्रा, तंद्रा, भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता ये छः अवगुण छोड़ देने चाहिए। अब भी ऐसा करो, सब एक मत होकर जाल को ले उड़ो।</p>
<p><em>अल्पानामपि वस्तूनां संहति: कार्यसाधिका।<br />
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः।।</em></p>
<p>"छोटी- छोटी वस्तुओं के समूह से भी कार्य सिद्ध हो जाता है, जैसे घास की बटी हुई रस्सियों से मतवाला हाथी भी बाँधे जाते हैं।"</p>
<p>अपने कुल के थोड़े मनुष्यों का समूह भी कल्याण का करने वाला होता है, क्योंकि तुस (छिलके) से अलग हुए चावल फिर नहीं उगते हैं।</p>
<p>यह सोच कर सब कबूतर जाल को लेकर उड़े और वह बहेलिया जाल को लेकर उड़ने<br />
वाले कबूतरों को दूर से देख कर पीछे दौड़ता हुआ सोचने लगा, ये पक्षी मिल कर मेरे जाल को लेकर उड़ रहे हैं, परंतु जब ये गिरेंगे तब मेरे वश में हो जायेंगे। फिर जब वे पक्षी आँखों से ओझल हो गये तब व्याध लौट गया।</p>
<p>जब कबूतर ने देखा कि लोभी व्याध लौट रहा है तब कबूतर ने कहा कि अब क्या करना चाहिए।</p>
<p><em>माता मित्रं पिता चेति स्वभावात्रितयं हितम्।<br />
कार्यकारणतश्चान्ये भवन्ति हितबुद्धयः।।</em></p>
<p>"माता, पिता और मित्र ये तीनों स्वभाव से हितकारी होते हैं और दूसरे लोग कार्य और किसी कारण से हित की इच्छा करने वाले होता हैं।"</p>
<p>इसलिए मेरा मित्र हिरण्यक नामक चूहों का राजा गंडकी नदी के तीर पर चित्रवन में रहता है, वह हमारे फंदों को काटेगा। यह विचार कर सह हिरण्यक के बिल के पास गये। हिरण्यक सदा आपत्ति आने की आशंका से अपना बिल सौ द्वार का बना कर रहता था। फिर हिरण्यक कबूतरों के उतरने की आहट से डर कर चुपके से बैठ गया। चित्रग्रीव बोला-- हे मित्र हिरण्यक, हमसे क्यों नहीं बोलते हो ? फिर हिरण्यक उसकी बोली पहचान कर शीघ्रता से बाहर निकल कर बोला -- अहा ! मैं पुण्यवान हूँ कि मेरा प्यारा मित्र चित्रग्रीव आया है।</p>
<p><em>यस्य मित्रेण संभाषो यस्य मित्रेण संस्थिति:।<br />
यस्य मित्रेण संलापस्ततो नास्तीह पुण्यवान।।</em></p>
<p>"जिसकी मित्र के साथ बोल- चाल है, जिसका मित्र के साथ रहना- सहना हो, और जिसकी मित्र के साथ गुप्त बात- चीत हो, उसके समान कोई इस संसार में पुण्यवान नहीं है।"</p>
<p>अपने मित्र को जाल में फँसा देखकर आश्चर्य से क्षण भर ठहर कर बोला"-- मित्र, यह क्या है ? चित्रग्रीव बोला"-- मित्र, यह हमारे पूर्वजन्म के कर्मो का फल है।</p>
<p><em>यस्माच्च येन च यथा च यदा च यच्च,<br />
यावच्च यत्र च शुभाशुभमात्मकर्म।<br />
तस्माच्च तेन च तथा च तदा च तच्च,<br />
तावच्च तत्र च विधातृवशादुपैति।</em></p>
<p>"जिस कारण से, जिसके करने से, जिस प्रकार से, जिस समय में, जिस काल तक और जिस स्थान में जो कुछ भला और बुरा अपना कर्म है, उसी कारण से , उसी के द्वारा, उसी प्रकार से, उसी समय में, वही कर्म, उसी काल तक, उसी स्थान में, प्रारब्ध के वश से पाता है।"</p>
<p><em>रोगशोकपरीतापबन्धनव्यसनानि च।<br />
आत्मापराधवृक्षाणां फलान्येतानि दहिनाम्।</em></p>
<p>"रोग, शोक, पछतावा, बंधन और आपत्ति ये देहधारियों (प्राणियों) के लिए अपने अपराधरुपी वृक्ष के फल हैं।"</p>
<p>यह सुनकर हिरण्यक चित्रग्रीव के बंधन काटने के लिए शीघ्र पास आया। चित्रग्रीव बोला-- मित्र, ऐसा मत करो, पहले मेरे उन आश्रितों के बंधन काटो, मेरा बंधन बाद में काटना। हिरण्यक ने भी कहा -- मित्र, मैं निर्बल हूँ और मेरे दाँत भी कोमल हैं, इसलिए इन सबका बंधन काटने के लिए कैसे समर्थ हूँ ? इसलिए जब तक मेरे दाँत नहीं टूटेंगे, तब तक तुम्हारा फंदा काटता हूँ। बाद में इनके भी बंधन जहाँ तक कट सकेंगे तब तक काटूँगा। चित्रग्रीव बोला-- यह ठीक है, तो भी यथाशक्ति पहले इनके काटो। हिरण्यक ने कहा-- अपने को छोड़कर अपने आश्रितों की रक्षा करना यह नीति जानने वालों को संमत नहीं है।</p>
<p>क्योंकि मनुष्य को आपत्ति के लिए धन की, धन देकर स्री की और धन और स्री देकर अपनी रक्षा सर्वदा करनी चाहिए।</p>
<p><em>धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राणा: संस्थितिहेतवः।<br />
तान्निघ्रता किं न हतं, रक्षता किं न रक्षितम् ?</em></p>
<p>"दूसरे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों की रक्षा के लिए प्राण कारण हैं, इसलिए जिसने इन प्राणों का घात किया, उसने क्या घात नहीं किया ? अर्थात सब कुछ घात किया और जिसने प्राणों का रक्षण किया उसने क्या रक्षण न किया ? अर्थात सबका रक्षण किया।"</p>
<p>चित्रग्रीव बोला-- मित्र, नीति तो ऐसी ही है, परंतु मैं अपने आश्रितोंका दुख सहने को सब प्रकार से असमर्थ हूँ।</p>
<p><em>धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत।<br />
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति।।</em></p>
<p>"चित्रग्रीव कहता है कि पण्डित को पराये उपकार के लिए अपना धन और प्राणों को भी छोड़ देना चाहिए, क्योंकि विनाश तो अवश्य होगा, इसलिये अच्छे पुरुषों के लिए प्राण त्यागना अच्छा है।"</p>
<p>दूसरा यह भी एक विशेष कारण है कि इन कबूतरों का और मेरा जाति, द्रव्य और बल समान है, तो मेरी प्रभुता का फल कहो, जो अब न होगा तो किस काल में और क्या होगा ?</p>
<p>आजीविका के बिना भी ये मेरा साथ नहीं छोड़ते हैं, इसलिए प्राणों के बदले भी इन मेरे आश्रितों को जीवनदान दो।</p>
<p>हे मित्र, मांस, मल, मूत्र तथ हड्डी से बने हुए इस विनाशी शरीर में आस्था को छोड़ कर मेरे यश को बढ़ाओ। जो अनित्य और मल- मूत्र से भरे हुए शरीर से निर्मल और नित्य यश मिले तो क्या नहीं मिला ? अर्थात सब कुछ मिला।</p>
<p><em>शरीरस्य गुणानां च दूरमत्यन्तमन्तरम।<br />
शरीरं क्षणविध्वंसि कल्पान्तस्थायिनों गुणा:।।</em></p>
<p>"शरीर और दयादि गुणों में बड़ा अंतर है। शरीर तो क्षणभंगुर है और गुण कल्प के अंत तक रहने वाले हैं।"</p>
<p>यह सुनकर हिरण्यक प्रसन्नचित्त तथा पुलकित होकर बोला-- धन्य है, मित्र, धन्य है। इन आश्रितों पर दया विचारने से तो तुम तीनों लोक की ही प्रभुता के योग्य हो। ऐसा कह कर उसने सबका बंधन काट डाला। बाद में हिरण्यक सबका आदर- सत्कार कर बोला -- मित्र चित्रग्रीव, इस जाल बंधन के विषय में दोष की शंका कर अपनी अवज्ञा नहीं करनी चाहिए।</p>
<p><em>योsधिकाद्योजनशतात्पश्यतीहामिषं खगः।<br />
स एव प्राप्तकालस्तु पाशबंध न पश्यति।।</em></p>
<p>"जो पक्षी सैकड़ों योजना से भी अधिक दूर से अन्न के दाने को या माँस को देखता है, वही बुरा समय आने पर जाल की बड़ी गाँठ नहीं देखता है।"</p>
<p>चंद्रमा तथा सूर्य को ग्रहण की पीड़ा, हाथी और सपं का बंधन और पण्डित की दरिद्रता, देख कर मेरी तो समझ में यह आता है कि प्रारब्ध ही बलवान है।</p>
<p>और आकाश के एकांत स्थान में विहार करने वाले पक्षी भी विपत्ति में पड़ जाते हैं। और चतुर धीवर मछलियों को अथाह समुद्र में भी पकड़ लेते हैं। इस संसार में दुर्नीति क्या है और सुनीति क्या है और विपत्तिरहित स्थान के लाभ में क्या गण है ? अर्थात कुछ नहीं है। क्योंकि काल आपत्तिरुप अपने हाथ फैला कर बैठा है और कुछ समय आने पर दूर ही से ग्रहण कर झपट लेता है।</p>
<p>यों समझा कर और अतिथि सत्कार कर तथा मिल भेटकर उसने चित्रग्रीव को विदा किया और वह अपने परिवारसमेत अपने देश को गया। हिरण्यक भी अपने बिल में घुस गया।</p>
<p>इसके बाद लघुपतनक नामक कौवा सब वृत्तांत को जानने वाला आश्चर्य से यह बोला-- हे हिरण्यक, तुम प्रशंसा के योग्य हो, इसलिए कृपा करके मुझसे भी मित्रता कर लो। यह सुन कर हिरण्यक भी बिल के भीतर से बोला-- तू कौन है ? वह बोला-- मैं लघुपतनक नामक कौवा हूँ। हिरण्यक हँस कर कहने लगा-- तेरे संग कैसी मित्रता ?</p>
<p>क्योंकि पंडित 