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॥ मॉ ॥

 

उसे खोने का दर्द, तो

तेरे खोने का डर हे मुझे।

 

उसे पाने कि ख्वाईश….,

तो तेरे होने की खुशी हे मुझे।

 

उसके छोड जाने का गम….,

तो तेरे पास रेह्ने का घमंड हे मुझे।

 

उससे दिल तोडने की सजा…,

तो तुझ्से जिंदगी की सोगात मिली हे मुझे।।

 

खुदा कि रेहमत से…,

उसके शक्ल मे धोका…..,

ओर तेरी शक्ल मे खुद खुदा मिला हे मुझे॥

 

**** संदीप जगताप

क्यों न हरेक मन पे छाये जवानी

आज काफी अरसा बाद अपने ब्लॉग पर आई हूँ | मतवाले इस मौसम को देखकर लिखे बिना नहीं रह पाई, जो प्रस्तुत आप स्नेही पाठकों की सेवा में…

क्यों न हरेक मन पे छाए जवानी

ये बरखा का मौसम सजीला सजीला
घटाओं में मस्ती, हवाओं में थिरकन |
वो बलखाती बूँदों का फूलों से मिलना
वो शाख़ों का लहराके हर पल मचलना ||
नशे में है डूबी, क़दम लड़खड़ाती
वो मेघों की टोली चली आ रही है |
कि बिजली के हाथों से ताधिन ताधिनता
वो मादल बजाती बढ़ी आ रही है ||
पपीहा सदा ही पियू को पुकारे
तो कोयल भी संग में है सुर को मिलाती |
जवानी की मस्ती में मतवाला भँवरा
कली जिसपे अपना है सर्वस लुटाती ||
मौसम में ठण्डक, तपन बादलों में
अम्बुआ की बौरों से झरता पसीना |
सावन की रिमझिम फुहारों के संग ही
मन में भी अमृत की धारा बरसती ||
पगलाई बौराई है सारी धरती
चढ़ा है नशा पत्ते पत्ते पे भारी |
कि सुध बुध को बिसराके तन मन थिरकता
तो क्यों ना हरेक मन पे छाए जवानी ||

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