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	<title>हिन्दी-शेर &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/हिन्दी-शेर/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "हिन्दी-शेर"</description>
	<pubDate>Fri, 29 Aug 2008 19:35:54 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[अकेलापन-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=270</link>
<pubDate>Fri, 29 Aug 2008 16:43:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=270</guid>
<description><![CDATA[

जब याद आती है अकेले में किसी की
खत्म ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>
<div align="center">
जब याद आती है अकेले में किसी की<br />
खत्म हो जाता है एकांत<br />
जिन्हें भूलने की कोशिश करो<br />
उतना ही मन होता क्लांत<br />
धीमे-धीमे चलती शीतल पवन<br />
लहराते हुए पेड़ के पतों से खिलता चमन<br />
पर अकेलेपन की चाहत में<br />
बैठे होते उसका आनंद<br />
जब किसी का चेहरा मन में घुमड़ता<br />
हो जाता अशांत</p>
<p>अकेले में मौसम का मजा लेने के लिये<br />
मन ही मन किलकारियां भरने के लिये<br />
आंखे बंद कर लेता हूं<br />
बहुत कोशिश करता हूं<br />
मन की आंखें बंद करने की<br />
पर खुली रहतीं हैं वह हमेशा<br />
कोई साथ होता तो अकेले होने की चाहत पैदा<br />
अकेले में भी यादें खत्म कर देतीं एकांत<br />
.................................<br />
दीपक भारतदीप</strong></div>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://dpkraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शब्दों के फूल कभी नहीं मुरझाये-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=267</link>
<pubDate>Thu, 28 Aug 2008 14:36:21 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=267</guid>
<description><![CDATA[कुछ पाने के लिये
दौड़ता है आदमी इधर से ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div align="center"><strong>कुछ पाने के लिये</p>
<p>दौड़ता है आदमी इधर से उधर</p>
<p>देने का ख्याल कभी उसके</p>
<p>अंदर नहीं आता</p>
<p>भरता है जमाने का सामान अपने घर में</p>
<p>पर दिल से खाली हो जाता</p>
<p>दूसरे के दिलों में ढूंढता प्यार</p>
<p>अपना तो खाली कर आता</p>
<p>कोई बताये कौन लायेगा</p>
<p>इस धरती पर हमदर्दी का दरिया</p>
<p>नहाने को सभी तैयार खड़े हैं</p>
<p>दिल से बहने वाली गंगा में</p>
<p>पर किसी को खुद भागीरथ<br />
बनने का ख्याल नहीं आता<br />
.....................................<br />
अपने नाम खुदवाते हुए</p>
<p>कितने इंसानों ने पत्थर लगवाये</p>
<p>पर फिर भी अमर नहीं बन पाये</p>
<p>जिन्होंने रचे शब्द </p>
<p>बहते रहे वह समय के दरिया में</p>
<p>गाते हैं लोग आज भी उनका नाम</p>
<p>कुछ पत्थरों पर धूल जमी</p>
<p>कुछ टूट कर कंकड़ हो गये</p>
<p>पर </strong></div>
<div align="center"> </div>
<div align="center"><strong><br />
............................</p>
<p>दीपक भारतदीप</strong></div>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://dpkraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आदमी स्वयं भ्रम में फंसा नजर आता-हिन्दी कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=73</link>
<pubDate>Wed, 27 Aug 2008 15:37:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=73</guid>
<description><![CDATA[यूं तो वक्त गुजरता चला जाता
पर आदमी सा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>यूं तो वक्त गुजरता चला जाता<br />
पर आदमी साथ चलते पलों को ही<br />
अपना जीवन समझ पाता<br />
गुजरे पल हो जाते विस्मृत<br />
नहीं हिसाब वह रख पाता</p>
<p>कभी दुःख तो कभी होता सुख<br />
कभी कमाना तो कभी लुट जाना<br />
अपनी ही कहानियां मस्तिष्क से<br />
निकल जातीं<br />
जिसमें जी रहा है<br />
वही केवल सत्य नजर आती<br />
जो गुजरा आदमी को याद नहीं रहता<br />
अपनी वर्तमान हकीकतों से ही<br />
अपने को लड़ता पाता </p>
<p>हमेशा हानि-लाभ का भय साथ लिये<br />
अपनों के पराये हो जाने के दर्द के साथ जिये<br />
प्रकाश में रहते हुए अंधेरे के हो जाने की आशंका<br />
मिल जाता है कहीं चांदी का ढेर<br />
तो मन में आती पाने की ख्वाहिश  सोने की लंका<br />
कभी आदमी का मन अपने ही बोझ से टूटता<br />
तो कभी कुछ पाकर बहकता<br />
कभी स्वतंत्र होकर चल नहीं पाता </p>
<p>तन से आजाद तो सभी दिखाई देते हैं<br />
पर मन की गुलामी से कोई कोई ही<br />
मुक्त नजर आता<br />
सत्य से परे पकड़े हुए है गर्दन भौतिक माया<br />
चलाती है वह चारों तरफ<br />
आदमी स्वयं के चलने के भ्रम में फंसा नजर आता<br />
.....................................</p>
<p><strong>लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह कवितापाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
इस लेख के अन्य बेवपत्रक/पत्रिकाएं नीचे लिखी हुईं  हैं<br />
<a href="http://anantrajl.blogspot.com">1. अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://deepakraj.blogspot.com">4.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[असली फूल, नकली फूल-हिदी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=488</link>
<pubDate>Wed, 27 Aug 2008 15:01:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=488</guid>
<description><![CDATA[अब करते हैं लोग शिकायत
असली फूलों में  ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अब करते हैं लोग शिकायत<br />
असली फूलों में  वैसी<br />
सुगंध नहीं आती<br />
नकली फूलों में ही<br />
इसलिये असली खुशबू छिड़की जाती<br />
दौलत के कर रहा है खड़े, नकली पहाड़ आदमी<br />
पहाड़ों को रौदता हुआ<br />
नैतिकता के पाताल की तरफ जा रहा आदमी<br />
सुगंध बिखेर कर खुश कर सके उसे<br />
यह सोचते हुए भी फूल को शर्म आती<br />
...............................</p>
<p>नकली रौशनी में मदांध आदमी<br />
नकली फूलों में सुगंध भरता आदमी<br />
अब असली फूलों की परवाह नहीं करता<br />
पर फिर भी उसके मरने पर अर्थी में<br />
हर कोई असली फूल भरता<br />
भला कौन मरने पर उसकी सुगंध का<br />
आनंद उठाना है<br />
यही सोचकर असली फूलों की<br />
आत्मा सुंगध से खिलवाड़ करता<br />
..............................<br />
धूप में खड़े असली फूल  ने<br />
कमरे में सजे असली फूल की<br />
तरफ देखकर कहा<br />
‘काश मैं भी नकली फूल होता<br />
दुर्गंधों  ने ली मेरी खुशबू<br />
इसलिये कोई कद्र नहीं मेरी<br />
मै भी उसकी तरह आत्मा रहित होता’<br />
फिर उसने डाली<br />
नीचे अपने साथ लगे कांटो पर नजर<br />
और मन ही मन कहा<br />
‘जिन इंसानों ने कर दिया है<br />
मुझे इतना बेबस<br />
फिर भी मेरे साथ है यह दोस्त<br />
क्या मै इनसे दूर नहीं होता</strong><br />
........................................</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आओ लिखें-छटांक भर कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=262</link>
<pubDate>Mon, 25 Aug 2008 17:06:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=262</guid>
<description><![CDATA[सागर की लहरे कितनी पास हों
किसी की प्य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सागर की लहरे कितनी पास हों<br />
किसी की प्यास नहीं बुझती<br />
गागर की बूंदें ही काम आयें<br />
दस दिशाऐं हैं धरती पर<br />
जब चलें पांव एक ही दिशा में जायें<br />
हाथी बड़ा बहुत है<br />
महावत उस पर अंकुश की नौक से काबू पायें<br />
बड़ा होने से क्या होता है<br />
अगर कोई जमाने के का काम का न हो<br />
छोटा है मजदूर तो क्या<br />
उसी हाथ से बड़े-बड़े महल बन जायें<br />
इतिहास में दर्ज है<br />
बड़ों-बड़ों के पतन की कहानी<br />
पढ़कर लोग भूल जाते<br />
पर कवियों की छोटी छोटी<br />
दिल को सहलाने वाले शब्द<br />
कभी लोग भूल न पायें<br />
बड़े बड़े ग्रंथ लिखकर भी<br />
अगर जमाने को खुश न कर सके तो क्या फायदा<br />
लिखे का असर दूर तो हो यही है कायदा<br />
किलो की किताब लिखने से अच्छा है<br />
आओ लिखें छटांक  भर कवितायें<br />
लोगों के दिमाग से उतरकर वापस न लौटें<br />
उनके दिल में उतर जायें<br />
बड़ी न हो, भले छोटी हो रचनायें</strong><br />
....................................</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://dpkraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ख्वाहिश है कि जमाना उनको सलाम करे- हिन्दी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=259</link>
<pubDate>Sat, 23 Aug 2008 17:04:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=259</guid>
<description><![CDATA[जिंदगी जीने का उनको बिल्कुल  सलीका नही]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जिंदगी जीने का उनको बिल्कुल  सलीका नहीं है<br />
उनके पास वफा बेचने का कोई एक  तरीका नहीं है<br />
भीड़ में मचायें शोर अपनी जिंदगी के तजूर्बे का<br />
पर उससे कभी कुछ खुद सीखा नही है<br />
ख्वाहिश है कि जमाना उनको सलाम करे<br />
आवाजें हैं उनकी बहुत तेज,पर शब्द तीखा नहीं है<br />
बेअसर बोलते हैं पर जमाना फिर भी मानता है<br />
उनको परखने का खांका किसी ने खींचा नहीं है<br />
ईमानदार के ईमान को ही देते हैं चुनौती<br />
खुद कभी उसका इस्तेमाल करना सीखा  नही है<br />
फिर भी नाम चमक रहा है इसलिये आकाश में<br />
जमीन पर लोगों ने अपनी अक्ल से चलना सीख नहीं है<br />
........................................</strong><br />
<strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल के मचे तूफानों का कौन पता लगा सकता ह-हिन्दी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=257</link>
<pubDate>Fri, 22 Aug 2008 17:37:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=257</guid>
<description><![CDATA[
मोहब्बत में साथ चलते हुए
सफर हो जाते आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
मोहब्बत में साथ चलते हुए<br />
सफर हो जाते आसान<br />
नहीं होता पांव में पड़े<br />
छालों के दर्द का भान<br />
पर समय भी होता है बलवान<br />
दिल के मचे तूफानों का<br />
कौन पता लगा सकता है<br />
जो वहां रखी हमदर्द की तस्वीर भी<br />
उड़ा ले जाते हैं<br />
खाली पड़ी जगह पर जवाब नहीं होते<br />
जो सवालों को दिये जायें<br />
वहां रह जाते हैं बस जख्मों के निशान<br />
.................................<br />
जब तक प्यार नहीं था<br />
उनसे हम अनजान थे<br />
जो किया तो जाना<br />
वह कई दर्द साथ लेकर आये<br />
जो अब हमारी बने पहचान थे<br />
................................<br />
दीपक भारतदीप</strong><br />
<strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उनके लिये जज्बात ही होते व्यापार-हिन्दी शायरी ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=255</link>
<pubDate>Thu, 21 Aug 2008 16:51:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=255</guid>
<description><![CDATA[कुछ लोग कुछ दिखाने के लिये बन जाते लाच]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कुछ लोग कुछ दिखाने के लिये बन जाते लाचार<br />
अपनी वेदना का प्रदर्शन करते हैं सरेआम<br />
लुटते हैं लोगों की संवेदना और प्यार<br />
छद्म आंसू बहाते<br />
कभी कभी दर्द से दिखते मुस्कराते<br />
डाल दे झोली में कोई तोहफा<br />
तो पलट कर फिर नहीं देखते<br />
उनके लिये जज्बात ही होते व्यापार </p>
<p>घर हो या बाहर<br />
अपनी ताकत और पराक्रम पर<br />
इस जहां में जीने से कतराते<br />
सजा लेते हैं आंखों में आंसु<br />
और चेहरे पर झूठी उदासी<br />
जैसे अपनी  जिंदगी से आती हो उबासी<br />
खाली झोला लेकर आते हैं बाजार<br />
लौटते लेकर घर  दानों भरा अनार </p>
<p>गम तो यहां सभी को होते हैं<br />
पर बाजार में बेचकर खुशी खरीद लें<br />
इस फन में होता नहीं हर कोई माहिर<br />
कामयाबी आती है उनके चेहरे पर<br />
जो दिल  में गम न हो फिर भी कर लेते हैं<br />
सबके सामने खुद को गमगीन जाहिर<br />
कदम पर झेलते हैं लोग वेदना<br />
पर बाहर कहने की सोच नहीं पाते<br />
जिनको चाहिए लोगों से संवेदना<br />
वह नाम की ही वेदना पैदा कर जाते<br />
कोई वास्ता नहीं किसी के दर्द से जिनका<br />
वही  बाजार में करते वेदना बेचने और<br />
संवेदना खरीदने का व्यापार<br />
.........................................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इश्क पर लिखते हैं, मुश्क कसते हैं शायर-हास्य व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=249</link>
<pubDate>Mon, 18 Aug 2008 16:50:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=249</guid>
<description><![CDATA[अपने साथ भतीजे को भी
फंदेबाज घर लाया औ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अपने साथ भतीजे को भी<br />
फंदेबाज घर लाया और बोला<br />
‘दीपक बापू, इसकी सगाई हुई है<br />
मंगेतर से रोज होती मोबाइल पर बात<br />
पर अब बात लगी है बिगड़ने<br />
उसने कहा है इससे कि एक ‘प्रेमपत्र लिख कर भेजो<br />
तो जानूं कि तुम पढ़े लिखे<br />
 नहीं भेजा तो समझूंगी गंवार हो<br />
तो पर सकता है रिश्ते में खटास’<br />
अब आप ही से हम लोगों को  आस<br />
इसे लिखवा दो कोई प्रेम पत्र<br />
जिसमें हिंदी के साथ उर्दू के भी शब्द हों<br />
यह बिचारा सो नहीं पाया पूरी रात<br />
मैं खूब घूमा इधर उधर<br />
किसी हिट लेखक के पास फुरसत नहीं है<br />
फिर मुझे ध्यान आया तुम्हारा<br />
सोचा जरूर बन जायेगी बात’</p>
<p>सुनकर बोले दीपक बापू<br />
‘कमबख्त यह कौनसी शर्त लगा दी<br />
कि उर्दू में भी शब्द हों जरूरी<br />
हमारे समझ में नहीं आयी बात<br />
वैसे ही हम भाषा के झगड़े में<br />
फंसा देते हैं अपनी टांग ऐसी कि<br />
निकालना मुश्किल हो जाता<br />
चाहे कितना भी जज्बात हो अंदर<br />
नुक्ता लगाना भूल जाता<br />
या कंप्यूटर घात कर जाता<br />
फिर हम हैं तो आजाद ख्याल के<br />
तय कर लिया है कि नुक्ता लगे या न लगे<br />
लिखते जायेंगे<br />
हिंदी वालों को क्या मतलब वह तो पढ़ते जायेंगे<br />
उर्दू वाले चिल्लाते रहें<br />
हम जो शब्द बोले  उसे<br />
हिंदी की संपत्ति बतायेंगे<br />
पर देख लो भईया<br />
कहीं नुक्ते के चक्कर में कहीं यह<br />
फंस न  जाये<br />
इसके मंगेतर के पास कोई<br />
उर्दू वाला न पहूंच जाये<br />
हो सकता है गड़बड़<br />
हिंदी वाले सहजता से नहीं लिखें<br />
इसलिये जिन्हें फारसी लिपि नहीं आती<br />
वह उर्दू वाले ही  करते हैं<br />
नुक्ताचीनी और बड़बड़<br />
प्रेम से आजकल कोई प्यार की भाषा नहीं समझता<br />
इश्क पर लिखते हैं<br />
पब्लिक में हिट दिखते हैं<br />
 इसलिये मुश्क कसते हैं शायर<br />
फारसी  का देवनागरी लिपि से जोड़ते हैं वायर<br />
इसलिये हमें माफ करो<br />
कोई और ढूंढ लो<br />
नहीं बनेगी हम से तुम्हारी बात<br />
.........................................................................</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भला कहां  हमें कच्चे धागों का बंधन निभाना है-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=243</link>
<pubDate>Sat, 16 Aug 2008 13:23:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=243</guid>
<description><![CDATA[उसने घर में घुसते ही
अपने  चारों मोबाइ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>उसने घर में घुसते ही<br />
अपने  चारों मोबाइल का स्विच आफ कर<br />
अल्मारी में रख दिये<br />
फिर अपनी टांगें सोफे पर फैलाई<br />
पास ही बैठा देख रहा था छोटा भाई</p>
<p>उसने बड़े भाई से पूछा<br />
‘यह क्या किया<br />
जान से प्यारे<br />
मोबाइलों  का स्विच आफ किया<br />
सभी को अल्मारी की कैद में डाल दिया<br />
अब  वह चारों जानूं जानूं कहकर<br />
किसे पुकारेंगी<br />
बैठे तुम्हारे नंबरों को निहारेंगी<br />
क्या उन सबसे बोर हो गये हो<br />
यह इश्क से परेशान घोर हो गये हो<br />
या कोई पांचवीं पर दिल आ गया है<br />
तुम  मोबाइल भी  साथ रखकर सोते हो<br />
उसकी घंटी और तुम्हारी आवाजें सुनकर<br />
तो लगता नहीं कि कभी नींद तुम्हें आई<br />
ऐसा क्या हो गया<br />
कहीं तुमने इश्क से सन्यास की कसम तो नहीं खाई’</p>
<p>बड़ा भाई बोला<br />
‘आज तो था आजादी की दिन<br />
खूब जमकर बनाया<br />
मैं तो निकला था घर से  खरीदने का किराना<br />
वह भी चारों अलग अलग आई<br />
कोई निकली थी कालिज में फंक्शन का<br />
कोई सहेली के साथ पिकनिक का<br />
कोई निकली थी स्पेशल क्लास का बनाकर बहाना<br />
लक्ष्य एक ही था इश्क करते हुए<br />
मोटर सायकिल पर घूमते हुए<br />
इस बरसात में नहाना<br />
सभी के परिवार वाले घर में बंद थे<br />
अपने कामों के पाबंद थे<br />
इसलिये कहीं किसी का डर नहीं था<br />
सचमुच हमने आजादी मनाई<br />
पर कमबख्त यह राखी भी कल आई<br />
भाईयों को राखी बांधकर वह<br />
फिर मोबाइल पर देंगी आवाज<br />
हो जायेगा में मेरे लिये मुसीबत का आगाज<br />
फिर तो मुझे जाना पड़ेगा<br />
नहीं तो पछताना पड़ेगा<br />
कल अगर गया तो फिर<br />
आज जैसे ही घुमाना पड़ेगा<br />
मेरे दोस्त भी बहुत है<br />
किसी कि बहिन है इधर<br />
तो किसी की उधर<br />
सभी कल चहलकदमी सड़कों पर करेंगे<br />
मेरे साथ किसी को देख लिया तो<br />
माशुका की जगह बहिन समझेंगे<br />
चारों में से किसी के साथ तो<br />
परमानेंट टांका भिड़ेगा<br />
पर बाद में दोस्तों की फब्तियों से<br />
कौन घिरेगा<br />
आज तो सभी की आंख<br />
वैसे ही पवित्र देखने लग जाती हैं<br />
अक्ल माशुका को भी बहिन समझ पाती है<br />
ऐसे में अच्छा है बाद के लफड़ों से<br />
एक दिन के लिये इश्क से  दूर हो जाऊं<br />
क्यों मैं किसी के भाई की उपाधि पाऊं<br />
किसी को जिंदगी का हमसफर तो बनाना है<br />
भला कहां  हमें कच्चे धागों का बंधन निभाना है<br />
इसलिये मैंने राखी के दिन को ही<br />
पूर्ण आजादी की तरह  मनाने की अक्ल पाई<br />
...............................................<br />
नोट-यह कविता पूरी तरह काल्पनिक है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा<br />
भला कहां कच्चे धागों का बंधन निभाना है-हास्य कविता</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[किताबों में लिखे शब्दों की पंक्तियां उनके पांव में बेड़ियाँ  नजर आ रही हैं-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=240</link>
<pubDate>Fri, 15 Aug 2008 09:08:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=240</guid>
<description><![CDATA[किताब में लिखे शब्दों की पंक्तियां
सल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>किताब में लिखे शब्दों की पंक्तियां<br />
सलाखों की तरह नजर आ रही हैं<br />
कुछ चेहरे छिपे हैं उसके पीछे<br />
जिनकी आंखें बुझी जा रही हैं </p>
<p>पाठ है आजादी का<br />
जिसमें कई कहानियां हैं<br />
लोग उन्हें सुनाये जा रहे हैं<br />
पर उससे आगे नहीं जा पा रहे ं<br />
क्योंकि किताब एक कैद की तरह हो गयी है<br />
कोई दूसरी मिल जाये तो<br />
शायद वह उससे निकल पायें<br />
पर वह भी एक दूसरी कैद होगी<br />
जिसमें वह फिर बंद हो जायें<br />
संभव है उसी में लिखा पढ़कर सभी को सुनायें<br />
अपनी सोच बंद है आलस्य के पिंजरे में कैद<br />
दूसरों के ख्याल पर जली मोमबत्तियों पर<br />
पढ़ने वाले कैदी रौशनी पा रहे हैं<br />
आजादी के गीत गा रहे हैं<br />
पुरानी कहानियों के दायरों से बाहर<br />
कौन बाहर आयेगा<br />
शब्दों का पहरेदार फिर<br />
उनको अंदर भगायेगा<br />
शहीदों के समाधि पर लगाकर<br />
हर वर्ष मेले<br />
नयी सूरतें अपना मूंह छिपा रहीं हैं<br />
किताब में लिखी शब्दों की पंक्तियों<br />
उनके पांव बेड़ी की तरह तरह नजर आ रही हैं<br />
.............................................................<br />
..............................................................</strong><br />
<strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जुबान अंदाज हालातों का नहीं करती-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=238</link>
<pubDate>Thu, 14 Aug 2008 17:06:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=238</guid>
<description><![CDATA[सपने सजाता है
उनको बिखरता देख
टूट जाता]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सपने सजाता है<br />
उनको बिखरता देख<br />
टूट जाता है मन<br />
कहीं लगाने के लिये ढूंढो जगह<br />
वहीं शोर बच जाता है<br />
जैसे जल रहा हो चमन</p>
<p>भला आस्तीन में सांप कहां पलते हैं<br />
इंसानों करते हैं धोखा<br />
नाम लेकर का खुद ही जलते हैं<br />
क्या दोष दें आग को<br />
जब अपने चिराग से घर जलते हैं<br />
वही सिर पर चढ़ आता है<br />
जिसे करो पहले नमन<br />
जब बोलने को मचलती है जुबान<br />
 हालातों अंदाज का नहीं करती<br />
चंद प्यार भरे अल्फाज भी<br />
नहीं दिला पाते वह कामयाबी<br />
जो खामोशी दिला देती है<br />
सपनों में जीना अच्छा लगता है<br />
पर हकीकत वैसी नहीं होती अमूनन<br />
.........................................</strong></p>
<p><strong><br />
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<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्योंकि कोई किसी का नहीं हुआ-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=236</link>
<pubDate>Wed, 13 Aug 2008 14:56:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=236</guid>
<description><![CDATA[हमने देखा था उगता सूरज
उन्होने देखा डू]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हमने देखा था उगता सूरज<br />
उन्होने देखा डूबता हुआ<br />
वह कर रहे थे चंद्रमा की रौशनी में<br />
जश्न मनाने की तैयारी<br />
पर हमने बिताया था पूरा दिन<br />
सूरज की तपती किरणों में<br />
अपने पसीने में नहाते<br />
हमारा मन भी था डूबा हुआ</p>
<p>वह आसमान में टिमटिमाते तारों की<br />
बात करते रहे<br />
उनकी रात<br />
खुशियों की कहानी कह रही थी<br />
जबकि हमारे बदन से पसीने की<br />
बदबू बह रही थी<br />
सबकी जमीन और आसमान<br />
अलग-अलग होते हैं<br />
किसी को रात डराती है तो  किसी को दिन<br />
किसी को भूख नहीं लगती किसी को सताती है<br />
इसलिए सब होते हैं अकेले<br />
क्योंकि कोई किसी का नहीं हुआ<br />
-----------------------------<br />
<strong><br />
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<p></strong></p>
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</item>
<item>
<title><![CDATA[चमन की बागडोर है जिसके हाथ वही दुश्मन हो जाता-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=230</link>
<pubDate>Tue, 12 Aug 2008 14:18:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=230</guid>
<description><![CDATA[लुट जाने का खतरा अब
गैरो से नहीं सताता
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>लुट जाने का खतरा अब<br />
गैरो से नहीं सताता<br />
अपनों को ही यह काम<br />
अच्छी तरह अब करना आता</p>
<p>पहरेदारी अपने घर की किसे सौेपे<br />
यकीन किसी पर नहीं आता<br />
जहां भी देखा है लुटते हुए लोगों को<br />
अपनों का हाथ नजर आता<br />
कई बाग उजड़ गये हैं<br />
माली के हाथों जब<br />
जोअब फूल नहीं लगाता<br />
इंतजार रहता है उसे<br />
कोई आकर लगा जाये पेड़ तो<br />
वह उसे बेच आये बाजार में<br />
इस तरह अपना घर सजाता<br />
नाम के लिये करते हैं मोहब्बत<br />
बेईमानी से उनकी है सोहबत<br />
जमाने के भलाई का लगाते जो लोग नारा<br />
लूट में उनको ही मजा आता<br />
कहें महाकवि दीपक बापू<br />
मन में है उथलपुथल तो<br />
अमन कहां से आयेगा यहां<br />
जिनके हाथ में बागडोर होती चमन की<br />
किसी और से क्या खतरा होगा<br />
वही उसका दुश्मन हो जाता</strong><br />
..................................<br />
<strong><br />
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<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कौन करे सच का इजहार-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=227</link>
<pubDate>Mon, 11 Aug 2008 15:14:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=227</guid>
<description><![CDATA[आँख के अंधे अगर हाथी को
पकड कर उसके अंग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आँख के अंधे अगर हाथी को<br />
पकड कर उसके अंगों को<br />
पकड लें<br />
अपने बुद्धि के अनुसार<br />
उसके अंगों का बयान<br />
कुछ का कुछ कर लें<br />
तो चल भी सकता है<br />
पर अगर अक्ल के अंधे<br />
रबड़ के हाथी को पकड़ कर<br />
असल समझने लगें तो<br />
कैसे हजम हो सकता है</p>
<p>कभी सोचा भी नहीं था कि<br />
नकल इतना असल हो जायेगा<br />
आदमी की अक्ल पर<br />
विज्ञापन का राज हो जायेगा<br />
हीरा तो हो जायेगा नजरों से दूर<br />
पत्थर उसके भाव में बिकता नजर आएगा<br />
कौन कहता है कि<br />
झूठ से सच हमेशा जीत सकता है<br />
छिपा हो परदे में तो ठीक<br />
यहाँ तो भीड़ भरे बाजार में<br />
सच तन्हाँ लगता है<br />
इस रंग-बिरंगी दुनिया का हर रंग भी<br />
नकली हो गया है<br />
काले रंग से भी काला हो गया सौदागरों का मन<br />
अपनी खुली आंखों से देखने से<br />
कतराता आदमी उनके<br />
चश्में से दुनियां देखने लगता है<br />
........................................................</p>
<p>आंखें से देखता है दृश्य आदमी<br />
पर हर शय की पहचान के लिये<br />
होता है उसे किसी के इशारे का इंतजार<br />
अक्ल पर परदा किसी एक पर पड़ा हो तो<br />
कोई गम नहीं होता<br />
यहां तो जमाना ही गूंगा हो गया लगता है<br />
सच कौन बताये और करे इजहार</strong><br />
..................................................................</p>
<p><strong><br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नहीं मिलते उनकी करतूतों के निशान-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=225</link>
<pubDate>Sun, 10 Aug 2008 12:55:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=225</guid>
<description><![CDATA[कई किताबें पढ़कर बेचते है ज्ञान
अपने व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कई किताबें पढ़कर बेचते है ज्ञान<br />
अपने व्यापार को नाम देते अभियान<br />
चार दिशाओं के चौराहे पर खड़े होकर<br />
देते हैं हांका<br />
समाज की भीड़ भागती है भेड़ों की तरह<br />
नाम लेते हैं शांति का<br />
पहले कराते हैं सिद्धांतों के नाम पर झगड़ा<br />
बह जाता है खून सड़कों पर<br />
उनका नहीं होता बाल बांका<br />
कोई तनाव से कट जाता<br />
कोई गोली से उड़ जाता<br />
पर किसी ने उनके घर में नहीं झांका<br />
कहीं नहीं मिलते उनकी करतूतों के निशान<br />
....................................................</p>
<p>हमें मंजिल का पता बताकर<br />
खुद वह जंगल में अटके हैं<br />
कहने वाले सच कह गये<br />
जो सबको  बताते  हैं<br />
नदिया के पार जाने का रास्ता<br />
वह स्वयं  कभी पार नहीं हुए हैं<br />
कहैं  महाकवि दीपक बापू<br />
उन्मुक्त भाव से जीते हैं जो लोग<br />
मुक्त कहां हो पाते हैं स्वयं<br />
दुनियां भर के झंझट उनके मन के बाहर लटके हैं<br />
.................................................</strong></p>
<p><strong><br />
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<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तब तक अधूरा है अभिव्यक्ति का सृजन-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=222</link>
<pubDate>Sat, 09 Aug 2008 16:51:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=222</guid>
<description><![CDATA[जो सरल और  सहज हैं
जिन के दिल में हैं ने]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जो सरल और  सहज हैं<br />
जिन के दिल में हैं नेकनीयति<br />
करते हैं वही रचना का सृजन<br />
जिन पर खुद  की ख्वाहिशों और<br />
अरमानों को पूरा करने का बोझ है<br />
समाज में तनाव का करते हैं वही विसर्जन </p>
<p>दूसरे के दर्द को अपने दिल की<br />
आंखों से देखकर जो करते हैं विचार<br />
सृजक  वही बन पाते हैं<br />
जो सतह पर तैरते हुए केवल<br />
दिखाने के लिए बनते हैं हमदर्द<br />
वह तो शब्द के सौदागर हैं<br />
बेच लें बाजार में ढेर सारी रचनाएं<br />
पर फिर भी सृजक नहीं कहलाते हैं<br />
प्रसिद्धि और प्रशंसा के ढेर सारे शब्द<br />
अपने खजाने में जमा करते लेते<br />
पर सृजन की उपाधि का नहीं कर पाते  अर्जन</p>
<p>कहने से कोई सृजक नहीं हो जाता<br />
चंद शब्द लिखने से कोई सृजन नहीं हो पाता<br />
आखों से पढ़कर<br />
कानों से सुनकर<br />
हाथों से स्पर्श कर<br />
जब तक अपनी अनुभूतियों को<br />
दिल में डुबोया न जाए<br />
तब तक रस और श्रृंगार के बिना<br />
अधूरा है अभिव्यक्ति का सृजन<br />
-------------------------</strong><br />
<strong><br />
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<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक टुकड़ा बरफी-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=218</link>
<pubDate>Fri, 08 Aug 2008 13:46:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=218</guid>
<description><![CDATA[एक पड़ौसन ने दूसरी से कहा
‘तुम्हें बधा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>एक पड़ौसन ने दूसरी से कहा<br />
‘तुम्हें बधाई हो बधाई<br />
तुम्हारे पतिदेव जहां करते हैं<br />
मदद का काम<br />
वहां आई जमकर भारी बाढ़<br />
वहां बरसात हुई है जाम<br />
अब तो तुम्हारे घर लक्ष्मी बरसेगी<br />
सारी दुनियां तुम्हें देखकर<br />
अपने अच्छे भाग्य को तरसेगी<br />
यह खबर आज अखबार में आई<br />
तुम हमें खिलाना अब अच्छी मिठाई‘</p>
<p>सुनकर दूसरी पड़ौसन भड़की और बोली<br />
‘मैं क्यों खिलाऊं तुम्हें मिठाई<br />
तुम्हारे जहां  करते हैं<br />
लोगों की सेवा का काम<br />
वहां भी तो पड़ा था भारी सूखा<br />
तुम्हारे घर में यहां बन रहे थे पकवान<br />
वहां खाने को तरसे थे लोग रूखा सूखा<br />
तब तो तुमने किसी को यह<br />
खबर तक नहीं बताई<br />
मिठाई मांगने के लिये तो<br />
बिना टिकट चली आई<br />
पर जब आ रहा था सूखे के समय<br />
रोज घर में नया सामान<br />
तब तुमने एक टुकड़ा बरफी भी नहीं भिजवाई<br />
इसलिये तुम भूल जाओ मिठाई<br />
........................................................</strong><br />
<strong><br />
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<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भीड़ की भेड़ नहीं शेर बनो-हिदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=215</link>
<pubDate>Thu, 07 Aug 2008 17:17:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=215</guid>
<description><![CDATA[भीड़ में सबको भेड़ की तरह
हांकने कि को]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>भीड़ में सबको भेड़ की तरह<br />
हांकने कि कोशिश में हैं सब<br />
चलते जाते हैं आगे ही आगे<br />
सीना तानकर अपना चलते<br />
पर कोई शेर आ जाये सामने<br />
तो कायरता का भाव उनमें जागे </p>
<p>भेड़ों की तरह भीड़ में चलते<br />
अब में थक गया हूँ<br />
सोचता हूँ कि अब बची जिन्दगी<br />
शेरों की तरह लड़ते हुए गुजारूं<br />
कर देते हैं वह शिकार होने के लिए भेड़ों को आगे<br />
सियारों का ही खेल चल रहा है सब जगह<br />
जो कभी सामने नहीं आते<br />
भेडो को शिकार के लिए सामने लाते<br />
खुद चढ़ जाते अट्टालिकाओं पर भागे-भागे </p>
<p>मन नहीं चाहता किसी को<br />
अपने पंजों से आहत करूं<br />
पर फिर सोचता हूँ कि<br />
मैं किसी की भेड़ भी क्यों बनूँ<br />
चल पडा हूँ<br />
जिन्दगी की उस दौर में<br />
जहाँ शेर ही चल सकते हैं आगे<br />
------------------------------------------<br />
<strong><br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वफा मुफ्त में नहीं मिलती-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=208</link>
<pubDate>Fri, 01 Aug 2008 16:05:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=208</guid>
<description><![CDATA[वफा  अब मुफ्त में नहीं मिलती
अगर दाम दे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>वफा  अब मुफ्त में नहीं मिलती<br />
अगर दाम देने की ताकत हो पास तो<br />
बेचने वाले सौदागरो की भीड़ दिखती<br />
ओ बाजार में खड़े इंसान<br />
अपने मन में कोई खुशफहमी में आकर<br />
किसी से बिना मतलब वफा की<br />
उम्मीद कभी न करना<br />
वफा के सौदागर तरक्की में लगे हैं<br />
उन्हें भी यह कभी मुफ्त में नहीं मिलती<br />
कौड़ी के भाव भले ही खरीद लें वह<br />
पर आम इंसान को सोने के भाव मिलती<br />
.....................................................................</strong></p>
<blockquote><p>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहले एक कौवा दिखा दो-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=206</link>
<pubDate>Thu, 31 Jul 2008 17:07:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=206</guid>
<description><![CDATA[एक श्रोता ने कवि से कहा
‘अपने को बहुत ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>एक श्रोता ने कवि से कहा<br />
‘अपने को बहुत बड़ा कवि समझते हो तो<br />
कौवे पर कोई व्यंग्य कविता लिख कर दिखा  दो’<br />
कवि ने उदास होते हुए कहा<br />
‘कौवे पर कविता लिख सकता हूं<br />
पर वीभत्स रस से सराबोर हो जायेगी<br />
सुन लोगे तो तुम्हें रात भर<br />
नींद नहीं आयेगी<br />
कौवे की तस्वीर भी तुम्हें सतायेगी<br />
जिसकी नस्ल ही लुप्त हो रही हो<br />
अब पहले की तरह कांव-कांव कर<br />
कहां नजर आते<br />
दिख जायें तो इंसानों की<br />
बुरी नजर का शिकार हो जाते<br />
उस पर व्यंग्य कविता कैसे लिखें<br />
 तुम कहीं चलकर पहले एक कौवा दिखा दो’<br />
......................................................................</p>
<blockquote><p>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[स्वयं पढ़ा कुछ नहीं, दूसरों को लिखना सिखाते हैं-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=200</link>
<pubDate>Thu, 10 Jul 2008 16:09:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=200</guid>
<description><![CDATA[आया फंदेबाज और एक
किताब हाथ में थमाते ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आया फंदेबाज और एक<br />
किताब हाथ में थमाते हुए बोला<br />
‘दीपक बापू, लो पकड़ लो यह किताब<br />
‘लिखने के नुस्खें सीखें’<br />
एक दोस्त के घर से उठायी<br />
इसे देखकर तुम्हारी याद आयी<br />
हमारा तो न पढ़ने से वास्ता<br />
न लिखने का जाने रास्ता<br />
तुम ही अंतर्जाल पर लिखते<br />
थक गये लगते हो<br />
फ्लाप की जमात में बैठे<br />
हिट होने की जगह तकते हो<br />
तुम पर तरस आया<br />
इसलिये ले आया<br />
इसे पढ़कर कुछ सीख लो<br />
शायद लेखक की सलाह काम कर जाये<br />
तुम्हारा नाम भी चमक जाये<br />
यही इच्छा हमारी अभी पूरी नहीं हो पायी’</p>
<p>आपनी टोपी उतारकर गंजी खोपड़ी पर<br />
हाथ फेरते हुए<br />
कुछ देर किताब देखी<br />
फिर उठाकर जोर से फैंकी और<br />
कहैं  महाकवि दीपक बापू<br />
‘कमबख्त तुम हमारी अक्ल भी हर लेते हो<br />
कभी कभी करारा झटका  देते हो<br />
हमने थोड़ी पढ़ी तो<br />
लेखक का नाम पढ़ने का विचार आया<br />
यह कभी हमारे सुनने में नहीं आया<br />
यहां जो कुछ नहीं सीखता वही<br />
दूसरों को सिखाने में जुट जाता है<br />
जो पड़े उनके चक्कर में<br />
कुछ मिलना तो दूर<br />
गांठ से और लुट जाता है<br />
यह लिखता है ऐसा मत लिखो<br />
और ऐसे मत दिखो<br />
खुद ही अभी लिखना शुरू किया लगता है<br />
अगर इसका लिखा देखें तो<br />
अभी पढ़ना शुरू किया ऐसा भी लगता है<br />
यहां जमाने का उसूल है<br />
कुछ सीखे बिना ही<br />
दूसरों को सिखाना शुरू कर दो<br />
शिष्य हुए बिना गुरू का आवेदन कर दो<br />
लिखना हो जिंदगी में<br />
या दिखना हो<br />
हर विषय पर वही लोग<br />
बोलते हैं पहले<br />
जो कुछ सीखने से पहले ही दहले<br />
कोई उनकी अक्ल पर शक न करे<br />
प्रसिद्धि के शिखर पर पहला हक न करे<br />
तमाम गुर उठाकर बाजार में बेचने आ जाते हैं<br />
शक्ल के हों आकर्षक<br />
ख्याल से हों ढीठ<br />
चाल मस्त और मतवाली   हों<br />
अदायें दिल बहलाने वाली हों<br />
अपनी तरफ खींचते हैं पहले लोगों का ध्यान<br />
फिर शब्दों का बघारते हैं ज्ञान<br />
ऐसे लोग लिखना सिखाते हैं<br />
भीड़ में दिखने के बहाने जिनको आते हैं<br />
कई लोगों को पढ़ते हैं हम भी<br />
पर वह कुछ पढ़ते हैं भी  कि नहीं<br />
हमें यह बात समझ में नहीं आयी<br />
हिट और फ्लाप का खेल तो है निराला<br />
अपने गुरु के आदेश पर हमने कभी मोह नहीं पाला<br />
अब कोई दूसरा गुरु कुछ सिखा दे<br />
ऐसा नजर नहीं आता भ्<br />
उठा लो किताब यह हमें नहीं चाहिये<br />
जो सीखा है वह भी भूल जायेंगे भाई’<br />
.......................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अब रास्ते से निकलने के लिये तरसे-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=199</link>
<pubDate>Tue, 08 Jul 2008 13:36:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=199</guid>
<description><![CDATA[बरसों से कभी ऐसे मेघ नहीं बरसे
हमेशा र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बरसों से कभी ऐसे मेघ नहीं बरसे<br />
हमेशा रहा जल का अकाल<br />
हम पानी की बूंद बूंद को तरसे<br />
बहुत सारी शायरी प्यास पर लिखी<br />
तो कई कवितायें गर्र्मी पर रच डाली<br />
पसीने में नहाते हुए मेघों पर<br />
अपने व्यंग्य शब्दों से हम  अधिक बरसे</p>
<p>इस बार राशन पानी लेकर आसमान में मेघ आये<br />
लगता है ढूंढ रहे थे हमको<br />
अपनी बरसात से नहलाने को<br />
घर लौटने से ऐसे बरस जाते हैं<br />
कि तालाब बनी सड़कों से<br />
घर पहुंचने का रास्ता निकालने के लिये<br />
 अब तो रोज तरसे</p>
<p>उस दिन साइकिल समेत<br />
मझधार में फंसे थे<br />
आगे कार तो पीछे टूसीटर अड़े थे<br />
आसमान से बरसते मेघों को देखकर<br />
हमें अपने पर ही रहम आया<br />
एक मेघ अपना कोटा पूरा कर<br />
हमारे सामने आया<br />
और बोला<br />
‘और गर्मी पर कविता लिख<br />
हमारी मजाक उड़ाता दिख<br />
जब भी देख गर्मी में नहाते हुए ही<br />
अपनी कविता लिखता है<br />
सारे जमाने को कार की बजाय<br />
साइकिल पर चलता दिखता है<br />
भला! इसमे हमारा क्या दोष<br />
जो हम पर दिखाता है रोष<br />
कार और पैट्रोल का खर्च बचाता है<br />
इसलिये साइकिल में तेरा तेल निकल जाता है<br />
पिछली बार गर्मी पर कविता लिखकर<br />
अपने ब्लाग पर हिट हुआ था<br />
हास्य कविता के रूप में फिट हुआ था<br />
अब हम पर  हास्य कविता लिख<br />
पर हमारे संदेश के साथ खड़ा दिख<br />
सुन हम क्यों नहीं बरसों से, जो अब  ऐसे बरसे<br />
सारे नाले और नालियां बंद कर<br />
हमारे जल का मार्ग अवरुद्ध कर दिया<br />
तुम इंसानों ने<br />
धरती पुत्र पेड़ पौद्यों का कत्ल किया<br />
तुम्हारे बीच बरसे शैतानों ने<br />
एक तरफ बरसी दौलत तो<br />
दूसरी और हरियाली को लोग तरसे<br />
अपने विनाश का खुद ही किया इंतजाम<br />
इसलिये कई बरसों  ऐसे नहीं बरसे</p>
<p>इस बार जमकर बरस कर बता दिया<br />
जमकर बरसते हुए   पग-पग पर<br />
सड़कों और पंगडंडियों को<br />
जलमग्न बना दिया<br />
प्रकृति से छेडछाड़ का नतीजा दिखा दिया<br />
अगर चाहते हो कि हर बरस बरसें तो<br />
हास्य कविता पर हम लिख<br />
प्रकृति को प्यार करने का<br />
इंसानों को संदेश देता दिख<br />
लोगों को बता दे कि<br />
अपने ही भूलों से जो किया विनाश इस धरती का<br />
इसलिये ही पहले पानी को<br />
अब रास्ते से निकलने के लिये तरसे<br />
..................................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[खबरों की खबर देने वाले-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=198</link>
<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 16:08:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=198</guid>
<description><![CDATA[खबरों की खबर वह रखते हैं
अपनी खबर हमेश]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>खबरों की खबर वह रखते हैं<br />
अपनी खबर हमेशा ढंकते हैं<br />
दुनियां भर के दर्द को अपनी<br />
खबर बनाने वाले<br />
अपने वास्ते बेदर्द होते हैं</p>
<p>आंखों पर चश्मा चढ़ाये<br />
कमीज की जेब पर पेन लटकाये<br />
कभी कभी हाथों में माइक थमाये<br />
चहूं ओर देखते हैं अपने लिये खबर<br />
स्वयं से होते बेखबर<br />
कभी खाने को तो कभी पानी को तरसे<br />
कभी जलाती धूप तो कभी पानी बरसे<br />
दूसरों की खबर पर फिर लपक जाते हैं<br />
मुश्किल से अपना छिपाते दर्द होते हैं</p>
<p>लाख चाहे कहो<br />
आदमी से जमाना होता है<br />
खबरची भी होता है आदमी<br />
जिसे पेट के लिये कमाना होता है<br />
दूसरों के दर्द की खबर देने के लिये<br />
खुद का पी जाना होता है<br />
भले ही वह एक क्यों न हो<br />
उसका पिया दर्द भी<br />
जमाने के लिए गरल होता<br />
खबरों से अपने महल सजाने वाले<br />
बादशाह चाहे<br />
अपनी खबरों से जमाने को<br />
जगाने की बात भले ही करते हों<br />
पर बेखबर अपने मातहतों के दर्द से होते हैं</p>
<p>कभी कभी अपना खून पसीना बहाने वाले खबरची<br />
खोलते हैं धीमी आवाज में अपने बादशाहों की पोल<br />
पर फिर भी नहीं देते खबर<br />
अपने प्रति वह बेदर्द होते हैं<br />
----------------------------<br />
दीपक भारतदीप </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्या फायदा विषय का पहाड़ खोदने से-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=195</link>
<pubDate>Fri, 04 Jul 2008 14:15:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=195</guid>
<description><![CDATA[
समाज के शिखर पर बैठे लोग
हांकते हैं ऐस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
समाज के शिखर पर बैठे लोग<br />
हांकते हैं ऐसे आदमी को<br />
जैसे भेड़-बकरी हों<br />
जो न बोले<br />
न कहे<br />
न देखे<br />
उनके काले कारनामें दिन के उजाले में भी<br />
अपने डंडे के जोर पर चलता उनका फरमान<br />
टूट जाये चाहे किसी का भी अरमान<br />
उन पर कोई नहीं उठाता उंगली<br />
फिर भी समाज की गलियों में<br />
गोल-गोल घूमता है<br />
चाहे वह कितनी भी संकरी हों<br />
........................................................</p>
<p>अब तो मुद्दे जमीन पर नहीं बनते<br />
हवा में लहराये जाते<br />
राई से विषय पहाड़ बताये जाते<br />
मसले अंदर कमरे में कुछ और होते<br />
बाहर कुछ और बताये जाते<br />
चर्चा होती रहे पब्लिक में<br />
पर समझ में न आये किसी के<br />
ऐसे ही विषय उड़ाये जाते </p>
<p>कहें महाकवि दीपक बापू<br />
‘कई बार विषयों का पहाड़ खोदा<br />
कविता जैसी निकली चुहिया<br />
भाई लोग उस पर हंसी उड़ाये जाते<br />
बहुत ढूंढा पढ़ने को मिला नहीं<br />
होती कहीं कोई व्यापार की डील<br />
करता कोई तो कोई और लगाता सील<br />
कुछ को होता  गुड फील<br />
तो किसी को  लगती  पांव में कील है<br />
कोई समझा देता तो<br />
न लिखने का होता गिला नहीं<br />
कोई खोजी पत्रकार नहीं<br />
जैसा मिला वैसा ही चाप (छाप) दें<br />
हम तो खोदी ब्लागर ठहरे<br />
विषयों का पहाड़ खोदते पाताल तक पहुंच जाते<br />
कोई जोरदार पाठ बनाये जाते<br />
पर पहले कुछ  बताता<br />
या फिर हमारे समझ में आता<br />
तो कुछ लिख पाते<br />
इसलिये केवल हास्य कविता ही लिखते जाते<br />
क्या फायदा विषय का पहाड़ खोदने से<br />
जब केवल निकले चुहिया<br />
उसे भी हम पकड़ नहीं पाते<br />
....................................<br />
दीपक भारतदीप </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>

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