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	<title>हैदराबाद &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/हैदराबाद/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "हैदराबाद"</description>
	<pubDate>Sun, 20 Jul 2008 10:53:30 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[मेला घूमेंगे?]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/?p=215</link>
<pubDate>Tue, 01 Apr 2008 10:11:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[झूले में बैठने का मन है? आइये आपको हैदर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>झूले में बैठने का मन है? आइये आपको हैदराबाद में <i>"राजस्थानी हवाई झुल्ला" </i>में सैर करवाते हैं।</p>
<p><a href="http://saptrang.wordpress.com/files/2008/04/p3310037.jpg" title="Rajasthani Hawai Jhulla"><img src="http://saptrang.wordpress.com/files/2008/04/p3310037.jpg" alt="Rajasthani Hawai Jhulla" align="middle" border="2" height="277" width="370" /></a></p>
<p>गेट पर लिखा हुआ है <i>"शराब पिके झुले पर बैठना मना है।"</i> यार शराब <i>पिके  </i>झूले पे कोई क्यों पैसा बरबाद करेगा... पीकर तो आदमी का दिल, दिमाग ,जिस्म सभी कुछ झूमता और झूलता ही रहता है :) । ऐसा लिखना चाहिये, <i>"या तो झूले पर बैठो, नही तो शराब पियो"</i> :D &#124;</p>
<p><a href="http://saptrang.wordpress.com/files/2008/04/p3310029.jpg" title="jhoola"><img src="http://saptrang.wordpress.com/files/2008/04/p3310029.jpg" alt="jhoola" border="2" height="400" width="300" /></a></p>
<p>और ये झूले के एकदम ऊपर से मेले का दृश्य (दांयी ओर मौत का कुआ दिख रहा है, बांयी और जो नही दिख रहा वहां अन्य प्रकार के झूले, गाडियां आदि थीं)</p>
<p><a href="http://saptrang.wordpress.com/files/2008/04/p3310043.jpg" title="View from top"><img src="http://saptrang.wordpress.com/files/2008/04/p3310043.jpg" alt="View from top" align="absmiddle" border="2" height="288" width="383" /></a></p>
<p>बचपन में झूले में बैठने में बहुत डर लगता था। अब नही लगता। सच्ची :) । इस समय हमारे गांव में भी मेला लगता है। महाशिवरात्रि  से शुरू होता है, अभी चल ही रहा होगा।  ये लोहे के बडे झूले तो बाद में देखे, शुरुआती यादें लकडी के झूलों की हैं जिन्हे आदमीं खींचा करते थे। <b>चकडोलर </b>कहते हैं हमारे यहां उन्हे।चर्र चर्र आवाज करते थे चलते समय। टाकिज भी आता <strike>था</strike>  है मेले में पर मैने आज तक नही देखा। सच्ची।</p>
<p><a href="http://saptrang.wordpress.com/files/2008/04/p3310035.jpg" title="chanaa masala"><img src="http://saptrang.wordpress.com/files/2008/04/p3310035.jpg" alt="chanaa masala" border="2" height="295" width="393" /></a></p>
<p>और ये है "नींबू, कैरी, धनिया, पुदीना, टमाटर एवं अन्य मसालों" से भरपूर, चना मसाला। खाया नही, बस फोटो लिया। गांव में मेले की फेमस चीज गोंद के पापड हुआ करती थी, अभी भी चांस लग जाये तो नसीब हो जाते हैं। कल गये थे मेले में घूमने। यहां नेकलेस रोड पर। आप भी फोटो देख कर खुश हो लीजिये। :)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हैदराबाद-झलकियाँ]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/11/14/charminar-mecca-masjid/</link>
<pubDate>Wed, 14 Nov 2007 08:09:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/11/14/charminar-mecca-masjid/</guid>
<description><![CDATA[
चारमीनार- हैदराबाद की पहचान। हैदराबा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="center"><a href="http://saptrang.wordpress.com/files/2007/11/charminar.jpg" title="चारमीनार"><img src="http://saptrang.wordpress.com/files/2007/11/charminar.jpg" alt="चारमीनार" align="middle" border="3" height="340" hspace="2" vspace="2" width="422" /></a></p>
<p align="center">चारमीनार- हैदराबाद की पहचान। हैदराबाद का प्रतीक चिन्ह। इसे सन १५९१ में मुहम्मद कुली कुतुब शाह ने बनवाया था। आज इसके चारों और काफी व्यस्त बाजार है, जहाँ आप मोती, चूडियाँ, कपडे एवं और भी ढेर सारी खरीदारी कर सकते हैं।</p>
<p align="center"> <a href="http://saptrang.wordpress.com/files/2007/11/mecca-masjid.jpg" title="मक्का मस्ज़िद"><img src="http://saptrang.wordpress.com/files/2007/11/mecca-masjid.jpg" alt="मक्का मस्ज़िद" align="middle" border="3" height="343" hspace="2" vspace="2" width="424" /></a></p>
<p align="center">मक्का मस्ज़िद - चित्र चारमीनार के ऊपर से लिया। निर्माण  मुहम्मद कुली कुतुब शाह ने ही शुरू करवाया, पर पूरी होने में लगे ७७ साल।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हैदराबाद में धमाके-ज़िन्दगी चल रही है...]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/08/26/hyderabad-blasts-26-aug/</link>
<pubDate>Sun, 26 Aug 2007 16:56:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/08/26/hyderabad-blasts-26-aug/</guid>
<description><![CDATA[ज़िन्दगी चल रही है। हमारे लिये, जो थोडे ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ज़िन्दगी चल रही है। हमारे लिये, जो थोडे खुशकिस्मत थे कल शाम को...। पर जिन्होने अपने खोये हैं इन धमाकों मे...उनके लिये तो शायद सब कुछ बिखर गया। पूना से आये हुए वो छात्रों के परिवार, यो टी. वी. पर बिलख बिलख कर रोती दिखाई दी वो माँ और बाकी लोगों के  परिवार, यार दोस्त....।</p>
<p>सुबह सिकंदराबाद गया था, हालांकि रविवार को वैसे भी सडकों पर आवाजाही कम होती है, और दुकाने भी बन्द रहती हैं...पर फिर भी रोजमर्रा की तरह आवागमन था सडकों पर। (शाम को पता चला कि नजदीक से सारे शापिंग माल, जो आमतौर पर  रविवार को खुले रहते हैं, आज बंद थे।)</p>
<p>कुछ सावधानियां बरतनी होंगी शहर को। सप्ताहांत पर हैदराबाद सेन्ट्रल, बिग बाजार, प्रसाद, ईट स्ट्रीट आदि जगहों पर पैर रखने की जगह नही होती, सांस लेना मुश्किल। सुरक्षा के इन्तजाम वाकई बहुत ढीले हैं, कोई भी कुछ भी लेकर घुस सकता है। कुछ दुर्घटना हो जाये, तो ज्यादा लोग भगदड से हताहत हो जायेंगे..ऐसी संरचना है इन जगहों की। हालांकि लुम्बिनी पार्क, गोकुल चाट और मक्का मस्ज़िद...अपेक्षाकृत खुली जगहें थी..पर अगली बार(भगवान ना करे) गर निशाना कोई बन्द जगह/बाजार/काम्प्लेक्स हुआ तो परिणाम और बुरे होंगे।</p>
<p>पिछली बार हैदराबाद के बारे में सात पसंदीदा बातें लिखी थीं..तो कहा गया था कि दोष भी तो गिनाओ। शायद एक दूसरे पर भरोसा करना और मिल जुल कर रहना इस शहर का सबसे बडा दोष है। शांत...सुस्त शहर है, लोग अपने में मगन। क्या बदलें? सिनेमाघर में जायें तो अपने बाजू वाले को शक की निगाह से देखें? या बाजार में खरीदरी करने जायें तो लोगों से बच बच कर निकलें? लोगों को देख कर मुस्कुराना छोड दें या तहज़ीब से बात करना छोड दें? ऐसा करना तो शायद उन लोगों के मंसूबे कामयाब कर देना होगा। ऐसा हरगिज़ नही करेगे।</p>
<p>जिन्दगी चल रही है।</p>
<p>कल ये भी तो हो सकता था, हम लुम्बिनी पार्क में शो देख रहे हो सकते थे..या बम किसी सिनेमाघर में फटा हो सकता था जहाँ शनिवार/रविवार को अक्सर चले जाया करते हैं।  :(</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हैदराबाद में धमाके]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/08/25/hyderabad-blasts-25-aug/</link>
<pubDate>Sat, 25 Aug 2007 16:02:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/08/25/hyderabad-blasts-25-aug/</guid>
<description><![CDATA[मई में मक्का मस्जिद में हुए बम विस्फोट]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मई में मक्का मस्जिद में हुए बम विस्फोट के करीब तीन माह बाद हैदराबाद में फिर बम धमाके हुए हैं।</p>
<p>लुम्बिनी पार्क में एक बम फटा है। यहाँ हर शाम करीब ४५-४५ मिनट के लेज़र शो होते है..और शनिवार/रविवार की शाम को अपेक्षाकृत अधिक भीड रहती है।यह एक ओपन एयर थियेटर नुमा जगह है और एक <em>अच्छी शाम</em> बिताने के लिये बेहतरीन जगह है।</p>
<p>दूसरा विस्फोट कोटी इलाके में हुआ है, <strike>लेकिन ये सिलिन्डर फटा है या बम, ये अभी साफ नही है</strike> (ये भी बम ही था)। यह इलाके की एक खाने पीने की दुकान के आसपास हुआ है, <strike><strong>सो गैस सिलिन्डर भी हो सकता है।</strong></strike> कोटी शहर का व्यस्ततम इलाका है, और यहाँ बहुत भीड रहती है।</p>
<p>टी वी चैनल मरने वालों की संख्या <strike>१५ से २०</strike> ३५ से ऊपर बता रहे हैं । पर अभी निश्चित संख्या (जो ज्यादा भी हो सकती है) सामने आने में अभी समय लगेगा। ज्यादा लोग कोटी वाले धमाके मे हताहत  हुए हैं।</p>
<p>किंग कोठी और अबिड्स इलाका (जहाँ मैं रहता हूँ)...के आसपास हालांकि पुलिस की गाडियां सडकों पर दिख रही हैं, पर कोई तनाव नही है।</p>
<p><strong>इतने अच्छे शहर को पता नही किसकी नज़र लग गई है :( शांति के लिये दुआ कीजिये।</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हैदराबाद: सात पसंदीदा बातें]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/08/09/7-things-about-hyderabad/</link>
<pubDate>Thu, 09 Aug 2007 18:58:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/08/09/7-things-about-hyderabad/</guid>
<description><![CDATA[मौसम- अप्रेल अंत और मई शुरू को छोड दें]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मौसम</strong>- अप्रेल अंत और मई शुरू को छोड दें...तो पूरा साल मौसम <em>सन्ट </em>रहता है एकदम...खूब सर्राटेदार हवा चलती है। ना ज्यादा गर्मी..न ज्यादा ठंड...और अच्छी बरसात।</p>
<p><strong>खाना</strong>- खाने की परेशानी पर अपने शुरुआती दिनों में लिख चुका हूँ, बेचलर्स को ज्यादा समस्या होती है। लेकिन फिर भी, <em>’सिर्फ शाकाहारी’</em> होटल खूब मिल जायेंगे...</p>
<p><strong>किताबें </strong>- क्या कहने। अबिड्स पर हर रविवार को पुरानी किताबें बिकती हैं...पटरी पर..खूब सारी। किताबों की पारखी नजर होनी चाहिये..और ढूंढने के लिये समय और धैर्य। १५ दिन पहले जार्ज आर्वेल (George Orwell) की <strong>१९८४ (1984)</strong> मात्र  रु. २५/- में खरीद कर लाया हूँ। कभी कभी हिन्दी किताबें भी मिल जाती हैं। इसके अलावा एक-दो अड्डे और हैं अच्छी किताबों के।</p>
<p><strong>Cost of Living:</strong> दिल्ली और बैंगलोर जैसे महानगरों से कहीं कम। हालंकि शहर जिस ते्जी से बढ रहा है, उसे देखते हुए आने वाले समय में ऐसा रहेगा नही ज्यादा समय तक। कुछ इलाकों में एक-एक एकड जमीन करोडों में बिक रही है...लेकिन फिलहाल ४-६ हजार में २ BHK का ठीक ठाक फ्लेट मिल जाता है (पगडी मात्र २ महीने की....बैंगलोर वाले १० महीने की मांगते हैं)</p>
<p><strong>आटो</strong>  - चेन्नई और बैंगलोर (बंगलुरू) के आटो चालकों की करतूतों के इतने किस्से पढ रखे हैं कई अंग्रेजी चिट्ठों पर। लेकिन हैदराबाद के ९०% आटो चालक आपके साथ बेइमानी नही करेंगे, एकदम बेफिक्र रहिये। २८ रुपये होने पर २८/- ही लिये जाते हैं...२ रुपये छुट्टे वापस कर दिये जाते हैं...हर आटो वाला मीटर से चलता है...बिरला ही lumpsum राशि की मांग करता है</p>
<p><strong>फिल्में - </strong>हैदराबाद से सस्ती फिल्में (नई) आप इस स्तर के शहर में पूरे हिन्दुस्तान में शायद ही कही देख पायें। मल्टीप्लेक्स कभी नही जाते । लेकिन जितने भी सिनेमाघर हैं...दरें १०/- से ५०/- के बीच ही मिलेंगी। हिन्दी फिल्में खूब देखी जाती हैं। कई फिल्में First Day देखीं हैं यहाँ। और हाँ, मेरे घर की २-३ किलोमीटर की परिधी में १०-१५ सिनेमाघर होंगे। :)</p>
<p><strong>भाषा</strong>- बिल्कुल समस्या नही। सब लोग हिन्दी बोल समझ लेते हैं (हैदराबाद/सिकन्दराबाद में)। कई बार ऐसा हुआ है कि आटो वाले को सिर्फ हिन्दी ही आती थी, तेलुगु नही।..शायद यही वजह रही कि अब तक तेलुगू नही सीख पाया...जो खटकता है अक्सर।</p>
<p>*****************************************</p>
<p>ये मेरी सौवीं पोस्ट है। चिट्ठाकारी करते हुए पिछले महीने २ साल पूरे किये। पच्चीस महीने में १०० का आँकडा। औसतन, महीने में चार पोस्ट। कोई तीर मारने वाला काम तो नही (बडे बुजुर्ग दो-तीन महीनों में लिख मारते हैं) पर मुझे जैसे आलसी के लिये यही बहुत है...कि किसी काम को लगातार २ साल करता रहा। ये विश्वास भी है कि विकेट पे डटे हुए हैं..चाहे धीरें खेलें..पर नाबाद हैं(बरबाद तो हैं ही...)।</p>
<p>कई लोगों की तरह..पहला हिन्दी ब्लाग रवि जी का देखा था, सुखद आश्चर्य हुआ था और अंग्रेजी में <a href="http://raviratlami.blogspot.com/2005/03/blog-post_22.html" target="_blank">टिप्पणी </a>छोडी थी। ३-४ महीने देखता रहा..उन लोगों के चिट्ठे..जिन्हे आजकल अनूप जी <em>नोस्टाल्जियाते</em> रहते हैं ...थोडे दिन बाद खूद भी कूद पडा..हालाँकि खुद को भी पता नही था कि यहाँ क्या लिखूंगा... पहले <a href="http://www.saptrang.blogspot.com" target="_blank">ब्लागस्पाट </a>पर, और पिछले साल वहाँ दिक्कत आने पर यहाँ वर्डप्रेस पर। बहुत बिट्स/बाइट्स बह गये दरिया में इस दरमियान।</p>
<p>थोडा लिखा...खूब पढा..क्या खूब पढा और खूब सीखा। नये लोगों से परिचय हुआ, सोंच का दायरा बढा...नये मित्र भी बने। सफर चल रहा है..और सफर का मजा भी आ रहा है। इस सफर में साथ देने के लिये आप सबका शुक्रिया....</p>
<p>अभी खयाल-ए-जिगर का गुबार राह में है,<br />
बहार आ कर रहेगी, बहार राह में है,<br />
बढे चलो के वो मंजिल अभी आई नही,<br />
ये वो मुकाम है जिसका शुमार राह में है।</p>
<p><em>(ये पंक्तियां पापा ने ३-४ साल पहले CAT  की परीक्षा के समय भेजी थीं, हास्टल मे....शायर का नाम मालूम नही है)</em></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अजनबी..तुम जाने पहचाने से लगते हो]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/04/19/ajanabi/</link>
<pubDate>Thu, 19 Apr 2007 11:35:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/04/19/ajanabi/</guid>
<description><![CDATA[कैसा महसूस होता है जब कोई धीरे धीरे इत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कैसा महसूस होता है जब कोई धीरे धीरे इतना करीब आ जाता है कि पता भी नही चलता और वो जिन्दगी का हिस्सा बन जाता है।</p>
<p>अजनबी, कल जब तुम मेरी जिन्दगी में आये थे, तो तुम्हारे लिये मैं और मेरे लिये तुम कितने नये नये थे।...अनेक आशंकाओं, पर उत्साह से मन भरा हुआ था। उत्साह आज भी है, पर आशंकाएं विश्वास में बदल चुकी हैं। और साथ में हैं, तुम्हारे संग बिताये पल, चाहे वो सिनेमाघरों की अंधेरी सीटे हों या बिडला मंदिर के प्रांगण से दिखता विहंगम दृश्य। ट्रेफिक में फँसा हुआ आटो अथवा रविवार को अबिड्स में पटरी लगने वाली की दुकानों पर किताबों को देखते हुए चहलकदमी। हर समय, हर जगह तुम मेरे साथ थे और तुमसे अपनेपन का रिश्ता जुडता गया ।</p>
<p>अब इससे पहले कि आप मुझे तरह तरह की बधाइयां देने लगें और मेरी <a href="http://saptrang.wordpress.com/2007/04/10/shadi/" target="_blank">पिछली पोस्ट</a> की तरह कुछ गलतफहमियां पैदा हो जायें, मैं स्पष्ट कर दूं कि ये पंक्तियाँ समर्पित हैं, इस प्यारे से शहर हैदराबाद को जहाँ रहते हुए मुझे हाल ही में एक साल बीत गया&#124;  ऐसा भी नही है कि एक साल में मैने इस शहर की खूब खाक छानी है या खूब घूमा हूँ, कुछ परिचित रास्तों को छोड दें, तो ज्यादतर हिस्से से वाकिफ भी नही हूँ, पर फिर भी...बात है भाई।</p>
<p>बावजूद इसके कि मैं अब भी तेलुगु के २-४ वाक्य भी ठीक से नही बोल पाता, आज तक एक भी तेलुगु फिल्म नही देखी, तेलुगु का कोई गाना ठीक से नही गा पाता और सानिया मिर्जा के अलावा किसी हैदराबादी लडकी को नही जानता। बावजूद इसके कि अभी तक चारमीनार नही देख पाया हूँ  ना ही गोलकुंडा का किला और मारडपल्ली, कूकटपल्ली और चीकटपल्ली(ये सब जगहों के नाम हैं) भी मेरे पल्ले नही पडते । बावजूद इसके कि इन १२ महीनों में से नौ महीने अनगिनत होटलों की चौखटों पर सर  पटक पटक कर नाक भौं सिकोडते हुए रसम चावल इडली डोसे खाये हैं,  पिछले एक साल में ये शहर इतना करीब आ गया कि अब अपना दूसरा घर जैसा लगने लगा है।</p>
<p>अजनबी..तुम वाकई जाने पहचाने से लगने लगे हो यार !</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[खाना-पीना इन हैदराबाद....]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2006/09/25/hyderabad_food/</link>
<pubDate>Mon, 25 Sep 2006 18:48:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2006/09/25/hyderabad_food/</guid>
<description><![CDATA[हैदराबाद में करीब ६ महीने हो गये हैं औ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हैदराबाद में करीब ६ महीने हो गये हैं और इन छः महीनों में सबसे ज्यादा धक्के खाना खाने के लिये खाए हैं ...ना जाने कितने होटलों के मत्थे टेके हैं, कितने रेस्त्राओं को आजमा कर देखा है । इसी लेकर कुछ राज की बातें-ज्ञान की बातें-काम की बातें, जो अपन ने अपने अनुभव से जानी, देखी, सीखीं, समझीं । </p>
<p>'टिफ़िन' का मतलब होता है नाश्ता और 'मील्स'  मतलब खाना...याने अगर दफ़्तर में कोई आपसे पूँछे कि "Had your Tiffin?" तो उसे अपना लंचबाक्स मत दिखाने लगिये...वो पूँछ रहा है कि क्या आप नाश्ता कर चुके?</p>
<p>चपाती और फुल्का और रोटी तीन अलग अलग चीजें है..<br />
चलिये आपको इनका अंतर भी समझा देते हैं,चपाती और फुल्का, मैदा के बनते हैं, आटा प्रयोग करने का चलन नही है इधर । फुल्का बोले तो मैदा की लोई को जरा सा चपटा किया, और एक मिनट तक डोसे वाले तवे पर गरम होने दिया । बस और कुछ नही करना, फुल्का तैयार..ये आपको मील्स के साथ बोनस के तौर पर दिया जाता है। चपाती फुल्के की बडी बहन है, और मेरे हिसाब में हमारी तरफ़ पाये जाने वाले परांठे की भी दूर की रिश्तेदार हो सकती है । इसके अंतर्गत फुल्के से  थोडी बडी और नरम लोई को बेल कर उसी डोसे वाले तवे पे डाल दें, ऊपर से थोडे नारियल तेल के छींटे दे दें, थोडा उलट पलट दें। बस चपाती तैयार । और रोटी...अबे वो क्या होती है...वो इधर नही मिलती ।<br />
वैसे फुल्के और चपाती की खासियत ये है, कि थाली में परोसने के १० मिनट तक अगर आपने इन्हे खुल्ला छोड दिया, तो फ़िर चाहे आप पेप्सोडेंट लगातें हों, या लाल दंत मंजन...आप इन्हे नही चबा सकते...अजी चबाना छोडिये, टुकडे करने में पसीने आ जायेंगे ।</p>
<p>आप को रोटी खानी हो या पूरी या डोसा, साथ में नारियल चटनी ही मिलेगी...न ना..अचार तक नही मिलेगा..अगर आप अड गये तो पहले आपको समझाया जायेगा कि नही 'साsssर' अचार रोटी के साथ नही देते (थोडा आश्चर्य भी जताया जायेगा, कि कैसा बेवकूफ़ है, चपाती/पूरी के साथ अचार मांग रहा है)...फ़िर थोडी बहस कीजिये...फ़िर समझौता..कि भाई चटनी ना दे..बस अचार दे दे</p>
<p>सब्जी(दाल/सांभर) में डालने के लिये एक प्याज या टमाटर के दो से ज्यादा टुकडे करना वर्जित है। अगर प्याज/टमाटर छोटा है  तो पूरा भी चलेगा (क्या फ़र्क पडता है, उबलने के बाद सब एक जैसे हो जायेंगे)। लौकी के टुकडे कम से कम एक क्यूबिक इंच के जरूर हों, इससे छोटे नही।  गनीमत है, कद्दू का ज्यादा चलन नही है ।</p>
<p>ऊपर वाला नियम हरी मिर्च पर भी लागू होता है</p>
<p>सलाद याने कच्ची प्याज/टमाटर या ककडी नाम की कोई चीज नही होती...पर सांभर में कोई सी भी सब्जी (गाजर,लौकी,बैंगन...)किसी भी मात्रा में और किसी भी आकार में डाली जा सकती है।</p>
<p>झाडू से अपनी जिन्दगी में फ़र्श ही साफ़ होते देखा था..लेकिन नही, डोसा बनाने का तवा भी इससे साफ़ किया जाता है (सींक वाला झाडू)</p>
<p>कोई भी मील्स दही के बिना अधूरा है...दही नही तो सही नही ।</p>
<p>चावल के साथ आपको सांभर,रसम,दाल,एक सूखी सब्जी और कोई चटनी भी मिल जायेगी...पर रोटी (सारी चपाती के साथ...सिर्फ़ नारियल चटनी और पता नही कौन सी सब्जी)...बहुत नाइंसाफ़ी है !!!!</p>
<p>हरी सब्जी (साग) का यहाँ चलन नही है...उसकी कमी सांभर/रसम/नारियल चटनी में करी पत्ता डाल कर पूरी कर ली जाती है. अब करी पता के साथ दिक्कत ये है कि उसे चबाकर निगलना बडा मुश्किल है..इसलिये छाँटना पडता है</p>
<p>चाय में अदरक/इलायची/चाय मसाला डालने का कोई रिवाज नही है,  यहाँ तक कि दूध और चाय को साथ साथ उबालते भी नही हैँ, चाय का पानी अलग, दूध अलग और ऐन मौके दोनो को चीनी के साथ मिलाया और पकडा दी(एकदम फ़ारेन श्टाइल में)...अब यार जब तक पत्ती दूध में ना उबले तब तक भला चाय का भी कोई मजा है?</p>
<p>अब कुछ अच्छी बातें भी (इसका मतकब ये नही है कि ऊपर मैने बुरी बातें लिखी थी ;) )...</p>
<p>इधर अधिकतर होटल्स में बर्तन गर्म पानी से धोये जाते हैं, और विशेषकर चम्मच तो हमेशा ही गर्म पानी में डूबी हुई मिलती है।</p>
<p>पीने का पानी बाकायदा स्टील के जग-गिलास में ही मिलता है,और ढँका हुआ होता है...वो सीमेंट की खुली टंकी, और प्लास्टिक के जग नही दिखते।</p>
<p>हैदराबाद में शाकाहारी भोजन की समस्या नही आती,'सिर्फ़ शाकाहारी' होटल बहुतायत में हैं, बहुरूपता भी है खाने में। पर उत्तर भारतीय को ज्यादा समय दक्खिन का खाना हजम नही हो सकता..इसी लिये तो ऊपर इतना रोना रोया है। फ़िर भी हैदराबाद को पूरा दक्षिण भारत का हिस्सा कहना उचित न होगा, और चेन्नई और बैंगलोर जैसे शहरों के मुकाबले उत्तर भारतीयों के लिये यहाँ ज्यादा आसानी होती है।</p>
<p>और हाँ, कुछ चीजें जिनकी खूब याद आती है..गरमागरम पोहा-जलेबी,  दाल-बाटी,  सादा रोटी-सब्जी :(<br />
 <br />
 </p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[ऐसा क्यों हो रहा है..?]]></title>
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<pubDate>Fri, 18 Aug 2006 10:24:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[पिछले २-३ महीनों से मैं नियमित रूप से फ़]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले २-३ महीनों से मैं नियमित रूप से फ़िल्में देख पा रहा हूं, एक तो नौकरी लगने के बाद से सप्ताहांत थोडे फ़्री मिल ही जाते हैं...और यहाँ हैदराबाद में टिकट दरें एक दम जेब को माफ़िक आती हैं...५० रुपये के अन्दर अन्दर आप किसी भी टाकिज में फ़िल्म देख लीजिये (मल्टीप्लेक्स, Imax आदि छोडकर)..</p>
<p>शुरुआत की एक दो फ़िल्में हमने मल्टीप्लेक्स में जाकर देखी, पर कुल मिलाकर वो जेब कटाना साबित हुआ..एक तो २ दिन पहले सीट बुक कराओ...फ़िर भी साले आगे की सीट दे देंगे...फ़िर सीटें एकदम घटिया, पैर फ़ैलाने की जगह नही, पुशबेक भी नही...और कुछ खानापीना भी साथ नही ले जाने देते...वहीं खरीद के खाओ(याने फ़िर जेब कटाओ)...हाँ 'पब्लिक' सही आती है...पर इतने पैसे(१००/- से १८०/-) सिर्फ़ 'पब्लिक' को देखने के लिये तो खर्चा नही न करेंगे....वो तो हम मुफ़्त में Eat Street पे जाके देख लेंगे...सो हम साधारण टाकिज में ही जाते हैं...पुशबेक सीट, आगे पैर फ़ैलाने की अच्छी जगह..और ३५-५० रुपये मात्र... :)</p>
<p>तो मैं कह रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है....बोले तो..कैसा...</p>
<p>'कभी अलविदा ना कहना'.... महा बकवास फ़िल्म हमें लगी, पर वो हिट हो रही है (इंडिया कि रिपोर्ट्स का पता नही, पर अमेरिका में तो...)</p>
<p>'फ़ना' बिल्कुल बेकार फ़िल्म लगी....सुपरहिट हुई है  </p>
<p>'कृष' में भी कुछ खास नही लगा...वो भी सुपरहिट</p>
<p>और 'ओम्कारा' हमें खूब पसंद आयी...बेचारी फ़्लोप हो गयी !!!</p>
<p>ऐसा मेरे साथ(या उन फ़िल्मों के साथ) क्यों हो रहा है ?</p>
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