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	<title>फ़िल्म &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/फ़िल्म/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "फ़िल्म"</description>
	<pubDate>Wed, 14 May 2008 12:52:22 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[New Linux Ubuntu in just 15 Days]]></title>
<link>http://ubuntukanpur.wordpress.com/?p=20</link>
<pubDate>Wed, 09 Apr 2008 11:20:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>oskanpur</dc:creator>
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<description><![CDATA[लाइनक्स उबुँटू के सबसे आधुनिक संसकरण ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>लाइनक्स उबुँटू के सबसे आधुनिक संसकरण में अब मात्र १५ दिन बाकी - २४ अप्रैल को स्वयं <a title="लाइनक्स उबुँटू - डाउनलोड करें" href="http://www.ubuntu.com/getubuntu/download" target="_blank">डाउनलोड करें</a> और अपने नवीन अथवा खटारा कम्प्यूटर में नया जीवन फूँक दें &#124;</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[Open Source Software Education in India]]></title>
<link>http://oskanpur.wordpress.com/2008/03/28/open-source-software-education-in-india/</link>
<pubDate>Fri, 28 Mar 2008 10:26:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>oskanpur</dc:creator>
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<description><![CDATA[भारत मे सार्वजनिक वित्त पर चलने वाली श]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>भारत मे सार्वजनिक वित्त पर चलने वाली शिक्षण सँसथाएं व खुला सोर्स कोड / <a title="अपने कम्प्यूटर के लिए आाधुनिक व मुफ्त लाइनक्स उबुँटू डाउन लोड करें" href="http://www.ubuntu.com/getubuntu/download" target="_blank">लाइनक्स उबुँटू शिक्षा</a> - किसकी जिम्मेदारी ?</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[आजा नच ले: जा... नच ले!]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/12/01/aaja-nach-le/</link>
<pubDate>Sat, 01 Dec 2007 16:11:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/12/01/aaja-nach-le/</guid>
<description><![CDATA[&#8216;चक दे इंडिया&#8217; देख कर मैने लिखा था क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>'चक दे इंडिया' देख कर मैने <a href="http://saptrang.wordpress.com/2007/08/12/chak-de-india/">लिखा </a>था कि .."<em>अंडरडाग </em>की जीत की कहानी अक्सर हम सब को पसंद आती है…जाने अन्जाने हम अपने आप को अंडरडाग से जुडा महसूस करते है.."। जाने क्यों..'आजा-नच-ले' देखते देखते मुझे चक दे इंडिया याद आती रही। शायद इसलिये भी, कि जिन जयदीप साहनी ने चक दे इंडिया लिखी थी, उन्ही नें आजा नचले भी लिखी है।</p>
<p>फिल्म की कहानी है, दिया(माधुरी दीक्षित) की जो फिलहाल न्यूयार्क में कोरियोग्राफर हैं। करीब दस साल पहले दिया को अपना शहर शामली छोडना पडा था, अपने प्यार के लिये। वो वापस लौटती है, अपने गुरू की मौत पर। उसे अजंता थियेटर बचाना है जहाँ उसने नृत्य सीखा है, और जिसे गिरा कर अब एक शापिंग माल बनने वाला है।</p>
<p>चक दे.. से तुलना करूं तो वहाँ शाहरुख-कोच, यहाँ माधुरी-नृत्य निर्देशिका, शाहरुख के खिलाफ सारा देश, माधुरी के खिलाफ सारा शहर, वहाँ हाकी तो यहाँ रंगमंच, वहाँ १६ खिलाडियों की एक टीम, यहाँ ८-१० कलाकारों की एक टीम, वहाँ क्रिकेट बनाम हाकी है, यहाँ रंगमंच बनाम बाजार...और अंततः अंडरडाग (अंडरडाग को हिन्दी में क्या कहेंगे?) की जीत ।</p>
<p>लेकिन दोनों की तुलना करना शायद आजा नचले के साथ अन्याय होगा। शाहरुख आज के समय के सबसे बडे सितारे हैं और पारंपरिक रूप से बालीवुड में ४० के आसपास के अभिनेताओं का वर्चस्व रहा है। उधर माधुरी का शिखर समय आज से लगभग १३-१४ वर्ष पहले था, ६ साल बाद यह उनकी पहली फिल्म है और इस बीच दरिया में कई प्रिंट्स बह चुके। यह शायद पहली बार होगा जब मुख्य धारा की कोई फिल्म एक ४० पार के अभिनेत्री पूरी तरह अपने कंधों पर उठाये हुए है, और क्या खूब उठाये हुए है। और इस साहस के लिये निर्माता-निर्देशक और उनकी टीम बधाई की पात्र हैं।</p>
<p>माधुरी के अलावा फिल्म आज के दौर के बेहतरीन कलाकारों से भरी पडी है। विनय पाठक, इरफान, कोंकना सेन शर्मा, रनबीर श्रोय, कुनाल कपूर, अखिलेन्द्र मिश्रा, रघुवीर यादव..इतने सारे कलाकार एक फिल्म में हों तो वैसे ही फिल्म का देखना बनता है। हालांकि इसका एक नुकसान ये भी है कि सबको बहुत थोडा-थोडा स्क्रीन स्पेस मिला है और आप तमन्ना करते हैं कि काश फलां के हिस्से में कुछ डायलाग्स और होते। हालांकि करना नही चहता, पर यहां भी चक से इंडिया से तुलना किये बगैर नही रह सकता...चक दे इंडिया की लडकियां फिल्म की जान थीं..पर वो सब अपेक्षाकृत नये चेहरे थे, यहां चूंकि सामना देखे दिखाये चेहरों से होता है, सो आप थोडा और की फरमाइश किये बिना नही रह सकते।</p>
<p>फिल्म की शुरुआत में माधुरी थोडी थकी हुई नजर आती हैं..खासकर अंग्रेजी गाने में..लेकिन एक बार जब टाइटल ट्रेक पर उनके ठ्मके लगने शुरू होते हैं तो चेहरे पर मुस्कान आये बिना नही रहती। माधुरी दीक्षित फिल्म की जान हैं...हालांकि उनकी मुस्कान देख कर मुझे हम-आपके-हैं-कौन याद नही आई, लेकिन उनके ठुमके देख कर "मेरा-पिया-घर-आया" जरूर याद आया।</p>
<p>फिल्म का क्लाइमेक्स हाल के समय में आई फिल्मों में सबसे बढिया है। आमतौर पर हिन्दी फिल्मों में इन्टरवल के बाद कई बार फिल्म बहकने लगती है पर यहाँ क्लाइमेक्स लैला मजनूं पर आधारित एक नृत्य नाटिका है और ये २०-२५ मिनट फिल्म के सबसे बेहतरीन पल हैं। शानदार बोल, बढिया संगीत, जगमग सेट और दमदार अभिनय...यह नाटिका खत्म होते होते बिल्कुल आप सम्मोहित से हो जाते हैं और एक अजीब से सन्नाटे से भर जाते हैं। (हालांकि फिल्म के गानों के साथ यह नृत्य नाटिका पूरी तरह नही दी गई है।)</p>
<p>टाइटल ट्रेक और अंतिम नृत्य नाटिका के सेट, नृत्य संयोजन और प्रकाश संयोजन बेहतरीन हैं।  हालांकि ये बात कुछ हजम नही होती कि दिन में इतना खंडहर सा दिखने वाला मंच, रात में कैसा जगमगा उठता है। लेकिन इतनी छूट दी जा सकती है।</p>
<p>जब ६० पार के अमिताभ बच्चन को केन्द्रिय भूमिकाओं में रख कर फिल्में लिखे जाने लगीं थी तो यह बालिवुड में एक नये दौर की शुरुआत थी। क्या माधुरी की वापसी वाली यह फिल्म एक नये दौर की शुरुआत करेगी...देखते हैं।(जयप्रकाश चौकसे, दैनिक भास्कर के अपने <a href="http://www.bhaskar.com/2007/12/01/0712010049_aaja_nachle.html" target="_blank">नियमित कालम</a> में माधुरी की वापसी वाली बात पर एतराज जताते हैं और कहते हैं कि माधुरी गईं ही कब थी? आप क्या कहते हैं?)</p>
<p><strong>चलते चलते-</strong><br />
फिल्म देख कर रात को घर लौटे तो सब खबरिया चैनल फिल्म को उत्तर प्रदेश में बैन किये जाने की खबरें दिखा रहे थे। बहुर देर तो यह समझ नही आय कि वो लाइन कौन सी थी जिस पर बवाल मचाया रहा है। सच मानिये, अगर यह विवाद ना खडा होता तो शायद ध्यान भी ना जाता इस लाइन पर। वैसे इस तरह फिल्म को बैन करना क्या "अभिव्यक्ति-की-स्वतंत्रता-का-गला-घोंटने" के दायरे में नही आता? भई किसी विवादास्पद पुस्तक अथवा चित्र पर इस तरह का बैन तो यही कहलाता।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ओम-शांति-ओम : पिच्चर पूरी फिल्मी है मेरे दोस्त !]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/11/09/om-shanti-om/</link>
<pubDate>Fri, 09 Nov 2007 17:51:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/11/09/om-shanti-om/</guid>
<description><![CDATA[२००३ में आई फरहा खान निर्देशित पहली फि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>२००३ में आई फरहा खान निर्देशित पहली फिल्म 'मैं हूं ना' अगर आपने देखी हो, तो आपको याद होगा कि किस तरह से उन्होने आर डी बर्मन साहब के गाने, ७० के दशक की लम्बे कालर वाली शर्ट और बेल बाटम पेन्ट का इस्तेमाल किया था।(नही देखी हो तो अब देख लीजियेगा, हफ्ते में दो बार किसी न किसी चैनल पर आती है)।</p>
<p>कट टू २००७। 'ओम शांति ओम'। फरहा खान एक कदम आगे जाती हैं। अबकी बार कहानी, घटनाएं, दृश्य, मेकअप, कलाकार...सब वहीं से (३० साल पहले से) उठाती हैं...उसमें रोमांस के लिये शाहरुख की अदाएं, कामेडी के लिये पुराने कलाकारों की नकल(मिमिक्री), इमोशन और ड्रामा के लिये 'कर्ज़' की कहानी, हिप हाप के लिये धिनचक गाने और चटखीले रंग मिलाती हैं और अच्छी तरह से फेंटती हैं। साथ में मिलाती हैं ढेर सारा प्रचार, और रिलीज के लिये दिवाली का त्यौहार, और लीजिये, हो गई ओम-शांति-ओम तैयार।</p>
<p>फिल्म की कहानी में कुछ नही है..मेरा मतलब है बताने लायक कुछ नही है। अगर आप पृथ्वी पर ही रहते हैं और फिल्मो का थोडा बहुत भी शौक रखते हैं तो ट्रेलर देख कर ही कहानी समझ लिये होंगे। जो बताने लायक है, वो है प्रस्तुतीकरण। अब ये आपके टेस्ट पर निर्भर करता है, या तो आपको बहुत पसंदा आयेगा...या बिल्कुल बेकार। <em>तटस्थ </em>( :) ) नही रह पायेंगे।</p>
<p>वैसे एक सवाल। क्या सत्तर का दशक सिर्फ बेल बाटम पेन्ट, हाथ में चिडी बल्ला लेकर नाचते जीतेन्दर, कान ढंकते बाल, बडे गोगल्स, धमा धम संगीत (एक शब्द में कहें तो मनमोहन देसाई) का ही थी? अभी NDTV पर देख रहा था, सत्तर का दशक 'गर्म हवा', 'शतरंज के खिलाडी' और 'निशांत' का भी था..समानांतर सिनेमा के लिये मील का पत्थर था वो समय। लेकिन ये फरहा खान की अपनी मर्जी है वो क्या दिखायें...सो 'मैं हूं ना' और 'ओम शांति ओम' सामने आती हैं।</p>
<p>कुल मिला कर एक मसाला फिल्म, दिमाग पर जोर डाले बिना, सिर्फ टाइमपास करने जाना है तो जरूर जाइये...लेकिन अगर आप जिन्दगी में सिनेमा या सिनेमा में जिन्दगी ढूंढते हैं, तो फिर...पिच्चर आपके लिये नही है मेरे दोस्त।</p>
<p><strong>चलते चलते:</strong></p>
<p>अभी 'सांवरिया' नही देखी है लेकिन विभिन्न साइट्स पर सांवरियां और ओम-शांति-ओम पर लोगों की प्रतिक्रियाएं पढ रहा हूं..सांवरियां पर प्रतिक्रियाएं ठंडी आ रही हैं और ओम-शांति-ओम की तारीफ। ये कितना प्रायोजित है और कितना सही, नही कह सकता। मेरे खयाल में फिल्म तो सांवरिया भी बुरी नही होगी, पर भंसाली से लोगों को उम्मीदें कुछ अलग तरह की हैं। ओम-शांति-ओम कोई बहुत बढिया फिल्म भी नही है..दो से तीन स्टार हद से हद लेकिन फरहा खान से मसाला की उम्मीदें  थी..वही मिला, सो बुरा नही लगा। भंसाली से 'ब्लेक' के बाद और बेहतर सिनेमा की अपेक्षा थी, हो सकता है उतनी अच्छी ना हो। फिल्म देख लें फिर अपना नजरिया रखेंगे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चक दे इंडिया - 'भारत माता' की जय]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/08/12/chak-de-india/</link>
<pubDate>Sun, 12 Aug 2007 12:36:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/08/12/chak-de-india/</guid>
<description><![CDATA[अंडरडाग की जीत की कहानी अक्सर हम सब को ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><em>अंडरडाग</em> की जीत की कहानी अक्सर हम सब को पसंद आती है...जाने अन्जाने हम अपने आप को <em>अंडरडाग </em>से जुडा महसूस करते है...  चाहे वो सिंड्रेला हो या हैरी पाटर, आमिर की <em>लगान </em>टीम हो या हिमेश रेशमिया या ७० के दशक का दबा कुचला एंग्री यंग मैन। आम आदमी, याने की अपन जैसे लोग, उनमें अक्सर अपनी छवि देखते हैं..क्योंकि जिन्दगी में सबने कभी ना कभी कामयाबी का सपना पाला होता है और वो <em>अंडरडाग</em> शायद उसी सपने को जी रहा होता है। और अगर आप इसे १५ अगस्त के मौके पर इसे देशभक्ति की चाशनी में लपेट दें तो कहना ही क्या....क्या स्वाद आयेगा।</p>
<p>तो जब शाहरुख खान १६ लडकियों की एक बिखरी हुई टीम को, बिना <em>हाई-फाई </em>संसाधनों के, हाकी का (जो कि खुद भी भारत में <em>अंडरडाग </em>ही है) विश्वकप दिलाने निकल पडते हैं...तो दर्शक अपने आप को उनके साथ कदम मिलाता हुआ पाता है.. ये  बात सिनेमाघर में गूंज रही तालियों और सीटियों से साफ पता चलती है (ये अलग बात है कि ताली बजाने वालों में से अधिकतर के कभी हाकी स्टिक पकडी भी नही होगी..पर उससे क्या फर्क पडता है..अधिकतर ने कभी पेडों के इर्दगिर्द घूम कर हिरोइन के साथ कर नैन मटक्का भी तो नही किया होगा..।)</p>
<p>ये है चक दे इंडिया.... कोच कबीर खान की कहानी, जिसे सात साल पहले विश्वकप हाकी में पाकिस्तान के खिलाफ हुए फाइनल में गोल ना कर पाने पर गद्दार करार दे दिया गया..और जो अपने आप को साबित करने के लिये उस टीम का खेवनहार बनता है..जिसे एसोसिएशन विश्वकप में भेजने तक को राजी नही।</p>
<p>बाकी घटना क्रम का अंदाजा आसानी से लगया जा सकता है, सो कुछ कहने की जरूरत नही है। फिर भी थोडा बहुत कहेंगे...जो नजर में चढा।</p>
<p>फिल्म की जान है टीम की लडकियाँ...ज्यादातर नये चेहरे..और १६ लडकियों को ढाई घंटे में बराबर समय देना कठिन काम था... और वो तब, जब आपको शाहरुख को भी समय देना हो ..पर निर्देशक ने बखूबी काम किया है..और फिल्म खत्म होते होते आपको लगभग सभी १६ खिलाडियों के नाम याद हो जायेंगे, कुछ एक तो लम्बे समय तक याद रखे जाने लायक हैं। फिल्म में कुछ जगह झोल जरूर हैं पर रफ्तार ऐसी है आप कभी भी बोरियत महसूस नही करते। गाने भी सिनेमाघर में तीन ही दिखाये गये, और सब पार्श्व में बजे सो संगीत भी फिल्म की गति में कहीं रुकावट नही लाता, एक खेल फिल्म के लिये जरूरी थी....शीर्षक गीत और सूफियाना अंदाज का "मौला मेरे ले ले मेरी जान" जरूर पसंद आयेंगे।</p>
<p>इनके बाद हैं शाहरुख(जी हाँ, पहला नम्बर तो अपन टीम को ही देंगे) .... जो अभिनय में दुहराव के बावजूद अच्छे लगते हैं। दुहराव इसलिये कहा, कि संवाद आदायगी ऐसी कि...'चक दे इंडिया' की टीम को फटकारता/जोश दिलाता कोच हो या 'मुहब्बतें' में प्रेम का पाठ पढाता आशिक या ११ देशों की पुलिस से बतियाता 'डान'...सब एक जैसे लगते हैं।</p>
<p>कुछ मुद्दे अच्छे छेडे हैं फिल्म में- क्षेत्रवाद, खासकर जब मिजोरम की लडकी कहती है "<em>हमारे देश में ही हमें मेहमान बनायेंगे तो भला अच्छा लगेगा ?</em>"; मीडिया पर,  मीडिया, जो  अपनी खबर बनाने के लिये किसी को जीरो/हीरो बना देता है; खेल संघों के पदाधिकारी और उनके खेलों के प्रति रवैये पर; खेल में, परिवार में, दिल्ली के मेक्डोनाल्ड रेस्त्रां में...महिला बनाम पुरुष; और हाँ क्रिकेट बनाम हाकी भी।</p>
<p>कुल मिला कर देखने लायक फिल्म...और हाँ साथ में यशराज बैनर की आने वाली फिल्म "लागा चुनरी में दाग" का ट्रेलर भी देखने को मिला।</p>
<p><strong>चलते चलते</strong>- रात को एक बजे फिल्म देख कर जिस आटो से घर पहुँचे..उस आटो वाले का कहना था.."<em>२ साल बाद मैने कोई फिल्म देखी है..मैं ज्यादा फिल्म नही देखता ,पर इस फिल्म को देखने के लिये एक अन्य साथी ने मुझसे कहा था। बहुत अच्छी पिच्चर है साहब...आप पूरा फैमीली के साथ बैठकर देख सकते हैं...कोई  टुच्चापन नही है फिल्म में...."</em><br />
अपना मानना है कि जो फिल्म आटो वालों को पसंद आ जाती है, वो जरूर हिट होती है। :)</p>
<p>पुनश्चः - <strong>मीर रंजन नेगी</strong>, जिनकी जिन्दगी से यह फिल्म प्रेरित है, के बारे में <a href="http://www.rediff.com/movies/2007/aug/13negi.htm" target="_blank">यहाँ </a>पढें ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हिमेश भाई का 'सुर्रूर']]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/06/20/himesh-aap-ka-suroor/</link>
<pubDate>Wed, 20 Jun 2007 12:21:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/06/20/himesh-aap-ka-suroor/</guid>
<description><![CDATA[आप का सुर्रूर- द मूवीई-द रीयल लुव स्टोर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आप का सुर्रूर- द मूवीई-द रीयल लुव स्टोरी </strong>(अंग्रेजी में स्पेलिंग है Aap Kaa Surroor-The Moviee-the Real Luv Story) ये है हिमेश रेशमिया की पहली फिल्म का नाम । कोई बहुत सनसनीखेज जानकारी नही दी मैने आपको...। किसी भी टी. वी. चेनल को खोल लीजिये (आस्था, संस्कार नही, वहाँ ’रूपा’ के <em>एड </em>ज्यादा आते हैं) इसके प्रोमो दिख जायेंगे। लेकिन इतने प्रोमो देख देख कर थक गया और इतना पक गया कि निश्चय किया कि एक पोस्ट तो बनती ही है इसपे।</p>
<p>सुना है, बहुत मंहगी फिल्म है, पूरी फिल्म जर्मनी में बनी है और किसी कंपनी ने २० करोड में इसके अधिकार खरीदे हैं । बहुत खूब । हिमेश भाई का फैन तो नही हूँ...पर बहुत ज्यादा नापसंदगी भी नही है । वैसे बन्दे के बारे में कहा जाता है कि "either you love him, or hate him" और विश्वास न हो तो कभी ओरकुट पर Himesh Reshamiyaa की Hate और Fan कम्यूनिटीज देख लीजियेगा ।<br />
तो मैं आपका सुर्रूर की बात कर रहा था...फिल्म कैसी होगी यह तो २९ तारीख के बाद पता चलेगा, पर फिलहाल कुछ बातें जो मैने प्रोमोज में नोट की और मुझे पसंद आईं क्योंकि निर्देशक ने अपनी Strengths और Weaknesses को बखूबी संभाला है-</p>
<p>१) फिल्म का कोई भी गाना देख लीजियेगा, गानो के बीट्स बडे धांसू हैं..पर हिमेश भाई को नाचना नही आता। तो क्या हुआ..हिमेश भाई सिर्फ हाथों को झटके देते हैं..और <a href="http://www.youtube.com/watch?v=PlwM-KwWKw">कैमरा जूम करता</a> रहता है...बाकी डांस बस बेकग्राउंड में साथी कलाकार करते दिखते हैं। सही है भाई, जब नाचना ना आए (जैसे सन्नी पाजी को भी नही आता), तो क्यों फजीहत करवाई जाये।<br />
२) हम नही नाच सकते तो क्या, हमारा कार्टून तो नाच सकता है, भाई लोगों ने एक गाने का फिल्मांकन <a href="http://www.youtube.com/watch?v=CEPImDLvJEE">कार्टून </a>बना कर भी किया है..जिसमें इनकी खिचडी दाढी की जो कंघी कर रखी है ...सदके जावां<br />
३) जर्मनी कभी गया नही, पर वहां की सडकों पर आटो देख के दिल खुश हो गया...और कोई देखे ना देखे....आटो वाले भाई-बंधु तो आ ही जायेंगे..दिन भर गाने भी तो बजाते हैं आटो में हिमेश भाई के।</p>
<p>४) मल्लिका शेरावत तो हैं ही चकाचक, साथ में शोले का 'महबूबा' गाना भी डाला है।</p>
<p>५) और सबसे बडा <strong>राज</strong>...जिन बालों को इतने जतन से, इतने सालों से टोपी की नीचे छुपा रखा था (कई दोस्त बोलते थे कि बाल नही हैं, हमने कहा चेहरे पर तो हैं, सर पे भी जरूर होंगे। कुछ कहते थे...खाज है सर में..वो हो सकता है)..पर नही जी नही । सुना है जान अब्राहम को नींद नही आती आजकल । क्या लहराती हुई जुल्फें है गुरू....बस एक झलक दिखी है अभी टी वी पर...बाकी के लिये फिल्म देखनी पडेगी पूरी...पर शायद शेम्पू कंपनियाँ अभी से लाइन लगाने लगी हैं...एड करवाने के लिये ।</p>
<p>वैसे ..एड तो <em>विक्स वेपोरब </em>का भी खूब जमेगा...बन्द नाक...खुल खुल जाये :)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हनीमून ट्रेवल्स.]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/02/25/honeymoon-travels/</link>
<pubDate>Sun, 25 Feb 2007 11:13:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/02/25/honeymoon-travels/</guid>
<description><![CDATA[प्रेमी प्रेमिका, प्यार तकरार, घरवालों/]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>प्रेमी प्रेमिका, प्यार तकरार, घरवालों/खलनायक से जंग, थोडी धां धूं और थोडी फ़ां फूं और अन्त में हीरो हिरोइनी का मिलन..और पिक्चर समाप्त।  १०० में ८० बेईमान वाले देस की फ़िल्म इन्डस्ट्री की १०० में ८० फिल्में भी शादी पर आकर खत्म हो जाती है । लेकिन जिन्दगी...सही मायनों में वो तो शादी के बाद शुरु होती है।</p>
<p>शादी के बाद की जिन्दगी तो नही, पर तुरन्त बाद का एक छोटा सा हिस्सा, जहाँ पति पत्नि एक दूसरे को समझने की पहली कोशिश करते हैं और पहली बार एक दूसरे को जानते हैं (बोले तो <em>ह्ल्दीनून</em> या हनीमून) लेकर आयी हैं रीमा कागती, फिल्म "हनीमून ट्रेवल्स प्रा. लि. " में । फिल्म में छः जोडे हैं, अगर सलाम-ऐ-इश्क देखी हो तो छः जोडों के नाम पे घबराइयेगा नही..ना तो फिल्म उतनी लम्बी है और ना ही कहानी को इतना उलझाया कि सुलझ ही ना सके ।</p>
<p>हाँ तो साहब फिल्म के मुख्य किरदार हैं छः शादी शुदा जोडे, एक टाटा स्टारट्रेक बस और रेडियो मिर्ची (अच्छी "visibility" मिली दोनो को) । सब कलाकारों के नाम यहाँ लिख नही पाऊँगा, मुझे याद भी नही हैं । जो चीज इन सभी को जोडती है वो है शादी के बाद रिश्तों में आने वाला परिवर्तन।  ऐसा क्यों होता है कि शादी के बाद बहुत कुछ 'बदल' जाता है । तुम पहले तो ऐसे ना थे, पहले तो ऐसे करते थे, पहले तो ये था अब वो है आदि आदि... । हमारी अभी नही हुई है सो हमे इस बारे में कुछ नही मालूम :) ।</p>
<p>हर किरदार की अपने कुछ उलझने है, कुछ सपने हैं और कुछ हकीकते हैं । एक अधेड जोडा है जिसकी दूसरी शादी है, और जो अपनी जिन्दगी में हुए पुराने दर्दनाक वाकयों को भूलना चाहता है,  एक खालिस पंजाबी लडकी जो खूब सपने देखती है और खूब बोलती है, पर पति है कि उसे कोई 'और' ही गम है, एक बंगाली जोडा जहाँ पति कुछ 'कंजरवेटिव' किस्म का है, और पत्नि है कि खुले आसमान में उडना चाहती है, एक गुजराती जोडा जहाँ लडकी की शादी उसकी मर्जी के खिलाफ हुई है, एक जोडा जो इन्टरनेट के जरिये मिले थे पर जहाँ लडकी एक बार अपना दिल तुडा चुकी है तो लडके को कोई 'और' ही आदत है और एक जोडा जो कभी नही लडता हमेशा खुश रहता है और सिर्फ प्यार करना जानता है ।</p>
<p>कहीं कहीं फिल्म यह संदेश देती हुई दिखी कि शादी हमे हकीकत से रू ब रू कराती है और वहाँ सब कुछ रंगीन नही होता । प्यार के साथ तकरार,  कभी चमाचम कभी भंगार, कभी छप्पन भोग तो कभी फलाहार होता ही है, अगर ऐसा नही है, अगर सिर्फ प्यार ही प्यार है तो वो परामानवीय है, साधारण इंसान के लिये नही है, सुपर हीरोज़ (जी हाँ, वो भी है फिल्म में) के लिये है ।</p>
<p>एक दो जगह पर कुछ झोल और अतिनाटकीयता छोड दें तो हमे फिल्म अच्छी लगी, एक बार देखने लायक । अच्छी बात, कलाकारों का अभिनय और कहानी का नयापन । साथ ही यह भी कि बस दो घन्टे की फिल्म है, पकने लगें उसके पहले खत्म हो जाती है ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मान गये 'गुरू' !]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/01/12/guru/</link>
<pubDate>Fri, 12 Jan 2007 20:33:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/01/12/guru/</guid>
<description><![CDATA[&#8220;साहब..खडा हो सकता हूँ, या उसके लिये भ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>"साहब..खडा हो सकता हूँ, या उसके लिये भी लाइसेन्स लेना होगा ?"<br />
उस जमाने की फ़िल्म है गुरू, जब आपको हर काम, हर फ़ेक्ट्री, हर धन्धे के लिये लाइसेन्स चाहिये होता था । हमने वो जमाना से देखा नही, जब तक सोंचने समझने लायक हुए तब तक ९० का दशक आ चुका था । लेकिन वाकई में गुजरात के एक गाँव से आये हुए, दसवीं फेल आदमी के लिये आसान नही रहा होगा । पर अपने दिमाग, लगन और जोड तोड से उसने कर दिखाया और इन सबसे बढ कर था, सपने देखना । मैं 'गुरू' की ही बात कर रहा हूँ, धीरू भाई अंबानी की नही, पर क्या फ़र्क पडता है ।</p>
<p>'गुरू' की कहानी में आप ऐसा नया शायद ही कुछ पायेंगे जो आप ना जानते हों, लेकिन अभिषेक बच्चन के लिये ये फ़िल्म जरूर देखियेगा । अभिनय, हावभाव, मेकअप....शानदार... ।और इन सबके ऊपर, आवाज....दम है भाई । कहीं कहीं बडे बच्चन नजर आते हैं । फ़िल्मांकन खूबसूरत है, खास तौर पर कुछ शुरुआती दृश्य तो मुझे गाडफ़ादर(शायद भाग २) की याद दिलाते हैं । और तीसरी तारीफ़ेकाबिल बात, संवाद । छोटे छोटे संवाद जो एक दम निशाने पर जाकर बैठते हैं ।</p>
<p>ऐश्वर्या राय, ठीक ठाक हैं, 'बरसो रे मेघा' गाने की बारिश में मैं ताल वाली ऐश्वर्या को देखने की कोशिश कर रहा था...पर असफल रहा, गलत जगह और समय पर गलत चीज ढूंढ रहा था । साथी कलाकार सब अपनी अपनी जगह फ़िट बैते हैं , वैसे माधवन-विद्या बालन की प्रेम कहानी की जरूरत नही थी । मिथुन दा को बहुत दिन बाद बडे पर्दे पर देखा ।</p>
<p>गुलजार साहब के गाने, हमेशा की तरह धीरे धीरे जुबान पर चढे, और हमेशा की ही तरह कई बोल अभी भी समझ में नही आये हैं। पर गाने कहीं कहीं गैर जरूरी महसूस हुए, १-२ ना होते तो भी ठीक था, करीब पौने तीन घंटे से ऊपर की फ़िल्म है ।</p>
<p>कुल मिला कर जरूर देखने लायक फ़िल्म, अभिषेक बच्चन की अब तक की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म ।......"आज खुश तो बहुत होंगे तुम..ऐं..???" :)</p>
<p>पुनश्चः -<br />
बहुत दिन पहले एक मेल फ़ारवर्ड में पढा था,<br />
प्र.- MBA के क्या मायने है ?<br />
उ.- एक छोटे से गाँव से आया हुआ स्कूल फेल आदमी, अपनी मेहनत और लगन से ६४,००० करोड रुपये की कंपनी खडी करता है, दो MBA धारी आकर उसके २ टुकडे कर डालते हैं ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[फिर छा गये मामू!!!]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2006/09/01/chaa_gaye_maamoo/</link>
<pubDate>Fri, 01 Sep 2006 20:28:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[ये पोस्ट लिखते हुए डर तो लग रहा है..कारण]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ये पोस्ट लिखते हुए डर तो लग रहा है..कारण..अजी आजकल जो फिल्म मुझे अच्छी लगती है वो <a target="_blank" href="https://saptrang.wordpress.com/2006/08/18/%e0%a4%90%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-2/">फ्लाप जो हो जाती है</a>..पर क्या करूं मामू...बोले तो..अपने आप को रोक नही पाये...उम्मीद पूरी है कि इस बार ऐसा नही होगा</p>
<p>सबसे पहले, पहली बात, पार्ट -१ के मुकाबले कैसी है, तो अपना कहना ये है कि इक्कीस नही है...पर उन्नीस भी नही है..इक्कीस नही लगने की वजह ये हो सकती हैं कि पहले भाग को देखने के पहले कोई अपेक्षा थी नही, और इस बार फिल्म अपेक्षाओं के बोझ तले दबी थी..<br />
पिछली बार मुन्ना ने डाक्टर बन कर लोगों के दिल का खुश किया था, इस बार मुन्ना की जोडी बनी है(सर्किट के अलावा)...अपने बापू के साथ, बापू..बोले तो गाँधी जी.और हाँ,,जादू की झप्पी इस बार अपको नही मिलेगी..पर हाँ, गाँधीगिरी है ना..वो क्या है..ये तो आप खुद ही देख लीजियेगा<br />
फिल्म की कहानी यहाँ ज्यादा लिख कर आपका मजा खराब नही करूंगा बस इतना ही कि मुन्ना इस बार अपने प्यार को पाने के लिये नाटक करता है, इतिहास का प्रोफेसर बनने का, प्यार है जान्हवी(विद्या बालन), जो ग्रेसी सिह से कहीं अच्छी दिखती है(जब विद्या बालन <em>हम पाँच</em> में आती थी तो सोंच भी नही सकते थे कि इतनी खूबसूरत दिख सकती है)...और जब <em>लोचा</em> हो जाता है, तो मुन्ना की मदद के लिये आते हैं गाँधी जी..बोले तो इस बार भाईगिरी/दादागिरी नही, गाँधीगिरी चलेगी&#124;<br />
फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष है कहानी, जो बिना बोर किये और प्रवचन दिये, कई सारे समसामयिक मुद्दों को छू जाती है..और हास्य तो अपनी जगह है ही...हैदराबाद में पब्लिक इतनी तालियाँ और सीटियाँ बजा रही थी, तो उत्तर भारत की तो मैं कल्पना ही कर सकता हूँ&#124;<br />
फिल्म की कहानी,निर्देशन और संपादन राजकुमार हीरानी का है..और हर पहलू पर उन्होने वाकई मेहनत की है, कोई विदेशी लोकेशन नही,महँगे-चकाचौंध भरे सेट नही, पर एक शानदार कहानी और कन्सेप्ट(करण जौहर शायद सुन रहे हों)..और पात्र चयन के बारे में तो कुछ कह ही नही सकते...Everybody just made for the role he is performing.और हाँ आप अपने पूरे परिवार के साथ बैठ कर फिल्म देख सकते हैं,कोई टेन्शन नही.<br />
अपनी माने तो..जरूर देखना मामू..</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ऐसा क्यों हो रहा है..?]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2006/08/18/%e0%a4%90%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-2/</link>
<pubDate>Fri, 18 Aug 2006 10:24:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[पिछले २-३ महीनों से मैं नियमित रूप से फ़]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले २-३ महीनों से मैं नियमित रूप से फ़िल्में देख पा रहा हूं, एक तो नौकरी लगने के बाद से सप्ताहांत थोडे फ़्री मिल ही जाते हैं...और यहाँ हैदराबाद में टिकट दरें एक दम जेब को माफ़िक आती हैं...५० रुपये के अन्दर अन्दर आप किसी भी टाकिज में फ़िल्म देख लीजिये (मल्टीप्लेक्स, Imax आदि छोडकर)..</p>
<p>शुरुआत की एक दो फ़िल्में हमने मल्टीप्लेक्स में जाकर देखी, पर कुल मिलाकर वो जेब कटाना साबित हुआ..एक तो २ दिन पहले सीट बुक कराओ...फ़िर भी साले आगे की सीट दे देंगे...फ़िर सीटें एकदम घटिया, पैर फ़ैलाने की जगह नही, पुशबेक भी नही...और कुछ खानापीना भी साथ नही ले जाने देते...वहीं खरीद के खाओ(याने फ़िर जेब कटाओ)...हाँ 'पब्लिक' सही आती है...पर इतने पैसे(१००/- से १८०/-) सिर्फ़ 'पब्लिक' को देखने के लिये तो खर्चा नही न करेंगे....वो तो हम मुफ़्त में Eat Street पे जाके देख लेंगे...सो हम साधारण टाकिज में ही जाते हैं...पुशबेक सीट, आगे पैर फ़ैलाने की अच्छी जगह..और ३५-५० रुपये मात्र... :)</p>
<p>तो मैं कह रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है....बोले तो..कैसा...</p>
<p>'कभी अलविदा ना कहना'.... महा बकवास फ़िल्म हमें लगी, पर वो हिट हो रही है (इंडिया कि रिपोर्ट्स का पता नही, पर अमेरिका में तो...)</p>
<p>'फ़ना' बिल्कुल बेकार फ़िल्म लगी....सुपरहिट हुई है  </p>
<p>'कृष' में भी कुछ खास नही लगा...वो भी सुपरहिट</p>
<p>और 'ओम्कारा' हमें खूब पसंद आयी...बेचारी फ़्लोप हो गयी !!!</p>
<p>ऐसा मेरे साथ(या उन फ़िल्मों के साथ) क्यों हो रहा है ?</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एन्थोनी क्यों है????]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2006/08/06/anthony_kyo_hai/</link>
<pubDate>Sun, 06 Aug 2006 12:34:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[जी हां, फ़िल्म का नाम तो है &#8216;एन्थोनी कौ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जी हां, फ़िल्म का नाम तो है 'एन्थोनी कौन है?'...पर पूरे दो ढाई घन्टे मैं बैठ कर यही सोंचता रहा कि ये 'क्यों है.??' भाई राजकौशल जी क्या बनाना चाहते थे, क्यों बनाना चहते थे और क्या बना गये ये शायद वो भी नही समझ पाये..और हम तो मूढ हैं ही।</p>
<p>पहले सोंचा होगा कि चलो एक कोमेडी बनाई जाये, अरशद-संजय की जोडी ठीक रहेगी, काम शुरु करते हैं...फ़िर मूड बदला, खयाल भी बदले....चलो एक थ्रिलर बनाने की कोशिश करते हैं...एक काम करते हैं..साथ में थोडी प्रेम कहानी भी डाल देते हैं..ह्म्म, जम नही रहा यार..चलो सबको मिला के एक खिचडी बना देते हैं...कहानी का क्या है...वो तो वैसे भी शुरू से अपने पास थी ही नही!!!और हां...२-४ गाने भी तो रखने होंगे ना फ़िल्म में.....जरूरत तो नही है, पर डाल दो यार, बिना कहानी की फ़िल्म, बिना गानों के अच्छी नही लगेगी...मार्केट में एक टोपी वाला बहुत चल रहा है आजकल, बनाता तो वो भी खिचडी ही है, पर अपनी खिचडी में उसकी खिचडी मिल जायेगी तो स्वाद शायद अच्छा बन पडे...तो ले लो उसे ही...उउउउउउउउउउउउउउउउउउ   ..नही निर्माता के रोने की आवाज नही है, रेशमिया का संगीत है ये तो...</p>
<p>फ़िल्म की कहानी चूंकि है ही नही, सो उसके बारे में यहां कुछ नही लिखूंगा, कलाकारों के बारे में कुछ बता देते हैं..अगर आप फ़िल्म, संजय दत्त को देखने जा रहे हैं...तो ना ही जायें...अतिथी भूमिका है उनकी,फ़िल्म में उनसे ज्यादा रोल तो कबूतरों का है..अब कबूतर आपको पसंद हों तो बात अलग है। अरशद वारसी, फ़िल्म के नायक हैं...पर चूंकि फ़िल्म का कन्सेप्ट ही क्लीयर नही था, सो ना तो वो सर्किट्नुमा कोमेडी कर पाये, ना ही कुछ और..और हां, बहुत मोटे लगते हो कुछ जगहों पर यार...या तो तो बनियान पहना ना करो फ़िल्म में..या थोडी कसरत करना शुरू कर दो. हीरोइन मनीषा लाम्बा ..अच्छी हैं(वो क्या है, मैं महिलाओं की बुराई नही करता), और राजपाल यादव ने अपना रोल क्या सोंच कर स्वीकर किया, वो ही जाने..</p>
<p>शायद फ़िल्म की(या शायद हमारी) सबसे बडी समस्या ये थी, कि संजय-अरशद की जोडी से हम कुछ ज्यादा ही उम्मीद लगाये बैठे थे, और इसी वजह से हमारा  गुस्सा यहां निकल रहा है। कुलमिला कर,मजा नही आया मामू!!! हम ये सलाह देंगे कि DVD मिल जाये तो ठीक पर थियेटर में जाके इस फ़िल्म पर पैसे बरबाद करने की गलती कतई ना करें....</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सप्ताहांत पर दो फ़िल्में]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2006/07/31/%e0%a4%b8%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a5%9e%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/</link>
<pubDate>Mon, 31 Jul 2006 12:38:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[इस सप्ताहांत पर दो फ़िल्में देखीं, ओंका]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस सप्ताहांत पर दो फ़िल्में देखीं, ओंकारा और फ़ना.</p>
<p><strong>फ़ना</strong> काफ़ी पहले रिलीज हो गई थी पर हम देख नही पाए थे..फ़िल्म में खास कुछ नही है, सिवा आमिर-काजोल की जोडी के. मध्यांतर से पहले खूब शेर-ओ-शायरी है, जिस पर पब्लिक ने खूब तालियां/सीटियां मारी, हैदराबाद में मैने पहली बार देखा कि लोग सीटियां मार रहे थे, और कमेन्ट्स दे रहे थे...नही तो यहां पब्लिक इतना चुप चाप फ़िल्म देखती है मानो लगता है मय्यत में आये हैं. पर अपन को वो शेर-ओ-शायरी बिल्कुल चवन्नाछाप लगी...और फ़िल्म की कहानी का तो कहना ही क्या...सच कहता हूं अगर आमिर-काजोल नही होते तो फ़िल्म शायद ३ दिन भी नही चलती. काजोल जबरदस्त लगी...(पर अपन को काजोल DDLJ के गाने "<em>मेरे ख्वाबों में जो आये</em>"..में जैसी लगी वैसी फ़िर कभी नही लगी...:) )खैर, लिखने लायक ज्यादा कुछ नही है फ़ना के बारे में....</p>
<p> अब आते हैं <strong>ओंकारा</strong> पर...फ़िल्म धांसू है, इसमें कोई शक नही....जैसा कि सबको पता है, ये शेक्स्पीयर के नाटक <em>ओथेलो</em> पर आधारित है...अतः कहानी में कुछ नया तो नही है, दो प्रेमी, प्रेम में शक, बुरा दोस्त/साथी जो शक के बीज डालता है आदि के घालमेल से सैंकडों फ़िल्में बनी होंगी, पर विशाल भारद्वाज ने कहानी को जो 'ट्रीटमेंट' दिया है वो वाकई काबिले तारीफ़ है.</p>
<p>फ़िल्म की जान हैं.....१) फ़िल्म के संवाद २)उसके बाद कलाकारों का अभिनय और फ़िर ३) संगीत....इन सबके साथ साथ बेहद खूबसूरती से फ़िल्माये गये द्र्श्य...फ़िल्म की प्रष्ठ्भूमि उत्तर प्रदेश की है, पर शायद फ़िल्मांकन महाराष्ट्र के किसी इलाके में हुआ है....</p>
<p>बहुत समय बाद कोई फ़िल्म ऐसी देखी, जिसे देखने के बाद बाहर निकल कर मैं उसके संवाद दोहरा रहा था....फ़िल्म में गालियों का भरपूर प्रयोग किया गया है, सो शायद किसी-किसी को वो खल सकता है, लेकिन मेरे हिसाब से यही बात फ़िल्म को बहुत जाना पहचाना सा बनाती है, विशेषकर अगर आप कभी UP/बिहार के किसी गांव में रहे हॊ....इसके मद्देनजर हम ये सलाह देंगे कि अपनी महिला मित्र के साथ ये फ़िल्म ना ही देखने जाएं...आप खुल कर हंस भी नही पायेंगे...हां अगर दोस्तो के साथ जायेंगे तो जमकर मजा लेंगे....हैदराबाद में शायद लोगों को संवाद समझ ना आ पाये हों पर उत्तर भारत में खूब तालियां मिलेंगी ये अपनी गारंटी...इसके साथ ही पात्रों के नाम काफ़ी स्ट्राइकिंग हैं...(मिसाल बिपासा उर्फ़ 'बिल्लो चमनबहार')</p>
<p>अभिनय के लिहाज से सैफ़ के केरियर की सबसे अच्छी फ़िल्म..."लंगडा त्यागी" लम्बे समय तक याद रखा जायेगा, अजय देवगन के बारे में कुछ नही कहूंगा, वो पहले भी कई बार ऐसे रोल कर चुके हैं खासकर जिस फ़िल्म में उन्हे आंखों से बोलना होता है(पढें गंभीर अभिनय ). कोंकना सेन शर्मा....उफ़्फ़्फ़....एकदम 'नेचुरल'.... एक संवाद "हंसी बडी मंहंगी हो रखी है आजकल" अभी भी मेरे कानो में गूंज रहा है....विवेक ओबेराय और करीना, ठीक ठाक थे, और बिपासा...इनके हिस्से में दो जबरदस्त आयटम नम्बर थे ('बीडी' और 'नमक')...लेकिन मैं यही कहूंगा कि इन्हे डांस करना नही ही आता..अगर यही गाने शिल्पा शेट्टी को दे देते तो फ़ोड डालती...हां गानों की सिचुएशन ऐसी है कि बुरा नाच भी अखरता नही है...</p>
<p>हिमेश रेशमिया के जमाने मे विशाल भारद्वाज बहुत सुकून देते हैं "<em>जग जा री गुडीया</em>" बहुत ही मीठा बन पडा है बहुत मीठी लोरी जैसा...मुझे <em>सदमा</em> के गाने <em>'सुरमई अंखियों में...</em>' की याद दिला रहा था...'बीडी' और 'नमक' सुन कर लग रहा था कि सीट छोड कर नाचने लगें..पर ये अलवर तो नही न था..टाइटल ट्रेक भी जोश भरा है. गुलजार साहब के बोल और उपमाएं वाकई जादू हैं(गौर करें..."<em>आंखें तेज ततैया जैसे जीभ सांप का फ़ुंकारा</em>").</p>
<p>कुलमिला कर विशाल भारद्वाज ने एक अच्छा पैकेज दिया है. 'मकडी' बच्चों की फ़िल्म कही गई थी, और 'मकबूल' काफ़ी गंभीर थी..कई जगह ऊपर से निकलने जैसी..पर 'ओंकारा' में अच्छा मसाला भरा है...एक बार जरूर चखिये...अच्छा लगेगा.."नमक इस्क का"</p>
<p>:)</p>
]]></content:encoded>
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