आती-जाती रहती हैं यह सदियाँ रास्ते पर रहती हैं मेरी दो अँखियाँ तेरे इंतज़ार में तुझे देखने के लिए जाने कब से तू आँखों में बसी है जाने कब से यह महफ़िल सजी है यूँ ही घर आना-जाना बढ़ गया एक पल में तेरा नशा… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: आती-जाती रहती हैं यह सदियाँ रास्ते पर रहती हैं मेरी दो अँखियाँ तेरे इंतज़ार में तुझे देखने के लिए जान … more →