हमारी आंखें लुप्त हो रही हैं (a poem by ravi kumar, rawatbhata) हम एक अंधेरी खान में जी रहे हैं हम कई घंटों तक रोजी-रोटी की आपाधापी में रहते हैं सोते हैं कई घंटे बाकी समय में खु़द को उलझाए रखने क… more →
सृजन और सरोकारदीपक भारतदीप wrote 2 months ago: कमरों में बंद दौलत लूटकर लुटेरे जा सके यहां से कितनी दूर। उसकी चकाचैंध में रौशनी खो बैठे उनके नूर। अ … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 2 months ago: हमारी आंखें लुप्त हो रही हैं (a poem by ravi kumar, rawatbhata) हम एक अंधेरी खान में जी रहे हैं … more →
विनय wrote 11 months ago: बोल तुझे इक हर्फ़ में कैसे लिख दूँ तस्वीर नहीं बनती कभी हर्फ़ों से… तू रोशनी और यह तन्हाई अंधेरा … more →
विनय wrote 11 months ago: बारहा पिरोये हैं कई ज़ख़्म साँस के एक ही धागे में टुकड़े-टुकड़े बिखरी हुई ज़िन्दगी बहुत नज़दीक़ लगी है त … more →