फिर से लौटेंगे भेड़िए – रवि कुमार ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) एक कविता पोस्टर ख़ुद की कविता पर भी लिख मारा था. इस बार अपनी कोई कविता ही देना चाहता था, सोचा चलो यह पोस्टर ही पोस्ट … more →
सृजन और सरोकारNidhi KM wrote 1 month ago: दीपावली की रात… एक घर मे… छोटी-छोटी बेटियाँ, माँ का हाथ बटा रही है, घर मे रंग-रोगन कर, प … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 3 months ago: फिर से लौटेंगे भेड़िए – रवि कुमार ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) एक कविता पोस्टर … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 3 months ago: रात के अंधेरे ही सही – अनीस इमाम ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) शब्दों के कुछ सम … more →
दीपक भारतदीप wrote 7 months ago: कमरों में बंद दौलत लूटकर लुटेरे जा सके यहां से कितनी दूर। उसकी चकाचैंध में रौशनी खो बैठे उनके नूर। अ … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 8 months ago: हमारी आंखें लुप्त हो रही हैं (a poem by ravi kumar, rawatbhata) हम एक अंधेरी खान में जी रहे हैं हम क … more →
विनय wrote 1 year ago: बोल तुझे इक हर्फ़ में कैसे लिख दूँ तस्वीर नहीं बनती कभी हर्फ़ों से… तू रोशनी और यह तन्हाई अंधेरा … more →
विनय wrote 1 year ago: बारहा पिरोये हैं कई ज़ख़्म साँस के एक ही धागे में टुकड़े-टुकड़े बिखरी हुई ज़िन्दगी बहुत नज़दीक़ लगी है त … more →