मैं कब कहता हूं जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, मैं कब कहता हूं जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने ? कांटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है, मैं कब कहता हूं वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने ? मैं कब… more →
वक़्त का ये परिंदा रुका है कहाँ!Himanshu Pandey wrote 13 hours ago: ’अज्ञे्य’ अज्ञेय का काव्य किस विधा से प्राणवान हुआ है, यह मौन, सन्नाटा बुनने वाला कवि किस तरह काव्य … more →
PRIYANKAR wrote 4 months ago: अज्ञेय की एक कविता मैंने आहुति बन कर देखा मैं कब कहता हूं जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, मैं … more →
संपादक- मिथिलेश वामनकर wrote 1 year ago: सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय” हम नदी के द्वीप है। हम नही कहते कि हमको छोड क … more →
PRIYANKAR wrote 1 year ago: ( 1911-1987 ) अज्ञेय की एक कविता हंसती रहने देना जब आवे दिन तब देह बुझे या टूटे इन आँखों को हँसत … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: मैं कब कहता हूं जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, मैं कब कहता हूं जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने ? का … more →
Rewa Smriti wrote 2 years ago: मैं ने देखा एक बूँद सहसा उछली सागर के झाग से; रंग गई क्षणभर, ढलते सूरज की आग से। मुझ को दीख गया: सून … more →
Rewa Smriti wrote 2 years ago: कितनी नावों में कितनी बारकितनी दूरियों से कितनी बार कितनी डगमग नावों में बैठ कर मैं तुम्हारी ओर आया … more →
Rewa Smriti wrote 2 years ago: खोज में जब निकल ही आया सत्य तो बहुत मिले । कुछ नये कुछ पुराने मिले कुछ अपने कुछ बिराने मिले कुछ दिखा … more →