अश्क़ गिनता है मेरे आज मुनाफ़े की तरह ज़िंदगी आँखों से गुज़रती है जनाज़े की तरह आज वो ही दर मुझे लगता है बुतखाने सा कभी करता था इबादत जहां काबे की तरह जिससे मरासिम थे कभी दिल-ओ-जाँ की तरह वो शख़्स देखे है म… more →
इक शायर अंजाना सा...Rohit Jain wrote 1 year ago: अश्क़ गिनता है मेरे आज मुनाफ़े की तरह ज़िंदगी आँखों से गुज़रती है जनाज़े की तरह आज वो ही दर मुझे लगता है … more →