सहर-ब-सहर1 मैं ढूँढ़ता रहा शुआएँ2 कहाँ छिप गयीं नूर-सी रोशन निगाहें न कोई घर रहा मेरा न कोई ठिकाना मेरी मंज़िल तो बन गयीं अब ये राहें है जो दर्द सो अब तन्हाई से है मुझे असरकार हों, कुछ काम आयें दुआएँ3 … more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 8 months ago: सहर-ब-सहर1 मैं ढूँढ़ता रहा शुआएँ2 कहाँ छिप गयीं नूर-सी रोशन निगाहें न कोई घर रहा मेरा न कोई ठिकाना म … more →