विनय wrote 1 year ago: मैं ज़हर का असर ढूँढ़ता फिरा वह शामो-सहर ढूँढ़ता फिरा जिस बाज़ार में ग़म बिकते हों उसे दिनो-दोपहर ढूँढ … more →
विनय wrote 1 year ago: दिल पर होने लगा इक अंजाना असर खोने लगी है हर शाम मेरी नज़र गौर से कभी उसको देखा नहीं फिर भी पहचान लूँ … more →
विनय wrote 1 year ago: हर गली हर कूचा दर-ब-दर ढूँढ़ते हैं हम अपनी दुआ में असर ढूँढ़ते हैं तुम देखकर हँसते हो मुझे और हम तेर … more →