वो अपने ज़ोम में था, बेख़बर रहा मुझसे उसे गुमाँ भी नहीं, मैं नहीं रहा उसका (ज़ोम-pride / बेख़बर-unaware / गुमाँ- suspicion, doubt)… more →
क्या बात हैSatish Chandra satyarthi wrote 10 months ago: रचनाकार: अहमद फ़राज़ ख़्वाब मरते नहीं ख़्वाब दिल हैं न आँखें न साँसें के जो रेज़ा-रेज़ा हुए तो बिखर … more →
Mahua wrote 1 year ago: वो अपने ज़ोम में था, बेख़बर रहा मुझसे उसे गुमाँ भी नहीं, मैं नहीं रहा उसका (ज़ोम-pride / बेख़बर-unaw … more →