ग़म-ए-हस्ती को कोई अज़गार मिल जाये और कुछ नहीं कोई इन्तेज़ार मिल जाये ज़िंदगी साहिलों पर अटकी हुई है अब मुझे कोई मझधार मिल जाये शरीफ़ों की बस्ती में दिल नहीं लगता सच्चा अब कोई गुनहगार मिल जाये ये खाली दीवा… more →
इक शायर अंजाना सा...Rohit Jain wrote 1 year ago: ग़म-ए-हस्ती को कोई अज़गार मिल जाये और कुछ नहीं कोई इन्तेज़ार मिल जाये ज़िंदगी साहिलों पर अटकी हुई है अब … more →