ग़म-ए-हस्ती को कोई अज़गार मिल जाये और कुछ नहीं कोई इन्तेज़ार मिल जाये ज़िंदगी साह… more →
Rohit Jain wrote 6 months ago: ग़म-ए-हस्ती को कोई अज़गार मिल जाये और कुछ … more →
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