सौंधी हुई एक खु़शबू मेरी आँखों में आकर सो गयी है कभी भर जो आती है आँख सारा मंज़र महका देती है… तुम्हारे बिन लम्हों की गलियों में सदियों का फ़ासला तय कर रहा हूँ भटक रहा हूँ तुम्हारा नाम तुम्हारा नि… more →
तख़लीक़-ए-नज़ररवि कुमार, रावतभाटा wrote 8 months ago: हमारी आंखें लुप्त हो रही हैं (a poem by ravi kumar, rawatbhata) हम एक अंधेरी खान में जी रहे हैं हम क … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: अपने शहर पर इतना नहीं इतराओ कि फिर पराये लगने लगें लोग सभी कभी यह गांव जितना छोटा था तब न तुम थे यहा … more →
Amarjeet Singh wrote 1 year ago: ऐसी आंखें नही देखी, ऐसा काजल नही देखा, ऐसा जलवा नही देखा, ऐसा चेहरा नही देखा, जब ये दामन की हवा ने, … more →
विनय wrote 2 years ago: सौंधी हुई एक खु़शबू मेरी आँखों में आकर सो गयी है कभी भर जो आती है आँख सारा मंज़र महका देती है… … more →