हिंदी ब्लाग जगत के कुछ ब्लाग लेखक अंतर्जाल पर वैसी ही गुटबाजी देख रहे हैं जैसी कि सामान्य रूप से बाहर देखने को मिलती है। यहां हम इस बात पर विचार नहीं करेंगे कि क्या वाकई कोई गुटबाजी है या नहीं बल्कि … more →
दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिकादीपक भारतदीप wrote 1 month ago: हिंदी ब्लाग जगत के कुछ ब्लाग लेखक अंतर्जाल पर वैसी ही गुटबाजी देख रहे हैं जैसी कि सामान्य रूप से बाह … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: माला फेरै कह भयो, हिंरदा गाठि न खोय। गुरु चरनन चित राखिये, तो अमरापुर जोय।। माला तो कर में फिरै, ज … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः। स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः।। नीति विशारद चाणक्य कहते ह … more →
दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: नीति विशारद चाणक्य कहते हैं आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः। स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः … more →
दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: नीति विशारद चाणक्य कहते हैं आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः। स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः … more →
योगेन्द्र wrote 8 months ago: विगत इक्कीस अक्टूबर के दैनिक वार्तापत्र ‘हिन्दुस्तान’ के मुखपृष्ठ पर एक समाचार देखने को मिला, शीर्षक … more →
दीपक भारतदीप wrote 10 months ago: रहिमन उजली प्रकृति को, नहीं नीच को संग करिया वासन कर गहे, कालिख लागत अंग कविवर रहीम कहते हैं कि जिनक … more →
दीपक भारतदीप wrote 10 months ago: 1.आज के युग में अर्थ की प्रधानता है और धन संचय प्रमुख आधार है। धन संचय हर मनुष्य के लिये आवश्यक है … more →
दीपक भारतदीप wrote 12 months ago: इस प्रथ्वी पर जीवन अपनी सहज धारा से बहता जाता है। अनेक आपदायें इस प्रथ्वी पर आती हैं पर फिर सब कुछ स … more →
दीपक भारतदीप wrote 12 months ago: इस सप्ताह मैंने कोई ऐसा पाठ या रचना नहीं लिखी जिसकी चर्चा की जा सके। वजह यह रही कि बरसात के मौसम में … more →
अजीत कुमार मिश्रा wrote 1 year ago: महोदय, मुझे भी कई बार कलकत्ता जाने का सौभाग्य प्राप्त हुया और हर बार मैं कालीघाट मंदिर में भी गया पर … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: १.इन्द्रियों के विषयों-रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श-में विद्वानों को कभी आसक्त नहीं होना चाहिए. विषय … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: रहिमन नीचन संग बसि, लगत कलंक न काहि दूध कलारी कर गाहे, मद समुझै सब ताहि कविवर रहीम का कथन है कि नीच … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: गुन ते लेत रहीम जन, सलिल कूप ते काढि कूपहु ते कहुं होत है, मन काहु को बाढि कविवर रहीम कहते हैं … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: चतुराई क्या कीजिए, जो नहिं शब्द समाय कोटिक गुन सूवा पढै, अन्त बिलाई खाय संत शिरोमणि कबीरदास जी कह … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: १. जो व्यक्ति ऐसे लोगों को दंड देता है जिन्हें दंड नहीं देना चाहिए तथा जिनको देना चाहिऐ उनको नहीं द … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: मथत मथत माखन रही, दही मही बिलगाव रहिमन सोई मीत हैं, भीर परे ठहराय कविवर रहीम कहते हैं कि जब दही को ल … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: १.जिस देश में मूर्खों का सम्मान नहीं होता, अन्न संचित रहता है तथा पति-पत्नी में झगडा नहीं होता वहाँ … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: 1.किसी भी व्यक्ति का जहाँ सम्मान न हो उसे त्याग देना चाहिए. क्योंकि बिना सम्मान के मनुष्य जीवन जीने … more →