कभी बैठकर अकेली,मैं सोचती रहती हूँ हर वक़्त किसे मैं खोजती रहती हूँ | मेरे सारे अपने आसपास ही तो है कौन गुमशुदा,जिसे तलाशती रहती हूँ | घर लौटकर आए है सभी लोग पलक बंद कर,किसकी राह देखती रहती हूँ | जानत… more →
mehekshreesh k. pathak wrote 1 month ago: हर आहट, वो सरसराहट लगती है, जैसे डाल गया हो डाकिया; चिट्ठी दरवाजे के नीचे से. अब, हर आहट निराश करती … more →
Maheep Saraf wrote 4 months ago: कुछ जादू सा हे आज इन हवाओं में, जानी पहचानी सी सरगम हे इन सदाओं मे जाने क्यों तेरी आहट सी लगती हे ये … more →
विनय wrote 1 year ago: और दाँव अपनी जाँ का किसने लगाया होगा फिर इश्क़ ने फ़रहाद कोई बुलाया होगा यूँ ही नहीं बिगड़ता है कोई कि … more →
विनय wrote 1 year ago: यह कोरे काग़ज़ करते हैं दिल की बात जैसे यह कोरे हैं वैसे मेरे दिन-रात अपनी मुलाक़ात कब मुकम्मल हुई थी द … more →
विनय wrote 1 year ago: जब-जब सनम तेरी यादें आती हैं कैसे कहें कितना तन्हा कर जाती हैं रोते हैं सब से छिपकर अँधेरों में ख़ुद … more →
विनय wrote 1 year ago: तेरी यादों के साये तले जाने हम- कितनी दूर तक चले क्या ख़बर कब… थकते क़दमों की शाम ढले जाने कब प … more →
mehhekk wrote 1 year ago: कभी बैठकर अकेली,मैं सोचती रहती हूँ हर वक़्त किसे मैं खोजती रहती हूँ | मेरे सारे अपने आसपास ही तो है … more →