चले हैं आज ज़माने को आज़माये हुए ये देखो खून में अपने ही हम नहाये हुए न जाने मुझको हुआ कौन सा मक़ाम हासिल लुटा के घर भी चला हूं मै सर उठाये हुए ना उसकी ख़ता थी न थी ख़ता मेरी निकल रहे हैं मगर हम नज़र चुराये… more →
इक शायर अंजाना सा...Rohit Jain wrote 1 year ago: चले हैं आज ज़माने को आज़माये हुए ये देखो खून में अपने ही हम नहाये हुए न जाने मुझको हुआ कौन सा मक़ाम हास … more →