यह बीते हुए लम्हों का शोर है या तन्हाई के ग़म की ख़ामोशी दिल को कुछ शोर जान पड़ता है मगर वह कानों में क्यों नहीं उसने इजाज़त नहीं दी है हमें उन लम्हों को दोबारा पढ़ने की गुज़रें है वह कभी इधर से यह बात भ… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: यह बीते हुए लम्हों का शोर है या तन्हाई के ग़म की ख़ामोशी दिल को कुछ शोर जान पड़ता है मगर वह कानों में … more →