यक़ीनन तुम्हारे हुस्न पे लाखों मरते होंगे मगर जो तुम पर मिट गया वह ‘नज़र’ है मेरी इब्तिदा तुम हो, मेरी इन्तिहाँ तुम हो! इब्तिदा= beginning, start, इन्तिहाँ= end, zenith शायिर: विनय प्रजापति … more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: यक़ीनन तुम्हारे हुस्न पे लाखों मरते होंगे मगर जो तुम पर मिट गया वह ‘नज़र’ है मेरी इब्तिदा … more →
विनय wrote 1 year ago: खोया-खोया फिरता हूँ तेरे बिना ज़िन्दगी तू जो मिल जाये मुझे सँवर जाये ज़िन्दगी तू नहीं तो कुछ नहीं कुछ … more →