तन्हाई यूँ ढूँढ़ती है मुझे जैसे मेरी सदा तुम्हें जो दीवारें ख़ुद-ब-ख़ुद गिरती हैं मैं कैसे चुनावाऊँ उन्हें मैं बद से बदतर हुआ जाता हूँ याद कर-करके तुम्हें ख़िज़ाँ भी ख़ुशरंग हुई जाती है खुष्क पत्ते पहन… more →
तख़लीक़-ए-नज़रpryas wrote 1 year ago: कुछ और लिखने का प्रयास किया है. कृपया मेरी गलतियाँ सुधारें. ~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~- … more →
विनय wrote 1 year ago: तन्हाई यूँ ढूँढ़ती है मुझे जैसे मेरी सदा तुम्हें जो दीवारें ख़ुद-ब-ख़ुद गिरती हैं मैं कैसे चुनावाऊँ … more →
mehhekk wrote 1 year ago: उन ओस की बूँदो का आना लालिमा की चुनर पूरब पर लहराए मंद मंद बहती ये शीतल हवाए खिली कुसुमीता मध्यम मुस … more →