मैं ईज़ा1 में पड़ा नदामत2 को तड़पता रहा जैसे शोला बुझती आग में भड़कता रहा मैं कमरे में बैठा खोया रहा तेरे ख़्यालों में और चौखट का दरवाज़ा खड़कता रहा जैसे कभी बरखा के बादल बरसते नहीं वैसे वो सारा दिन बर्… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: मैं ईज़ा1 में पड़ा नदामत2 को तड़पता रहा जैसे शोला बुझती आग में भड़कता रहा मैं कमरे में बैठा खोया रहा … more →