मैं चुराकर लाई हुं तेरी वो तस्वीर जो हमारे साथ तूने खींचवाई थी मेरे जाने पर। में चुराकर लाई हुं तेरे हा थों के वो रुमाल जिससे तूं अपना चहेरा पोंछा करती थी। मैं चुराकर लाई हुं वो तेरे कपडे जो तुं पहना … more →
रज़िया "राज़""रज़िया" wrote 7 months ago: मैं चुराकर लाई हुं तेरी वो तस्वीर जो हमारे साथ तूने खींचवाई थी मेरे जाने पर। में चुराकर लाई हुं तेरे … more →
"रज़िया" wrote 1 year ago: ये शहर अब वों शहर नहीं, न जाने किसकी नज़र लगी?(2) … more →
"रज़िया" wrote 1 year ago: हमारा घर मेरा घर, हमारा घर, हम सब का घर। बडी, मंझली, छोटी और मुन्ने का घर । जहाँ हम पले, जहाँ हमने … more →
"रज़िया" wrote 1 year ago: अय धूप की किरन! तू हर सुबह मेरे घर की खिड़की पर दस्तक देती थी. छोटी-छोटी किवाडों से मेरे घर में चली … more →