मुझसे भी रकीबों की तरह बात ना करो मेरी ही बाज़ी में मुझे तुम मात ना करो इक बार तो कह दो मुझे तुम अपना हालेदिल मुझे क़त्ल इन्तेज़ार में दिन रात ना करो ये खुल के शरमाना भी भला कैसी अदा है ज़ुल्मोसितम पर ही … more →
इक शायर अंजाना सा...Rohit Jain wrote 1 year ago: मुझसे भी रकीबों की तरह बात ना करो मेरी ही बाज़ी में मुझे तुम मात ना करो इक बार तो कह दो मुझे तुम अपना … more →