एक गिरह ज़ुबाँ में, सब के होती है वक़्त लगते ही लफ़्ज़ अटका देती है लोग क्या समझते हैं मैं ना-पाक हूँ या मौक़ापरस्त! अजब माहौल है, इस मेरी जा का कि मीर जैसा ज़हन किसी का नहीं एक मज़ाक़ लगता हूँ, या लोग मुझको … more →
तख़लीक़-ए-नज़ररवि कुमार, रावतभाटा wrote 6 months ago: पक चुकी आँखों की ताबिश (a poem by ravi kumar, rawatbhata) ००००० जब कलम से रिसता लहू जमने लगा हो सफ़हा … more →
दीपक भारतदीप wrote 6 months ago: नजरें फेरकर वह चले जाते हैं। देखने में लगते हैं हमसे बेपरवाह पर हकीकत यह है कि हमारी आंखों में उनको … more →
विनय wrote 2 years ago: एक गिरह ज़ुबाँ में, सब के होती है वक़्त लगते ही लफ़्ज़ अटका देती है लोग क्या समझते हैं मैं ना-पाक हूँ या … more →
विनय wrote 2 years ago: एक पानी में भीगी हुई किताब जाने किसने? सूखने के लिए रख दी है धूप में जैसे जैसे नमी भाप बनती है पन्ने … more →