अपने दर्द का बयां न कभी न करना बन जायेगा तमाशा। अपनी ही गमों ने लोग हैरान हैं अपनों की करतूतों से परेशान है कर नहीं सकते किसी की पूरी आशा। किसी इंसान को कुदरत हीरे की तरह तराश दे अलग बात है इंसा… more →
दीपक भारतदीप की ई-पत्रिकादीपक भारतदीप wrote 49 minutes ago: अपने दर्द का बयां न कभी न करना बन जायेगा तमाशा। अपनी ही गमों ने लोग हैरान हैं अपनों की करतूतों … more →
दीपक भारतदीप wrote 54 minutes ago: कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन को लेकर जोरदार सम्मेलन हो रहा है। इसमें गैस उत्सर्जन को लेकर अनेक तरह … more →
दीपक भारतदीप wrote 15 hours ago: क्या देश में समाज से कभी जाति समाप्त हो सकती है? अनेक लोग दिन रात यह संदेश गाते फिरते हैं कि यहां जा … more →
दीपक भारतदीप wrote 16 hours ago: मृतिपण्डो जलरेखया वलचितः सर्वोऽप्ययं न नन्वणुः स्वांशीकृत्य स एवं संगरशतै राज्ञां गणैर्भुज्यते। ते द … more →
दीपक भारतदीप wrote 16 hours ago: गते शोको न कत्र्तव्यो भविष्यं नैव चिनतयेत्। वर्तमानेन कालेन प्रवर्तन्ते विचक्षणाः।। हिंदी में भावार् … more →
दीपक भारतदीप wrote 6 days ago: जो तुम भी चाहोगे इंसानी बुत बनकर बड़े कहलाओगे। सीख लो नटों के इशारों की डोर पर नाचना जमाने में … more →
दीपक भारतदीप wrote 6 days ago: अशिक्षितनयः सिंहो हन्तीम केवलं बलात्। तच्च धीरो नरस्तेषां शतानि जतिमांजयेत्।। हिंदी में भावार्थ-सिंह … more →
दीपक भारतदीप wrote 6 days ago: कुमिकीटवधोहत्या मद्यानुगतभोजनम्। फलेन्धनकुसुमस्तयमधैर्य च मलावहम्।। हिंदी में भावार्थ-कोई भी मनुष्य … more →
दीपक भारतदीप wrote 6 days ago: मासांहारी मानवा, परतछ राछस जान। ताकी संगति मति करै, होय भक्ति में हान।। संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 week ago: धर्म बन गयी है शय बेचा जाता है इसे बाज़ार में, सबसे बड़े सौदागर पीर कहलाते हैं. भूख, गरीबी, बे … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 week ago: सच कहते हैं जिंदगी के फैसले कभी जंग से नहीं होते। पर्दे के पीछे तय हो जाते फैसले ले देकर कटवाते है व … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 week ago: माशुका ने पूछा आशिक से ‘अगर शादी के बाद मैं मर गयी तो क्या मेरी याद में ताजमहल बनवाओगे।’ आशिक … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 week ago: हिंदी भाषा की चर्चा अक्सर विवादों के कारण अधिक होती है। विवाद यही कि हिंदी थोपी जा रही है या हिंदी व … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 week ago: अपनीतं सुनीतेन योऽयं प्रत्यानिनीषते। मतिमास्थाय सुदृढां तदकापुरुषव्रतम्।। हिंदी में भावार्थ-जो अन्या … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 week ago: कबीर सांई मुझ को, रूखी रोटी देय। चुपड़ी मांगत मैं डरूं, मत रूखी छिन लेय।। संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 weeks ago: जीभ स्वाद के कूप में, जहां हलाहल काम। अंग अविद्या ऊपजै, जाय हिये ते नाम। भावार्थ-संत शिरोमणि कबीरदास … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 weeks ago: प्राकृतिक का नियम है परिवर्तन! दिन हुआ है तो रात भी होगी। सूरज उगा है तो जरूर डूबेगा। धूप है तो अंधे … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 weeks ago: आदमी अपनी जिंदगी को अपने नज़रिये से जीना चाहता है पर जिंदगी का अपना फलासफा है। आदमी अपनी सोच के अनुसा … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 weeks ago: समाचार भी अब फिल्म की तरह टीवी पर चलते हैं। हास्य पैदा करने वाले विज्ञापनों के बीच दृश्यों में हिंसा … more →