दीपावली फिर टल गई (a poem by ravi kumar, rawatbhata) आफ़ताब का दम भरने वाले दिए की लौ से खौफ़ खा गए आखिर ब्लैकआउट के वक्त उनके ही घर से रौशनी के आग़ाज़ का जोखिम वे कैसे उठा सकते थे आफ़ताब के सपने संजोती उ… more →
सृजन और सरोकाररवि कुमार, रावतभाटा wrote 1 month ago: दीपावली फिर टल गई (a poem by ravi kumar, rawatbhata) आफ़ताब का दम भरने वाले दिए की लौ से खौफ़ खा गए आ … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 2 months ago: हरीश भादानी जी नहीं रहे. कल २ अक्टूबर को उनका निधन हुआ. जो उन्हें जानते हैं, वे सब जानते ही हैं. वे … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 2 months ago: ज़िंदगी का मुक़द्दस नग़्मा (a poem by ravi kumar, rawatbhata) मैं आऊंगा जब चाक हो जाएगी हर राह कि जब ह … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 2 months ago: आसमान फिर सिमट रहा है (a poem by ravi kumar, rawatbhata) आसमान जब भी उतरता है धरा पर उसके पास होते ह … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 2 months ago: फिर से लौटेंगे भेड़िए – रवि कुमार ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) एक कविता पोस्टर … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 3 months ago: अहम नाक़ाबिलियतों के बाबजू्द (a poem by ravi kumar, rawatbhata) जो अपना ज़मीर नहीं मार सकते वे इस मौजू … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 3 months ago: चाहे मुझे पागल करार दिया जाए (a poem by ravi kumar, rawatbhata) कोई यदि पूछेगा सबसे बेहतर रंग कौनसा … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 4 months ago: जिन्हें नज़ाकत से जिया है मैंने (a poem by ravi kumar, rawatbhata) मैंने जिद्दोजिहद की हर पल से और हा … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 4 months ago: मैं समन्दर के बिना कामिल नहीं (a poem by ravi kumar, rawatbhata) मेरी बुलन्दियों से हमेशा मुख़ालिफ़त र … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 5 months ago: शोला हो चुकी निगाहों के जरिए (a poem by ravi kumar, rawatbhata) मैं नींद खोजता रहा नींद एक ख़्वाब बिल … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 5 months ago: मेरे पास कई ख़्वाब हैं (a poem by ravi kumar, rawatbhata) मेरे पास कई ख़्वाब हैं ख़्वाबों के पास कई ताब … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 5 months ago: हमारे पास और शामें नहीं (a poem by ravi kumar, rawatbhata) मैंने उससे कहा मुझे तुमसे कुछ कहना है उसन … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 6 months ago: पक चुकी आँखों की ताबिश (a poem by ravi kumar, rawatbhata) ००००० जब कलम से रिसता लहू जमने लगा हो सफ़हा … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 6 months ago: मैं हर शै पर छाता गया (a poem by ravi kumar, rawatbhata) जब मैं सुलगा सुनहरी रेत में छिपी सुर्ख़ चिंग … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 6 months ago: अच्छा लगता है (a poem by ravi kumar, rawatbhata) अच्छा लगता है बच्चों को खिलखिलाते देखना समन्दर को क … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 6 months ago: भूख एक बेबाक बयान है (a poem by ravi kumar, rawatbhata) भूख के बारे में शब्दों की जुगाली साफ़बयानी नह … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 7 months ago: हमारी आंखें लुप्त हो रही हैं (a poem by ravi kumar, rawatbhata) हम एक अंधेरी खान में जी रहे हैं हम क … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 8 months ago: मैं ख़ुदाओं के बीच सो रहा (a poem by ravi kumar, rawatbhata) उसने मुझसे ख़ुदा के नूर के बारे में पूछा … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 8 months ago: ज़माना ख़ौफ़ज़दा है हमसे (a poem by ravi kumar, rawatbhata) ज़माना परेशान है कि हमारे पुरसुकून चहरों पर प … more →