दिल के बोझ की गठरी संभल के उतारना जीत को दूर जाते देख कर ही हारना हारना मत इन आंसुओ से आसानी से हो सके तो इन्हे दिल में ही मारना. गठरी उतरी तो पल भर थकान मिट जायेगी फिर चाहोगे सहारा, सूनी आंखे थक जा… more →
Mahamiaswati's Blogरविकुल wrote 4 months ago: शहीदों के जिस्म पर लगेंगे कब तलक जख्म गहरे, कब तक बैठे रहेंगे निर्वाक लगाए सोच पर पेहरे, निर्दोश लहू … more →
रविकुल wrote 5 months ago: कविता हंस रही है और कवि रो रहा है! क्या होगा ऐसे देश की आवाम का, जिसकी सरहद का सिपाही सो रहा है !! … more →
रविकुल wrote 5 months ago: भ्रष्ट समाज का उत्कर्ष करो ! जीवन है संघर्ष संघर्ष करो !! मिटा डालो उग्रता के निशां, बदल डालो भ्रमित … more →
mequitnever wrote 5 months ago: आज मैं अपने डेस्क को ठीक कर रहा था और कहीं कोने से मेरे हाथ एक फोल्डर लगा | उस फोल्डर में रंगीन कगाज … more →
दीपक भारतदीप wrote 8 months ago: कुत्ता कहा तो क्या इनाम तो दिया आखिर गोरों ने दिया गुलाम की तरह व्यवहार किया तो क्या थप्पड़ मारकर सल … more →
mequitnever wrote 8 months ago: सफ़र की क्या मंजिल हो लहरों का क्या साहिल हो माझी का क्या नाव हो सपनो की क्या उड़ान हो देखते थे यह सब … more →
mahamiaswati wrote 12 months ago: दिल के बोझ की गठरी संभल के उतारना जीत को दूर जाते देख कर ही हारना हारना मत इन आंसुओ से आसानी से हो … more →
mahamiaswati wrote 12 months ago: कौन कहता है ज़माना बदल रहा है? आज भी पीड़ा अग्नि में मनु-मन जल रहा है. आज भी हम वक्त से मजबूर हैं खु … more →
विकास परिहार wrote 1 year ago: होटल के प्रांगण में चल रहा था जश्न झूम रहे थे लोग लिये डांडिया की स्टिक हांथों में, गहरी लिपस्टिक लग … more →
24july2008 wrote 1 year ago: आँखों की यह निर्झर धारा थमने दो दर्द अगर यह जमता है तो जमने दो क्यो रोती हो जब जन्मदाता ही मौन है स … more →